मृगया-मृगेन्द्र – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

उम्मेद भवन पैलेस, जोधपुर

।।संदेश।।

श्री हिंगलाजदान कविया द्वारा विरचित और ठा. ओंकारसिंह द्वारा सम्पादित, “मृगया-मृगेन्द्र” शीर्षक काव्यकृति पढ़कर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। इस कृति में कवि ने कुचामण के कुंवर शेरसिंह की उस वीरता का वर्णन किया है जिसका प्रदर्शन उसने कुचामण की पहाड़ियों में एक सिंह के आतंक से अपनी जनता को विमुक्त करने हेतु किया था। कवि ने, “मृगया-मृगेन्द्र” की कथा अपनी तीर्थयात्रा के अंतराल में एक सिद्ध पुरुष की जुबान से सुनी थी जिसे उसने ऐसे अनेक प्रसंगों से भी जोड़ दिया है जिनके कारण मूल कथावस्तु में सरसता का संचार हो गया है। यह पुस्तक चारण कवियों की परम्परागत प्राचीन एवं प्रचलित डिंगल शैली में लिखी गई है जिसमें वीरगाथाकाल की रचना-पद्धति और छन्दयोजना का सुन्दर समायोजन है। रोचक कथावस्तु, भाव व्यंजना तथा भाषाशिल्प के कारण काव्य कृति श्रेष्ठ और सरस बनी है।

कवि ने इस रचना द्वारा अपनी प्रतिभा और उत्कृष्ट सर्जनशीलता का तो परिचय दिया ही है किन्तु मूल पाठ का सम्पादन, समीक्षण और व्याख्यापरक हिन्दी अनुवाद करने में ठा. ओंकारसिंह ने जो परिश्रम किया है, उससे काव्यकृति की शोभा में चार चाँद लग गये हैं।

मैं इस कृति का हार्दिक स्वागत करते हुए इसके सम्पादक महोदय को साधुवाद देना अपना कर्तव्य समझता हूँ जिन्होंने राजस्थान के साहित्य भण्डार में एक अभिनव तथा मूल्यवान रत्न जोड़ा है।

मोहर
गजसिंह
महाराजा, जोधपुर-मारवाड़


।।महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शौधकेन्द्र, जोधपुर।।

।।निदेशकीय।।

राजस्थानी साहित्य के प्रवर्तन और संवर्द्धन में चारण कवियों का विशेष योगदान रहा है, वीर-गाथा-काल के अधिकांश काव्य-ग्रंथ उन्हीं के द्वारा लिखे गये थे जिनमें देशकाल और परिस्थितिजन्य मान्यताओं के अनुरूप उन्होंने वीरों की शौर्यपूर्ण गाथाओं का चित्रण अत्यन्त प्रशंसापूर्ण शब्दावली में किया था। उसी परम्परा को जीवित रखते हुए श्रीहिंगलाज दान कविया ने परम्परागत प्राचीन डिंगल शैली में “मृगया-मृगेन्द्र” नामक यह खण्ड काव्य रचा है जिसमें कुचामण के ठाकुर रावबहादुर केसरीसिंह के पुत्र कुँवर श्री शेरसिंह द्वारा सिंह को ललकार कर उसे अपनी तलवार से मार गिराने की महत्वपूर्ण घटना का काव्यगर्भित वर्णन किया गया है। काव्य की कथावस्तु में कवि ने यथार्थ के पर्दे पर लोकोत्तर कल्पनाओं का रंग चढ़ाकर उसे जिस रूप में संवारा और समायोजित किया है, उससे एक विशिष्ट कोटि की रूपसजा बनी है। किसी भी खण्ड-काव्य के लिए अपेक्षित जिन तत्त्वबिन्दुओं के आधार पर कथा वस्तु का शाखसम्मत विधि-विन्यास अथवा रेखांकन किया जाता है, उस पद्धति का अनुसरण करने में कवि को उल्लेखनीय सफलता मिली है।।

राजस्थानी भाषा-साहित्य के अनन्य प्रेमी तथा शोधकर्ता ठाकर श्री औंकार सिंहजी ने इस वीररसात्मक काव्यकृति का सम्पादन कर उसे प्रकाश में लाने का जो सत्प्रयास किया है, वह प्रशंसनीय है, क्योंकि उसके माध्यम से एक महान कवि का रचना-कौशल तो प्रकट हुआ ही है उसके साथ-साथ राजस्थानी साहित्यकोष को भी एक अभिनव तथा अनोखे काव्यरत्न की भी उपलब्धि हुई है।।

“मृगया-मृगेन्द्र” का शुभारम्भ मंगलाचरण करने की उस परिपाटी के ही अनुरूप हुआ है जिसमें कोई रचनाकार अपनी कृति की निर्विघ्न समाप्ति के लिये अपने इष्टदेव तथा वाग्देवी सरस्वती से वरदान प्राप्त करने की प्रार्थना करता है। कवि ने काव्य के मुखबंध के रूप में प्रथमतः ही उस घटना का उल्लेख किया है कि एक सिंह ने अत्यन्त कुद्ध होकर जब भगवान शंकर के नंदी का वध कर डाला तो यह सिंह शिवजी के शाप से प्रताड़ित होकर मृत्युलोक में विंध्याचल के वन में जन्मा और कुंवर शेरसिंह द्वारा मारा गया। उस छोटे से घटनाचक्र को कवि ने अपनी कल्पनाशक्ति के बल पर जिन-जिन प्रासंगिक सूत्रों में अनुबन्धित किया है, वह उस सर्जनशील प्रतिभा का ही चमत्कार है।।

कथानक को श्रृंखलाबद्ध करने हेतु उसने बिलोचिस्तान स्थित हिंगलाज देवी के दर्शनार्थ अपनी तीर्थयात्रा के प्रसंग में सिद्ध पुरुषों की एक जमात को जब बाघम्बर धारण किये हुए देखा तो उसके मन में उसका रहस्य जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। सिद्ध मण्डली ने बाघम्बर (सिंह की खाल) का जो इतिहास कवि के सम्मुख वर्णित किया, वही इस काव्य रचना का प्रेरणास्रोत बना है। वहीं से काव्य की प्रबंधात्मकता का प्रारम्भ और विस्तार समझने का सूत्र विकसित होता है जिसके अंतराल में कवि ने यथा-प्रसंग अनेक प्रकार की वस्तु-व्यंजना और भाव्य-व्यंजना सुन्दर छन्दों में की है, कवि ने रचताचल नामक पर्वत की शोभा का वर्णन करते हुए उसकी प्राकृतिक छटा के साथ-साथ भगवान् शंकर के परिवार का भी सौष्ठवपूर्ण उपक्रम किया है जो अंततः नंदी के वधिक उस सिंह के लिए शिवजी के शाप का कारण बना और वह सिंह मृत्युलोक में जाकर विंध्याचल अटवा के सिंह के रूप में पुनः जन्मा। माता पार्वती के अनुग्रह एवं वरदान के फलस्वरूप उसकी अर्धांगिनी सिंहनी ने भी उसी स्थल पर सिंहनी के रूप में पुनर्जन्म लेकर अपने पति (सिंह) का सहवास प्राप्त किया। उधर भगवान् शिव की कृपा से नंदी भी जीवित होकर अपने स्वामी की सेवा में पुनः संलग्न हो गया, इस कृति के कथानक में कवि ने सिंह और शूकर के युद्ध, सिंह की स्वेच्छा-चारिता और शेरसिंह द्वारा सिंह का वध, शिव-पार्वती की कृपा से सिंह दम्पत्ति का पुनरुद्धार और उन्हें पुनः अपनी जन्मस्थली की प्राप्ति आदि अनेक उपकथाएँ जोड़कर इस कृति को मनोरंजक तथा रसमयी भव्यता प्रदान की है। मैं सभी दृष्टियों से इस काव्यकृति का संस्तव करते हुए सम्पादक को हार्दिक बधाई देता हूँ।
ठा. ओंकारसिंहजी राजस्थानी साहित्य के विद्वान् हैं और उनको राजस्थानी काव्य बड़ी मात्रा में कंठस्थ भी है। मैं निवेदन करता हूँ कि वे राजस्थानी के साहित्य भण्डार को और भी अधिक सुसमृद्ध बनाने में निरन्तर अपना योगदान देते रहें, यह काव्य-कृति खण्ड-काव्य के रूप में सफल और स्तुत्य है। इसके रचनाविधान में खण्ड-काव्य के लिए अभिवांछित प्रमुख तत्त्वों का समावेश करने में कवि ने अपने प्रबंधचातुर्य का सौष्ठवपूर्ण निर्देशन प्रस्तुत किया है। इसके विद्वान् सम्पादक ठा. श्री ओंकारसिंहजी ने राजस्थान के एक महान, किन्तु उपेक्षित कवि के काव्य को प्रकाश में लाकर तथा परिश्रम-पूर्वक अनुवाद करके राजस्थानी साहित्य की अमूल्य सेवा की है।

महेन्द्रसिंह
डॉ. (कुं) महेन्द्रसिंह नगर
निदेशक (संस्कृति) मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट, जोधपुर


।।हिंगलाज तास मृगराज हित, करन काव्य इच्छा करिय।।

लगभग सवा सौ बरष पहले मौलासर गांव मे चारणों की काव्य गौष्ठि चल रही थी, जिसमें विभिन्न जगह के चारणों के साथ राजपूत सरदारों का भी समागम था। विविध विषयों पर चर्चा परिचर्चा संवाद दोहा सोरठा छप्पय कवित्त आदि वीररस श्रृंगाररस भक्तिरस की त्रिवेणी बह रही थी। उस संगोष्ठि के मध्यमान महनीय महामना हिंगलाजदानजी कविया थे, जिनको सभी वक्ता व श्रौता सुनने को उत्सुक थे। ऐसा ही हुआ भी। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के धनी कविया साहब ने विविध विषयों पर अपनी लेखनी व वाचन के औजस्वी पूर्ण प्रस्तुतिकरण से सभी का मन मोह लिया था। संयोगवशात उस काव्यगोष्ठि मे ही कुचामन ठाकुर केसरीसिंहजी के सुपुत्र कुंवर शेरसिंह ने भी शिरकत की और सभी वक्ताओं को सुना, परन्तु उनके मन मानस पर कविया हिंगलाजदानजी की छवि अमिट हो गई पर उनको अपने विषय मे कविता लिखने का प्रस्ताव देने की हिम्मत नही हो पाई। उन्ही दिनों मे शेरसिंहजी ने तलवार के वार से शेर की शिकार की थी, जिसका कई कवियो ने अपनी रचनाओं मे वर्णन किया था पर शेरसिंहजी, कविया हिंगलाजदानजी द्वारा इस पर रचना बनवाना चाहते थे।

समय अपने प्रवाह से चलता रहा पर यह बात शेरसिंहजी को अहर्निश अन्तर्मन मे व्याप्त रहती थी। ऐक दिन संयोगवशात रसाल गांव के चारण रिड़मलदानजी सांन्दु का शेरसिंहजी से मिलना हुआ। बातों का दौर चला और हिंगलाजदानजी की भी चर्चा चली। कुंवर ने अपना मंतव्य कवि के समक्ष पेश किया, रिड़मलदानजी ने कहा कि वे तो मैरे मित्र व रिश्तेदार हैं, मैं आप के लिए यह कविता उनसे बनवाकर ला दूंगा। कुंवर को खुशी व आशा हुई और सांन्दु साहब का आभार प्रकट किया।

यह प्रस्ताव लेकर रिड़मलदानजी कविया हिंगऴाजदानजी के पास गये और स्पष्ट शब्दो मे अपना आने का प्रयोजन प्रकट किया तो, पेशोपेश मे पड़े कविवर ने यह, कहा कि….. “या बात तो बेजां बड़ी ही छै, पर आप आगा तो मैं ऊं शेर (नाहर) की तांई कविता बणा द्दूंलो सा“। ऐसा सुनकर सांदू कवि को भी संतोष हुआ कि मित्र ने मित्रता का मान रख ही लिया है।

कुचामन और बूड़सु दोनो ही रघुनाथसिंह मेड़तियों के दो समान रूतबे व जागीरी के ठिकाणे थे। दोनो का बारह बारह गांवो पर आधिपत्य था, पर कुचामन की किले की संरचना किसी रियासती रूतबे के समान थी। वहां यह लोकेत्तर मे कहावत प्रचलित थी कि, ऐसा किला राणी जाये (राजा) के पास हो सकता ठकुराणी जाये (ठाकुर) के पास नही हो सकता। फिर भी सुदृढ बनावट के किले के मालिक शेरसिंहजी पुत्र केसरीसिंहजी थे, पर छोटी संरचना के बूड़सू के किले के मालिक ठाकुर श्री लिछमणसिंहजी के ह्रदय मे हिंगलाजदान कविया हरदम धड़कते थे, और जब भी कवि का मारवाड़ का कहीं का भी दौरा होता था तो बूड़सू ठाकुर साहब आप स्वयं अथवा अपने आदमी को कवियाजी को अपने यहां बुलाकर कई कई दिनो तक सेवा (हीड़ा) सुश्रुषा करने का लोभ संवरण करते थे, कवि को कुर्सी पर बैठा कर स्वयं उनके चरणों के पास बेठते थे, और यही दिल के भाव कवि को उनसे आत्मिय लगाव से बांधे रखते थे। कवि ने “दुर्गा-बहत्तरी” जैसी उच्चकोटी की भक्ति रचना के समापन के दोहै मे यह लिखकर कि……….

अबै बीनती ऐक हिंगोऴ वाऴी,
जिका ध्यान दै कान कीजै धजाऴी।
लहैरी महैरांण भूपाऴ लच्छो,
अखो दूसरो रीझ खीजाऴ अच्छो।।७०

कलब्रच्छ म्हाराज रा सेवकाँ को,
बण्यो राखिजै बूड़सू भूप बाँको।
बऴे हूं लुऴै रावऴा पांव बन्दू,
अड़ी नाव ऊबारबा आव इन्दू।।७१

लंकाऴै चढे चाल जंघाऴ लेलै,
हली राजड़ा ज्यों प्रथीराज हेलै।
हरी पोकरी रै हुवो जेम ह्वीजै,
कवी पात री मात ऊबेल कीजै।।७२

और दोनों का यही अनन्य अटूट प्रेम यह काव्य बनाने व बनवाने मे बाधक बन रहा था, परन्तु ऐक दूसरी धारा के वाहक सांदू रिड़मलदानजी भी कविया हिंगलाजदान जी के अभिन्न मित्र बालसखा और गनायत थे। इस तरह की विचित्र विकट परिस्थिति मे कवि ने यह काव्य संरचना उस शेर (नाहर) के नाम से सृजन करदी जिसे …..इस शेरसिंह ने अपना शौभाग्य मान स्वीकार की।

।।छप्पय।।
जरठ अच्छ हरिजच्छ, बैर कैलाश बिथारिय।
कंठीरव करि कोप, दुसह हत्थल हनि डारिय।
शिव सराप लहि सींह, तुरत रजताचल तज्जिय।
बिन्ध्याचल बिंटकन, आय मृतलोक उपज्जिय।
पुनि सेर हाथ संग्राम परि, प्रान पुब्ब विग्रह परिय।
“हिंगलाज तास मृगराज हित, करन काव्य इच्छा करिय।।

कवि ने मन क्रम वचन से उस शेर के लियै काव्य किया, पर वह शेर शरीर छोड़ रजताचल चला गया। इस शेर को रसाल के कविवर ने कविता बनवाकर ले जाकर सस्वर सुना दी। शेरसिंह काव्य की कमनीयता और सरंचना के श्रृंगार सौष्ठव से गदगद हो गया और कवि को मारवाड़ की मीठी बाजरी के भरे बोरों को ऐकसौ ऐक ऊँटो की पीठपर लादकर सेवापुरा पंहुचाकर अपनी और से तुच्छ भेंट बता कर स्वीकार कर अपना सौभाग्य बढाने की प्रार्थना का संदेश भेजा जिसे कवि ने भी सहर्ष स्वीकार कर शेरसिंह का मान बढाया।

यह वृतान्त कविवर हिंगलाजदानजी के छोटै भ्रातज पुत्र श्रीजोगीदानजी कविया ने जैसा बताया वैसा लिखा है। (मुझे इन महामना के दर्शन करने का सौभाग्य सन 1995 मे मिला था जब आप वृध्दावस्था में थे)

~~राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा सीकर)


।।प्रस्तावना।।

श्री हिंगलाजदान कविया और उनका काव्य सर्वश्रेष्ठ महाकवि जयपुर से प्रकाशित प्रमुख दैनिक समाचार पत्र “राजस्थान पत्रिका” में वर्षों तक “नगर परिक्रमा” स्तम्भ प्रकाशित हुआ था। इसके लेखक थे प्रसिद्ध स्तम्भ लेखक व राजस्थान की संस्कृति के अनन्य शोध कर्ता श्री नन्दकिशोर पारीक, पारीकजी ने “राजस्थान पत्रिका” के दिनांक 21-2-1996 के अंक में लिखा “डिंगल” के सर्वश्रेष्ठ महाकवि हिंगलाजदान जी कविया। “कोई चौपन वर्ष पूर्व की बात होगी, सोलह सत्रह वर्ष का मैं दीपावली की ढोक देने के लिए जयपुर के साहित्य-मनीषी हरिनारायण शर्मा बी.ए. विद्या भूषण के पास गया था। मैं जब पहुंचा तो नाटे कद के एक वयोवृद्ध सज्जन वहां थे, जिनका पगड़ी और अंगरखे का लिबास उनको पुरातनपंथी जता रहा था, वे पुरोहितजी से विदा लेकर वहाँ से जा रहे थे और पुरोहितजी, जो उस सज्जन से कद में लगभग डेढ़े नहीं तो सवाये अवश्य थे, अपनी झुकी हुई कमर के साथ उठ खड़े हुए थे और बड़े आत्मीय भाव से उनके साथ द्वार तक जाकर उन्हें विदा कर रहे थे। जब वे चले गए और पुरोहितजी अपने स्थान पर लौट आए तो मेरी ओर देखकर पूछने लगे, “भाया, थे यांने जाणो छो ज्यो अबार-अबार गया छै” मैंने गर्दन हिला कर नहीं में उत्तर दिया तो पुरोहितजी ने दूसरा प्रश्न किया, ” और थे मैथिलीशरण गुप्त नै जाणो छो” मैंने हां में उत्तर दिया और कहा कि मैथिलीशरण गुप्त की तो कविताएं पढ़ी हैं हमारी हाई स्कूल की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक में भी हैं, तो पुरोहितजी ने कहा, “ये ज्यो गया, वै मैथिलीशरण गुप्त से इक्कीस छै उन्नीस कोनै, बहुत बड़ा कवि छै ये हिंगलाजदान जी कविया”।

मैं तब नवीं कक्षा का छात्र था और हिंगलाजदान जैसे काव्य-महारथी की महानता को मुझे समझाने के लिए यह तुलना करना पुरोहितजी की अपनी शैली, अपना ढंग था, जिसने इस महान् चारण कवि की छवि को सदा के लिए मेरे मन मस्तिष्क पर अंकित कर दिया। यद्यपि मुझे फिर उनके दर्शन करने का सौभाग्य तो प्राप्त नहीं हुआ, किन्तु उनके भतीजे श्रीजोगीदान कविया, जो मिडिल स्कूल में मेरे हिन्दी के अध्यापक रह चुके थे और उनसे जब-तब मिलना हो ही जाता था।

मैं उनसे जब भी मिलता और नमन करता तो मुझे उनके ताऊ सौम्य-मूर्ति श्री हिंगलाजदानजी का स्मरण हो आता और अपने इन हिन्दी अध्यापक के माध्यम से मैं सदैव उनके सान्निध्य और सामीप्य की प्रतीति करता रहता।

वास्तव में कविवर हिंगलाजदान कविया तत्कालीन राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से श्रेष्ठतर कवि थे, यों तो दो महान कवियों की तुलना करना उचित नहीं है, परन्तु कविवर हिंगलाजदान कविया की श्रेष्ठता दर्शाने का इससे अच्छा माध्यम भी नहीं है, यह तुलना इसलिये भी क्षम्य है कि श्री हिंगलाजदान कविया की देश व हमारे राज्य ने अज्ञानतावश अब तक उपेक्षा की है।

