म्हारो कोई कागज आयो?

मैं उन दिनों ग्यारहवीं का विद्यार्थी था जब मुझे आत्मीजनों से पत्र द्वारा संवाद करने का शौक जागृत हुआ।

मैं सींथल पढ़ा करता था, वहां मेरा ननिहाल था। यह बात 1989 की है। जब जस्सुसर गेट स्थित बिनाणी भवन में अकादमी का विशाल साहित्यकार सम्मेलन हुआ था। मैं ग्यारहवीं का विद्यार्थी था ऐसे में मेरी उसमें प्रतिभागिता की कोई संभावना ही नहीं थी। लेकिन महापुरूषों ने कहा है कि जहां चाह वहां राह। मैं भी सींथल से बीकानेर आ गया और छात्रावास के कुछ मित्रों के साथ सांयकाल नियत स्थान पर पहुंच गया। हालांकि गांगी कोई गीतों में नहीं थी फिर भी कवि होने का भ्रम तो था ही अतः हुंसरड़पणै से श्रोताओं में सबसे आगे बैठ गया। हां, एक बात मैं आपको बताना भूल गया कि मेरी एक डिंगल रचना ‘जागती जोत’ 89 के एक अंक में छप चूकी थी सो बांदरी ही अर बिच्छू खायग्यो वाली स्थिति होनी ही थी। 
वहां पर राजस्थान के कई दिग्गज साहित्य मनीषी आए हुए थे। उनमें डॉ मनोहर शर्मा, डॉ शक्तिदानजी कविया, सदीक साहब, भीम पांडिया, आदि आदि।

मैंने जैसे तैसे ही मान न मान मैं तेरा महमान की तर्ज पर कविया साहब को मेरे एक मित्र द्वारा कहलाया कि एक कविता प्रस्तुत करने की बायड़ मेरे भी है। कविया साहब की सदाशयता कहिए कि उन्हें जैसे ही मेरा नाम बताया गया तो उन्होंने पूछा कि दासोड़ी के किसी एक कवि का त्रिभंगी छंद जागती जोत में अभी पिछले अंक में ही छपा है!! हां वे शायद वृद्ध होंगे। ऐसा आनुप्राशिक छंद है?

मेरे मित्र ने बताया कि “नहीं, किसी वृद्ध की नहीं अपितु वो गिरधर की ही रचना है!!” वे अत्यंत प्रसन्न हुए। हालांकि रचना में अनुप्राशों के दोटों के अलावा कुछ नहीं था लेकिन कवियां साहब मेरी फेरी भलांई मत घालो पण मोडै री मठोठ तो देखो की बात से ज्यादा खुश हुए और उन्होंने आदरणीय सदीक साहब जो कि संचालन कर रहे थे को कहा कि इस बच्चे को भी बोलाओ।

मैंने मेरा चित इलोल गीत पढा। गीत का व्याकरण मेरे ध्यान में नहीं था लेकिन भैरजी आसिया का गीत किनिया मेह रे घर रूप किनिया, धरै सुर धणियाप। मुझे याद था उसकी लय पकड़कर बनाया था। गीत शुद्ध बना। कविया साहब सहित तमाम मनीषियों को पसंद आया।

घाव में घोबा तब और हो गया जब कविया साहब के संयोजन में रैनबो हाउस जोधपुर एक कथाकार समारोह होने वाला था और उसमें कविया साहब ने मुझे आमंत्रित कर दिया फिर तो सेठां वाल़ो घणो चढीजणो हुयग्यो।

जैड़ो कै कैताणो है कै बाई रै हार न कोई डोर!  काजल़ माथै जोर!! या यूं कैयदां कै “थाकोड़ो वाणियो बही फिरोल़ै” री गत मन विलमाने के लिए आज घर पर पुरानी फाइलें फिरोल रहा था कि उनमें कई ऐसे कागद मिले जिन्हें पढकर आनंदित हुआ।
ठा.अक्षयसिंह जी रतनू, डॉ मनोहरजी शर्मा, जसकरणजी खिड़िया, बद्रीदानजी गाडण, ओंकारसिंहजी बाबरा, रेवंतदानजी चारण, व डॉ शक्तिदानजी कविया आदि मनीषियों को मेरे जैसे अकिंचन ने पत्र लिखे और इन उदार हृदय लोगों ने जिन आत्मीयता से प्रत्युत्तर दिए उससे लगता है कि वास्तव में ये बड़े मिनख थे और हैं।

