म्है देता कै लेता ?

मेवाड़ रै महाराणा जगतसिंह जी रै भरियै दरबार में आय खारोड़ा (अमरकोट, सिंध) रा चारण नेतसी देथा अर खेतसी देथा महाराणा नैं मुजरो कियो अर अरज करी कै ‘म्हें तीन घोड़ा लाया हां।’ दरबार पूगतो सम्मान देय आपरै राजकवि रै समरूप सम्मानित खेमसूरजी सौदा सूं ओल़खाण कराई। खेमसूरजी मेवाड़ रै महाराणा रा मानीता कवि। हाथ में स्वर्ण जड़ित चुटियो राखै। कोई पण चारण उणांं सूं जंवारड़ा करण नैं हाथ आगो करतो तो खेमसूरजी आपरा हाथ नीं मिलाय र आपरी चुटियो उण चारण रै हाथ सूं लगायर आपरो मोटापणो दरसावता, अर चारण ई महाराणा रा मानैतड़ अर मोटा मिनख मानर आपरा हाथ चुटियै रै लगायर जंवारड़ां रो संतोष मानता।

ज्यूं ई नेतसी अर खेतसी री ओल़खाण खेमसूरजी सौदा सूं होई तो नेतसी आदर सहित जय माताजी री कैयर आपरा हाथ खेमसूरजी कानी बढाया तो उठीनै सूं खेमसूरजी आदतन आपरो सोनै जड़ित चुटियो आगो कियो। हाथ री जागा चुटियो देखर धाट रै देथा रो सम्मान जागियो अर इणां आपरै हाथां में झाल्योड़ी झाड़खै री तड़ी चुटियै रै लगाई।

ज्यूं तड़ी चुटियै रै लागी तो खेमसूरजी रो अहम जागियो अर त्रिसूल़ो चढायर पूछियो – ‘हां तो आप कांई जात बताई आपरी?’

इण सहजता सूं कैयो – ‘हुकम म्हें खारोड़ै रा देथा!’

खेमसूरजी रो अहम हबोल़ा लेवै हो, उणां कैयो – ‘अच्छा-अच्छा आप तो देथा नहीं देता हो।’

नेतसी पाछो कैयो ‘हुकम आप शायद ऊंचो सुणो!, म्हें तो देथा हां।’

उणां उणी तेवर में पाछो कैयो – ‘नीं-नीं आप देथा नीं देता ईज हो।’

खैर। महाराणा पूछियो बारठजी घोड़ां रो मोल बतावो? नेतसीजी कैयो कै ‘एक-एक घोड़ै रा दस हजार रुपिया।’

दरबार पूछियो कै इतरो आकरो मोल तो इणां री कांई विशेषता है? नेतसीजी कैयो कै इणां मांय सूं किणीपण एक घोड़ै रा सुम (खुर) खाडै में देयर च्यारां कानी सीसै पायर कोई सवार माथै चढर एडी लगावेला तो घोड़ो जिण ताकत अर वेग सूं उछल़ेला उणसूं घोड़ै री बधताई परख लीजो।

ओ परीक्षण करीज्यो तो घोड़ै रा च्यारूं सुम खाडां में रैया अर घोड़ो फदाक दैणी आगो जा पड़ियो। ओ अद्भुत पराक्रम देखर महाराणा कैयो ‘एक घोड़ो खरीद लूं ला अर इण एक रा पूरा दाम दे दूंला पण तीसरै घोड़ै नै म्है खरीदण री स्थिति में नीं हूं।’

आ बात सुणर देथा नेतसी कैयो ‘हुकम जे हिंदवा सूरज ई ओ घोड़ो खरीद नीं सकै तो पछै दूसरै बापड़ै री किणरी औकात!’ नेतसी उणी दरबार में हाजर खारी रा पंचायणजी मोतीसर नैं ‘कैयो पांचाजी मुजऱो करो ओ घोड़ो थांरो!’ पंचायणजी नै घणमोलै घोड़ै माथै सवार करायर दोनां देथां भायां खेमजी सौदा नै कैयो ‘खेमजी म्हें देता कै लेता?’ खेमजी लचकाणा पड़तां कैयो ‘नहीं आप देता हो!’ उण बगत कवि पंचायणजी एक गीत कैयो जिणरो एक दूहालो-

नेता रहसी नाम, देथा दातारां तणा।
बण कायर बदनाम, मूंजीड़ा जासी मरै।।

पखां उजाल़ा पात खींढै तणा पोतरा,
जोड़ हमरोट चत्रकोट जेथा।
सेल सौदां तणै दिया तैं नेतसी,
दूथियां हजारी बाज देथा।।

जिको एक घोड़ो जगतसिंहजी खरीदियो हो बो बलूजी चांपावत नै भेंट कर दियो। इणी घोड़ै री पीठ सवार होय बलूजी आगरा रै किले सूं अमरसिंह री देह नै लाय इतियास में नाम अमर कियो अर वीरगति पाई। महाराणा रो अहसान बलूजी माथै रैयो जिको उणां देबारी रै जुद्ध में अदीठ रैय आपरी तरवार रै आपाण महाराणा री मदत कर घोडै रो मोल चुकायो।

संदर्भ- धरा सुरंगी धाट -डॉ शक्तिदान कविया
ढल़गी रातां!बहगी बातां!!2 सूं-गिरधर दान रतनू दासोड़ी

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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