श्रीकविया को उनकी प्रतिभा के अनुरूप उच्च पटल पर स्थापित करना हमारा कर्त्तव्य है, श्रीहिंगलाज दान जी कविया का जन्म जयपुर जिले की अब वर्तमान चौमूं तहसील के ग्राम सेवापुरा में श्री रामप्रताप कविया के घर माघ शुक्ल 13 शनिवार विक्रमी सम्वत् 1924 में हुआ था, ये अपने पिता की दूसरी सन्तान थे, अपने पितामह नाहरजी कविया के संसर्ग से इन्हें बाल्यावस्था में ही कविता में रुचि उत्पन्न हुई और ये पाँच वर्ष की आयु में ही कविता करने लगे थे, उनकी स्मरणशक्ति अत्यन्त प्रखर थी, जिसके कारण वे किसी भी छन्द को दो बार सुनकर कंठाग्र कर लेते थे।

सेवापुरा ग्राम श्रीहिंगलाजदान के पूर्वज सागर कविया को जयपुर नरेश माधोसिंह (प्रथम) ने वि. सम्वत् 1821 में प्रदान किया था, राजपूत राज्यों में कवियों को जागीर (सांसण) आदि देकर आर्थिक रूप से निश्चिन्त बना देने की अनोखी परम्परा थी, इस निश्चिन्तता से कविगणों की प्रतिभा प्रफुल्लित होती रहती थी। वंशानुगत संस्कारों से हिंगलाजदान की कविता में प्रखरता आई और विरासत में मिला हुआ काव्य-रचना कौशल श्रेष्ठता के शिखर पर पहुंच गया, इन्होंने छन्द शास्त्र, व्याकरण तथा पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं का अनोखा ज्ञान अर्जित किया।।

इन्होंने छन्द-शास्त्र की एक अद्वितीय पुस्तक “प्रत्यय पयोधर” लिखना आरंभ किया था, यह पुस्तक अपूर्ण है, परन्तु अनोखी व अलभ्य सामग्री से परिपूर्ण है, इनके भतीजे (मुरारदान के पुत्र) श्रीजोगीदान कविया के शब्दों में, “प्राचीन छन्दों के आचार्यों ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं, परन्तु किसी ने इतनी सरल युक्तियाँ नहीं निकाली, सामान्य वर्णमाला के अष्टकर्म तो लघु और गुरू के आधार पर कई एक आचार्यों ने लिखे हैं किन्तु प्लुत को सम्मिलित करके किसी ने भी अष्टकर्म लिखने का साहस नहीं किया, इन्होंने गण बांधने और पताका लिखने की प्रक्रिया को भलीभांति खोल कर समझाया है, एवं इनके अतिरिक्त मात्राबन्ध छन्दों के मेरु प्रस्ताव के षटकर्म, जिन्हें आज तक किसी विद्वान् ने नहीं लिखा, उनमें से चार कर्म अर्थात् संख्या, प्रसार, नष्ट और उद्दिष्ट की विधियाँ इन्होंने भलीभांति निकाल ली हैं, ये मर्कटी तथा सूची की क्रिया पर विचार कर ही रहे थे कि इनके जामाता का देहावसान हो गया, जिससे दुखी होकर आगे कार्य करना बन्द कर दिया।

यह अप्रकाशित ग्रंथ इनके कनिष्ठ भ्राता मुरारदान के पुत्र पाबूदान के पास अभी सुरक्षित बताया जाता है। परन्तु उपलब्ध नहीं है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रभावित

हिंगलाजदान कविया की विश्वकवि श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) से मुलाकात हुई थी, जिसके विषय में श्री नन्दकिशोर पारीक ने राजस्थान पत्रिका, में अपने स्तम्भ “नगर परिक्रमा” में दि. 2 मार्च, 1996 के अंक में लिखा था, वीर रस के प्रतीक, “कविवर हिंगलाजदान कविया जैसे सिद्धहस्त रचनाकार थे, वैसे ही डिंगल गीत-पाठी भी थे, उनका गीत-पाठ उन प्राचीन चारण कवियों का स्मरण करा देता था जो अपने वीररस-सिक्त गीत सुना कर अपने संरक्षकों एवं आश्रयदाताओं में मरण-त्यौहार मनाने का अदम्य साहस और जोश भर देते थे, तीर्थयात्रा के दौरान उनके कलकत्ता जाने का उल्लेख पहले किया जा चुका है, वह रोचक संस्मरण सेवापुरा के शार्दूलसिंह कविया इस प्रकार सुनाते हैं, “कोई पचास वर्ष पूर्व जब हिंगलाजदान कलकत्ता गए थे तो वहां की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी राजस्थानी के प्राचीन साहित्य में काफी कुछ दिलचस्पी ले रही थी, फतहपुर शेखावाटी के सेठ रामदेव चोखानी की राजस्थानी साहित्य में उत्कट रुचि थी और हिंगलाजदान को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से मिलाने का माध्यम भी वही बने थे।

चोखानीजी ने जब उन्हें श्रीगुरुदेव से मिलाया और उनके कवित्व तथा डिंगल के वीर-गीत के विषय में बताया तो कवीन्द्र रवीन्द्र ने डिंगल गीत सुनाने का आग्रह किया, हिंगलाजदान की अपनी रचनाएं कुछ कम नहीं थीं, किन्तु फिर भी असाधारण स्मरणशक्ति के धनी इस डिंगल कवि ने उन्हें अपना कोई गीत न सुनाकर हुकमीचन्द खिड़िया का गीत सुनाया, जिन्हें डिंगल गीतों का आचार्य माना जाता है। डिंगल के इस शीर्षस्थ गीतकार के लिये कहा जाताहै, “गीत-गीत हुकमीचंद कहग्यौ, हमैं गीतड़ी गावो” इस कवि के वीर-गीत डिंगल साहित्य के ऐसे रत्न माने जाते हैं जो अपने गंभीर घनघोर गर्जन जैसी शब्दावली में वीरों को मर मिटने की प्रेरणा देने और कायरों के हृदय प्रकम्पित करने की क्षमता रखते हैं”।

गुरुदेव श्री रवीन्द्रनाथ के अनुरोध को स्वीकार करते हुए हिंगलाजदान जी ने हुकमीचंद खिड़िया का एक बड़ा गीत सस्वर उन्हें सुनाया, अपनी अतीव ओज पूर्ण और प्रभावशाली शैली में उन्होंने आधे गीत का ही पाठ किया होगा कि गुरुदेव अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए, उनका अंग-प्रत्यंग फड़कने लगा और नेत्र आरक्त हो गए, वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगे तो श्री हिंगलाजदान ने उत्तर दिया कि समझ में तो कुछ खास नहीं आया, किन्तु उनके पाठ करने के ढंग से ही ऐसा जोश आ गया है कि यदि अर्थ समझ पाते तो पता नहीं क्या होता। भाषा की अग्राह्यता के बावजूद रस की ऐसी अनुभूति गुरुदेव को हुई कि वे कह उठे, आज मैंने वीर-रस को प्रत्यक्ष देख लिया है”।

।।मृगया-मृगेन्द्र।।

यह 194 छन्दों का एक खण्ड-काव्य है, इसमें कुचामण के ठाकुर राव बहादुर श्री केसरीसिंह के पुत्र कुँवर शेरसिंह द्वारा सिंह को ललकार कर तलवार से मारने की महत्त्वपूर्ण घटना का वर्णन है, इस घटना को कवि ने अपनी कल्पना से रोचक कथा के रूप में उत्कृष्ट कविता द्वारा गुम्फित किया है, इस काव्य के पढ़ने में उपन्यास का सा आनन्द आता है और पाठक का कौतूहल कहीं मन्द नहीं पड़ता, कवि ने इस खण्ड-काव्य के कथानक का प्रारंभ अपनी एक यात्रा से किया है, कवि एक बार हिंगलाज देवी के दर्शनार्थ मकरान (बिलोचिस्तान) गये, वहाँ उन्हें परब्रह्मपुरी नामक साधु के दर्शन हुए, साधु एक बड़े बाघम्बर (सिंह चर्म से बना आसन) पर बैठे थे, कवि ने इतना बड़ा बाघम्बर कभी नहीं देखा था, अतः जिज्ञासावश पूछा कि इतना विशाल बाघम्बर कहाँ से प्राप्त हुआ? साधु ने बाघ की जो कथा सुनाई वह इस प्रकार थी, “एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत से नन्दी (बैल) पर सवार होकर सुरम्य वन-विहार को चले। एक रमणीय स्थल देखकर उन्होंने नन्दी को हरी घास चरने के लिये छोड़ दिया और स्वयं समाधि लगाकर ध्यानमग्न हो गये, थोड़ी देर बाद पार्वती का वाहन सिंह उधर आया। नन्दी ने उसे रोका क्योंकि उसके विचरण से शिवजी की समाधिस्थ ध्यानावस्था में व्यवधान उत्पन्न हो सकता था। सिंह ने क्रोधित होकर अपनी ऐक वज्र हाथल (अग्रणी पंजे) से नन्दी पर प्रहार किया, जिससे वह मूर्छित हो गया। मूर्छा खुलने पर नन्दी ने भगवान शिव से करुण पुकार की। शिवजी ने अपने तीनों नेत्र खोले और क्रोधित होकर सिंह को श्राप दिया कि तू मृत्युलोक में जाकर नौ जन्मों तक कष्ट भोग। सिंह की सिंहनी ने पार्वती के पास जाकर अनुनय विनय की कि मैं अपने पति से अलग नहीं रह सकती और मुझे भी मृत्युलोक जाना पड़ेगा, अतः मेरा एक जन्म व पति का एक जन्म मिला कर हम दोनों को एक जन्म ही मृत्युलोक में भोगने का दण्ड दिया जाय। पार्वती सिंहनी की पतिभक्ति (सतीत्व) को देख कर प्रसन्न हुई और उसकी प्रार्थना शिवजी से स्वीकार करा ली। सिंह व सिंहनी मृत्युलोक के विन्ध्याचल में उत्पन्न हुए। बड़े होने पर हाड़ौती (अरावली) के पहाड़ों में विचरण करते हुए मारवाड़ राज्य के कुचामण के पहाड़ी क्षेत्र में पहुंचे। कुचामण के ठाकुर राव बहादुर केसरीसिंह को सिंह-दम्पति के आने के समाचार मिले। उनके कुंवर शेरसिंह ने शिकार करने का निश्चय किया, वे दलबल सहित पहाड़ों में गये। हांका (शोर) कर करके सिंह को कन्दरा से निकाला गया। शेरसिंह के साथगये शिकारियों ने बन्दूकों से सिंह को मारना चाहा, परन्तु कुँवर ने उन्हें मना कर दिया और स्वयं ने तलवार से सिंह का वध करने की ठानी। दो सिंहों के बीच युद्ध हुआ, कुँवर ने सिंह को तलवार से मार डाला। सिंहनी ने सती होकर अपने प्राण त्यागे और सिंह का अनुगमन किया, सिंह-दम्पति पुन: कैलाश पर्वत पर लौटे।“

स्वामी परब्रह्मपुरी ने कवि को बताया कि यह बाघम्बर उसी सिंह की खाल है, जिसे कुंवर शेरसिंह ने मारा था।

।।मृगया-मृगेन्द्र की भाषा।।

इस खण्ड काव्य की भाषा व शैली प्रारम्भ में पिंगल (ब्रजभाषा मिश्रित राजस्थानी) है तथा आगे विशुद्ध डिंगल (राजस्थानी) है, कवि का दोनों भाषाओं पर पूर्ण अधिकार था, उन्होंने संस्कृत शब्दों के तद्भव रूप गढ़ कर उनका यथास्थान प्रयोग किया है, उर्दू, फारसी के शब्दों का प्रयोग किया है, मुहावरों का भी भरपूर प्रयोग हुआ है, शब्द-शिल्प की कलात्मकता, अलंकारों की छटा और अर्थ-गौरव के सुन्दर समायोजन की दृष्टि से यह लघु ग्रंथ हमारे काव्य-साहित्य का अनमोल रत्न है। कई चारण कवियों ने कुँवर शेरसिंह द्वारा तलवार से सिंह मारने के अत्यन्त साहस पूर्ण कार्य पर कविता लिखकर उनसे पुरस्कार प्राप्त किया, परन्तु शेरसिंह को महाकवि श्री हिंगलाज दान जी का यह खण्ड-काव्य प्राप्त हुआ तो वे गद्गगद् हो गये।

श्री नन्दकिशोक जी पारीक के अनुसार, “यह प्रति प्राप्त करने के बाद कुचामन के कुँवर ने अपने गढ से एक सौ एक ऊँटों पर मारवाड़ की मीठी बाजरी के बोरे लदवा कर अपने यश-गायक कवि के घर सेवापुरा भिजवाये थे, जिन्हें सौगात मानकर इस सुकवि ने सहर्ष स्वीकारा। चारणों को, कई लाख-पसाव और कई क्रोड़-पसाव देने के उदाहरण तो ख्यातों या पुराने इतिहास में रहे है, बीसवीं सदी में जब सामन्ती व्यवस्था जाने मे कुछ ही दशकों की देर थी, बाजरी के एक सौ एक ऊँटों का काफिला कुचामन से सेवापुरा तक भेजना भी लाख पसाव का ही रूपान्तर था, उनके काव्य से उपकृत उस सामन्त-पुत्र ने इस नये जमाने में भी कैसी बात रखली थी”।

मेरा चारण कवियों और उनकी कविता के ज्ञाताओं ने सदा सम्पर्क रहा है। श्री हिंगलाजदानजी कविया के फुटकर छन्द कई जानकारों से सुनने पर मुझे उनकी कविता का संग्रह करने में रुचि हुई। मैंने फुटकर छन्दों-दोहों से ही अनुमान लगा लिया कि इस कवि की कविता उच्च कोटि की है, और मैंने उनकी कविता का संग्रह करने की ठानी। मेरा राज्यसेवा में विभिन्न स्थानों पर पदस्थापन और स्थानान्तरण होता रहा। जहाँ भी रहा उस क्षेत्र के चारण सज्जनों से सहज ही में सम्पर्क हो जाता था, मुझे कविता सुनने में रुचि थी और उन्हें कोई सुनने वाला चाहिये था, लम्बे समय तक कई कवियों की कविता अपनी डायरियों में लिखी।

श्री हिंगलाजदानजी की कविता सबसे अधिक उनके भतीजे स्वर्गीय श्री जोगीदान जी कविया से लिखी, वह राजकीय मिडल स्कूल के शिक्षक पद से सेवा निवृत्त हुए थे व स्वयं भी कवि थे। उन्होंने ही मुझे ”मृगया-मृगेन्द्र” की एक हस्त लिखित प्रति बताई, जिसकी मैंने प्रति लिपि करवा ली। उन्हें यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि मैं श्री हिंगलाजदान जी की समस्त कविता प्रकाश में लाने को उत्सुक हूँ। उनके पास कविवर की जो भी कविता थी उसकी प्रतिलिपि करवाने की सुविधा मुझे दे दी, वह मेरा आभार मानते थे कि वर्तमान समय में जब केवल अंग्रेजी व हिन्दी का बोलबाला है, राजस्थानी के किसी कवि की परख व आदर करने वाला कोई तो है। परन्तु मैं उनका आभार मानता हूँ कि उन्होंने राजस्थानी के सर्वश्रेष्ठ कवि की कविता का संग्रह करने और कठिन शब्दों का अर्थ समझने में मुझे पूर्ण सहयोग दिया। वास्तव में उनके सहयोग के बिना यह खण्ड-काव्य प्रकाश में भी नहीं आता।।

।।कवि की अन्य कृतियाँ।।

कवि की एक कृति ”मेहाई-महिमा” का सम्पादन श्रीजोगीदानजी कविया ने किया था, जिसे रैनवाल (जयपुर राज्य) के ही जागीरदार श्री गिरिराजसिंहजी ने वि. सं. 1998 में प्रकाशित कराकर निःशुल्क वितरित किया था, इस काव्य-कृति में काबुल (अफगानिस्तान) के बादशाह कामरान, जो दिल्ली के बादशाह बाबर का पुत्र व हुमायूँ का भाई था, उसके द्वारा बीकानेर पर आक्रमण करने पर वहाँ के राठौड़ नरेश राव श्रीजैतसिंह के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। उस युद्ध में चारण देवी करणीजी ने अपनी दिव्य शक्ति द्वारा राव जैतसिंह की सहायता की थी। कहते हैं कि उसी सहायता से राव श्रीजैतसिंह ने कामरान को परास्त किया था। उस युद्ध की पृष्ठभूमि, तैयारी व युद्ध की विभीषिका का कवि ने बड़ा ही सांगोपांग व ओजस्वी वर्णन किया है। उक्त कृति के अतिरिक्त कवि की अब तक अप्रकाशित काव्य की अनमोल कृतियाँ निम्न प्रकार है।

  1. आखेट अपजस
  2. सालगिरह शतक (इन्द्रबाई खुड़द के द्वारा मनाया गया माँ श्रीकरणीजी की वर्षगांठ समारोह का वर्णन)
  3. प्रत्यय पयोधर
  4. बांणिया-रासो
  5. काठेड़ा (टौंक, मालपुरा, उणियारा आदि) की बोली पर हास्य-व्यंग
  6. जयपुर नगर की बोली पर हास्य व्यंग
  7. फुटकर कविता जिनमें प्रमुख हैं देवी करणीजी व अन्य देवियों की स्तुतियाँ एवं बलजी-भूरजी सम्बंधी कवित्त गीत, और राजपूतों को चेतावनी, फटकार, हाकिमों, वकीलों जागीरदारों आदि पर विसहर व अपशय, आलोचनात्मक व्यंग, महाराजा मानसिंहजी (द्वितीय) जयपुर की प्रशंसा आदि।

कवि श्रीहिंगलाजदान अपने समय के अद्वितीय कवि थे, अपने डिंगल व पिंगल काव्य में उन्होंने राजस्थानी के अनोखे अलंकार ”वैण-सगाई” का सदा निर्वाह किया है। उनकी कविता में अनुप्रासों की अनुपम छटा है। कवि का शब्द भण्डार अखूट है। उसमें जयपुर क्षेत्र की ढूंढाड़ी बोली के अतिरिक्त सुदूर मारवाड़ और बीकानेर, जैसलमेर की बोली, ब्रजभाषा, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि के शब्दों का बड़ा सुन्दर प्रयोग हुआ है, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों की छटा सर्वत्र दिखाई देती है, उनकी कविता की एक पंक्ति में वैण-सगाई के अतिरिक्त दो-दो, तीन-तीन अलंकार समाहित हैं, फिर भी कविता में कहीं क्लिष्टता अथवा अनैसर्गिकता नहीं आई है, उनका शब्द-सामर्थ्य ऐसा है कि उनका एक भी छन्द द्वितीय स्तर का नहीं है। कविता की हर पंक्ति प्रथम स्तर की है इस कोटि की रचना किसी अन्य कवि की कविता मे दिखाई नहीं देती।

मेरे उपरोक्त मत के समर्थन में कवि की कुछ फुटकर रचनाओं को उद्धृत करना भी समीचीन होगा।।

।।न्यायालयों का चित्रण।।

।।कवित्त।।
ऐक ही हुकूमत किताब जापता की एक, हर दो फरीक एक कागजात हर में।
दोउन के काम में हुकामन की दोय राय, हुकम विलोम-लोम लालच लहर में।
कवि हिंगलाज न्यायकारी को अन्यायकारी, एती सावचेती बिन संकट शहर में।
बिल्ली बांदरे के से अदल्ली इन्साफ टूटें, आंधरे बजार लूटे धौरे दोपहर में।।
जापता=कानून, फरीक=पक्षकार, बिलोम-लोम=उलटा-पलटा, बिल्ली बांदरे के से=बन्दर बांट,
अदल्ली इंसाफ=न्याय निर्धारण, आंधरे बाजार=अंधे लोग, धौले दोपहर में (दिन दहाड़े)
बाजार लूट रहे हैं।

