मोरवड़ा मे सांसण की मर्यादा रक्षार्थ गैरां माऊ का जमर व 9 चारणों का बलिदान (ई. स.1921)

प्रसंग: सिरोही राज्य पर महाराव केशरीसिंह का शासन था। राज्य आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। राज्य की माली हालात सुधारने के नाम पर खजाना भरने की जुगत में दरबार ने कई नये कर लगाकर उनकी वसूली करने का दबाव बनाया। जिन लोगों को कर वसूल करने की जिम्मेदारी दी उन्होंने पुरानी मर्यादाओं और कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए उल्टी सीधी एवं जोर जबरदस्ती से कर वसूल करना शुरू कर दिया।

इसी कर-वसूली के लिए एक जत्था मोरवड़ा गाँव मे भी आया। मोरवड़ा गाँव महिया चारणों का सांसण मे दिया गाँव था। सांसण गांम हर प्रकार के कर से एवं राजाज्ञा से मुक्त होता है। ये बात जानते हुए भी दरबार के आदमियों ने आकर लोगों को इकठ्ठा किया और टैक्स चुकाने का दबाव बनाया। गाँव के बुजुर्गों ने उन्हे समझाया कि ये तो सांसण गांव है! हर भांति के कर-लगान इत्यादि से मुक्त, आप यहाँ नाहक ही आए! यहाँ सिरोही राज्य के कानून नहीं बल्कि हमारे ही कानून चलते हें और यही विधान है।

आने वाले भी राज के आदमी थे, उन्होंने अनसुना करते हुए कहा कि इन पुरानी और फालतू बातों मे कुछ नहीं धरा, सीधे सीधे टैक्स देते हो तो ठीक वरना राजाज्ञा का पालन कराना हमें आता है।

मोरवड़ा के चारण भी अपनी मर्यादा और आन बान पर मर मिटने वाले लोग थे। उन्होंने अपनी मूछों पर ताव देते हुए भ्रकुटियाँ तानते हुए जवाब दिया कि जब तक हम जीवित हें तब तक तो हमारा ही कानून चलेगा! महियाओं को मरने के लिए आतुर देख दरबार के आदमियों के साहस ने भी जवाब दे दिया और उन्होंने प्रस्ताव रखा कि कोई बात नहीं “हम लोग कोई बीच का रास्ता निकालते हें जिससे आपकी बात भी रह जाए और दरबार के आदेश की अवहेलना भी न हो। इसलिए आप हमे सिर्फ एक गेहूं का पुला दे दो और हम उसी को टैक्स कि भरपाई मान लेंगे ताकि बाकी लोग भी यही समझेंगे कि मोरवड़ा से भी वसूली हो गई। ”

महियाओं ने कहा कि “दरबार को यदि ज्यादा ही भूख है तो इस वसूली को कर अथवा टैक्स का नाम दिए बगैर ही लें तब तो चाहे पूरे गाँव का सारा धान ले जाओ। मगर टैक्स के नाम से तो हमारे पास हमारे शीश ही हें जो हम कटवा देने को तैयार हें।”

दोनों पक्ष अपनी अपनी बात पर अड़े तो बात बढ़ गई और महियाओं ने दरबार के लोगों को वहाँ से पीट कर भगा दिया। इस पर सिरोही के सशस्त्र बाल ने आकार अगले दिन पराभात कि बेला मे पूरे गाँव को घेर लिया। सशस्त्र सेना देखकर भी महियाओं ने पीछे हटना मंजूर नहीं किया और सिर पर कफन बांधकर सेना का मुकाबला करने अअ गए। एक तरफ लकड़ियों और तलवारों से लेस चारण तो दूसरी ओर राज्य के बंदूकधारी सैनिक। भयंकर मुकाबला हुआ। कानोजी महिया के कई तीर लगे मगर उनकी परवाह किये बगैर वे बहादुरी से लड़े और वीरगति प्राप्त की। अपने गाँव कि मर्यादा की रक्षा एवं चारणों को प्रदत्त सनातनी अधिकारों कि रक्षा के लिए सिरोही महाराव केशरी सिंह की टुकड़ी से मुकाबला करते हुए उस समय नौ चारण-कानोजी, मुकनजी, पेमजी, खेतजी, मनरूप, जवोजी, खेतोजी, हिंदजी और अचल़दान शहीद हुए। उल्लेखनीय बात यह है कि जवोजी का तो एक दिन पहले ही विवाह हुआ था। दूल्हे ही पोशाक खोली ही थी कि गाँव पर अचानक ये आफत आन पड़ी। इनकी माँ ने समझाया और कहा कि “जवा तू लड़ने मत चले जाना, अभी तेरे कांकण डोरड़े भी नहीं खुले हें!” जवजी बोले “मा ! ये क्या बात कह रही है? फिर मे पीछे से जी कर क्या करूंगा? मे कायरों की भांति मौत से डरता नहीं हूँ, मे गाँव कि मर्यादा की खातिर मरने के लिए तत्पर हूँ!!” जवजी की माँ का मन नहीं माना और उसने बेटे को एक कमरे मे बंद कर दिया और बाहर एक पहरेदार बैठा दिया। किन्तु वीर जवजी कहाँ रुकने वाले थे! वे कच्चे कमरे की छत के केलुओं को फेंक कर वहाँ से निकल गए और रणांगण मे जा भिड़े और वीरगति वरण करी। इसका पता गैरां माँ को लगा तो उन्होंने अपने गाँव कि मर्यादा खातिर जम्मर किया और अपना नाम इतिहास मे अमर किया।

