म्है मरियां ई कोट भिल़सी !!

बीकानेर माथै जिण दिनां महाराजा सुजाणसिंहजी रो राज तो जोधपुर माथै अभयसिंहजी रो।

जोधपुर रै राजावां री कुदीठ सदैव बीकानेर माथै रैयी ही। उणां जद ई देखियो कै बीकानेर में अबार सत्ता पतल़ी है अथवा आपसी फूट रा बीज ऊग रैया है तो उणां बीकानेर कबजावण सारु आपरो लसकर त्यार राखियो।

ओ ई काम अभयसिंहजी कियो। ऐ ई बीकानेर माथै सेना लेय आया।

अभयसिंहजी री फौज रो डेरो बीकानेर रै पाखती लागो। महाराजा रो पख पतल़ो हो पण तोई केई सिरदार महाराजा रै पख में मरण मतै रैया, जिणसूं जोधपुर री पार नीं पड़ी अर उणां बीच-बचाव करर आपरा डेरा पाछा लदिया। इणमें जोधपुर री वीरता रै छींपो (कलंक) लागो अर नकसी (तौहीन) होई।

उण दिनां होल़ी आगला दिन हा अर उणां मनैगनै पूरी तय करली ही कै होल़ी बीकानेर नै जीतर मंगल़ावांला। इण खातर उणां होल़ी री अठै थापना ई करदी ही। पण बीकानेरियां री मरण त्यारी देख जोधपुर रो साथ होल़ी नै गाडां घाल बहीर होयो। बीकानेर सूं पैंतीस कोस आगा जायर नागौर कनै होल़ी मंगल़ाई। इण बात रो साखीधर शंभुदानजी रतनू (दासोड़ी) रो एक गीत उल्लेखणजोग है। जिणमें कवि लिखै कै – सूजै रै पोतरां नै वीकै रो पोतरां री वीरता रो ऐड़ो सिकताव लागो कै अभयसिंह बिनां लड़ियां ई आपरी थापित होल़ी नै गाडां-घाल पैंतीस कोस परिया जायर मंगल़ाई-

हुवो ताव सूजां इसो राव वीकाहरां,
झाट खग अजावत नकू झाली।
सीस गाडां तणै बैठ एकण समै,
होल़का कोस पैंतीस हाली।।

महाराजा सुजाणसिंहजी रै देवलोक होयां इणां रै पाट जोरावरसिंहजी बैठा पण राज में पड़ी कल़ै इणांनै ई शांति सूं नीं रैवण दिया।

चूरू ठाकर संग्रामसिंह माथै दरबार री कुठारगी (नाराजगी) ही सो दरबार सूं ए खंचिया (दूर) रैता अर भादरा ठाकर लालसिंह रै इणां सूं जिलो (आत्मीय संबंध) हो सो ऐ दोनूं मिल़र जोधपुर सूं अभयसिंह जी नै बीकानेर माथै एकर पाछा चढा लाया।

अभयसिंह जी जोधपुर सूं चढ देशनोक आय करनीजी रा दरसण किया अर देपावतां (करनीजी री संतान) माथै जोर दियो कै-
“वे ज्यूं बीकानेर राजावां सारु करनीजी सूं अरज करै उणीगत म्हारै खातर ई करै।”

पण चारणां मना कर दियो अर कैयो कै – “बीकानेर री रुखाल़ी कोई करनीजी म्हांरै कैणै सूं थोड़ी ई करै !! ओ तो इणांरो दियोड़ो राज है सो म्हांरी अरज री जरूत नीं पड़ै-

बीको बैठो पाट, करनादे श्रीमुख कैयो।
थारै रैसी थाट, म्हांरां सूं बदल़ै मती!!

अभयसिंहजी नै रीस आयगी अर उणां कैयो कै-
“म्हारै बूकियां में गाढ होवैला तो करनी जी आपै ई मदत में आ जावैला।”

अभयसिंहजी री फौज लखमीनाथजी मंदिर कनै डेरा दिया। शहर में घणो उजाड़ कियो अर मिनखां रो ई घाण होयो। भाईयां रै दगै देवण री आसंका अर पख पतल़ो पड़ण सूं दरबार दिलगीर होवण लागा। प्रभात किणी आयर कैयो कै गढ री बुरज माथै धोल़ी चील आई है। दरबार नै अरज कराई कै अजेज आय दरसण करै। ‘धोल़ी चील’ करनीजी री प्रतीक मानी जावै। बीकानेर रै हर राजा री करनीजी रै प्रति अगाध आस्था सो दरबार सुणतां आय दरसण किया अर उणांरै मन धीजो धरियो कै करनीजी री कृपा रै बल़ जीत बीकांण री होसी। जद खुदोखुद एक दूहो कैयो-

दाढाल़ी डोकर थई, कै थूं गई विदेस?
खून बिनां क्यूं खोसवै, निज बीकां रो नेस?