राजपूतों को फटकारते हुए कवि ने कहा है दोहा

कीजै माफ कुछत्रियां, सांची कहण कुसूर।
भाठां हूं बेड़ी भत्यां, जावै डूब जरूर।।
(कुछत्रियां=कुक्षत्रिय, भाठां=पत्थरों से भरी हुई नाव जरूर डूबती है)

।।छप्पय।।
लाजा स्यांणां चुप साधली, बावळो हूं तो बोलूं।
घ्रांण बंक घातियां, छातियां औरी छोलूं।
राजपूत चारणां, जुड्यो यण कारण जोड़ो।
जोरदार जात नै, और कुण देवै ओड़ो।
तौहीन राजपूताँ तणी, मैं करतो लाजां मरू।
जुलम हूँ बाज आवै न जद, करूँ न तो कोई करूँ।।
स्याणा=बुद्धिमान, बावळो-=अल्पबुद्धि, घ्रांण बंक=टेढी भुकुटि, जुड्योयण=जोड़ना, ओड़ो=उपालम्भ, तौहीन=निरादर, तणी=की।

वकीलों के विषय में कवि ने एक सुन्दर कवित्त कहा है।।

।।कवित्त।।
कार-मुख्तारन को कवि का नमस्कार, पाँव जहाँ उनके हमारो तहाँ पगरा।
हारा मुवक्किल को सहारा नहीं हब्बा एक, जीते सुकराना को लगावें और रगरा।
पड़ जावै बाथ्यां मैनताना की बकाया पर, ये न जानै बापरे को सर्वस्व बिगरा।
नाव तें रपट दरियाव में बहन लागो, तोऊ उतराई को मल्लाह करे झगरा।।
कार=मुख्तारन वकील लोगों को, पगरा=पगड़ी, मुवक्किल=पक्षकार हब्बाएक=एक भी कौड़ी
(हब्बा शब्द फारसी का है)। सुकराना=शुक्रगुजार होने पर भेंट। रगरा=रगड़ा, मेहनताना फीस शुल्क
(नाव ते=नाव से फिसलकर डूबनेवाले व्यक्ति से मल्लाह किराये के पैसे के लिये झगड़ा कर पगरा रहा है)

।।कवित्त।।
द्वापर जमाना तो रवाना भयो चारज दे, सबै काम-कारज कलू को दिये सम्हला।
जिसके प्रभाव में रईस कई जनमें जो, तुहिन गिरी में गेरे तोर फोर तबला।
उदकी इनामी छुटभाइन के फैरें छुरी, निर्दय महाबल को कहा करै निबला।
देख यह कैसी समै आई हिंगलाजदान, चूहे की चपाती पर हाथी करै हमला।।
चारज (Charge)=प्रभार, कलू=कलयुग, जिसके कलयुग के प्रभाव से जो रईस पैदा हुए वे उन हिजड़ों की भांति है जो हिमालय में गलने के लिए गये और वहाँ अपने तबले आदि वाद्य यंत्र फोड़कर समाप्त हो गये।
उदकी=उदक (सांसण) की भूमि जो कि ब्राह्मणों, चारणों आदि को समर्पित कर दी जाती है।
(एसी भूमि पर कोई लगान नहीं लगता था)
इनामी=इनाम के रूप में भूमि पाने वाले भूस्वामी, छुटभाइन=छुटभाई, महाबल=बलशाली, निबला=निर्बल, चपाती=रोटी।

कविता की उपरोक्त बानगी से यह पता चलता है कि किस प्रकार कवि उर्दू फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का सफल प्रयोग करता है, ये विजातीय शब्द उसकी कविता में बड़े स्वाभाविक व सहज रूप में समा जाते हैं, ये शब्द न केवल नैसर्गिक लगते हैं अपितु कविता के प्रवाह को ही निभाते हुए प्रसाद गुण को भी बढ़ाते हैं। इस प्रकार का प्रयोग अन्य कवियों की कविता में सफल होता नहीं पाया गया है।

मैं राजस्थानी भाषा का विद्वान होने का दावा नहीं करता हूँ, हमारे शिक्षा काल में राजस्थानी भाषा न तो स्कूलों में पढ़ाई ही जाती थी न कॉलेजों में, मुझे तो इस भाषा के काव्य की उत्कृष्टता ने आकर्षित किया और मैंने स्वाध्याय से ही इसका अर्थगौरव समझा। मेरे द्वारा शब्दों के दिये गये अर्थ कहीं-कहीं त्रुटिपूर्ण भी हो सकते हैं। यदि इनकी ओर राजस्थानी भाषा के विद्वानों ने ध्यान दिलाया तो भविष्य में और सुधार दिया जाएगा।

मेरी योजना हिंगलाजदानजी कविया के काव्य को तीन भागों में प्रकाशित करने की है। पहले (प्रथम) भाग के रूप में तो मृगया-मृगेन्द्र प्रकाशित हो रहा है। दूसरे भाग में मेहाई-महिमा, सालगिरह-शतक (इन्द्रबाई खुड़द के द्वारा माँ श्री करनीजी के जन्म की वर्षगांठोत्सव का वर्णन) श्री करणीजी व अन्य देवियों की स्तुतियां होंगी। तीसरे भाग में कवि की फुटकर रचनाएं होंगी, जो अनेक विषयों और व्यक्तियों के संबंध में हैं, इनमें कवि की स्पष्टवादिता के साथ बहुत ही विलक्षण काव्य-प्रतिभा परिलक्षित होती है।

जो पाठक इस खण्ड-काव्य को पढ़ेंगे वे अवश्य कवि के काव्य की श्रेष्ठता को अनुभव करेंगे।

महाकवि श्री हिंगलाजदान का देहान्त 81 वर्ष की आयु में बैसाख बदी नवमी के दिन विक्रम संवत् 2005 (ई.स.1948) को हुआ था, मेरा मत है कि इस प्रकार की बहुमुखी काव्य-प्रतिभा के धनी कविया श्रीहिंगलाजदान राजस्थानी के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। “ऐसे महान कवि का राजस्थान में कोई स्थायी स्मारक बनना चाहिए”। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे राजनेताओं में राजस्थानी काव्य के ज्ञाता और प्रेमियों का नितान्त अभाव है, और राजनीतिज्ञों के समर्थन के बिना आज कल किसी का भी स्मारक बनना असंभव सा है। आशा है कि राजस्थानी भाषा के साहित्यकार व प्रेमी इस विषय में कुछ ठोस कार्यवाही करेंगे, हो सकता है कि राजस्थानी के इस महान कवि का स्मारक बन जाये। उससे प्रेरणा लेकर राजस्थानी के ही अन्य श्रेष्ठ कवियों के भी स्मारक बन सकते हैं।

मैं श्री हिंगलाज दान जी कविया जैसे महान परन्तु उपेक्षित कवि के काव्य को प्रकाश में लाकर अपने को अत्यन्त संतुष्ट व गौरवान्वित अनुभव करता हूँ, मेरे इस कार्य द्वारा मैं अपने जीवन की एक बहुत अमूल्य अभिलाषा की पूर्ति व एक महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य का पालन कर रहा हूँ। इस कार्य में मुझे स्व. श्रीजोगीदानजी कविया (सेवापुरा) से जो सहायता मिली उसके लिए मैं पुनः उनका आभार प्रकट करता हूँ। मैं मेरे अत्यन्त स्नेही श्री फतहसिंहजी मानव, आर.ए.एस. (कवियों की बासणी, जैतारण उपखण्ड) का भी आभारी हूँ, जिन्होंने मेरा सम्पर्क श्री जोगीदान कविया से कराया था। मैं राजस्थानी के अनन्य विद्वान “डॉ. शक्तिदानजी कविया” का भी आभार प्रगट करता हूँ जिन्होंने इस महत्ती पुस्तक के प्रूफ-संशोधन का कार्य किया है। अन्त में महाकवि श्री हिंगलाजदान कविया की प्रशंसा में राजस्थानी के ही प्रसिद्ध कवि श्री बद्रीदान गाडण का एक सुन्दर दोहा देना समीचीन होगा।

कवि कविया हिंगलाज को, जस कथियो किम जाय।
अभिधा, लक्षणा, व्यञ्जना, सबदां में ना समाय।।

~~ओंकारसिंह बाबरा (पाली)


।।मृगया-मृगेन्द्र।।

।।रचना – महाकवि कविया श्रीहिंगऴाजदानजी।।

अथ मृगया-मृगेन्द्र लिख्यते

।।आर्य्या।।
गंडत्थल मढ लेखा, रजत रोलंभराजि गुंजारन
शोभित भाल सुधान्सु, नमो मेनकात्मजा वन्दन।।1
पर्वतराज की पुत्री के पुत्र गणेश को नमस्कार है जिनके कपोलों पर बहते मद की सुगंध से आकृष्ट हुए भौरों की गुंजार सदा रहती है और जिनके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है।

।।दोहा।।
गनपति गवरि गिरीश गुरु, परमा पुरुष पुरान।
श्री सरस्वती करनी सकति, देहु उकति वरदान।।2
गणेश, गौर(पार्वती), महादेव, लक्ष्मी, विष्णु, सरस्वती, करणी माता, शक्ति मुझे उक्ति (काव्य रचना) का वर दान दे।

।।छप्पय।।
जरठ अच्छ हरिजच्छ, बैर कैलाश बिथारिय।
कंठीरव करि कोप, दुसह हत्थल हनि डारिय।
शिव सराप लहि सींह, तुरत रजताचल तज्जिय।
बिन्ध्याचल बिंटकन, आय मृतलोक उपज्जिय।
पुनि सेर हाथ संग्राम परि, प्रान पुब्ब विग्रह परिय।
हिंगऴाज तास मृगराज हित, करन काव्य इच्छा करिय।।3
अच्छे व वृद्ध शेर ने क्रोधित होकर बैल (नन्दी) को अपने आगे के पंजे से मार डाला। शिवजी के श्राप से सिंह ने रजता चल पर्वत छोड़ा और मृत्युलोक में जाकर विंध्याचल के वन मे पैदा हुआ, फिर कुंवर केसरी सिंह के हाथ से मारा जाकर अपने पूर्व शरीरमे प्रकट हो गया। श्रीहिंगलाज दान ने उस सिंह के लिये काव्य करने की इच्छा की है।

।।दोहा।।
परम पुनीत प्रताप पितु, मन क्रम वचन मनाय।
अब करि वन्दन उच्चरत, भई कथा जिंह भाय।।4
पिता के पुण्य-प्रताप से मन, कर्म और वचन से कवि वंदना करके अब जैसी रचना हुई उसका वर्णन करता है।

।।पद्धरी।।
हम गये सपरसन हिंगलाज।
मग मध्य मिल्यो सिद्धन समाज।
पहचानि हरीजन जोरि पानि।
दण्डोत करी हिंगलाज दान।।5

तिन बीच एक उत्तम अतीत।
परब्रह्मपुरी नामा पुनीत।
मन लीन निरंजन भजन माहि।
नरनाह साह परवाह नांहि।।6

परश्रमित पन्थ विश्राम पाय।
बैठे मृगिन्द चरमा बिछाय।
जो सिंह त्वचा नव हल्थ जानि।
ममचित्त लयो आश्चर्य मानि।।7

ता हेत बात ताकी तमाम।
पायन परि पूछ्यो करि प्रनाम।
इह भयो कवन बन गज अमित्र।
चर्मा बिलोकि उर फुरत चित्र।।8
हम हिंगलाज देवी (बिलोचिस्तान स्थित) को धोक देने गए तब मार्ग में हमें सिद्ध पुरुषों की एक जमात मिल। ईश्वर भक्त पहचान कर कवि हिंगलाज ने हाथ जोड़कर दण्डवत प्रणाम किया। उस मंडली में परब्रह्मपुरी नाम के एक पवित्र व ईश्वर भजन में लीन साधु थे जो किसी राजा या बादशाह की भी परवाह नहीं करते थे। वे मार्ग की थकान से विश्राम पाने के लिए बाघम्बर (सिंह की खाल) बिछाकर बैठे थे। सिंह की नौ हाथ लम्बी खाल को देखकर मेरे मनमें आश्चर्य हुआ, इसलिए मैंने उनके पाँव में गिरकर प्रणाम करके सारी बात पूछी कि यह हाथियों को संहार करने वाले (सिंह) की खाल मेरे हृदय में चित्रित हो गई है।।

।।पद्धरी।।
केहर नव हत्थे सुनत कान।
परतच्छ न देख्यो यह प्रमान।
ललकार ताहि हनि मंडलाग।
भूपति किंह कीने द्वै विभाग।।9

चित बढ़त तास इतहास चाह।
ललचात श्रवन तनि गवन लाह।
कंठीर कथा हिंगलाज काज।
राजी हुय भाखहु सिद्धराज।।10

यह बैन सुनत बोले अतीत।
बहु काल होय इनमें व्यतीत।
गोविन्द भजन बिन जो गमात।
पुनि मिलत नांहि सो समय पात।।11

अवयव तथापि परिश्रमित ऐन।
विस्तार कथा कहिबो बने न।
तस्मात तास सुच्छम चरित्र।
मैं कहत चित्त दे सुनहु मित्र।।12

ईसान दिशा उत्तम अनूप।
रजताचल राजत रुचिर रूप।
कन्दर जिंह अन्दर सावकास।
उत्तड़्ग शृड़्ग परसत अकास।।13
नौ हत्थे सिंह की बात कानों से तो सुनी है पर आज प्रत्यक्ष प्रमाण देखा है। किसी राजा ने ललकार कर तलवार से सिंह के दो टुकड़े किए। उसका इतिहास जानने की चाह से मेरे कान ललचा रहे हैं। अत:, हे सिद्धराज। हिंगलाजदान के लिए उस सिंह की कथा प्रसन्न होकर कहिये। ये वचन सुनकर वे साधु बोले कि पूरी कथा कहने में समय व्यतीत होगा, गोविंद के भजन बिना जो समय गंवाया जाएगा वह फिर नहीं मिलेगा। यद्यपि मेरे अंग-प्रत्यंग मार्ग के परिश्रम से थके हुए हैं और यह विस्तार से कथा कहते नहीं बनेगा फिर भी मैं उसका सूक्ष्म चरित्र कहूँगा जो हे मित्र। तुम चित्त लगाकर सुनो। इशान (उत्तर व पूर्व के बीच की दिशा) में एक सुंदर, उत्तम और अनुपम पावन पहाड़ रजताचल है। उस पहाड़ में लम्बी-चौड़ी गुफा है और पहाड़ की चोटी आकाश को छूती है।।

निरझरन निरन्तर झरत नीर।
संचरत त्रिविध सुन्दर समीर।
व्याकौस विपन सन्तत बसंत।
रितु पञ्च विवर्जित नित रहंत।।14

तंह बहत तरड़्गनि सह तरड़्ग।
लहलहत ललित पल्लव लवड़्ग।
बहु भांतिनि कुञ्जत सकुनि वृन्द।
मकरन्द मत्त गुञ्जत मलिन्द।।15

तट छिलत तोय निर्मल तराग।
पड़्कज प्रफुल्ल पूरित पराग।
नग उक्त गवरि त्रिम्बक निवास।
जग जाहर नाहर वृषभ जास।।16

जिंह पुत्र वंश दीपक अजेय।
मूषकारोह बल अप्रमेय।
परचण्ड सुण्ड प्रज्ञा पयोधि।
गजराज बदन द्विजराज गोदि।।17

सुत द्वितिय स्वामि कार्तिक सधीर।
बलवण्ड पिण्ड वीराधि वीर।
पड़्कज पद वन्दत भूत प्रेत।
हमगीर पारसद टहल हेत।।18
वहाँ सदा पानी के झरने बहते हैं और तीनों प्रकार (शीतल, मंद, सुगंध) की हवा चलती हैं, वहाँ फूल खिले रहते हैं और सदा बसंत ऋतु ही रहती है। शेष पाँच ऋतुएँ वहाँ वर्जित हैं। वहाँ तरंगों के साथ नदी बहती है और लौंग के सुन्दर पत्ते लहलहाते हैं। वहाँ कई प्रकार के पक्षियों का झुंड कलरव करता है व पराग सेवन करके भौरे मस्त रहते हैं। वहाँ तट से टकराता हुआ पानी सरोवर में भरता है। उस सरोवर में पराग से भरे कमल खिले रहते हैं। उस पहाड़ में पार्वती और शिव का निवास है उनके जग प्रसिद्ध वाहन सिंह और बैल (नन्दी) रहते हैं।

शिव-पार्वती के पुत्र चूहे पर सवारी करने वाले और असीम बलशाली तथा वंश के दीपक, बुद्धि के सागर, लम्बी सूंड वाले हाथी के मुख वाले गणेशजी गोद में बैठते हैं। शिव पार्वती के दूसरे पुत्र धैर्यवान, बलवान शरीर वाले वीरों के वीर कार्तिक स्वामी भी रहते हैं। उन शिव-पार्वती के चरण कमलों की भूत-प्रेत वंदना करते हैं और साथ में कई सभासद-सेवक सेवा हेतु रहते हैं।

गन्धर्व निकर मिल करत गान।
धुनि राग रंग नाना विधान।
अणिमादि सिद्धि आज्ञा अधीन।
निस घोस होत उच्छव नवीन।।19

इंहि भांति विराजत जगत ईश।
गिरिराज शृड़्ग गिरजा गिरीश।
बनि एक समय आरूढ़ बैल।
गंगाधर हल्ले विपन गैल।।20

प्रति पांव करत पावन पहार।
बहु बार कियो कानन बिहार।
कन्दर इक अन्दर रुचिर कुञ्ज।
पशुनाथ निहारिय कुशल पुञ्ज।।21

पल्लवित प्रफुल्लित सहित पत्त।
रोलम्ब भ्रमत सोरम्भ रत्त।
आतप परिवर्जित उष्ण रस्म।
अन्दर बहु सुन्दर फटिक अस्म।।22

वह ठौर देख अतिसय उदार।
हरिषे अनंग-हर पनंग-हार।
बाहन प्रति बुब्ले मृदु वृतान्त।
इह बहुत स्वच्छ ठाहर इकान्त।।23

हम धरत ध्यान आसीन होय।
तुम काज हरित तृन सरित तोय।
नह जगँ जोग निद्रा निवारि।
तौलां बन जन्तुन देहु तारि।।24
वहाँ गंधर्वो का समूह मिलकर अनेक राग में नाना प्रकार के गायन करता है। वहाँ शिव-पार्वती के आधनी अणिता आदि (अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित, वशित्व) सिद्धियाँ रहती हैं। वहाँ पर्वतराज की चोटी पर विश्व के स्वामी शिव-पार्वती विराजते हैं। एक समय ऐसा बना कि शिवजी बैल (नन्द्री) पर सवार होकर जंगल के रास्ते प्रत्येक पग पर पहाड़ को पवित्र करते हुए चले।

उन्होंने कई बार वन-विहार किया, उन्होंने एक गुफा देखी जिसके अंदर भौरों के झुंड प्रफुल्लित पल्लवों पर मंडराते हुए देखे, इस गुफामें गर्मी और सूर्य की किरणें वर्जित थीं। वहाँ सुन्दर स्फटिक की शिला देखकर साँपोंका हार पहननेवाले शिवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने वाहन (नन्दी) को कहा कि इस स्वच्छ व एकांत स्थान पर हम ध्यानमय आसीन होते हैं, तुम्हारे लिए यहाँ हरी घास एवं नदी का स्वच्छ पानी उपलब्ध है, जब तक हम योगनिद्रा से नहीं जगें तब तक तुम वन्य-जन्तुओं को दूर रखना।

सरनागत वत्सल यह सुनाय।
लय भये ध्यान तारी लगाय।
धवलिन्द खरो तंह सावधान।
मोरत बन जन्तुन सहित मान।।25

प्रारब्ध जोग कछु समय पाय।
उद्धवती बाहन कढ़िय आय।
अवलोक अच्छ अख्यो अगुढ।
मृगराज पलटि प्रति पाव मुढ।।26

