मोगल माताजी रा नाराच छंद – कवि खेंगार जी कविराज पाटडी

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॥दोहा॥
ऐक समय माहेशरी, खेल रच्यो घण खुब।
तन कटाक्ष री तरलता, घटा कनक घेघुंब॥1
भुषण सब तन पर धरे, सजे शोळ शिणगार।
सरळ वयण विखधरल सम, हिये मुक्तजुत हार॥2

॥छंद-नाराच॥
हिये उदार, मुक्त हार, हेमतार हिंडले।
लगी कतार वीर लार झुल सार झुमले।
वैताल ताल वीर हाक डाक घोर दीपणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥1
बल्लाळ, बुट, बेचरा, चांपल्ल डुँगरेचीयं।
अंबाय, आवडं, सांसाई, राजलं रवेचीयं।
हिंगोळ सातदीप हूंत भद्रकाळि भामणि
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥2
चाळक्कनेच चामुंडा वाघेशरी कहां वळी।
देवल्ल चांपलं सुदेव मात पीठडं मळी।
सहित होल, सुंदरी, भुजाळ दैत भंजणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥3
खोडल्ल, शैणी, खुबडी, सिमोइ, शीतळा सती।
विहत्त मात, वरवडी, भजंत रुप बहुमती।
करनल्ल, जान, कामख्या, गेली, सेमोज, लंगणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥4
शिकोतरं रु सिंधराय, महामाय, मेलडी।
उमा आशापुरी सु आई बेडाराय हो वडी।
समोय धाय मां सती ‘रु रांदलं सु रोहिणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥5
मधुपपान हाथ मांय गांन तांन गेहरं।
बजे मृदंग चंग बीन झांझ ताल झांझरं।
संगीत गीत नृत्य सार भार भोम भंजणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥6
कटि हरि, गति करि, पणांसु नेण पंकजं।
अलक्क शेष माल इन्द्र भोंह ज्युं अलि भजं।
कपोत कंठ, नास कीर, भास कोक भंजणि।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥7
बिजोर बेह दंत बेश क्रंत ज्युं मणि कणी।
विदेह गात्र तेजवंत रुप काम गंजणी।
अधर्र बिम्ब है अनूप, भीड दास भंजणी
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥8
खळक्क चूड बाजुबंध हाथ मांह बांधिया।
जडीत नंग नील जोप हार ओप है हियां।
कनंक कंकणं करं सुरं मृदुल शोभणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥9
धरा धसंत माचे धूम घोर पांव घुघरा।
फरे अतोल घेर फेर अंबरं तनो परा।
चखां कंकोळ रंग चोळ गाढ दैत गंजणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥10
पाळंत वाट घाट पंथ झाड प्हाड झंखरे।
सवार के अमूल सांझ भींछ रींछ भंखरे।
उणी वेळा सताबि आव शेवगां री धा सुणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥11
दधि मधे जहाज डोल, वाय कोरणं वहे।
महा भयान जोइ मक्र ग्राहतं तसे ग्रहे।
दुचित्त चित्त होय दास आवजे वेळा उणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥12
प्रदेश देश गाँव पंथ नाम ठाम नि आवडै।
कुजात जात मात केक आव धंध आखडे।
तदे उगार मात थुंज आप हो वडा धणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥13
दिवस्स कोक राज द्वार आयगो समे इसो।
दियो खरो तथापि मूढ भूप कार भार सो।
तदे आधार ताहरो धणीप दाखुं तुं धणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥14
कुदेश झाड गिरिकंद्र वंक जायगा वडे।
मळे अंधार अस्त मीत पंथ द्रष्टि नां पडे।
कुजीव जीवजंतु है जठे तठे है टेक तौ तणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥15
अगाज गाज वीज अंद्र घोर वाजणां घणां।
चले पवन्न दिस्स चार रेल उझळे रणां।
तहां भरोसो ताहरो प्रचंड भैसा कापणि।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥16
वहंत पंथ वाय बीच कीच कंट कंकरी।
झपट्ट बिचछू सांप झेर चालणो अगोचरी।
तठे तिहारी आश अंब बीकनें भगावणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥17
विवुय गीध्ध चित्र वक्र कोल केड ढाकरं।
कराल नारसिंह कैक दीर्ध रीच्छ कंतुरं।
विरुप देख होत बीक घात टाळ मां घणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥18
दुप्होर भोर अस्त दिह प्रेत भूत पे चरं।
दुजन्न शीश विण्ण देह कंचु डाकिनी करं।
सांची तुहाळि ओथ आइ मात तात तुं मणि।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥19
दुसाध मेछ महादुष्ट काळ क्रूर कुक्रमी।
कुमास के कुचाल कंक संक उपजे समी।
नको उपाय और नेक टेक तांह तुं तणि।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥20
हजार-लाख सैन होय आव धंध आखडे।
बजै निसांण ढोल बाज राग सिंधुवां रडे।
विशाळ हांक शूरवीर भीर कव्वियां तणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥21
कुदुःख अंग रोग कैक पीड आयने पडे।
सुझे न कोइ आन श्रोण रोग खुब कन्नडे।
अघोर व्याधि सूं उगार सब्ब काज सारणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥22
हिमंत लाज तौ हथां चडत्ती राख चारणाँ।
कुंवर आई रा कहाओ, ग्रंथ की उगारणां।
गणं “खैगार” ऐम गाय मात गुन्हा मेटणी।
सरां सरे अतोल सांच मोगलाँ शिरोमणि॥23

॥छंद-छप्पय॥
जयो जयो जगमात, भीड निज जनरी भंजण।
दुःख मेटण सुख दियण, गाढ दहितां अरि गंजण।
नयण चोळ कंकोळ, अतुल तरशूळ करग धर।
सेवग तणी सहाइ, आई करजे नित उपर।
मम मात तुंज मोगल मया, दया करे सुख दीजिए।
कर दोय जोड “खेंगारो” कहे, कवियों चडती कीजिए॥

~~कवि खेंगार जी कविराज पाटडी
(नरहरदान बाटी वीरसोडा द्वारा प्रेषित)

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