महाराणा प्रताप नै

अणदगिया तुरी ऊजल़ा असमर,
चाकर रहण न डिगियो चीत।
सारै हिदूसथान तणै सिर,
पातल नै चंद्रसेन पवीत।।
दुरसाजी आढा की इन कालजयी पंक्तियों के साथ ही प्रातः स्मरणीय महाराणा को समर्पित मेरी भावांजलि–

।।महाराणा प्रताप नै।।

।।छप्पय।।

मिहिर ऊग मा’राण, तिमिर दल़ अकबर तोड़्यो।
करां झाल किरपांण, माण मानै रो मोड़यो।
वन जमियो वनराव, भाव आजादी भूखो।
नह डिगियो नख हेक, लियो पण भोजन लूखो।
साहस रो रूप भूपां सिरै, मुगट मेवाड़ी मोहणो।
कीरती कल़श चढियो कल़ू, स्वाभिमान भड़ सोहणो।।1

प्रिथी तेज परताप, सुजस चंद सूरज साखी।
अचड़ लहण अजरेल, आण इकलिंग री राखी।
निमल़ रांण नखतेत, भांण कुल़ छत्री भाल़ो।
ऊजल़ रहियो आप, कियो अरियां दिस काल़ो।
वनफल़ां स्वाद मरजाद वल़, भमियो सथ ले भामणी।
पातला रांण प्रणाम तुझ, जोर मंडी धर-जामणी।।2

जो नमिया धर जोय, गाढ सुजस दुय गमिया।
जो नमिया नर जोय, दिलां री ऊणत दमिया।
जो नमिया धर जोय, खागबल़ पौरस खोयो।
जो नमिया नर जोय, देख कुल़वाट डुबोयो।
कँदरां भवन कंदमूल़ खा, हेर विखो नह हारियो।
नमण नहीं स्वीकार नर, धुर धिन मरणो धारियो।।3

इल़ पर हुवा अधीन, दीह कढ्या दुखियारां।
जामण ज्यांरी जोय, भोम मरी किम भारां।
कुल़ रै लग्यो काट, छतो दग अजै न छूटो।
विटल़ गयो वँश बोह, किती पण छाती कूटो।
स्वाधीन रह्या संकट सह्यो, नेम रख्यो डरिया नहीं।
परताप जिकां सिरहर पुरस, कव अंजस कीरत कही।।4

महियल़ धिन मेवाड़, अगन झाल़ां में उजल़ी।
मुसल़ां रो मद मेट, सुजस रखियो नित सजल़ी।
तन पर विखा तमाम, जाड सूं अंकै झेलै।
अरियां साम्हां आय, ठीक रणांगण ठेलै।
पमगांण पीठ रीठां प्रबल़, नर सीसोदा न्हाल़िया,
जेतला हुवा आगै जबर, (वांनै)एकै पतै उजाल़िया।।5

हुई हिंदवां हार, खार मुगलां हद खायो।
मारकाट धर मची, लांठोड़ां जीव लुकायो।
डरपी रैयत देख, छता डरिया छत्राल़ा।
बडां-बडां रण बीच, तीख तज लीधा टाल़ा।
पातलो रांण नह प्रगटतो, मरट हिंदु मिटजावतो।
गीधिया साच मानै गुणी, ओ)गरब मुगल गिटजावतो।।6

चढ चेतक री पीठ, वीर धिन रीठ बजाई।
मातभोम जस मंड, सेन समरांण सजाई।
सधर तांणियो सेल, उवो जस आभै अड़ियो।
चखां देख चहुंमेर, नगां जगमगतै जड़ियो।
पल़पल़ाट पेख पहुमी परै, पंगी तोरी पातला।
इल़ धिनो धीर इकरँग अहो, बाकी सहको बातला।।7

डुल़िया जो पद देख, खिति वंश ज्यांरा खल़िया।
कांगा केयक बीह, भाजनै भगदड़ भिल़िया।
कल़िया कीचड़ जाय, मरट तज मुगलां मिल़िया।
घरवट कीनी घाट, गुमर कुल़वट रा गल़िया।
उण बखत अडर पातल अहो, आंण रखी इकलिंग री।
आजादी जिगन रचिय इल़ा, आहूती उतबंग री।।8

हर-हर अखर हमेश, अचड़ कज सदा उचार्या।
धजवड़ हाथां धार, वीर किलमांण विडार्या।
अंतै धारण ओम, भोम कज रटियो भारी।
अकबर रो उर छेद, बण्यो वन-धरा बिहारी।
तूझ री होड किणसूं तुलां, आवै नह निजरां इको।
छत्रियां छात जाहर छिती, जग पातल नाहर जिको।।9

सो तुझ बाचां सुजस, अंजस नित नवलो आवै।
हेरां हिंदूस्तांन, गहर दिस-दिस में गावै।
मेदपाट सिरमोड़, मही धिन पावन माटी।
तीरथ हुइयो तरां, हिवां रँग हल़्दीघाटी।
गुमर सूं अजै कण-कण गजब, उफण जोस जस उच्चरै।
सच लोग जिकै कानां सुणै, वतनपरस्ती विच्चरै।।10

मरिया वै इण मुलक, रीठ सुणै नहीं रुकिया
मरिया वै इण मुलक, लरड़ियां बिच में लुकिया।
मरिया वै इण मुलक, चरित रजवट रो चुकिया।
मरिया वै इण मुलक, जिकै पद मुगलां झुकिया।
पातला रांण मरियो न प्रिथि, सूर भल़ै नह मर सकै।
अवन सदा रहसी अमर, धर गिरधर आगै धकै।।11

मेदपाट री मरट, राण कुंभेण रुखाल़ी।
समर चढ्यो ऊ सूर, गुमर अरियां दल़ गाल़ी।
सूर भल़ै संगराम, निडर कीनो जसनांमो।
भंजी पिसणां भोम, सधर अड़ियो जा सांमो।
श्रोण धर सींच रखियो सुजस, फतै धजा नभ फरहरै।
पातला राण कारण प्रिथी, कीरत अजलग नित करै।।12

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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