सुनि सिंह सगर्वित वचन सोय।
हत्थल हनि डारिय कुपित होय।
तन लगी चोट सतकोट तुल्य।
भुव्य पस्यो विकल सुधि सकल भुल्य।।27

काया सहि मूर्छा कछुक काल।
पुनि चेत चितारे प्रनत पाल।
हे शम्भु भक्त – वत्सल हमेश।
हिंसकन बिनासन हे महेश।।28

सञ्चरत स्वामि आज्ञानुसार।
पापेष्ट सतावत करि प्रहार।
आरत पुकार को सुनहिं ओर।।
मेटहु शशिशेखर कष्ट मोर।।29
शरणागत-वत्सल (महादेव) यह कहकर ध्यान में तल्लीन हो गये। बैलों में से श्रेष्ठ (नन्दी) ने खड़े होकर सावधानी से व मान सहित वन्य जतुओं हटा दिया, कुछ समय पश्चात् भाग्यवश पार्वती का वाहन (सिंह) वहाँ आ निकला। उसे देखकर नन्दी ने स्पष्ट कहा कि हे मूर्ख मृगराज। तुम उल्टे पाँव चले जाओ। सिंह ने नन्दी के अभिमान भरे शब्द सुने और क्रोधित होकर अपने हत्थल (पंजे) से नन्दी पर प्रहार किया। नन्दी के शरीर पर शिला (वज्र) जैसी चोट लगी और वह बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ समय तक मूर्छित रहने के बाद उसे पुन: चेत आया तो उसने महादेव को याद किया। हे भक्त वत्सल शम्भु, हिंसकों का विनाश करने वाले हे महेश। मैं स्वामी की आज्ञानुसार चला, परन्तु पापीसिंह ने मुझ पर प्रहार किया। मेरी करुण क्रन्दन को सुनकर हे महादेव। मेरे कष्ट मेटिये।

इंहि भांति पुकास्यो दुखित अच्छ।
परहस्यो ध्यान अन्धक-विपच्छ।
दुख द्वन्द्व हरन सुनि वचन दीन।
तत्पर ऊधारे नयन तीन।।30

परत्यक्ष लियो कारन पिछानि।
हरि जच्छ खरो करि अच्छ हानि।
भगतारत भंजन समझि भेव।
दे दियो श्राप देवाधि देव।।31

संकट नव सम्भव भव समंद।
मृतलोक जाय भोगहु मयन्द।
चिन्तवन कियो वृष कुशल चाहि।
तन भयो अनामय समय ताहि।।32

आरोहि उग्र आये अवास।
अष्टापद पूगो थह उदास।
दारा प्रति दाख्यो दुख उदंत।
कन्ता अब तजहि कैलाश कन्त।।33

शिव कथित सुनायो दुसह श्राप।
अनुताप कियो सिंहनि अमाप।
अद्रजा निकट पूगी उताल।
हुय नम्र उचास्यो सकल हाल।।34
जब इस भांति दुःखी नन्दी पुकारा तो अंधक राक्षस के (संहारक) शत्रु व दु:ख हरने वाले महादेव ने तत्काल अपने तीन नेत्र खोले, उन्होंने घटनाका प्रत्यक्ष कारण पहचान लिया, बैल (नन्दी) को मारकर सिंह खड़ा था, भक्तोंके दुःख भंजन करने वाले महादेव ने सारा रहस्य समझकर सिंह को श्राप दिया कि तुम मृत्युलोक जाकर नौ जन्मों का दु : ख भुगतो। फिर महादेव ने ध्यान लगाकर नन्दी के शरीर को सकुशल बना दिया। शिवजी नन्दी पर चढ़कर अपने निवास पर आ गए। सिंह उदास होकर अपनी गुफा में पहुँचा। उसने अपनी पत्नी सिंहनी को अपना दुःख सुनाया और कहा कि अब तेरे पति को कैलाश छोड़ना पड़ेगा, उसने शिवजी द्वारा दिए गए कष्टदायी श्राप की बात सुनाई तो सिंहनी ने असीम दुःख प्रकट किया। वह पार्वती के पास पहुंची और नम्रता से सारा हाल सुनाया।

ममकाज आज शंकर मनाय।
हिमवान सुता कीजै सहाय।
तदि कह्यो उमा सुनि सिंह-तीय।
जानहु अभंग शिव श्राप जीय।।35

तुम काज तदपि जैहों तुरन्त।
करहूं उपाय समझाय कन्त।
विसवासि सिंहनी कछुक बार।
अम्बिका गई बंबक अगार।।36

राजीव द्रगन लखि सम्भु रूप।
अस्तूति करन लग्गी अनूप।
जय जय महेश भय नयन-ज्वाल।
शशि-भाल जयति लोचन विशाल।।37

नागेन्द्र हार जय भूत नाथ।
मम नाह जयति जय इन्दु माथ।
ईशान जयति जारत-अनंग।
विश्वेश जयति गंगा-वरंग।।38

भार्गव जय बाहन-सौरभेय।
त्रिपुरारि जयति पितु कार्तिकेय।
गणराज जनक जय जय गिरीश।
अंधक निकन्द जय जयति ईश।।39
सिंहनी ने कहा कि हे हिमालय की पुत्री (पार्वती) सहायता कीजिये और मेरे लिए शंकर भगवान को मनाइये। तब पार्वती ने सिंहनी की बात सुनकर कहा कि तुम शिवजी के श्राप को अटूट (पक्का) मानो। फिर भी मैं तुम्हारे लिए तुरन्त जाऊंगी और पति को समझाऊँगी। सिंहनी को कुछ देर विश्वास देकर पार्वती शिवजी के स्थान पर गईं। अपने कमल नेत्रों से शम्भु का रूप देखा और वह अनोखी प्रार्थना करने लगी। हे नेत्रों से ज्वाला निकालने वाले महेश, सिर पर चन्द्रमा धारण किए विशाल नेत्रों वाले शिव, सांपों का हार पहनने वाले भूतनाथ, मेरे स्वामी, काम देव को भस्म करने वाले, सिर पर गंगा धारण किये विश्व के स्वामी, नन्दी का वाहन रखने वाले, त्रिपुर राक्षस को मारने वाले, कार्तिकेय व गणेश के पिताश्री, अंधक राक्षस को मारने वाले महादेव की जय हो।

इम बुल्लि स्तुति संजुत उछाह।
नग नन्दनि वन्दे चरन नाह।
मुसकाय कह्यो तब चन्द्रमौलि।
बामाड़्गनि वांच्छा प्रगट बोलि।।40

हेमवती सम्मुख जोरि हत्थ।
कह दई कमल-मुख सकल कत्थ।
अष्टापद पायो श्राप आज।
कर जोर अरज सिंह माफ काज।।41

पहचानहुँ कारन प्रान पीव।
तनु दोष दण्ड-दीरघ अतीव।
ते बैन सुनत बोले त्रिनैन।
दम्भोल रेख मम श्राप दैन।।42

चण्डिका बतावत तुच्छ चूक।
कछु माफ करहि रख-रहि कहूंक।
तस्मात सात भव करत दूर।
जुग जन्म सिंह लैहैं जरूर।।43

यह सुनत भवानी भवन आय।
सिंहनि प्रति बोली यह सुनाय।
कर जोर रिझाये ब्योमकेस।
सम्भव दुव रक्खे तदपि शेष।।44
इस प्रकार स्तुति करके प्रसन्न होकर पार्वती ने अपने स्वामी के चरणों की वंदना की, तब महादेव ने मुस्कराकर कहा कि हे अर्धांगिनी। अपनी इच्छा प्रकट करो। पार्वती ने हाथ जोड़कर अपने मुखकमल से सारी कथा कही। उसने निवेदन किया कि सिंह ने आज जो श्राप पाया है उसे माफ कर दीजिये। हे पतिदेव। कारण को पहचानिये, सिंह का दोष छोटा है परन्तु दण्ड बहुत बड़ा दिया गया है। ये वचन सुनकर महादेव बोले कि मेरा श्राप वज्र की रेखा है फिर भी पार्वती यदि सिंह का दोष छोटा बताती है तो कुछ माफ कर दिया जाएगा और कुछ श्राप यथावत रहेगा। अतः पृथ्वी पर सात जन्म लेने का दुःख दूर किया जाता है परन्तु दो युग में तो सिंह को वहाँ जन्म लेना ही होगा। यह सुनकर पार्वती अपने निवास स्थान पर आई तथा सिंहनी को बात सुनाई कि मैंने महादेवजी को करबद्ध होकर प्रसन्न किया फिर भी दो जन्म पृथ्वी पर लेने का श्राप यथावत रखा है।

तस्मात जन्म द्वै करि व्यतीत।
भरतार मिलहि तुम तैं अभीत।
सुन बोली सिंहनि वचन शुद्ध।
महमाया पायन नाय मुद्ध।।45

भूतेश हुकम दीन्हो सुभाव।
चण्डी हम लीनों सिर चढाय।
सुनिये पुनि स्वामिन यह सवाल।
भद्रे वामाड़्गनि चन्द्रभाल।।46

जग होत जहाँ जम्पति संजोग।
भोगत मिलि सम्पति विपति भोग।
हम श्राप – विभागी उभय होय।
दम्पति करि लैहैं बंट दोय।
लहि एक जन्म रहि मृत्युलोक।
ऐहैं बहोरि कैलाश ओक।।47

यह सुनत उमा कहि वाह वाह।
श्री आशिकरी सिंहनि सराह।
पतनी पति मानै परम प्रेय।
सब धर्म बीच यह कर्म श्रेय।।48

मन तोर मनोरथ सुकृत मूल।
स्वीकार करहिं धारक – त्रिशूल।
सुनि अरज दैहि शिव गरज सारि।
निरसंशय जानहु सिंह नारि।।49
इसलिए दो जन्म पृथ्वी पर लेकर तुम्हारा पति निर्भय होकर तुमसे मिल सकेगा। यह शुद्ध वचन सुनकर सिंहनी ने मुग्ध होकर पार्वती के पावों में नमन किया और बोली कि महादेव ने सहज भाव से जो हुक्म दिया है वह हमने नत-मस्तक होकर स्वीकार कर लिया है। फिर भी हे स्वामिनी, महादेव की कल्याणकारी भार्या एक बिन्दु और सुनिये। जगत में दम्पत्ति होने का संयोग होता है तो सम्पत्ति व विपत्ति का भोग दोनों भोगते हैं, हम दोनों श्राप के दो भागीदारी बनकर उसे भुगत लेंगे, हमएक जन्ममें मृत्युलोक में रहकर पुनः कैलाश में अपने घर लौट आएंगे।

यह सुनकर पार्वती ने “वाह-वाह” कहते हुए श्रीमुख से सिंहनी की सराहना की। पत्नी यदि पति को परम प्रिय मानती है तो यह सब धर्मों में श्रेष्ठ कर्म है। तेरे मन का मनोरथ अच्छे कर्मों का मूल है, जिसे महादेव स्वीकार करेंगे।

अग नन्दनि अख्यो हुकम एह।
गवनी मृग इन्दनि सुनत गेह।
नाहर पति थाहर थित निहारि।
थिरता जुत जमप्यो हित बिधारि।।50

श्री कंठ दियो दीरघ सराप।
तनु कियो ताहि दुर्गा-प्रताप।
अवशेष रह्यो जो जन्म एक।
न मिटै उपाय कीने अनेक।।51

तातें तन त्यागहु विरचि तल्प।
करि सुदृढ़ चित्त छोरहु विकल्प।
संजुत सनेह हम चलहिं सत्थ।
हत्थलन दलहिं मदमत्त हत्थ।।52

हर श्राप भोगि औहैं बहोरि।
दाक्षायन लै हैं सरन दौरि।
सुनि बैन लह्यो केहर संतोष।
दिल सूल सह्यो समतूल दोष।।53

करि मृत्युलोक जैबो कबूल।
दारा जुत सूतो सार्दूल।
निज संग राखि सम्पति सनेह।
दम्पति तजि दीनी उभय देह।।54
वे तुम्हारी विनती स्वीकार करेंगे। हे सिंहनी, तुम इसबात को बिना संशय जानो। पार्वती ने जो हुक्म सुनाया उसे सुनकर सिंहनी अपने निवास स्थान पर गई। अपने पति सिंह को गुफा में स्थित देखकर धैर्य से उसका हित विस्तार से कहा कि महादेव ने जो बड़ा श्राप दिया था वह पार्वती के प्रताप से छोटा हो गया है। जो एक जन्म का श्राप शेष रह गया है। वह निरस्त नहीं हो सकता, इसलिये शय्या बनाकर उस शरीर का त्याग करो, चित्त को रखो व विकल्प छोड़ो। मैं प्रेम पूर्वक तुम्हारे साथ चलूंगी और हम पृथ्वी पर अपलनी हाथलों (आगे के पंजों) से हाथियों का संहार करेंगे। हम महादेव का श्राप भुगत कर पुन: यहाँ आएंगे तो दक्ष की पुत्री (पार्वती) दौड़कर हमें अपनी शरण में लेंगी। सिंहनी के ये वचन सुन कर सिंह ने संतोष लिया और उसने अपने दिल की पीड़ा को समभाव से सहन किया। मृत्युलोक जाना स्वीकार करके सिंह अपनी पत्नी के साथ (शय्या पर) सो गया। प्रेम की सम्पत्ति साथ लेकर दम्पत्ति ने दोनों देहों को छोड़ दिया।

इह भात श्राप पायो अभग।
अम्बा प्रताप बिगरे न अग।
मृतलोक कथा अब सुनहु मित्र।
चित लाय सिंह चरमा चरित्र।।55
इस प्रकार अमिट श्राप पाया। पार्वती के प्रताप से उनके शरीर नहीं बिगड़े, अब हे मित्र, मृत्युलोक की कथा और सिंह की इस खाल की कथा चित्त लगाकर सुनो।

।।मरु-भाषा-दोहा।।
दह्यौ न नौको दुःख दिल, सह्यौ न ढोको सोक।
हाल्या दम्पति हेकला, लेण जनम मृत लोक।।56

विन्ध्याचळ आडोवळो, बाजै यण बेळाह।
आड़ागारा ऊपना, भाखर उण भेळाह।।57
सिंह दम्पत्ति ने नौ श्रापों का दुःख और दो श्रापों का शोक नहीं सहा, दोनों अकेले ही मृत्युलोक में जन्म लेने को चल पड़े। जो आजकल विंध्याचल-अरावली कह लाता है। उसमें दोनों हठी व झगड़ालू सिंह-सिंहनी ने साथ ही जन्म लिया।

।।छप्पय।।
झाड़ी तर झंगरां, बिखम बिंटक अति बैड़ा।
आठां बळौं उजाड़, नगर थावै नंह नैड़ा।
जुवा जुवा जम्पति, जनम लीधा उण जागां।
दच्छराज – दीहरा, सींह सींहणि हिक सागां।
कंदरा बाऴ क्रीड़ा करै, छौना बाघ उछांछऴा।
रचि दाव घाव चाऴा रूचिर, कुऴ सुभाव सीखै कऴा।।58
वहाँ झाड़ियों के गहन व कठिन समूह थे, आठों दिशिओं में उजाड़ (निर्जन वन) था समीप में कोई नगर नहीं था, दक्षराज की पुत्री (पार्वती) के ही प्रताप से भिन्न-भिन शरीरों में दोनों ने उस स्थान पर एक साथ जन्म लिया। वहाँ गुफा में दोनों सिंह के शावक ( बच्चे ) बालक्रीड़ा व उछलकूद करते, दाव व घाव लगाने के खेल खेलते हुये वे अपनी वंश परम्परागत कला को सीखने लगे।।

अब ज्यों ज्यों ओसता, बढ़ी त्यों त्यों बप बाढ़ा।
बाढ़ा ज्यों ज्यों सुबप, गह्या त्यों त्यों बळ गाढ़ा।
ज्यों ज्यों बळ ऊझळ्या, उछब त्यों त्यों चित आया।
आया ज्यों ज्यों उछब, भुजां खळ – धूंकळ भाया।
हेकहूं हेक मिळिया हमैं, जम्पति रह्या न जूजुआ।
बणराव पाट वाळा बिरद, हाथळ बळ प्रापत हुआ।।59

खिज बंकां नह खमै, घात रंका नहं घालै।
जुवो न थापै जोध, मतै आपै बण माले।
छाजै थह छापरां, विपण राजा मह बाजै।
डाकी बळ डाचरै, गजां चाचरै अग्राजै।
प्रति दीह सींह मारण प्रबऴ, कमरां भड़ हाडा कसै।
गहपूर जदपि जाहर जगत, विन्ध्याचऴ थाहर बसै।।60
बालक्रीड़ा व उछल-कूद करते, दाव व घाव लगाने के खेल खेलते हुए वे अपनी वंश परम्परागत कला सीखने लगे। अब ज्यों-ज्यों आयु बढ़ी त्यों-त्यों उनके शरीर भी बढ़ने लगे। ज्यों-ज्यों शरीर बढे त्यों त्यों उनका बल भी बढ़ा। ज्यों-ज्यों बल उफना त्यों त्यों उनके मन में उत्साह भी बढ़ा। ज्यों-ज्यों उत्साह बढ़ा त्यों-त्यों उनकी भुजाओं में शत्रु से युद्ध करने की इच्छा जागृत हुई, दम्पत्ति दोनों एक दूसरे से अभिन्न हो गये और भिन्न-भिन्न नहीं रहे उन्हें अपनी हाथलों (पंजों) के बल से वन के राजा का विरुद प्राप्त हो गया। वह सिंह बांके (अकडू) रहने वालों पर ज्यादा खिजता है और उन्हें क्षमा नहीं करता है। दीनों पर प्रहार नहीं करता है। दूसरों को योद्धा नहीं मानता और अपनी मर्जी के अनुसार वन में आचरण करता है। पहाड़ के ढाल पर गुफाओं में रहता है। और वह पृथ्वी पर वन का राजा कहलाता है। वह अपने बल से हाथियों के सिर पर हमला करके मुँह भरता है। उसे मारने के लिये प्रतिदिन हाडा (चौहान क्षत्रिय) शूरवीर अपनी कमर कसते है, फिर भी यह बात जाहिर है कि सिंह निःशंक होकर घमंड के साथ विंध्याचल की गुफा मे रहता है।

।।दोहा।।
गिर आडो जाडो गहण, घाटा विकट घणाह।
बाहण उण जागां बस्या, त्रण लोयणां तणाह।।61

जिण जागां थाहर जबर, फाबै नाहर फैल।
बांको उण मागां बहै, खाटक हेक खगैल।।62

नाहर सूतो नींद में, सींहणि जागै संग।
जायो भंडण रो जठै, भड़ आयो अण भंग।।63

सींहणि भाख्यो सूर नैं, इण घाटै मत आव।
चीत सहै नंह गाज घण, रीत यहै बणराव।।64

सूर कहै सुण सींहणी, फूल न कीजै फैल।
राह बहंता किम रुकै, गैदंता खागैल।।65
आड़े पहाड़ गहन वन में विकट घाटियाँ हैं अस स्थान पर त्रिनेत्र (शिव-पार्वती) के वाहन (सिंह-सिंहनी) बसते हैं, जिस स्थान पर बड़ी गुफा है और सिंह उत्पात मचाता है, उस मार्ग पर बांका-बांका और दबंग शूअर निकला। सिंह नींद में सो रहा था। उसके साथ सिंहनी जग रही थी। वहाँ मूंडणी (शूकरी) का वीर पुत्र (शूअर) एवं जिसे कोई अंग-भंग नहीं कर सकता था। आया, सिंहनी ने शूअर से कहा कि तू इस घाटी में मत आ, वन का राजा बादलों की गर्जना भी सहन नहीं करता। यह उसका स्वभाव है। शूअर ने कहा कि ऐ सिंहनी घमंड में आकर उत्पात मत करो। बड़े ही विकट दांतों वाला शूअर मार्ग चलते कैसे रुक सकता है।