चूंकि यह घटना सिरोही के राज दरबार एवं तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक शर्मनाक घटना थी अतः सिरोही राज्य एवं ब्रिटिश शासन के वेतन भोगी इतिहासकारों ने इस घटना को दबा दिया ताकि इसका प्रचार न होवे। अंतर्राष्ट्रीय प्रेस मे भी तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने इस घटना को एक कुरीति के रूप मे इस प्रकार पेश किया जिससे सरकार की बदनामी न हो।

किन्तु लोकरसना एवं हमारी श्रुति परंपरा ने इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को अपने लोकगीतों, काव्यों एवं लोक गाथाओं मे जीवित रखा और इन महावीरों को लोक नायक बनाया। तत्कालीन कवि रामदान जी का लिखा गीत इसकी बानगी है। इस गीत को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

उक्त घटना पर कवि मीठे खाँ जी मीर ने भी भावनाओं से ओत प्रोत एक चित्त-इलोल गीत लिखा है जिसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

हमारे वर्तमान इतिहास की पुस्तकों मे इस घटना का उल्लेख नहीं होने के कारण यह स्वाभाविक है कि इतिहासकारों को इस घटना की सत्यता के बारे मे संशय हो और वो हुआ भी। इस संशय के प्रत्युत्तर मे मोरवड़ा गाँव के श्री इन्द्रदान जी महिया ने 100 वर्ष पूर्व सन 1921 मे न्यूजीलेंड मे छपे तत्कालीन समाचारपत्र की कॉपी उपलब्ध करवाई जिसमे यह समाचार प्रदर्शित है। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक फ्रेंच लेखक की किताब का भी हवाला दिया जिसमे इस घटना का वर्णन है जो इसके पुख्ता सबूत हें। श्री गिरधरदान जी रतनू दासौड़ी ने निम्न पत्र लिख कर इतिहास मे ऐसे कई गौरवशाली तथ्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया जिन्हे इतिहास मे स्थान नहीं मिल पाया। गिरधरदान जी के पत्र के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है:

“इतिहास में काफी कुछ नहीं मिलता और काफी कुछ गलत तथ्यों पर आधारित मिलता है। इसका यह आशय नहीं है कि हम उसको लिखना या दुरस्त करना छोड़दें। वैसे यह घटना ब्रिटिश कालीन अखबारों में छपी है। सिरोही महारावल केशरीसिंह के शासनकाल की घटना है। उस गांव में इन वीरों की नौ पाषाण प्रतिमाएं व गैरां माऊ की प्रतिमा उस काले अध्याय की साक्षीधर है। इन्हीं केशरीसिंह के शासनकाल में वलदरा की हीरां माऊ ने जमर किया। सिरोही के इतिहास में तो इसका भी उल्लेख नहीं है।अनेक क्रूर शासकों, सामंतों व अन्य अत्याचारों के खिलाफ ऐसे तागे व जमर पश्चिमी राजस्थान में चारण देवियों ने कई स्थानों पर किए, लेकिन शासक अपने ऐसे कृत्यों को इतिहास के पन्नों पर कब दर्ज करवातें? क्योंकि यह उनके सुयश का पृष्ठ नहीं था। इतिहास में केवल सुयश अंकित करवाया जाता है क्योंकि उसे पुनः पढ़ने पर आनंद की अनुभूति होती और कुयश से अगर जमीर हों तो आत्मग्लानि।

हां डिंगल और लोककाव्य में यह सभी घटनाएं सुरक्षित हैं। वीर किसी भी जाति के हों वे वीर होतें हैं उन पर कलम चलाना प्रतिभा का सही व सटीक उपयोग ही है। ऐसा मेरा मानना है। आदरणीय आईजी ने आज अपनी वॉल पर मेरी एक पोस्ट दी है-सोम भाई!सोम!! उस महान वीर सोमसी भाटी का कहीं विवरण उपलब्ध नहीं है केवल एक मात्र डिंगल छंद के अलावा। आपका ध्यान मैं एक घटना की तरफ आकृष्ट कर रहा हूं। आजके चिपको आंदोलन की जननी इमरतादेवी व उनके साथ हुए बलिदानियों का उल्लेख शायद किसी भी ऐतिहासिक ग्रंथ में नहीं हुआ है। केवल जांभाणी साहित्य के अलावा परंतु उनका बलिदान लोक आस्था में अद्वितीय है और आज किसी ऐतिहासिक संदर्भ का मोहताज नहीं है।