महाराजा रो ओ दूहो सुण पाखती ई ऊभा शंभुदानजी रतनू (दासोड़ी) पाछो एक दूहो कैयो-

निज नेसां जोखो नहीं, जोखो है जोधाण।
अभो अफूठो जावसी, मेलै मन रो माण।।

महाराजा तय कियो कै वे खुद छानै जाय भादरा ठाकर लालसिंह सूं मिलैला अर उणांनै किणीविध बीकानेर रै पख में पाछा लावैला। वे गया पण बात बणी नीं। दयाल़दासजी ख्यात में लिखै कै – उणांरै मन में काई बात छी तोई करनीजी खैर कीवी।” अर्थात दगो पार नीं पड़ियो। जद किणी जोगतै सलाहकारां सलाह दी कै भूकरका ठाकुर कुशल़ सिंहजी नै खबर करो अर उणांनैं उडीको। हलकारै नै कुशल़सिंहजी कनै मेलियो।

कुशल़ सिंहजी साधारण वेशभूषा में आपरै कोट में आपरी भागोड़ी बकरी रै चाखड़ बांध रैया हा। हलकारो पूगियो अर बकरी रै चाखड़ बांध रैया ठाकुर साहब नै कोई साधारण हाल़ी बालधी समझर पूछियो कै-
“ठाकुर साहब कठै है? कोई खबर दैणी है!!”

ठाकुर साहब बोलिया “हां तो बता कांई खबर है?”

उण पाछो कैयो-
“भाई थूं थारो काम कर, म्हनै ऐ समाचार कोई दूजै नीं, खाली ठाकुर साहब नैं ई दैणा है!”

ठाकुर साहब समझग्या कै आंधो अर अजाण बरोबर होवै सो बै मांयां जायर आपरा गाभा पेरिया अर बैठक में हलकारै नै बुलायो। ज्यूं ई हलकारो मांयां आयो तो देखियो कै चाखड़ बांधण वाल़ो आदमी ई ठाकुर साहब री गादी माथै बैठो है!! उण माफी मांगी पण मोटै मिनखां रा मन ई मोटा होवता सो उणां कैयो,-“थूं तो बात बता!’

पूरी बात सुणतां ई ठाकुर साहब रा भंवारा तणग्या। मूंछां फरूकण लागी अर आपाण में शरीर खावण लागो। ठाकुर साहब साथ नै चढण रो आदेश दियो अर कैयो कै-
“उठै बैठा राजपूत, अपणै आपनै राजपूत कीकर कैवै? देश रो लूण खावणिया कीकर दूजै राजावां सूं जा मिलै? ऐड़ा निलज्जा आपरै सिर सेर सूत अर बगतर पैर कीकर तरवार बांधै?”

कुशल़ सिंहजी रै इण भावां नै किणी चारण कवि कितरै सतोलै सबदां में कैयी है-

पत मेलै रजपूत, महपत जा बीजां मिल़ै।
तो सिर माथै सूत, किम बांधै कुशल़ो कहै?
वीग्रहियो बीकाण, घणखायक बैठा घरै!
कड़ी पास केवाण, किम बांधै कुशल़ो कहै?

उणां अजेज आपरो साथ सजायो अर बीकानेर आया। आगे देखियो कै बीकानेर में च्यारां कानी अभय सिंहजी रै आतंक रो सायो पसर्योड़ो। कुशल़सिंहजी देखियो कै गढ रो गाढ जाब देवण वाल़ो है अर महाराजा छानै गढ छोड उण मिनखां सूं मिलण गया है जिकै इण कल़ै री जड़ है!! उणां नै ठाह लागो कै दरबार पाछा आयग्या अर सुरक्षित जागा जावण री सोच रैया है। उणां हाजर होय दरबार नै कैयो कै – “गढ म्हांरै र म्हांरै बाप रो !! महाराजा कुण होवै गढ छोडणिया? महाराजा म्हांरै माथै रा धणी है ! अर म्हे गढ रा धणी!! म्है ऊभां गढ में कोई बड़ेलो तो आप मानजो सूरज ऊगणो ई बंद कर देला!! इतरी निबल़ाई लावण री कठै जरूरत ? थांरी इण उदासी सूं तो गढ ई विलखो (दुखी) लाग रैयो।”

किणी चारण कवेसर ठाकुर साहब रै इण भावां नै कितरा सतोला सबद दिया है-

कुशल़ो पूछै कोट नै, विलखो क्यूं बीकाण।
मो ऊभां तो पालटै, भोम न ऊगै भाण।।

कुशलसिंह रै आपाण आगै पार पड़ी नीं अर अठीनै जयपुर बीकानेर रो पख लेय जोधपुर माथै कुदीठ दी। जिणरै डर सूं अभयसिंहजी तीन महिणां सूं आपरो लश्कर पाछो जोधपुर लेयग्या। दोनूं बार थूक-फजीती होई। जयपुर रै इण अहसान नै महाराजा जोरावरसिंह जी मानियो। दरबार रै इण कृतज्ञ भावां नै गाडण खींवराज माधोदासोत (डांडूसर) इण शब्दां में पिरोया-

बीकानेर गयंद जिम, गहे अभो गजग्राह।
सुणै पुकार सिहाय की, हर जिम ही जैसाह।।

~~गिरधर दान रतनू दासोड़ी

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