गैदन्तो खाल गिड़, कन्तो गिणै न काय।
माडांणी आं मांरगां, जो आवे मरजाय।।66

मर जावां के मारल्या, मुंडां न पाछा मूळ।
जांण पड़े रण जूटियां, ऊठ जगा सादूळ।।67
(सिंहनी ने कहा) शूअर बड़े दांतों वाला होगा, परन्तु मेरा पति किसी को गिनता ही नहीं है, जो इस मार्ग पर हठ करके आता है वह मारा जाता है। शूअर ने कहा या तो मर जाएंगे या विरोधी को मार देंगे पर लौटेंगे बिल्कुल नहीं, युद्ध में गुत्थम गुत्था होनेपर पता चलेगा, तू उठ और तेरे सिंह को जगा।

नोट:- राजस्थानी काव्य में सिंह (बाघ), वाराह (शूअर ), और वृषभ (धवळ-बैल) को शक्ति और साहस का प्रतीक माना गया है। इस काव्य में कवि ने पशु-प्रकृति का अपना अनोखा ज्ञान प्रदर्शित किया है। वास्तव में सिंह जंगल में बादल गरजने पर दहाड़ने लगता है जैसे कोई उसका प्रतिद्वंद्वी उसे आकाश से चुनौती दे रहा हो। मैं सिंह के शिकार के अपने अनुभव के आधार पर यह तथ्य लिख रहा हूं। [संकलनकर्ता, सम्पादक-अनुवादक-ग्रन्थ कर्ता]

।।छन्द-सारंग।।
डाकी इसा बोलियो बैण ढाढ़ाळ।
कंठीरणी छोड़ियो कुंजरां काळ।
जाग्यो महाबीर कंठीर जाजुल्य।
ताळी खुली मुण्डमाळी तणी तुल्य।।68
दैत्याकार बड़ा शूअर जब इस प्रकार से बोला तो सिंहनी ने सिंह को छोड़ा। तब महावीर व ज्वाला के समान ज्वलन्त सिंह जगा, जैसे महादेव की तल्लीनता खुल गई हो।

घ्रोणी लखे सींह नूं गाजियो घोर।
जारै किसूं केहरी, ओर रो जोर।
नैड़ौ अठी होफर्यो बाघणी नाह।
बैडौं उठी बीफर्यौ बीर बाराह।।69

आगा बढ्या ज्यों चढ्या चौगणा अम्भ।
खीज्या घड़ी सांकड़ी रा अड़ी खम्भ।
छाक्या दहूं द्रोह में छोह में छाय।
लागी किनां सोर सन्दोह में लाय।।70

जागी दहूं दोयणां लोयणां ज्वाळ।
तूटी झळां बीजळां ज्यों निराताळ।
भेळा थया भाखरां भोमियां भूप।
रूठा अनूठा प्रकै काळ रा रूप।।71

दातै चढ्या अद्ररा दाइया दार।
भाराथ रौ हाथळा दातळा भार।
बेढीमणां बूठिया बेर बेढंग।
जेठी कणेठी बणे जूटिया जंग।।72
सिंह को देखकर शूअर ने घोर गर्जना की, अन्य किसी का बल वह कैसे सहन कर सकता है, इधर सिंह ने हुँकार की, उधर बांका शूअर क्रोधित (आग बबूला) हुआ, जैसे दोनों आगे बढ़े, वैसे ही उनका पानी (जोश) चौगुना बढ़ा, कठिन समय के दो स्तम्भ (सहारा देने वाले खंभे) एक दूसरे पर खीजे। दोनों ही क्रोध और उत्साह में ऐसे छके जैसे बारूद के ढेर में आग लग गई हो। दोनों विरोधियों की आंखों में ऐसे ज्वाला प्रज्ज्वलित हुई जैसे बिजली की असीम लपटें टूट पड़ रही हों। पहाड़ों का भूस्वामी(शूअर) और पहाड़ों का ही राजा (सिंह) भिड़े, ये अनूठे व क्रोधित दोनों ही प्रलयकाल से दिखाई दिये, पहाड़ों के दावे दार झगड़ पड़े। युद्ध का दारोमदार हाथों (सिंह के पंजों) और दांतों शूअर के (दाँतों) पर था। दोनो विकट यौध्दा शत्रुता से बुरी तरह बरसे और दोनो जेठी, कनेठी बनकर युध्द मे जुट गये।

लागा लड़ेवा चड़े बाढ बेलाग।
बागा मृगानाह बाराह बज्राग।
झाड़ा पहाड़ां चढ्या ग्रीधण्यां झूळ।
देखै भिड्या सूरमा सूर सादूळ।।73

खागां उभै आभ लागां झडै खीज।
बांस पडै डाच ज्यों भाचरै बीज।
दाखै घणी ग्रीधणी सींह नू दाद।
बोलै किती कोल नूं आफरीबाद।।74

रूता रणो स्तब्धरोमा बणोराव।
पोरै किसो खेत छोडै किसो पाव।
बैंडा बिहूं हेकसै बेख बानेत।
जावै किसो भाज पावै किसो जैत।।75
सिंह और शूअर वज्र की अग्नि की भाँति हठ करके, निडर होकर लड़ने लगे, ग्रिधणियों (गिद्धों) के समूह झाड़ों-पहाड़ों पर बैठकर वीरों, सिंह और शूअर की भिड़न्त देखने लगे। दोनों क्रोधित होकर आकाश में उछल-उछल कर इस प्रकार प्रहार करने लगे जैसे काँसी घड़ने के ऐरण पर बिजली गिरती हो। बहुत सी ग्रीधणियाँ सिंह को दाद दे रही थी, तो कितनी ही शूअर को शाबासी दे रही थी। शूअर और सिंह रण में रूप गये, कौन रणक्षेत्र में सोये (मरे) और कौन पाँव छोड़े।

आपै मतै आगळा एक हूँ एक।
टाळी टळे तेण में केण री टेक।
घाल्या घणां हाथळां दातळां घाव।
दीधा घणां होफरांडोफरां दाव।।76

जाया भला भंडणी सींहणी जोध।
काया बढे सुक्र तक्रेय ज्यों क्रोध।
आछा जुड्या जंग त्यों ऊधड्या अंग।
रोसैल दोनूं जणां नै घणा रंग।।77
दोनों ही एकदूसरे से बांके योद्धा थे, कौन सा भाग जाये और कौन-सा जीत जाय ? एक से एक अधिक मनमर्जी से चलने वाले, इनमें से किस की टेक टल सकती थी ? दोनों ने एक-दूसरे पर हत्थलों व दाँतलियों (शूअर के बाहर निकले हुए लम्बे दाँत) से घाव किये और हुँकारों व गर्जना करते हुए दांव-पेंच लड़े। शूअरी और सिंहनी ने अच्छे योद्धाओं को जन्म दिया, जिनके शरीर में अग्नि उस प्रकार प्रज्वलित होती थी जैसे आग पर घी डाला जाये। युद्ध में गुत्थमगुत्था होने से ये दोनों के शरीर उधड़ गये (खुल गये), दोनों क्रोधियों को शाबास है।

।।छप्पय।।
नाहर सूर निराट, बेढ़ बांका भड़ बागा।
अंग घावां ऊधडै, लडै बिहुं अम्बर लागा।
खग ओखल खागैल, घाव केहर घट घल्यो।
गरज्यो सहित गरूर, ऐंड भरपूर उझल्यो।
सजि सारदूळ हाथळ सबळ, जोम कवल माथै जड़ी।
कड़काय गैण हूंतां किना, पब्बय पर तड़िता पड़ी।।78
सिंह और शूअर बांके योद्धा आपस में ही भिड़े घावों से उनके शरीर छील गये, वे आकाश में उछल-उछल कर लड़ते रहे। शूअर ने अपनी तलवार (दाँतली) से सिंह के शरीर पर गहरा घाव कर दिया। सिंह गर्व सहित गरजा और बांकेपन के साथ उछला। अब सिंह ने अपनी सबल हत्थल जोश में आकर शूअर के सिर पर मारी जैसे आकाश से बिजली कड़क करे जैसे किसी पहाड़ पर गिरी हो।

।।दोहा।।
बाही सांगोपांग बळ, घट भांगो उण घाव।
हेकणमल्ल कवल्ल हण, रण जीत्यो बण राव।।79

डाढ़ाळे उण डोळ हूं, मार्यो हेकण मल्ल।
हाडोती जाहर हुई, गिड़-नाहर रण-गल्ल।।80
सिंह ने जमाकर शक्तिशाली हत्थल का प्रहार किया जिससे शूअर का पूरा शरीर विक्षत हो गया। राकल शूअर को मारकर सिंह ने रण जीत लिया। सिंह ने इस ढंग से बलिष्ट राकल शूअर को मारा। हाड़ोती (हाडा क्षत्रियों का बूंदी-कोटा क्षेत्र) में इस शूअर और सिंह के युद्ध की बात प्रसिद्ध हुई।

हाडां रै सालै हियै, डालै सिर डाढाळ।
घालै कर मूंछां घणां, कवण हकालै काळ।।81

माडां नाहर मारणां, भड़ हाडां भुज भार।
खग बीड़ा भंजै खिजै, गंजै कुण गुंजार।।82

आडा भाखर ऊपरै, हाडा करै न हल्ल।
रण लाडा बणराव रौ, माडां रहै अमल्ल।।83

संकै हाडा सीह सूं, संकै न हाडां सींह।
हालै करतो होफरां, आधोफरां अबीह।।84

बाजै दिन गेला बुवै, हेला हुवै हमेश।
ओला कठण उलांघणों, पैलां कठण प्रवेश।।85

पाहाड़ां गहपूर रो, थह सूतां डर थाय।
पग छूटे – आताप हूं, जूटै कवण जगाय।।86
हाडा क्षत्रियों के हृदय में टोकरे जैसे बड़े सिर वाला सिंह चुभ रहा था, उनमें से ही बहुतसे मूंछों पर हाथ फेरते थे, परन्तु इस काल को चुनौती या न्यौता कौन दे ? सिंह को जबरदस्ती मारने का दायित्व हाडा वीरों का था, परन्तु वे खीजकर तलवार की डोरी खोलते परन्तु सिंह को कौन मारे ? उस आडा पहाड़ पर हाडा क्षत्रिय भी हमला नहीं करते। वहाँ युद्ध के प्रेमी वन के राजा (सिंह) का भी जबदरस्ती शासन स्थापित हो गया। हाडा क्षत्रिय सिंह से ही सशंकित रहते थे, परन्तु सिंह कभी उनसे शंकित (भयभीत) नहीं था और निडर ही होकर पहाड़ की आधी ऊँचाई पर गर्जना करते हुए विचरण करता था। कई दिन वह मार्ग पर चलता जिसका हल्ला होता, प्रतिदिन इससे इधर के लोग उधर ही नहीं जा सकते थे और उधर के लोगों का इधर प्रवेश कठिन हो गया था। पहाड़ों में उस गर्वीले सिंह के गुफा में सोते रहने पर भी लोगों को डर लगता था। उसके डर से लोगों के पैर उखड़ जाते थे (फिर) उसे जगाने को कौन उद्यत हो।

विन्ध्याचळ कीधो विजय, बळ हाथळ बानैत।
आंटीलो हाल्यो अबै, पब्बे बियां पटैत।।87

सिंहणीं सागै सींह रै, सिंहणी सागै सींह।
मिळ हक्या हेकण मतै, बण उत्तर अण बीह।।88
बल से विन्ध्याचल पर्वत को जीत लिया, अब वह गर्वीला पटायत (भूस्वामी) सिंह सिंहनी के साथ वहाँ से अन्यत्र चला गया, सिंहनी सिंह के साथ और सिंह सिंहनी के साथ एकमत होकर व निडर होकर उत्तर दिशा के वन की ओर चले

।।छप्पय।।
भवण भद्र भाखरा, गवण कीधो बणगामी।
खागैला खावतां, बहै गैला दिस बामी।
धरि सदृढ़ धारणां, सैल कारणां सिधाया।
महा मृगा मारणां, धकै आरणां धकाया।
बळबण्ड पिण्ड हाथळ प्रबळ, च्यारूं हेकण चाल री।
झांकतां आंख खोटी झगै, मोटी भैण मुसाल री।।89
 उन वन चरों ने मरुप्रदेश (मारवाड़) के पहाड़ों की ओर प्रयाण किया, शूअरों का भी भक्षण करते हुए उन्होंने बाईं दिशा जाने का मार्ग पकड़ा। हुए वे मौजमस्ती करते व हिरणों का संहार करते हुए अगले वन को चले। बलवान शरीर व शक्तिशाली चारों हत्थों (पंजों) से एक साथ चलते थे और उनकी आंखें देखने में मशाल की बड़ी बहन जैसी प्रज्ज्वलित लगती थी।

गयन्द कन्ध गाहणा, मयन्द बाहण महमाया।
विध्या-चऴ बेडढ हूँ, अंचळ मारूधर आया।
शहर कुचामण सींव, आंण ढुका वण अन्दर।
अरण राव आराम, करण बैठा गिर कन्दर।
तिण बेर भूप केहर तपै, गंजण सीमाड़ां गरब।
जोधाणनाथ आणै अंजस, सुजस गाथ जांणै सरब।।90
वै हाथियों के कंधों को तोड़ने वाले, देवी के वाहन सिंह दम्पत्ति विन्ध्या-चल के ही गहन वन से मरुप्रदेश के क्षेत्र में आये। वे कुचामण नगर की सीमा में वन के अन्दर आये और पहाड़ की गुफामें आराम करने को बैठे। उस (कुचामण) नगर के स्वामी ठाकुर श्री केसरीसिंह जो सीमावर्ती अन्य सब भूस्वामियों का गर्व खण्डित करने में सक्षम थे, जोधपुर नरेश मारवाड़के स्वामी उन पर गर्व करते थे और उनके सुयश की गाथा सभी जानते थे।

।।भुजड़्गी।।
उचारां किसो दूसरो द्रंग ऐहो।
जठै भूपती केसरीसिंघ जेहो।
ब्रती चीत्त री ऊजळी नीत बेता।
जती सत्यवादी दती जुध्द जेता।।91
ऐसे किसी अन्य नगर का नाम भी कैसे लें जहाँ केसरीसिंह जैसा स्वामी हो। उसके चित्त की वृत्ति उज्वल थी, वह नीतिज्ञ था। संयमी, सत्यवादी, दातार और युद्ध-विद्या विशारद विजेता था।

मही मारवां थाप ऊथाप मंडै।
छत्रीबंस वाळी मृजादा न छंडै।
द्रगां देख चोरां ठगां दण्ड देवै।
सुपातां द्वजां सादरै साध सेवै।।92

तरां दूध पाणी नरां न्याय तोडै।
जुडै बुद्धि आभास कैमास जोड़ें।
दिपै आसती नासती नांहि द्वारै।
सदा सद्य जा पद्मजा ही सुधारै।।93

घुरै नौबता द्वार दंताळ घूमै।
बिजै चिन्ह बाजार झण्डा बिलूमै।
घणां थाट बैलां रथां ऊंट घोड़ा।
अणी देखि सत्रू सकै ओड़ ओड़ां।।94
वह राजा उथाप (किसीको स्थापित करने और किसी को पदच्युत) करने वाला था। वह क्षत्रिय वंश की मर्यादा नहीं छोड़ता था वह पैनी दृष्टि से जाँच करके चोरों व ठगों को दण्ड देता था व अच्छे चारणों व ब्राह्मणों व साधुओं का आदर करता था। वह मनुष्यों के विवादों को दूध का दूध और पानी का पानी करके न्यायपूर्वक निपटारा करता था। उसकी बुद्धि कैमास (पृथ्वीराज चौहान का प्रसिद्ध मंत्री) के समकक्ष थी, उसकी आस्तिकता बहुत ही दीप्तिमान थी, नास्तिक उसके द्वार परभी नहीं जा सकते थे। उसके घर में स्वच्छता व लक्ष्मी विराजमान थी। दरवाजे पर ही सदा नौबतें (नगाड़े) बजते थे और हाथी घूमते थे, बाजार में विजय पताकाएँ सदा लटकती थीं, ऊँटों, घोड़ों, बैलों और रथों के ठाट बाट थे।

घणौ घेर आसेर बैराट घाटां।
पवीरी कवी ओप आणै कपाटां।
त्रिसोता जिसो नीर गम्भीर टांका।
बिलाला किलादार जोधार बांका।।95

मिळे मोरचा तोप लेती मचोळा।
गिळे ऊगळे वक्र बारूद गोळा।
सज्यो सूरमा सोर साबात सीसै।
दुरग्गां दुवां उच्चता तुच्छ दीसै।।96

किलो दूर हूँ देखि शत्रू प्रकम्पै।
जसो नाह नौकोट रोवाह जम्पै।
सबै राज रा काज मन्त्री संवारै।
धजाबन्ध वाळी रजा सीस धारै।।97
उसकी सेना को देखकर इस छोर से उस छोर तक के सशंकित रहते थे। उसके किले का घेरा बड़ा था जहाँ विकट पर्वत घाटियों से ही पहुंचा जा सकता था, और किंवाड़ इतने सशक्त थे कि कवि भी उन्हें वज्र की उपमा देते थे। किले के बने टांके (जल-संग्रह का बड़ा हौज) में भी त्रिवेणी जैसा पानी था व किले के रक्षकगण बड़े मस्त व बांके वीर थे। मोर्चों पर तोपें ऐसी झूमती हुई चलती थीं व बारूद एंवं गोले निगल कर बांकेपन से उगलती थीं, किला बारूद शीशा व सैनिकों से सुसज्जित था इस किलेके सामने अन्य किसी किलों की उच्चता तुच्छ दिखाई देती थी। इस किले को दूर से देखकरही शत्रु कांपने लगते थे, जोधपुर के स्वामी भी किले को देखकर वाहवाही करते थे। शासन के सभी काम मंत्रीगण संभालते थे और देवी की आज्ञा शिरोधार्य करते थे।

जठे छागण्यां बाघण्यां बीच जीवै।
प्रपा हेक में हेकठी नीर पीवै।
तठै राजत्रेता तणों आज ताई।।
कळू काळ रो आवणों काम कांई।।98

जकै भूप जोड़ी सभा रायजादै।
सुनासीर देवां प्रभा नाद सादै।
उठै भ्रात आमात संघात आया।
मिल्या पाय ताजीम माथा नवाया।।99

प्ररोही प्रभा पाखती पूत पोतां।
महीपां कही झोकरै जालमोतां।
सभा भाळ मोताहळां रूप सारी।
किना फूलिया फूल अफैण क्यारी।।100
वहाँ बकरियां बाघिनों के बीच जाती थीं, और जलाशय में शामिल पानी पीती थी। वहाँ आज तक भी त्रेतायुग का राज है, कलयुग आने का वहाँ काम ही क्या है ? वहाँ नरेश ने राजपूतों की सभा का बड़ा आयोजन किया जैसे इन्द्र की सभा में ही देवताओं की सभा शोभित हो रही हो। वहाँ भाईपा (सगोत्रीय) बन्धु-बान्धवों व मंत्रियों के समूह आये, उन्होंने सम्मान पाकर मिलते हुए सिर नवाये, उनके पार्श्व में सगोत्रीय पुत्रों-प्रपोत्रों का प्रकाश उदित हुआ।

राजाओं ने भी यह कहाकि जालमसिंहोत (मेड़तिया राठोड़) धन्य हैं, सारी ही सभा मोतियों की माला के समान थी अथवा व जैसे अफीम के फूलों की क्यारी में फूल खिले हों।

दुहां रूपकां हाजरी पात दीवी।
करोलां अतै आय मालूम कीवी।
पृथी नाथ रा नौकरां सींह पेख्यो।
दुवो दोय आंख्या इसोनांहि देख्यो। 101

लबै बज्र वाळे भुजा दण्ड लागै।
अणी पूंछ हूँ मूंछ नौ हाथ आगै।
चसै नैण ज्यों रैण जूपी चरागां।
जई मैण रा नैण ज्यों क्रोध जागां।।102