वि. सं. 1879 मिगसर बदि 4 के दिन पोकरण ठाकुर सालमसिंह के खिलाफ माड़वा में मा चंदू ने जमर किया। उसका उल्लेख चांपावतों या जोधपुर के इतिहास में नहीं है। इसी प्रकार बीकानेर महाराजा रतनसिंहजी के अत्याचार के खिलाफ वि. सं. 1893 बैसाग सुदि 9 को सींथल में दो जमर व एक तेलिया हुआ लेकिन बीकानेर के इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है इसका मतलब यह लें की ये जमर नहीं हुए हैं!माड़वा के मेहरदानजी ने जैसलमेर शासक रणजीतसिंह पर 1921 में तेलिया किया लेकिन जैसलमेर के इतिहास में इसका कहीं उल्लेख नहीं है परंतु तत्कालीन डिंगल काव्य में और जनमानस में ये सभी बातें विश्रुत हैं।

मैं आपको यह भी निवेदन करदूं कि इतिहास में तो कई बातों को छिपाया गया है तो कई बातें जानबूझकर गलत लिखवाई गई लेकिन जनमानस ने न तो छिपी बातों को छिपा रखा और न ही गलत बातों में सहभागिता निभाई।

इन सभी जमरों व तेलियों का उल्लेख हमारे रावजी की बहियों में तत्कालीन डिंगल काव्य में व श्रुति परंपरा में हुआ है। इसका संकलन भी किया जा रहा है और संरक्षण भी ताकि अत्याचार के खिलाफ रचे इस अध्याय से आजकी पीढ़ी रूबरू हो सके।

इतिहास को हम ने संदर्भों के आधार पर कसौटी पर अभी तक कसा भी नहीं है अगर हमने कसना शुरू किया तो काफी कुछ नवीन रूप से हमारे सामने होगा। ”

कवि श्री गिरधर दान जी रतनू दासौड़ी ने उक्त घटना पर पिंगल मे अद्भुत कवित्त एवं डिंगल मे सोरठे लिखे हें जिन्हे पढ़ने के लिए आप यहाँ क्लिक करें

उक्त घटना के साक्ष्य के रूप मे सन 1921 मे न्यूजीलेंड मे छपे तत्कालीन समाचारपत्र की कॉपी नीचे प्रदर्शित है। समाचार को बड़ा पढ़ने के लिए निम्न इमेज पर क्लिक करें।

उक्त समाचारपत्र मे प्रदर्शित समाचार की कटिंग अलग से यहाँ प्रस्तुत है:

फ्रांस के लेखक डेनिस विडाल कि लिखी पुस्तक “Violence and truths – A kingdom of Rajasthan facing colonial power” के कवर पेज एवं इस घटना कि जानकारी देने वाला पेज भी अंग्रेजी मे अनुवाद के साथ नीचे प्रस्तुत है: (पुस्तक के पेज बड़े आकार मे देखने के लिए उन पर क्लिक करें)। हालांकि घटना का निरूपण एवं आँकलन इस लेखक ने भी समाचार पत्रों मे आए ब्योरे के आधार पर अपने शब्दों मे किया है जो कि गलत है क्योंकि इन्हे चारण परंपरा की सम्पूर्ण जानकारी स्वाभाविक रूप से नहीं होगी किन्तु घटना के साक्ष्य के रूप मे यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

अंग्रेजी अनुवाद

DENIS VIDAL

Violence and truths

A kingdom of Rajasthan facing colonial power

EDITIONS OF THE SCHOOL OF HIGH STUDIES IN SOCIAL SCIENCES. PARIS

अंग्रेजी अनुवाद

Paradoxically, the study of the nationalist movement in India has suffered from the excessive attention paid to Gandhi himself, then to the elites engaged in the struggle for independence. Today, conversely, a new historiography insists on the importance of the “subordinate” populations in this decisive phase of the history of India. But these analyses take the risk of locking themselves up in an often-Manichean vision of Indian society, by analyzing the events of that time as the only expression of the latent conflict between elites and popular classes.

It is a different perspective that is offered here. Anthropologist, Denis Vidal distances himself from current conceptions of the sociological analysis of traditional society in India. But also, against simplifying temptations, he resolutely takes the complexity route: that of an approach that wants to be attentive to facts that are sometimes insignificant in appearance and, based on them, reconstructs a subtle and comprehensive interpretation of groups, of their relationships, of the issues that bring them together or confront them. He thus outlines an unprecedented conception of Indian society and contemporary nationalist movement.