लेकिन मैं उस पत्र को आपसे साझा कर रहा हूं जो मेरे पास साहित्यिक दृष्टि से पहली बार आया-

जोधपुर
24/2/89
प्रिय गिरधारीदान जी रतनू
दि.5-6 मार्च 89 (रविवार व शनिवार) को जोधपुर में एक कथाकार समारोह हो रहा है। साहित्य अकादमी की तरफ से आयोज्य इस समारोह का संयोजक मैं हूं। आपसे अनुरोध है कि इसमें भाग लेकर कवि गोष्ठी में अपनी विशिष्ट प्रतिभा का परिचय दें। 5/3/89 को प्रातः जोधपुर पहुंचें, क्योंकि उसी दिन 11बजे उद्घाटन होगा। स्थान है-रेनबो हाउस, पावटा सी रोड़ (महामंदिर रोड़ पर)
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में।
शक्तिदान कविया
पोलो 2जोधपुर(राज.)
…………………
आने जाने का रेलभाड़ा आपको
भेंट कर दूंगा।
भोजन, आवास
की वहीं व्यवस्था है।
………..
श्री गिरधारीदान जी रतनू
सी/ओ
मुरल़ीदान/मेहरदान वीठू
पो.सींथल, वाया नापासर
जि.बीकानेर

यहां मुझे नारायणसिंह जी शिवाकर, डूंगरदानजी आसिया, जहूरखां मेहर, नृसिंह जी राजपुरोहित, बैणीदानजी लोल़ास प्रभृति सज्जनों के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। यहीं पर कविया साहब की शिष्य मंडली के मेधावी प्रतिनिधि दलपतसा मथाणिया से परिचय हुआ। मैंने वहां पर बरसाल़ै रा रे़णकी छंद सुनाया था, जो कविया साहब की रचना-

ऐरावत चढत सुरापत ओपत
श्वेत श्याम पट पीत सही।
निरखत अत हरखत दरखत नाचत
कुदरत गत नह जाय कही।
सांभेल़ो सजत रजत झड़ सांप्रत
घुर-घुर नौबत बजत घणी।
आलीजो इन्द्र परण धण आवण
बसुधा दुलहण वेस बणी।
जिए सजी सुहागण इन्द्र तणी।

को आकाशवाणी जोधपुर पर सुनकर तथा उसकी लय पकड़कर बनाई थी को सुनाया। कुछ तरुण होने के कारण तो कुछ छंद की बणगट देखकर सभी ने सराहा लेकिन आदरणीय शिवाकरजी मेरी काव्य कला से मुग्ध हो गए। उस समय ही उनकी कालजयी कृति वीर दुर्गादास सतसई आई थी। उल्लेखनीय है कि उसकी अप्रकाशित पांडुलिपि पर ही अकादमी ने अपना सर्वोच्च सूर्यमल्ल मीसण पुरस्कार दिया था।

शिवाकरजी ने मुझे अपने हस्ताक्षरों से युक्त सतसई उपहार स्वरूप दी थी। मुझे ऐसी कृति प्राप्त कर अत्यंत खुशी हुई।
फिर तो पुटिये के पांवों की तरह मुझे भी पक्का भ्रम हो गया कि अपन भी कवि हैं उसी प्रकार जिस प्रकार किसी ने एक तथाकथित समझदार से पूछा- थांरै गांम में समझणा कितरा है?
उसने कहा- एक फलाणसिंह एक ढिकड़सिंह अर थोड़ोक बहम म्हारो ई करै!!

जोधपुर वाली खुमारी उतरी भी नहीं थी कि ओंकारसिंहजी लखावत का पत्र अजमेर से आ गया कि आपको डिंगल कवि के रूप में अजमेर आमंत्रित किया जाता है।

यहां वो ही हुआ जो हिल़ी-हिल़ी लांकड़ी, अड़क मतीरा खाय। वहां पहुंचा।

भवन की उस समय की व्यवस्था कैलासदान जी कविया बिराई देख रहे थे। बड़ी-बड़ी रोबदार मुंछे, लंबा छरहरा बदन और काम के प्रति समर्पण। वे एक रजिस्टर में आगुन्तकों का रजिस्ट्रेशन कर रहे थे। मैंने सोचा कि शायद कवियों आदि के नाम बगैरह लिख रहें होंगे। क्योंकि बारठजी वाल़ी परड़ थी। किसी ने बारठजी से पूछा कि-

बारठजी परड़ किता बैम ब्यावै?
कै भाई म्है ओ धन धारियो कोनी!!