तियां रै हियां तेण री लंक तंगी।
जुडै भ्रूण हूँ चाचरो डाच जंगी।
जिका सीहरै सींहणी संग जाया।
उभै अद्र में पोढ़ता छोड़ आया।।103
चारणों ने कविता-दोहे सुनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इतने में शिकार खाने के कर्मचारियों ने आकर सूचना दी कि स्वामी के सेवकों ने जंगल में सिंह देखा है, ऐसा अन्य सिंह दो आंखों ने कभी नहीं देखा। उस सिंह की भुजाएँ बज्र के समान दिखाई देती हैं और पूंछ के अन्तिम छोर से उसकी मूंछे नौ हाथ की दूरी पर हैं। अर्थात् नौ हत्था नाहर है, उसकी आखें ऐसे दीप्तिमान हैं जैसे चिराग जल रहे हों। वे ऐसे लग रही थीं जैसे शिव ने कामदेव पर क्रोधित होकर दृष्टि डाली हो। उसकी कमर स्त्रियों की कमर की भाँति तंग है और उसका सिर कुए की भूण (चाकला) की भाँति बड़ा है व मुँहफाड़ भी बड़ी है। उस सिंह के साथ उसकी पत्नी सिंहनी भी है, हम दोनों को पहाड़ में सोता हुआ छोड़ कर आये हैं।

जुडै जंग जा हूं घणा रंग जानै।
करां सेर जोड्यां नरांनाथ कांनै।
पुणी बाप हूँ आप हूँ सीख पाऊँ।
ललक्कार डाळामथौ मार लाऊँ।।104

सुणे सेर रा बैण आज्ञा समापी।
थिरानाथ श्रीहाथ हूं पीठ थापी।
कहै सेर नूं जावतां सेर कानी।
सझे आवधा राखजे सावधानी।।105

बिजै सेर हूँ खाटियां सेर बाजै।
लखे न्हाटियां सेर आसेर लाजै।
खिसो खेल कंठीरवां फेट खाबो।
जलाल्या तणी फेट आखेट जाबो।।106
इस जोड़े से युद्ध करे उसे बहुत साधुवाद (शाबासी) है। कुँवर शेरसिंह ने नरेश की ओर हाथ जोड़कर निवेदन किया कि हे, पिताश्री यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अब विदा लूं और सिंह को ललकार कर मार लाऊँ, शेरसिंह के वचन सुनकर पृथ्वीपति (ठा.केसरीसिंह) ने पुत्र को आज्ञा दी और पीठ थपथपाई, शेरसिंह को सिंह की ओर जाते समय कहा की शस्त्रों से सजकर ही जाना और सावधानी रखना इस दूसरे शेर (सिंह) से विजय प्राप्त करने पर ही तुम शेरसिंह कहलाओगे, उसे देखकर भागने से कुचामण का किला लज्जित होगा।

शेरों से टक्कर लेना कोई खेल नहीं है एवं शिकार पर जाना ऐसी टक्कर है जैसी कि जलाल्या (बड़े दरवाजों को रोकने हेतु ही गाड़े गये पत्थर) से टक्कर हो।

सुण्या एबिया ऐण रा बैण सेरै।
हुआ सज्ज गैतूळ सादूळ हेरै।
तठे म्हावतां ब्याल कीधा तयारी।
धणी री भणी सासना सीस धारी।।107

अंगोछां तणी ओट लंगोट ऐंच्या।
खुसी ऊससी पिण्ड हूँ दण्ड बैंच्या।
कस्या याद पैगम्बरांसाध काया।
अभै बज्र सा काळजांनज्र आया।।108

समाया श्रणी सिन्धुराँ संक सूदै।
कलावां चढ्या बन्दरां हेल कूदै।
भणां भांमणां पिण्ड सुण्डा संभाळी।
रजां झाड़ि झूलां गजां पीठ राळी।।109
ऐसे टेढे वचन कुँवर शेरसिंह ने सुने और तैयार होकर वातूल (चक्रवात) की भाँति सिंह को खोजने हेतु चक्कर लगाने लगा। वहाँ महावतों ने हाथियों को तैयार किया, उन्होंने स्वामी की आज्ञा को ही शिरोधार्य किया अंगोछों की ओट में उन्होंने अपने लंगोट कसे और शरीर से प्रसन्नता उमगने से उन्होंने दण्ड पेले। अपने शरीर को भी कसरत से तैयार करके पैगम्बरों का ध्यान स्मरण किया, वे निडर हो गये ओर उनके कलेजे वज्र की भाँति कठोर दिखाई दिये, उन्होंने हाथियों की शंका दूर करने हेतु अंकुश पकड़े, और बन्दरों की भाँति ही उछल कूद करने लगे। उन्होंने वारणा का उच्चारण करते हुए हाथियों की सूण्ड व शरीर संभाला और रेत झाड़ कर झूलें हाथियों की पीठ पर डाली।

कसे हेम होदा ध्वजां सज्ज कीधी।
दखे बाप कुम्भाथळां थाप दीधी।
श्रणी री अणी बीतरी भीत सेता।
लग्या राह लोकाँ मुखाँ वाह लेता।।110

भरै पैंड त्यों अंकुरै अँड भारी।
चरै दान सौरम्भ सौरम्भचारी।
चहूं वै पगां पन्नगां लोक चांपै।
मजा हूँ ध्वजा दण्ड ब्रह्मण्ड मांपै।।111

करारा करां सीकरां फूंतकारै।
धरा रा धका शेष रोशीश धारै।
महा मांण रा कोट आपण माता।
अरांना लसै डूंगरां रूप आता।।112
सोने के होदे कसकर ध्वजाओं से सजाये और बापू-बापू कहते हुए हाथियों की पीठ थपथपाई अंकुश और अंगूठे की अग्रभाग की चोटों से डरते हुए हाथी भी लोगों के मुँह से वाहवाही लूटते मार्ग पर चले। हाथी भूमि पर अपने बड़े पद-चिह्न बनाते हुए चले। उनके मस्तक को महक, सुगंधित द्रव्य को भंवरे सेवन करने लगे। हाथी अपने चारों पैरों से पाताल तक को दबाते हुए चले। उन पर लगे झण्डे बहुत आसानी से आकाश-लोक तक को मापने लगे, भूमि पर उनके धक्कों को (पाताल) में शेषनाग ने सिर पर सहन किया। और गर्वोन्नत्त किलों की भाँति शक्ति से भरकर मदोन्नत्त चलते ये अड़ियल हाथी ऐसे ही दिखाई देते थे जैसे पहाड़ आ रहे हों।।

धका काळ का ब्याळ पीठाण धीठा।
दुती मेह री केहरी गेह दीठा।
सज्या गैमरांसींह आखेट सारू।
मंगाया हमैं हैमरां राव मारू।।113

सईसां थई हाजरी बाज-साळां।
गिरी थाप कंधां तुरी छन्दगाळां।
लगामां दई सांकड़ा तंग लीधा।
कसी ताग बागां वसीभूत कीधा।।114

सझी साखतां पिण्ड पोसाक सेती।
दुती जेवरां नेवरां ठौर देती।
चुभी चंचळा रै जिकां चंचळाई।
रच्या रूपरै ऊपरै लूंण राई।।115
ये काल के धक्के लगाने वाले और पीठ के धीठ (दृढ़) हाथी बादलों जैसे दिखाई देते हुए केसरीसिंह के आवास के पास दिखाई दिये, शिकार के लिये हाथी सज गये तो राजा ने घोड़े मँगवाये। घुड़शाला के सईस उपस्थित हुए, चंचल घोड़ों के कंधे थपथपाये गये। घोड़ों की लगामें लगाई गईं और तंग कसे गये, रस्सियों से उन्हें वशीभूत किया गया। पोशाकों से घोड़ों को सजाया गया, नेवरी (पैरों का ही गहना) आदि आभूषण अपने स्थान पर चमक रहे थे। उनकी चंचल चमक बिजली को भी चुभ रही थी। घोड़ों के सजे हुए रूप पर राईलौन किया गया।।(जिससे कि कहीं नजर नहीं लग जाये)।

घली चाकरां पाखरां पीठ घोड़ा।
पड़ी लाख रां ठाकरां धाक पोड़ा।
दिया आण केकाण खोले दुळागा।
लड़ालूम है घालना घूम लागा।।116

ससी राह संजोग सी नाळ सूमा।
लसी कामरां चामरां कान्त लूमा।
गुही कन्धरां याल जंघाल गोणां।
छयाचाप श्रीखण्डज्योंसाप छोणां।।117

कळी केवड़ा की कि घोड़ा कनोती।
जगी दीपरी दो कि साँमीप जोती।
उजाळी छता नाचता नैण आछा।
पखै प्रोथ सैनाय दै पाय पाछा।।118
नौकरों ने घोड़ों की पीठ पर पाखरें डालीं, घोड़ों के पौड़ों (खुरों) की आवाज से कई लाख रुपये की जागीरवालों (बड़े-बड़े ही जागीरदारों) पर भी धाक पड़ी। घोड़ों की दोनों ओर (आगे व पीछे के पैरों की) रास रस्सियां खोली गई तो साज-सज्जा से ही लदे हुए चक्कर काटने लगे चन्द्रमा व राहु के संयोग-सी घोड़ों की खुरतालें और उन पर सज्जित चँवर व लूमें कामदेव की भी शोभा बढ़ाने वाली थी, तीव्र गति से चलने वाले उन घोड़ों की गर्दन के बाल गूंथे हुए थे जिनकी लॉ चन्दन के धनुष पर लटके हुए सांप के बच्चों सी लग रही थी। घोड़ों की कनौती (दोनों कान) केवड़े की कलियों अथवा दो दीपकों की ज्योति जैसी लग रहीथी, बन्दनवार सहित नाचते हुए घोड़े नेत्रोंको अच्छे लग रहे थे, उनकी दो नासिका शहनाईयों से भी बढकर लग रही थी।

जिलै अंग कोमाचरी काच जेही।
करै मन्दुरां-मांडणां छन्द केही।
जिको धाव चक्री जिसा आवजावां।
पलट्टै तिके पातुरी भाव पावां।।119

लहै पार प्राकार रो रान लागां।
मलंगां भरै माकड़ा जेम मागां।
तियां गोळहू लोळ धारा तरच्छी।
बहै छेकता छोणि बे बे बरच्छी।।120

छकारा रळे ओझळै देखि छाहां।
विपच्छांबळे बच्छ संपेख बाहां।
बदै झोक भूलोकरा लोक बाधा।
लख्या शेर तोखार तय्यार लाधा।।121
उनके शरीरों की द्युति काँच जैसीथी, घोड़े कौतुक करतेहुए घुड़शाला की शोभा बढ़ा रहे थे, वे चक्र में दौड़ते और पलट पर ही नर्तकियों की भाँति पैर पलटते थे। व एड़ लगाने पर वे परकोटा भी लांघ सकते थे। और मार्ग में बन्दरों की भाँति ही कूदते थे, कभी गोलाई (गोलकुंडा) में दौड़ते और कभी एकदम चंचल होकर तिरछे दौड़ने लगते, ऐड़ लगाने पर दो-दो बरछियों की लम्बाई तक कूद जाते। वे अपनी छाया देखकर ही हिरणों के बच्चों की भाँति ही चमकते थे, उन्हें देखकर विपक्षियों की छाती जलती थी, संसार के सभी लोग ही उन्हें वाह-वाह कहते थे। कुंवर शेरसिंह ने देखा तो सभी घोड़े तैयार मिले।

पखै जाय रैबारियां ऊंट पेख्या।
परै रोप पावां सुभावां परेख्या।
डरावै भरै डाच रोसैल डाकी।
कसै बोम हं भोम ऊभा कजाकी।।122

नथी आदरै नाक नीचा नमाणा।
खड़ा फँखड़ा झाटकै काट खाणा।
नखां पीटिया बेळचा बीट नाकां।
बपां ढाळिया राळिया हाथ बाकां।।123

चकै छैल ज्यों फीफरां फैल चाबै।
तरां घाल नासां का नीठ ताबै।
मंडाया जरां जीन आखाड़ मल्लां।
गजां गञ्जता गाजआवाज गल्ला।।124
उसने पास जाकर रेबारियों के ऊँटों को देखा, अपने पैरों पर दूर ही खड़े रहकर ऊँटों के स्वभावकी परीक्षा की, ये विशाल व क्रोधित ऊँट मुँह फाड़ कर काटने जैसे डाकी लगते थे, ये डाकी भूमि पर खड़े हुए ही आकाश से रगड़ खाते थे, और वे नकेलों के बन्धन को भी नहीं मानते और वे खड़े-खड़े पिछले पैरों के बन्धन रस्सी को झटके देते, जैसे किसी को काट कर खाएंगे, रैबारियों ने उन ऊँटों के नखों को पीट कर उनके नाकों में गुंथी हुई रस्सियाँ डाली। (नकेल ऊँट के एक ओट में डाली जाती है, और बेलचा दोनों ओर ही डाला जाता है), उनके शरीर को झुकाकर उनके मुँह में हाथ डाले। ऊँट अपने फेंफड़ों को मुँह में से निकाल कर (गर्जना करते हुए) मस्त छैलों की भाँति लग रहे थे। नाकों में डोरी (बेलचे के अलावा) डाल कर उन्हें कठिनाई से वश में किया, उन अखाड़े के पहलवानों जैसे ऊँटों पर जीन (काठियाँ) रखी गई तो वे हाथी की आवाज को भी मात देने वाली गर्जना करने लगे।

चढ्याँ पालणां हालणां हेक चांटे।
छक्या झूठ हूं माकड़ा पूठ छांटै।
हुआ सज्ज पाकेट आखेट हल्लै।
पुळे प्रेरियां पन्थ सौ कोस पल्लै।।125

संभ्या सेर रै सूर सामन्त सागै।
जिका आंखियां डांखियां जेम जागै।
गढ़ां भांण केवांणरै पांण गञ्जै
भुजां भूमि आकासरो बीच भञ्जै।।126

हमारां हणौ हेक सामन्द हेळा।
बणै कुम्भ काली तणा जंग बेळा।
जसां जूसरां दूसरां दाब जूपै।
सटै चूण रै लूण रै सीस सूपै।।127
उन पर चढ़ने पर एक ही दौड़ में (सवार को) ऐसा लगता है जैसे सवार पालने पर बैठे हों, वे ऊँट मस्ती में धके हुए अपनी पृष्ठ भाग पर पूँछ से झपट्टे दे रहे थे। वे ऊँट सजकर शिकार के लिये चले, वे ऐसे तेज ऊँट थे जो प्रेरित करने पर एक ही दौड़ में सौ कोस की दूरी तय करते थे।।(सौ कोस के पल्ले का ऊँट एक मुहावरा है)’ कुँवर शेरसिंह के साथ शिकारके लिये जो सामन्तगण सजे। उनकी आँखें भूखे शेर की आँखों की ज्योति के समान तीव्र दिखाई दे रही थी। वे अपनी तलवारों से गढ़ों का मान-मर्दन करने व अपनी लम्बी भुजाओं से भूमि और आकाश के बीच की दूरी मिटाने में समर्थ थे। वे समुद्र की उतंग लहरों को पराजित करने वाले थे, वे युध्द के समय अपने सिर को भी पागल औरत के घड़े के समान तुच्छ समझते थे, वे अपने सुयश के जूड़े में जुड़े हुए दूसरों को दबाने में जुट जाते थे। वे आटे और नमक के बदले अपने शीश को न्यौछावर करने वाले थे।

विजै कान्त-विक्रान्त आजान-बाहू।
रचै खेत में दोयणां केत राहू।
करै पैज भारत्थ पारत्थ की सी।
सुणै बंब बीजां बणै काच सीसी।।128

दळां मार धारूजळां मोड़ देवै।
लखे आवता आभ नै दाब लैवै।
कंवारी घड़ां भेळणा जंग काला।
बिलाला अछी अच्छरां बच्छ बाला।।129

कटारां छुरां धारि धानंख कूतां।
खिजे रूक बन्दूक झाली अखूतां।
लड़ेवा अड़े गैण ऐफैण लीधा।
दुबाहां भड़ां पागड़ां पांव दीधा।।130
विजय के स्वामी शूरवीर जिनकी भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती थीं, वे रणक्षेत्र में शत्रु को राहु-केतु बना देते थे। वे महाभारत में अर्जुन के समान दृढ प्रतिज्ञा करते हैं और दूसरों (विपक्षियों) के नगाड़े सुनकर कांच की शीशी की भाँति ही (समाप्त होने को) तत्पर हो जाते हैं। वे शत्रु सेना को अपनी तलवारों की मार से भगा देते हैं और स्वयं आकाश को गिरता हुआ देखकर (अपनी भुजाओं से) थाम लेते हैं, वे ऐसी सेनाओं को जिन्हें किसी ने ललकारा नहीं है, नष्ट कर देते हैं। वे युद्ध में दीवाने (पागल) हो जाते हैं। वे उदारमना अल्पायु की परीयो, अप्सराओं से लाडले हैं (अर्थात् युद्ध में ही मरणोपरान्त उन्हें अप्सराएँ वरण कर हैं) उन्होंने कटारियां, छुरे, व धनुष धारण कर लिये हैं। उन जल्दबाजों ने खीजकर बन्दूकें भी संभाल ली है। और लड़ने के लिये वे आकाश से लग गये है और सब ने अफीम ले ली है, इन शूरवीरों ने अपने पैर घोड़ै व ऊँटो के पागड़ों में डाल दिये है। अर्थात सवार हो गये हैं।।

विषेश टिप्पणी:- अमृत मंथन के बाद चन्द्रमा ने भगवान विष्णु से शिकायत की कि एक राक्षस भी अमृत पी गया है। इस पर विष्णु ने अपने चक्र से उसका सिर काट दिया। धड़ तो राहु और सिर केतु रह गया, परन्तु राक्षस कुछ अमृत पी चुका था अतः राहु और केतु दोनों अमर हो गये। शूरवीर अपने ही शत्रुओं के सिर काट कर उन्हें राहु-केतु बना देते हैं।।

तयारी हुवा सींह आखेट ताई।
कड़ाजूड़ ऊभा कहै जेज कांई।
लख्यो साथ नैं सेर भारत्थ लाडै।
जमाजां गजां धूरजां जोम जाडै।।131

सिकारी सबै अंग पोसाक साझी।
झली पांण हूं ढाल केवाण जाझी।
चढ्यो फील माथै मढ्यो वीर चाळां।
मच्यो घोक भूलोक बम्बी त्रमाळां।।132
वे सिंह की शिकार के लिये तैयार हुए, व सुसज्जित होकर कहने लगे कि अब देरी किस बात की है, युद्ध प्रेमी कुंवर शेरसिंह ने अपनी सेना को देखा, ऊँटों, हाथियों व घोड़ों को बड़े जोश में पाया, सब शिकारी पोशाकों में सजे हुए थे, उन्होंने हाथों में ढालें व बड़ी तलवारें ले रखी थी। वीरता की चंचलता से आच्छादित वह वीर हाथी पर चढ़ा। युद्ध के नगारों व नौबत जिन्हें एक डंके से बजाया जाता था का शोर ही भूमण्डल पर छागया, हाथियों की चिंघाड़ की प्रतिध्वनि से पहाड़ गूंज उठे। ढोलों व नगारों की ध्वनि से बादलों का गर्जन भी लज्जित हो गया।

विषेश टिप्पणी:- युद्ध में क्षेत्र में जाते समय सभी सैनिक अफीम लेते थे, जिससे उनका साहस भी बना रहता था तथा मृत्यु होने पर प्राण भी ऊर्ध्वगति से मुंह होकर ही निकलते थे।

गिरन्दा गजां गाज गोरम्भ गाज्यो।
लखे मादळां बादळां नाद लाज्यो।
हमल्लां ढळां हूंकळां बाज हेसां।
दहल्लां गई फूट देसां विदेसां।।133

सझ्या द्वन्द आरम्भ ज्यों जम्भ साथै।
महादेव रौ नैण कै मैण माथै।
धिक्यो राम कै राकसां राजधानी।
किनां कुम्भ रो नन्द सामन्द कानी।।134