Denis Vidal is an anthropologist at ORSTOM and member of the Center of Indian and South Asian Studies from the EHESS. He did research on local cults in the Indian Himalayas (Himachal Pradesh) before working on the local history of Rajasthan.

अंग्रेजी अनुवाद

CHAPTER IV
The crisis of truth

The Morvada incident

Knowing the practices of the bards (the Charan), no one was particularly surprised to learn what had happened in Morvada in this April 1921. The report drawn up by the responsible officer was confirmed a week later by the first judge of the kingdom. A detachment about fifty soldiers had been sent to this village to recover the share of income that the state claimed but the villagers refused to give. Seeing the soldiers arrive, the Charan resorted to a parade that was customary for them. They built a pyre, and they forced an old woman to immolate herself there, preventing her by their blows from fleeing the stake as the fire began to reach it. Aggravating circumstance, in the eyes of the judge who took the case in hand, it was his own sons who forced their old mother to sacrifice herself by fire. [[Both women who died, one, Chatra’s wife, was burnt alive by the Charan themselves; his own sons, Achla and Bhima, as well as his other parents who were most active in perpetuating this crime]1], it is specified in a report of the judge which dates from three months after the incident. Understanding what was going on, the tahsildar, in charge of the troop, ordered the soldiers to intervene to disperse the Charan and save the old woman.

[1]Chief Judge, Sirohi to A.D. Macpherson, Personal adviser to A.G.G., NAI, F.P., sr. 32, f 437.1, 1922-23

अंग्रेजी अनुवाद

The press release which was sent by the administration to various newspapers in the country, insisted on the barbarity of the behavior of Charan:

[[Learning the reason for the smoke, the tahsildar immediately ordered the troops to enter the village and go to save the woman. As they approached from the stake, they saw her making desperate efforts to save her life, but every time she struggled to free herself, her persecutors rejected her in the flames. The Charan seem to have been determined that the sacrifice be accomplished to the end and years of stakes, knives, daggers and of swords, they blocked access to the pyre to prevent the advance of the troops.]2]

The incident only got worse. Some Charan injured themselves with their own daggers. The courage of the soldiers, in the circumstances, was as much bigger than they only encountered physical violence but even more, perhaps, to the symbolic violence represented by the sprinkling on them of the blood of the Charan, thus condemning them to revenge of the Goddess: [[We then accelerated our advance while that a man and a woman stabbed themselves with a knife in the stomach and began to spray us with their blood. This did not stop us and, as we sought to pass between the Charan to reach the jhammar and save the life of the woman who was burned, the Charan attacked us.]3] In the ensuing melee, the soldiers used their weapons. Several Charan, men as well as women, were injured or killed. To these victims, we should add the Charan who had stabbed themselves and the old woman who had not survived her injuries. Merchants, notable from the neighboring village of Mandar were taken to the scene to note what had happened and examine the corpses before they were cremated by the troops. This version of the facts, after having been confirmed by the judge who conducted the investigation, was reported as is by the Sovereign and the Agent for the Governor General in Rajputana in his official report to the government [[4]], It was also published in newspapers as well Indian than British, thanks to the good care of the Reuter Agency [[5]]

2. Bombay Chronicle, 3.5.21, Bombay.
3. Statement of Subedar, app. IV, NAI, F.P., sr 26, f. 437.1,1922-23.
4. H.H. Sirohi to Mr R.E. Holland A.G.G., and communication from the latter to S.G.I., NAI., sr. 21 et 26, f. 437.1, 1922-23
5. “An amazing instance of the survival of the custom of human sacrifice is revealed in an Indian government report of the collision between officials and villagers in Sirohi State. Certain villages including Morvada are held by an ancient sect called Charans or hereditary musicians, says a Reuter message… The troops were compelled to fire in self-defence, killing seven and wounding ten. They dispersed the mob, but were too late to save the woman’s life”, Daily Mirror, 13.6.1921″

ई. स. 1921 मे हुई इस घटना को हुए 100 वर्ष पूर्ण हो गए। दिनांक 7-8 अप्रेल, 2021 को गाँव मोरवड़ा मे इन वीर शहीदों कि याद मे शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। अपनी सनातनी परंम्परा एवं मर्यादा की रक्षा हित अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले इन महावीरों एवं जमर की ज्वाला मे लोकहित स्वयं को समाहित करने वाली गैरां माऊ को कोटि कोटि नमन, वंदन, श्रद्धांजलि।

One comment

  • Idcharan

    बहुत सुंदर आलेख …चारण परंपरा , शौर्य और पराक्रम की अदभुत गाथा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *