मिहिर ऊग मा’राण

मिहिर ऊग मा’राण, तिमिर दल़ अकबर तोड़्यो।
करां झाल किरपांण, माण मानै रो मोड़यो।
वन जमियो वनराव, भाव आजादी भूखो।
नह डिगियो नखहेक, लियो पण भोजन लूखो।
साहस रो रूप भूपां सिरै, मुगट मेवाड़ी मोहणो।
कीरती कल़श चढियो कल़ू, स्वाभिमान भड़ सोहणो।।1

प्रिथी तेज परताप, सुजस चंद सूरज साखी
अचड़ लहण अजरेल, आण इकलिंग री राखी।
निमल़ राण नखतेत, भाण कुल़ छत्री भाल़ो।
ऊजल़ रहियो आप, कियो अरियां दिस काल़ो।
वनफल़ां स्वाद मरजाद वल़, भमियो सथ ले भामणी।
पातला राण प्रणाम तुझ, जोर मंडी धर जामणी।।2

जो नमिया धर जोय, गाढ सुजस दुय गमिया।
जो नमिया नर जोय, दिलां री ऊणत दमिया।
जो नमिया धर जोय, खागबल़ पौरस खोयो।
जो नमिया नर जोय, देख कुल़वाट डुबोयो।
कँदरां भवन कंदमूल़ खा, हेर विखो नह हारियो।
नमण नहीं स्वीकार नर, धुर धिन मरणो धारियो।।3

इल़ पर हुवा अधीन, दीह कढ्या दुखियारां।
जामण ज्यांरी जोय, भोम मरी किम भारां।
कुल़ रै लग्यो काट, छतो दग अजै न छूटो।
विटल़ गयो वँश बोह, किती पण छाती कूटो।
स्वाधीन रह्या संकट सह्यो, नेम रख्यो डरिया नहीं।
परताप जिकां सिरहर पुरस, कव अंजस कीरत कही।।4

महियल़ धिन मेवाड़, अगन झाल़ां में उजल़ी।
मुसल़ां रो मद मेट, सुजस रखियो नित सजल़ी।
तन पर विखा तमाम, जाड सूं अंकै झेलै।
अरियां साम्हां आय, ठीक रणांगण ठेलै।
पमगांण पीठ रीठां प्रबल़, नर सीसोदा न्हाल़िया,
जेतला हुवा आगै जबर, (वांनै)एकै पतै उजाल़िया।।5

हुई हिंदवां हार, खार मुगलां हद खायो।
मारकाट धर मची, लांठोड़ां जीव लुकायो।
डरपी रैयत देख, छता डरिया छत्राल़ा।
बडां-बडां रण बीच, तीख तज लीधा टाल़ा।
पातलो राण नह प्रगटतो, मरट हिंदु मिटजावतो।
गीधिया साच मानै गुणी, (ओ)गरब मुगल गिटजावतो।।6

पाधर भिड़ियो पेख, टेक राखण टणकाई।
स्वाभिमान कज सूर, बात जगती वरताई।
अनम रह्यो अजरेल, खेल रणधीर खिलाड़ी।
चढ चेतक री पीठ, झाट सिर अरिया झाड़ी।
हर भांत विखो सहियो हरख, परख धरा दी पाधरी।
पातला राण पावन प्रगट, इक आजादी आदरी।।7

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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