खिज्यो बीरभद्रेस कै दच्छ खेधी।
बढी पैज के पत्थ जैद्रत्थ बेधी।
धजाबन्ध लै चक्र आगो धिकायो।
छड़ाळां छड़ाभास आकास छायो।।135
सेना के हमले और हुँकारों (हल्ले) व घोड़ों के हींस से (हण-हणाहट) जो दहशत हुई वह देश-विदेश तक फैली, जैसे इन्द्र का हमला जम्भासुर पर हो अथवा महादेव के नेत्र कामदेव पर पड़े हों अथवा राम ने राक्षसों की राजधानी लंका पर चढाई की हो या अगस्त्य ऋषि समुद्र की ओर बढ़े हों अथवा वीरभद्र (महादेव का एक गण जिसे दक्ष प्रजापति के यज्ञ को नष्ट करने भेजा गया था) दक्ष को खेद पहुँचाने बढ़ा हो अथवा पार्थ भी (अर्जुन) अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह करते हुए जयद्रथ को मारने चला हो इस प्रकार राजा ने सेना को आगे बढ़ाया। भालों की पंक्तियों से आकाश छा गया।

भरै डांण केकाण मोडांण भन्ती।
दगै दिगज्जां तुल्य जाजुल्य दन्ती।
छत्री पन्ध आखेट पाकेट छेड़ै।
किनां ताखड़ा माकड़ा लंक केड़ै।।136

म्रगां भूपरै ऊपर कूच मंड्यो।
खुरां खेह खद्योत रो द्योत खंड्यो।
हजारां करां मोर रो हार हूगो।
परां ध्वान ग्रीधां नरां कान पूगो।।137

खड़े जोध आया चढे क्रोध खाथा।
भिडे मूंछ भूहां अड़े आभ माथा।
सझे आंवळा झूळ सादूळ सूधो।
रसा-मद्र रा माडणां अद्र रूधो।।138
घोड़े हिराणों की भाँति छलांगे लगा रहे थे हाथी दिशाओं के हाथियों की भाँति बहुत देदीप्यमान हो रहे थे। जवान ऊँटों को क्षत्रियों के पंथ (शिकार) हेतु चलाया, मानो उतावले बन्दर लंका की ओर चले हों। मृगराज (सिंह) पर जो चढ़ाई हुई उसमें जानवरों के खुरों की रेत से सूर्य की ज्योति खंडित हो गई। हजारों किरणों वाले (सूर्य) की दशा मोर की आकृति वाली खूटी द्वारा निगले हुए हार की सी हो गई। (अर्थात् सूर्य की ज्योति मन्द पड़ गई), गृद्धों के परों की आवाज मनुष्यों के कानों में पहुँची। योद्धा क्रोधित होते हुए चढ़कर जल्दी आये। उनकी बांकी मूंछे भौंहों को छू रही थी और उनके उन्नत सिर आकाश को रहे थे। सेना सजकर सिंह को मारने हेतु आई। मारवाड़ के आभूषणों (क्षत्रिय सरदारों) ने पहाड़ को रौंद दिया।

विषेश टिप्पणी:- राजा विक्रमादित्य को जब शनिश्चर की दशा लगी तो उसके प्रभाव से मोर की आकृति की खूटी हार को निगल गई।

हणेबा बणेराव रा दाव हेर्या।
घणाँ ठाकराँ भाखराँ आय घेर्या।
लगी जोर हूँ सोर सींधू ललक्काँ।
पड़ी बाघणी कान खूटी पलक्काँ।।139

लखी फोज लंकाऴ रै खोज लागी।
जऴाबोऴ बीजूजऴां आग जागी।
हुवै भाखरां पाखती बीर हाका।
पड़ै चंचऴां हैल सेलाँ पऴाका।।140

तरारां भरै गैंण तोखार तीखा।
सरै व्याव पंखाऴ पब्बे सरीखा।
चटीठै रदां लागिया ऊंट चाऴै।
रूखां सैल सांमी मुखां झाग राऴै।।141
उन्होने सिंह को मारने के दाव ढूंढे, बहुत संख्या मे ठाकुरों ने पहाड़ौं को घेर लिया, सिंधु राग की ललकारों का जोरदार शोर सोती हुयी सिंहनी के कानों मे पड़ा और उसकी पलकें खुली। उसने सिंह के पीछे लगी हुई सेना को देखा, तलवारों की आग जलती देखी, पहाड़ों के पास ही वीरों की गर्जना हो रही थी, सेल अणी की चमक बिजली की चमक के समान दिखाई दे रही थी। तेज घोड़े भी छलांगे लगा रहै थे। हाथी ऐसै दौड़े चल रहे थे, जैसै पंखो वाले पहाड़ चल रहे हों। ऊँट भी अपने दाँत पीसते हुये कौतुक कर रहे थे, वे पहाड़ों की और रूख करके अपने मुख से झाग छोड़ रहे थे।

भणें मार जोधार तोकै त्रभागा।
लखीजै भुजाडंड ब्रह्मड लागा।
इसै रूप हूँ भूपती दीठ आयो।
गजां – गाहणी नाह सूतो जगायो।।142

सती रा पती ऊठरै काय सोवै।
जमीं रा धणी ताहरी राह जोवै।
बजे सींधवो राग फोजाँ बकारै।
थई थाहरां घेर चौफेर थारै।।143

दळाँ भंजणाँ ऊठ जोधा दकालै।
घणाँ रोस हूँ मोसराँ हाथ घाले।
अड़ेबा खड़े दूर हूँ सूर आया।
जुड़ेबा किसूं जेज लंकाळ जाया।।144
भालों को धारण किये हुए योद्धा मार मार के शब्द गुंजा रहे थे, उनकी लम्बी भुजाएं आकाश को छूती दिखाई देती थी। इस रूप में जब राजा को देखा तो सिंहनी ने अपने सोते हुए पति को यह कहते, हुए जगाया कि- “हे सती के पति सोता क्या है, उठ। पृथ्वी के स्वामी तेरी बाट जोहते हैं” युद्ध की राग बज रही है, फौजें तुझे ललकार रही हैं, तेरी गुफाओं को चारों ही ओर से घेर लिया गया है। हे सेनाओं का मर्दन करने वाले उठ, तुझे योद्धा ललकार रहे हैं, वे बहुत क्रुद्ध होकर मूंछों पर हाथ रख रहे हैं। वे शूरवीर लोग दूर से चलकर युद्ध करने आये हैं। हे सिंह (सिंह पुत्र) भिड़ने में क्या देर है।

दमंगा झडै चापडै अद्र दाजै।
बळी वल्लहा जाग त्रंमाळ बाजै।
सुण्या सींहणी वैण सादूळ सूतै।
उणींदा दृगां अंग मोड्या अखूतै।।145

तसीला लई पिण्ड भूडंड ताणे।
इणी भांति बोल्यो खुसी चित्त आंणे।
झकै काय कंठीरणी बैण झूठा।
पडै रावतां पांव मोसू अ’पूठा।।146

दकालै किसो सूरमो सारदूळा।
बण बात साखात पत्रां बघूळां।
खिस्यो राजवी मूझ आखेट खेले।
झळा जेठ री हाथळां फेट झेले।।147
प्रिय जाग, युद्ध चौड़े में बन्दूकें चल रही हैं, जिनसे पहाड़ तप्त हो रहा है। हे बड़े बलवान के नगाड़े बज रहे हैं। सोते हुए सिंह ने सिंहनी के वचन सुने और उस उतावले (जल्दबाज) सिंह ने उनींदी आँखें होते हुए ही अपना शरीर मोड़ा (आलस्य दूर किया), सिंह ने भुजाएँ लम्बी करके मरोड़े लिये और चित्त में प्रसन्नता लाकर इस प्रकार बोला- *”सिंहनी तू झूठे वचन बोल कर क्यों बकवास करती है, मेरे सामने रावों के पाँव उलटे पड़ जाते हैं। ऐसे कौन-से शूरवीर हैं जो कि सिंहों को ललकार सकते हैं, वे भारी चक्रदार आंधी (भतूलिया-वातूळ) में पत्तों की भाँति से उड़ते दिखाई देंगे। ऐसा कौन सा राजवी (राजाओं का वंशज) है जो मेरी शिकार खेले, जो जेठ की लू के थपेड़े और मेरी हत्थलों (आगे के पंजों) की झपट सहन कर सके।

भलां मेहरी गाज हूँ देह भांनै।
कहै जीह जावां किसो सींह कांनै।
अग्राजै गिरां कन्दरां कन्ध आँडै।
महाकाळ जंग लंकाळ माँडै।।148

कथै आज कंठीरणी वैण केहो।
अडै जुद्ध मोसूं किसो भूप ऐहो।
धणी देखरै ग्रीधणीं गैंण धाई।
जपै बैण झूठा नथी सींह जाई।।149

गजां गाज आवाज तासा तबल्लाँ।
हुवै रीस री ताहरै सीस हल्लाँ।
जिका जाहराँ नाहराँ बेध जाणै।
तिका वीर तो ऊपरै तीर तांणै।।150
ऐसा कौन है जो वर्षा की गाज (बिजली) से अपनी देह को नष्ट कराये और कौन है अपनी जिह्वा से सिंह के समीप जाने की बात कह सकता है। (कौन है) जो पहाड़ों व गुफाओं के कंधे पर अग्रणी होकर चल सकता है। कौनहै जो इस सिंह महाकाल (यमराज) से भी युद्ध करता है, हे सिंहनी आज तू यह कैसे वचन बोल रही है, ऐसा कौन-सा राजा है, जो मेरे से युद्ध में भिड़ सकता है। सिंहनी ने कहा “हे स्वामी तुम देखो, आकाश में गिद्धनियाँ चक्कर लगा रही हैं। सिंह की पुत्री कभी भी झूंठ नहीं बोलती है। हाथियों की चिंघाड़ व तासों व तबलों का शोर” तेरे सिर पर क्रोध का हमला हो रहा है जो प्रगट (खुले) में सिंह मारना जानते हैं। वे वीर तेरे पर तीर तान रहे है।
सिंह की शिकार में हाका कराया जाता है जिसमें ढोल, तासे-तबले आदि शोर करने हेतु काम में लिये जाते हैं।

बणी डाकणी बेख बैंडी बन्दूकां।
रजा काळ की सी झुकी भाळ रूकां।
छछोहा महावीर तोकै छड़ाळा।
अड़ी खम्भ मारूधरा थम्भ वाला।।151

कराँ मोसरा राळियाँ चाळ कीजै।
जिकाजार लंकाळ कै काळ जीजै।
बरूथाँ गजां गंजणी एम बोली।
खुजातै भुजा डांखियै आंख खोली।।152

दृगा देख सुण्डाऴ झण्डा दकूळां।
प्रलैकाळ रूपी हुवो झाळ पूळां।
करे पूंछ आछोट गुंञ्जार कीधी।
लड़ेवा अड़े आभ हूं झंम्प लीधी।।153
बांकी बंदूके डाकिनी वेष (समान) बनी हुई थी, तलवारें काल की आज्ञा से झुकी हुई सी दिखाई दी, छरहरे (गठीले) वीर भालों को समा रहे थे, वे वीर मरुधरा के स्तम्भ थे, (कुचामन ठिकाना मारवाड़ के स्तम्भों में गिना जाता था) वे वीर मूछों पर हाथ रखकर कौतुक कर रहे थे, उन्हें इस तरह सहन करके सिंह कितने समय और जीवित रहेगा ? हाथियों के झुण्डों समूहों को नष्ट करने वाली (सिंहनी) ने ऐसा यह कहा। अपनी भुजाओं को खुजलाते हुए क्रोधित होकर सिंह ने आंखें खोली, और आंखों से हाथियों के झुण्डों और पाखरों को देखकर वह प्रलयकाल की भाँति ही क्रोध की ज्वाला से प्रज्जवलित हुआ। व पूँछ को ऊपर करके उसने सिंहगर्जना की युद्ध करनेके लिये उसने आसमान में ऐक छलांग मारी।

छटा कोप कै तोप हूँ तीर छूटो।
त्रियो नैण कै गैण नक्षत्र तूटो।
हजारां भड़ां ऊपरै हेक हाल्यो।
चढै धेक बज्राग रै भेक चाल्यो।।154

कमे जोर हूं घोर हुंकार कीधो।
लखे सूरमा सोर ज्यों मौर लीधो।
करां ठाकरां चाप टंकार कीना।
तपक्का झली हैनरी मारटीना।।155

लखे शेर नू सेर केवाण लीनी।
भुवारां भिड़ी मोसरां रोस भीनी।
कह्यो साथ नूं लोह छूटो न कीजै।
लड़ाई उभै शेर री देख लीजै।।156
जैसेकि बिजली का कोप हुआ हो अथवा तोप से तीर छूटा हो अथवा महादेव का तीसरा नेत्र खुला हो अथवा आकाश से उल्कापात हुआ हो। हजारों योद्धाओं पर अकेला बढ़ा, हट करके ही बज्र की भाँति चला, जोर करके घोर हुंकार की शूरमाओं को देखकर जैसे बारूदने आग पकड़ ली है। ठाकुरों ने हाथ से अपने धनुषों की टंकार ली और “हैनरी मार्टिन” की बन्दूकें पकड़ी, सिंह को देखकर कुंवर शेरसिंह ने हाथ में तलवार ली, क्रोध से सनी उसकी मूंछे भुंआरे के जालगी, साथियों को कहा कि कोई प्रहार मत करो और दो शेरों की लड़ाई देखो।
यह हैनरीमार्टिन (Henry Martin) बड़ी शिकार के लिये विदेशों में बनी हुई विशेष बन्दूकें थीं।

धकै चाढ़िया हेक नै हेक धायो।
जुड्यो हेक हूँ हेक लंकाळ जायो।
लथोबत्थ ह्वैतां घणां रंग लागा।
बणी रो अणी रो धणी जंग बागा।।157

जरासन्ध भीमेण रै रूप जूटा।
छछोहां घणां सांधणां मोह छूटा।
दहूँ हाथळां ढाल हूँ पाल दूरा।
भिड्यो खाग हूँ वाह रै बाघ भूरा।।158

मृगाधीस रै सीस केवांण मारी।
धनो बंसरा भांण आहंस-धारी।
हुआ टूक जूजू भली भांत हूँताँ।
हणी साबणी पांत ज्यों तांत हूँताँ।।159
दोनों शेर एक दूसरे के सामने दौड़े। दोनों शेर भिड़ गये, दोनों ही गुत्थमगुत्था होकर कुश्ती लड़ने लगे तो उनको बहुत अधिक साधुवाद (शाबासी) मिले। वन के स्वामी और सेना के स्वामी युद्ध में जुट गये हों, व (ऐसे लगा जैसे) जरासंध व भीम युद्ध में जुट गये हों। छरहरे (गठीले) शरीर के ही दोनों योध्दा उत्थाह से भरे मोह छोड़कर समीप आ भिड़े। कुँवर शेरसिंह ने दूर से ही अपनी ढाल पर सिंह की हत्थलों के प्रहार को झेल लिया और वह शूरवीर तलवार द्वारा सिंह से भिड़ गया। उसने सिंह के सिर पर तलवार मारी। धन्य है, हे साहसधारी वह वंश का सूर्य, सिंह के दो अलग-अलग टुकड़े हो गये, जैसे कि ताँत से साबुन की पंक्ति को काट देने से होते हैं।

मृगा इन्दनूं केहरी नन्द मार्यौ।
किना द्वन्द नूँ वीर बाली डकार्यौ।
भुजा ठोक कै भीम जीमूत भंज्यो।
गहे सम्ब स्वाराट कै जम्भ गंज्यो।।160

भिड़े कान्ह कै मल्ल चाणूर भांगो।
लयो कै अखौ मारि लंगूर लांगो।
लड़े शेर हूँ सेर सूतो सलूभो।
अड़े शेर हूँ सेर संग्राम ऊभो।।161

सती सींहणी पौढ़ियो पेख स्वामी।
बणी संग सैगामणी अंगबामी।
सताबी तजे मद्र रा छुद्र सैलाँ।
गया दम्पती अद्र कैलास गैलाँ।।162
मृगराज को केसरीसिंह के पुत्र (शेरसिंह) ने मारा, जैसे द्वन्द्व (राक्षस) को बाली ने समाप्त किया हो अथवा भुजा ठोककर भीम ने जीभूत राक्षस को अथवा वज्र को पकड़कर इन्द्र ने जम्भासुर (राक्षस) को मारा हो। अथवा कृष्ण ने चाणूर मुष्टिक (पहलवान) को मारा अथवा लंगड़े लंगूर (हनुमान) ने अक्षय कुमार मारा हो, कुँवर शेरसिंह से लड़कर सिंह शांत सो रहा था, और सिंह से युद्ध करके कुँवर शेरसिंह खड़ा था। सती सिंहणी अपने स्वामी को चिर निद्रा में सोता देख उसकी धर्मपत्नि सहगामिनी (सती) बन गई। मारवाड़ के क्षुद्र पर्वतों को छोड़कर शीघ्र ही वह दोनो दम्पति कैलाश के मार्ग पर चला।

लखेवा शिवा लालसा चित्त लागी।
जिया पिण्ड ज्यों सिद्ध समाधि जागी।
महम्माय पावां पड्या नाय मौळी।
बळे जाय मातंग-माळा बिरोळी।।163

क्षुधा मेटबा मोकळा मांस खाया।
पिया नीझरां नीर आराम पाया।
फिर्या ऐम कैलास पूरी अफेरा।
कृपा पात्र कात्यायनी मात केरा।।164
उनके मन में पार्वती के दर्शन करने की इच्छा जागृत हुई। दोनों शरीर ऐसे पुनर्जीवित हो गये जैसे समाधि से जागे हों। दोनों शरीर सिर नमा कर महामाया ( (पार्वती) के चरणों में पड़े। फिर जाकर हाथियों की पंक्ति को नष्ट किया। उन्होंने अपनी भूख मिटाने के लिये बहुत मांस खाया, प्यास बुझाने के लिये झरनों का पानी पिया और विश्राम किया, इस प्रकार फिर कात्यायन (कार्तिकेय) की माताजी (पार्वती) के इन कृपापात्रों ने पूरे कैलाश पर्वत का चक्कर लगाया।

।।छप्पय।।
लखि समीप शिव लोक, ललित थाहर मग लग्गिय।
प्रवसि पुब्ब तन प्रान, जुगल सोवत सम जग्गिय।
बन्दि मात अम्बिका, बहुरि किय त्रम्बक वन्दन।
मन क्रम वचन मनाय, निखल दुख द्वन्द निकन्दन।
निज ठौर आय अधिकार निज, उग्र पुन्य अंकुर उदति।
कालिका सेव लग्गे करन, जम्पति सुख सम्पति जुगति।।165
कैलाश पास में आया देखकर ये अपनी सुन्दर थाह (घाटी या गुफा) के मार्ग चले, अपने पूर्व जन्म का शरीर व प्राण पाकर दोनों को ऐसे लगा जैसे सोने के बाद जगे हो। जो समस्त दु:ख द्वन्द्वों का नाश करने वाले हैं, माता पार्वती व शिवजी की पुनः वन्दना की। अपना स्थान व अधिकार पा कर उनके पहले के पुण्य अंकुरित अथवा उदित हुए। सुख ष सम्पति पा कर युक्ति से वार्तालाप करने व माता पार्वती की ही सेवा करने लग गये।

भिर कुमार इंह भांति, मार डारिय मृग मारन।
असु पठाय शिव ओक, धड़छि विग्रह खग धारन।
कसि बारन मृत काय, शहर कौतुक विस्तारन।
प्रबिदारन जय पाय, निनादि सहनाय नगारन।
बरहास खास असवार बनि, महावीर मरदां मरद।
प्रति बाग सेन हंकिय प्रबळ, ग्रह मण्डळ ढंकिय गरद।।166

दिय पठाय पुर दूत, विजय वृत्तान्त बखानन।
अविलम्बित तिंह आय, अरज अक्खिय नृप आनन।
पंञ्चानन तव पुत्र, मरद दोउन रन मण्डिय।
वाहन चण्डिय वीर, खड़ग खेटक बळ खंडिय।
सुनि राव बहादुर विजय सुत, करि सराह उच्छाह किय।
मिथला पिनाक भंजन मनुहं, समाचचार दशरथ सुनिय।।167
कुंवर शेरसिंह ने इस प्रकार सिंह-सिंहनी के शरीरों को तलवार से काटकर उनके प्राण कैलाश पर लौटाये उनके मृत शरीरों को हाथियों पर कसकर बांधा दिया और शहनाई व नगाड़ों की ध्वनि बजवाते हुए खास घोड़े पर सवार होकर मर्दो में मर्द महावीर (कुंवर शेरसिंह) ने अपनी सेना को मार्ग की ओर चलाया, जिसकी गर्द से सूर्य-मण्डल (आकाश) आच्छादित ही हो गया, उसने अपनी विजय के वृत्तान्त का वर्णन करने के लिये दूत नगर (कुचामण) को भेजे, दूतों ने शीघ्र नरेश के सम्मुख आकर निवेदन किया कि आपके पुत्र ने सिंह युगल से युद्ध किया और देवी-वाहन (सिंह) के बल को ढाल तलवार से नष्ट कर दिया।