यही स्थिति मेरी थी। मुझे पता नहीं था कि सामाजिक कार्यक्रमों की व्यवस्था सामूहिक होती है। मैंने तो पहला कार्यक्रम ही अकादमी का देखा था। मैंने सोचा नाम लिखालें !! क्या पता बिना नाम काव्य पाठ में नंबर आए कि नहीं।
मैंने भी पंजीकरण के लिए कहा तो उन्होंने पूछा नाम?
गिरधरदान
गांम?
दासोड़ी
उन्होंने बड़ी आत्मीयता से कहा-
तीस रुपया जमा करावो!!
मैंने कहा
ऐ भल़ै कां रा?
उन्होंने कहा-
आ रजिस्ट्रेशन फीस है!!
आप अबार भोजन करोलानीं उणरा,
रात रा पोढोलानी उणरा!!
म्है कह्यो सा भोजन ई पईसां सूं?
हां, आपां अठै कोई रा मेहमान थोड़ा ई हां!!
म्है देखियो शायद इणांनै ठाह नीं है कै हूं कुण हूं अर किणरै कह्यै सूं आयो हूं!! क्यूंकै आंधो अर अजाण बराबर हुवै।
म्है कह्यो-
सा हूं तो कवि हूं!! लखावत साहब रै बुलावै माथै आयो हूं। म्हारै सूं कैड़ा तीस रुपया?

कैलाससा नै कहा-
आप कांई कवि हो! अठै तो बगायो भाठो कवि माथै पड़ै !! अर सगल़ा लखावत साहब रै बुलायोड़ा ईज आया है!!
समझ्या बन्ना। अबै आप तीस रुपया बगसावो।

म्है सोचियो कठै आय’र पजियां हां।
आगै कुवो अर लारै खाई वाली बात हो गई न देते बना और न ही ना दे सका। पैसे आएं कहां से हमें कोई जेब खर्ची तो मिलती नहीं थी और खर्चा किस चीज का दें मैं तो पढ़ता भी ननिहाल था!! पैसा आए भी कहा से काठोज भाठै सूं करड़ी होती है!!
मैंने सोचा कि यह कैसा कवि सम्मेलन है? वहां डेढ सौ दिए और यहां तीस ले रहे हैं!! यहां तो वो ही बात हो रही है-

मामो आयो अर मा हंसी
देयग्यो दस अर लेयग्यो अस्सी!!

आयंदा सौगंध ले लेनी है ऐसे कवि सम्मेलन की क्योंकि उन दिनों घर बाल़र तीर्थ करने की बात सीख नहीं पाया था। उस समय मंच पर राजस्थान के तमाम डिंगल के दिग्गज उपस्थित थे। उनकी पावन उपस्थिति व दर्शन किसी तीर्थ यात्रा की अनुभूति से कम नहीं थी। खैर..

कैलाशसा को मैं आज भी नहीं भूल पाया हूं। भूलता भी कैसे? दोरो कुट्योड़ो अर सोरो जीमायोड़ो याद रैवै पछै कैलाससा तो चांदी रो जूत चेपियो हो!!

89 के बाद कैलाशसा से मेरा कभी मिलना नहीं हुआ लेकिन पिछले साल विजय विनोद के संपादन के सिलसिले में मुझे उन्होंने फोन किया-

म्हैं कैलासदान कविया बिराई बोलूं!!
मैंने पूछा कि आप तो अजमेर विराजतें हैं? वो ही या..
उन्होंने कहा हां वो ही।
मैंने कहा- हां जाणूं आपनै!!
उन्होंने बड़े आश्चर्य से पूछा- सर ! मुझे आप कैसे पहचानतें है?
सर ! म्हैं आपनै नीं भूल सकूं, और मैंने उन्हें अजमेर वाला पूरा विवरण सुनातें हुए कहा कि हुकम मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि-

कै तो जीयो जीवै कोनी!
अर जीवै तो इमरत पीवै कोनी!!

तो वे खिलखिलाकर हंसते हुए बोले सर मैंने अजमेर छोड़ दिया है।

क्रमशः

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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