सुभ उदंत सुनि श्रोन, नरन अन्दर नर नायक।
श्री मुख कंवर सराहि, बदन लग्गो यह बायक।
बन्दूकन बप बेधि, वीर बहु बाघ विहंडन।
दुल्लभ सरभ दकाळि, खड़ग खेटक गहि खंडन।
करबान झारि जित्यो कलह, पार पारि रजपूतपन।
भट अग्रगन्य यह बेर भुव, धन्य सेर शेरन निधन।।168
राव बहादुर केसरीसिंह ने पुत्र की विजय का समाचार सुनकर सराहना की व वहां उत्सव मनाया, मानो राजा दशरथ जी ने (रामचन्द्रजी द्वारा) मिथिला में धनुष भंग होने का समाचार सुना हो। शुभ कथा को कानों से सुनकर नरों में नायक (प्रमुख) ने श्रीमुख से कुँवर शेरसिंह की प्रशंसा की और मुँह से ये वचन कहे- “बंदूकों से तो सिंहों को बहुतों ने मारा है परन्तु सिंह को ललकार कर तलवार व ढाल पकड़ कर मारना एक दुर्लभ कृत्य है, तलवार चला कर जिसने युद्ध जीता है, जिससे रजपूती को पार लगाया है, जो इस काल में पृथ्वी पर योद्धाओं में श्रेष्ठ हैं, वह सिंह संहारक शेरसिंह धन्य है”। महाराज (केसरीसिंह) राजभवन में सभा आयोजित कर बिराजे, नगारों का घोष ऐसा हुआ जैसे बादलो ने गरज रहे हों।

विशेष टिप्पणी:- मारवाड़ राज्य की अनुशंसा पर भारत की ब्रिटिश सरकार ने ठाकुर केसरीसिंह को “राव बहादुर” की उपाधि दी थी।

राजभवन महाराज, विहद सद जोरि विराजिय।
आवाजिय आनध्द, गगन मानहुँ घन गाजिय।
कर बीनन झनकारि, निपुन गायक पनवारिय।
तान गान तन्डवन, विरचि सांगीत विद्यारिय।
धुनि राग रंग मंगल धमल, उत गुनवानन उच्चरिय।
आगम कुमार समचार इत, पत्तन जन कानन परिय।।169
निपुण संगीतज्ञों ने हाथ में वीणा लेकर झंकार की नृत्यकियों ने नाच प्रस्तुत किये नाच गायन व संगीत की रचनाएँ सुनाई गई, कलाकारों ने राग-रंग व मंगल गीतों का उच्चरण किया। इधर कुँवर (शेरसिंह) के लौट आने का समाचार नगर के लोगों के कानों में पड़ा।

अविलम्बित तजि ओक, लोक कौतुक मग लग्गिय।
संदूतन संबाद, जिलह नूतन जगमग्गिय।
धावत धरत न धीर, करत आवत कोलाहल।
जेज न सहत जईफ, बहत केवल हीमत बल।
तक्कत कुमार मारग तरफ, कवि शुमार सक्कत कहि न।
बाजार सदर अन्दर बहुल, नरन भीर मावत नहिं न।।170
लोगोंने भी अपने घर छोड़ कर शीघ्रता से कौतुक करते हुए मार्ग को पकड़ा। लोग समूहों में बातचीत करते नई शोभा की जगमगाहट देखने चले, वे अधीर होकर दौड़ने लगे और कोलाहल करते हुए आने लगे। वृद्धजन भी देरी सहन नहीं करके केवल हिम्मत के बल चल रहे थे। वे सब कुँवर (शेरसिंह) के आने के मार्ग की ओर तक रहे थे, उनकी गिनती कवि भी नहीं कर सकता। भीड भी़ इतनी थी कि मुख्य बाजार में भी नहीं समा पा रही थी।

जुवति सहंसन जूह, हुलसि हंसन सम हल्लिय।
सजि सोरह शृंगार, चरन होरह मग चल्लिय।
मुदित मन्द मुसकात, उदित सिंजत चहुँ ओरन।
जिय नाजुक संजुकत, झुकत मारुत झकझोरन।
कुच पीन मत्त बारन कलस, खीन लंक भार न खमत।
परतच्छ बदन तारन पतिय, कौतूहल कारन क्रमत।।171

तम्बेरम गति तुच्छ, लगत जिहं गौन बिलोकत।
कंठीरव सकुचात, लंक सुच्छम अवलोकत।
खंजन मृगन खतंग, दृगन दोउन सम सुन्दर।
बिग्रह बिरचि बिरंचि, हसत मञ्जिय रचि हुन्नर।
लावन्य सुकवि पार न लहत, बाजारन अन्दर बढ़िय।
आगम कुमार कारन उमँगि, चौबारन ऊपर चढ़िय।।172
सहस्त्रों युवतियों का समूह प्रसन्न होकर हँसों की भाँति चल रहा था, सोलह शृंगार से सजी हुई युवतियाँ पैरों को मन्द गति से बढ़ाते हुए मार्ग पर चल रही थी। मन्द मन्द मुस्कराती युवतियों के गहनों की यह ध्वनि चारों ओर फैल रही थी। वह अपने नाजुक हृदय के साथ चलती युवतियाँ भी हवा के झोंके से झुक जाती थी। उनके छोटे-छोटे कुच (वक्ष) व सिर पर (बधाई) के कलशों के भार को उनकी पतली कमर सहन नहीं कर पा रही थी। प्रत्यक्ष चन्द्रमा के मुख जैसी (चन्द्रमुखी नारियां) कौतूहल के कारण चली जा रही थी। उन युवतियों की चालको देखकर उसके आगे हाथी की मन्द गति भी तुच्छ लगती थी, उनकी पतली कमर देखकर सिंह भी मन मे सकुचा जाताथा उनके दोनों नेत्र खंजन पक्षी की भाँति व हिरण की ही आँखों के समान (मृगनयनी) तीर की भाँति सुन्दर दिखाई देते थे। उनके शरीरों की ही रचना करके ब्रह्मा ने अपनी कला से हाथ धो लिया था।
(अर्थात् ब्रह्मा ने फिर ऐसे शरीरों की रचना करना ही बन्द कर दिया था)।

।।छन्द मोतीदाम।।
इतै पुर लोक बिलोकत ऐन।
उतै दल हांकिय ढंकिय गैन।
अचानक रूधि दिवाकर ओज।
फिरी घनमाल क बीरन फोज।।173

चहूँ बल सेलन को चमकाव।
सूं ज्यों दल बद्दल बीज सिलाव।
दिपै बक सिंधुर दन्त उदार।
फबै कर सीकर बारि फुहार।।174
कवि उनकी सुन्दरता का पार ही नहीं पा सकता। ये युवतियाँ बाजारों में आगे बढ़ीं और कुँवर (शेरसिंह) के आने की उमंग में चौबारों पर चढ़ गई। इधर नगर के लोग भवनों पर से देख रहे हैं, उधर सेना के चलने से धूलि से आकाश ढक गया। अचानक सूर्य की छवि धूमिल हो गई, वीरों की सेना आई कि जैसे बादलों की श्रेणी आ गई हो, चारों ओर सेना के सेल (भाले) चमक रहे थे जैसे बादलों में से ही बिजली चमक रही हो। हाथियों के बड़े दाँत बगुलों की भाँति शोभित हो रहे थे, हाथी अपनी सूंडों से फुहारें छोड़ते हुए शोभा दे रहे थे।

सरासन बासव-चाप सुभाव।
रचै तनि तारख दुन्दभि राव।
उभै असुहीन अभंगन अंग।
मरे जनु फोर परे उत्तमंग।।175

कुसूमल बुन्द लगी रन खेत।
दकूलन इन्द-वधू छवि देत।
मयूरन सूरन पूरन मोद।
बिथारथ पक्खर भेख विनोद।।176

प्रभागन चक्र चल्यो जय पाय।
भयो भट खेल ठयो भाय।
चलैं कत लच्छन चोट चलात।
छलैं कत राह बराहन छात।।177
योद्धाओं के धनुष इन्द्रधनुष की भाँति दिखाई देते थे। हाथियों की चिंघाड़ बादलों की गर्जन की भाँति थी। दोनों सिंह व सिंहनी प्राणविहीन शरीर ऐसे दिखाई देते थे जैसे वे सिर छोड़ के मरे हों रणक्षेत्र में लगी उनके रक्त की बूंदें कपड़ों पर इस प्रकार शोभा देती थी जैसे वीर वधूटियाँ (लाल) हों, ओरों को व योद्धाओं को पूर्ण आनन्द प्राप्त हो रहा था म घोड़ों के पाखर ऐसे उछल रहे थे जैसे मेंढक कूद रहे हों। सेना के विभिन्न दल विजयी होकर चले, सैनिक कई प्रकार के कौतुक कर रहे थे। कई लक्ष्य पर चोट करते चल रहे थे, कई मार्ग में छल कर शूअरों का शिकार कर रहे थे।

चखें खग केतन बान अचूक।
वधैं मृग केतक झारि बन्दूक।
फिरै प्रति माग पतत्रन फोरि।
करै प्रति गौनन श्रोन झकोरि।।178

किते दल तै सल अग्ग करंत।
भगूरन भेदि गरूर भरत।
दिखावट के भट घोरन दौर।
प्रभंजन मान विभंजन पौर।।179

गिरै जिन ठोकर तें खरगोश।
हरै परि संग कुरंगन होश।
फिरावत के असि चक्र फिराव।
भरावत डक्र किते मृगभाव।।180
कई पक्षियों को मारकर अपने ही अचूक वाणों की परीक्षा ले रहे थे तो कई बन्दूक चलाकर हिरणों को मार रहे थे। कई ऐक पक्षियों को मारकर पुनः मार्ग पर आ रहे थे, कई रक्त झाड़ते हुए लौट रहे थे। कई अपने ऊँटों को आगे दौड़ा कर के वातूल (भतूलिया) का गर्व भंगकर गर्वित हो रहे थे। कई योद्धा घोड़े तेज दौड़ा कर उनके पौड़ों से हवा का मान-मर्दन कर रहे थे। घोड़ों की दौड़ों से कई खरगोश धराशायी हो गये। हिरणों के साथ दौड़ लगाने से ही हिरणों को होश उड़ा दिये। कई योद्धा इन घोड़ों को चक्री की भाँति घुमा रहे थे तो, कई हिरणों की भाँति छलांगे लगवा रहे थे।

ऊमै दल अन्दर शेर कुमार।
तरारत पत्तन पन्थ तुखार।
इहै बिध गोपुर पुग्गिय आय।
लये दुव केहर देह बलाय।।181

बस्यो पुर अन्दर बीर बरुत्थ।
जुस्यो गज बाज जमाजन जुत्थ।
हयन्दन हेस गयन्दन गाज।
ऊझल्लिय सल्लन गल्ल अवाज।।182

धिगारन लागि नगारन ध्रीह।
बजारन ढंकिय शेर अबीह।
बिलोकिय द्रंग अलौकिक बेख।
निहारत नाहर सुन्य निमेख।।183
सेना के बीच कुँवर (शेरसिंह) घोड़े पर सवार होकर नगर के मार्ग पर चल रहे थे, इस प्रकार नगर के मुख्य द्वारा पर पहुँचे, साथमें सिंह-सिंहनी की डरावनी लाशें भी लिये हुए थे। इस प्रकार वीरों के इस दल ने नगर में प्रवेश किया, हाथी, घोड़ों, ऊँटों का जमघट लग गया। घोड़ों की हींस एवं हाथियों की चिंघाड़ व ऊँटों के गले की आवाज ऊपर उठी। डंकों की चोट से नगारों की ध्वनि उठी। निडर शेरसिंह ने बाजार को भर दिया। सारा नगर उनके अलौकिक भेष को देख रहा है, सिंह और सिंहनी को लोग शून्य दृष्टि की (टकटकी) लगाकर से देख रहे हैं।

जुरे नर-नारि हजारन जूह।
समात न आत तथापि समूह।
बदै कहुँ विक्रम सींह बखान।
सदै कहुँ सूरन शेर समान।।184

जपै कहुँ फौज पराक्रम जाप।
तपै कहुँ भीरुन शस्त्र संताप।
कहै कहुँ पंकज पानि पसारि।
हन्यो यह शेर कुमार हंकारि।।185

चढ़े कहुँ अट्ट निहारत चक्र।
डकावत बाज भरावत डक्र।
उदायुध देखत नैर उदार।
बगी चतुरांगिन बीच बजार।।186
लोग हजारों झुंडों में आकर एकत्रित हुए, फिर भी समूह इतने आये कि नगर में ही समा नहीं रहे थे। कई (शेर) सिंह के इस पराक्रम की प्रशंसा कर रहे थे। तो कई योद्धाओं को सिंह के समान बता रहे थे। कई जगह सेना के पराक्रम की प्रशंसा हो रही थी। कई कायर (नागरिक) शस्त्रों के ताप से संतापित (भयभीत) हो रहे थे। कई कह रहे थे, कि इस सिंह को कुँवर शेरसिंह जी ही ने ललकार कर अपने कर कमलों से मारा। कई लोग भवनों पर चढ़ कर सेना को देख रहे थे, कई घोड़ों को कुदाते व छलांगे लगाते देख रहे थे, नगर के लोगों ने देखा कि सेना शस्त्र ऊँचे उठा कर बाजार के बीच चल रही है।

भई थित आय महीपत भौन।
कथा कहि पार लहै कवि कौन।
कुसानुग बाज गहे ततकाल।
तजी भट वाहन पीठ उताल।।187

कंठीरव मारि बकारि कबन्ध।
बिजै करि शेर तजे कटिबन्ध।
बली बलवन्तन संजुत बीर।
हुवो पितु बन्दन को हमगीर।।188

सझी सह साथ नई पवसाक।
हुई हरवल्ल नकीबन हाक।
क्रम्यों नृप मन्दर शेर कुमार।
लये भट बंकट संघट लार।।189
नरेश के भवन (गढ़) पर आकर सेना रुकी उस स्थिति का वर्णन कौन कवि कर सकता है। सईसों ने तत्काल घोड़ों को पकड़ा, योद्धाओं में शीघ्रता से ही अपनी सवारियों की पीठ छोड़ी। सिंह (शेर) को ललकार कर मारने वाले राठौड़ ने विजय प्राप्त कर अपना कमर पट्टा खोला। वह वीर अपने बलवान साथियों सहित पिता को वन्दन करने को गया, सबने नई सुन्दर पोशाकें धारण कर रखी थीं, आगे नकीब (ढोली) जोर से विरुद की आवाज कर रहे थे। कुमार शेरसिंह अपने बांके योद्धाओं के समूह को साथ लेकर नरेश के महल में आँखों से महल का निरीक्षण किया।

पधारिय राव बहादुर पास।
निहारिय नैनन भास निवास।
मिले पितु पुत्र महा मतिमन्त।
जथा पुरहूत सपूत जयन्त।।190

लवी उपमा सुकवी हिंगलाज।
रबी पितु पुत्र छबी अंगराज।
पर्यो सुत बीर बिचच्छन पाय।
लयो पितु तच्छन बच्छ लगाय।।191

दुबाहन वृन्द जई समुदाय।
मिले छक उद्धत मुद्ध नमाय।
भये थित आसन संजुत भूप।
रची दुति देव सची पति रूप।।192
दोनों बुद्धिमान पिता-पुत्र ऐसे मिले जैसे देवराज इन्द्र और उनके सुपुत्र जयन्त मिले हों, सुकवि हिंगलाजदान ने भी यह उपमा चुनी कि जैसे सूर्य और उसके पुत्र कर्ण मिले हों। विचित्र वीर पुत्र पिता के चरणों में गिरा तो उसी क्षण पिता ने उसे छाती से लगा लिया, योद्धाओं का विजयी समूह अपने उन्नत मस्तकों को झुका कर मिला। नरेश भी अपने आसन पर सामंतों सहित बैठे ऐसे दिखाई दे रहे थे जैसे इन्द्र देवताओं के मध्य बैठे हों।

बिदारन सिंह कथा तिंह बार।
धुनीग्रह लाय सुनी छत्रधार।
कहे कवि कीरत केर कवित्त।
रहे रचि शेर शिकार चरित्त।।193

लयो चित दै कविता रस लाह।
सभाजुत जम्पिय वाह सराह।
कर्यो नवछावरि को कर्त्तव्य।
दरोगन भौन भस्यो वह द्रव्य।।194

कुचामनि कन्त करोलन काज।
दई मनवांछित रीझ दराज।
कलावंत बारबधू सिंह काल।
निवाजस पाय भयेसु निहाल।।195

बन्यो यह भाँति बिजै दरबार।
प्रभा कहि कौन सकै लहि पार।।196
उस समय नरेश ने सिंह को मारने का यह वर्णन कान लगाकर सुना, कवि(कुँवर की) कीर्ति के कवित्त बोल रहे थे, वे शेरसिंह द्वारा की गई सिंह की शिकार के चरित्र ही की रचना कर रहे थे। नरेश चित्त लगाकर काव्य रस का लाभ लेरहे थे और मौजूद सभासदों सहित ”वाह-वाह” कह कर के सराहना कर रहे थे। न्यौछावर करने की रस्म अदा की गई, न्यौछावरों में प्राप्त धन से दरोगों (दास जाति) के घर भर गये थे। कुचामण-पति (केसरीसिंह) ने करोलों को (शिकारखाने के कर्मचारियों) मनवांछित बड़ी रीझ (इनाम) दी, उस समय कलावंत (संगीतज्ञ) व नर्तकियाँ इनाम (पुरष्कार व पारितोषिक) पाकर निहाल हो गये। इस प्रकार विजय का दरबार लगा, जिसकी शोभा का पार कौन पा सकता है।

।।सन्यासी उवाच।।

।।दोहा।।
सक बिक्रम उन्नीस सै, ता ऊपर गत तीस।
बुध चवत्थि फग्गुन बिसद, मार्यो तदिन मृगीस।।197

ता नाहर की यह तुचा, भई हमारी भेट।
छन्दन में तू कर छतो, अतो चरित आखेट।।198

आज्ञा पाय अतीत की, बन्दि चरण तिहँ बार।
गायो सिंह शिकार गुन, सुच्छम मति अनुसार।।199

आदि बिंदायक आदि के, बन्दे पद अरबिन्द।
अब बन्दों अवसान में, नन्द जसोदा नन्द।।200
विक्रम संवत 1930 बुधवार, फागुन सुदी (शुक्ल पक्ष) की चौथ को सिंह को मारा गया, उस सिंह की यह खाल हमें भेंट की गई, उस शिकार का इतना वर्णन तू छन्दों में प्रमट कर। संन्यासी की आज्ञा पाकर और उनके चरणों की वन्दना करके मैंने अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार शिकार का गुणगान किया है। आरम्भ में श्रीगणेशजी आदि के चरण-कमलों की वन्दना की व अब अंत में श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ।

।।आर्या।।
वृन्दा विपन बिहारी, धारी कर सूक ग्राव गोवर्धन।
नाना विघ्न निकन्दन, वासुदेव जयति जग वन्दन।।201
आर्या वृन्दावन विहारी, हाथ के नख पर गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले, नाना प्रकार के विघ्नों का नाश करने वाले विश्व के वन्दनीय श्री कृष्ण की जय हो।

~~कविया श्रीहिंगलाजदान जी (सेवापुरा)

प्रेषित: राजेन्द्रसिंह कविया (संतोषपुरा सीकर)

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