भक्त कवि मुरारदानजी आशिया नोखड़ा

बीसवीं सदी में डिंगल़ रा केई सिरै कवेसर होया, जिणां आपरी सिरजणधारा सूं समाज नै नवो भावबोध अर साहित्य नै ऊंचाई दी। ऐड़ै ई विरल कवियां मांय सूं एक हा मुरारदानजी आशिया नोखड़ा। नोखड़ा आशिया चारणां रो गांम। जठै साहित्यकारां अर साहित्य सेवियां री एक लंबी श्रृंखला रैयी है। जिणांमें भैरजी आशिया, वांकजी आशिया आद कवेसर इण थल़वट में चावा हा। भैरजी रचित करनीजी रो चित इल़ोल गीत तो इतरो लोकप्रिय है कै सैंकड़ू जणां रै कंठाग्र है-

सबल़ तोरो देख सरणो, ओट लीधी आय।
भणै यूं कर जोड़ भैरूं, पड़्यो रैसूं पाय।
तो महमायजी महमाय, मोपर महर कर महमाय।।

इणीगत वांकजी रा मथाणियै रै वाणियां माथै कियोड़ी व्यंग्योक्ति घणी चावी है-

फाकै फाको न छोडियो, आसाम्यां नै ऐन।
मथरा ढाबी माजनां, बापां हंदी बैन!!

भल़ै ई केई जोगता कवि अर मिनख होया जिणां में इण जुग में मुरारदानजी, देवीदानजी, ईश्वरदानजी, माधूदानजी आद उल्लेखणजोग है। तो काव्य सिरजण रै प्रति रुचि राखणियां में आजरी युवा पीढी में चंडीदानजी अर भंवरदानजी आशिया रो नाम अंजस साथै गिणाया जा सकै।

मुरारदानजी आशिया नोखड़ा रो जलम जेठूदानजी आशिया रै घरै नोखड़ा (फलोदी) में होयो। आपरो नानाणो दासोड़ी (बीकानेर) रा रतनू जुगतीदानजी कलजी रां रै घरै हो। जैड़ो कै कैताणो चावो है कै ‘धी दादाणै अर नर नानाणै’ या ‘मामा ज्यांरा मारका, भूंडा किम भाणेज?’ रो ई इज असर हो कै आपमें काव्य रै प्रति रुचि बचपन सूं रैयी अर इणरो कारण आपरै नानाणै रो साहित्यिक वातावरण हो। आपरा मामा करनीदानजी डिंगल़ रा ठावा कवि हा।

मुरारदानजी सहज, निरभिमानी, कुटंब-कबीलै रा भलचाऊ मिनख हा। आपरै व्यक्तित्व रो इज प्रभाव हो कै चारण री जात जिणनै मतीरां भारो कह्यो जावै पण नोखड़ा भातृत्व भाव अर एकता री मिसाल हो। आप रै प्रभामंडल़ माथै ओ दूहो सटीक ढूकै-

धिन-धिन चनण रूंखड़ा, धिन-धिन थारी बास।
हेक सरीखा व्है गया, जे तर ऊगा पास।।

सरल हृदय, सहज सुलभ, सौजन्य मूर्ति सर्वजन हितेषी, न्याय प्रिय अर संत प्रकृति रा मिनख मुरारदानजी री आ बधताई ही कै उणां किणी रै पेटे नीं तो धेख राख्यो अर नीं किणी नै कुटवचन भाख्यो। बल्कै उणांरै जिकोई संपर्क में आयो उण मिनख ई इण बुराइयां सूं बचण री सोची। मुरारदानजी री व्यक्तित्व री सटीक ओल़खाण रायसिंहजी सांदू रै इण सोरठे सूं मिलै-

राखै धेख न राग, भाखै नह जीबां बुरो।
दरसण करतां दाग, मिटै जलम रा मोतिया।।

समाज में व्याप्त रूढियां रा आप घोर विरोधी हा। भलांई टीका प्रथा होवो, भलांई दहेज प्रथा। वै मढां में होवण वाल़ी नवरात्रि में बलि प्रथा रा ई घोर विरोधी है। इणनै वै एक प्रकार रो हिंसक काम मानता। वै कैता कै देवी तो दया अर ममता री सागर होवै यानी जीवमात्र रै सारू मा सरूपा। मिनख नै दया धरम माथै अडिग रैणो चाहीजै। आ बात वै सदैव द्रढता रै सागै कैता। अन्याय रा आप कदै ई समर्थक नीं रैया। न्याय रै प्रति प्रतिबद्धता रो एक दाखलो देणो समीचीन रैसी। आपरै आगै-नैड़ै रिस्तै में एक बूढा अर बेवा माजी हा जिणां रै कोई औलाद नीं ही। आपरै पिताजी जेठूदानजी उणां रै खेत माथै कब्जो कर लियो। आ बात मुरारदानजी सूं सहन नी होई। इणां माजी रै पक्ष में आपरै पिताजी रो ई विरोध कियो अर जेठूदानजी नै खेत छोडणो पड़ियो। उण पेटै किणी कवि रो उणां माथै तंज कसतो एक दूहो आज ई लोक प्रचलित है “जेठू में जबरी करी, मिणधर तैंज मुरार।” पण उणांरी निंदा सुणनै समीचीन समझी पण न्याय रै मार्ग सूं विमुख नीं होया।

आपरो, आपरै नानाणै निरंतर दासोड़ी आणो-जाणो हो। गांम रै हर मिनख सूं हेत। हथाई रा रूप। ग्यान रा भंडार। मिनखपणै सूं मंडित अर मोटयार पीढी नै भणाई रै सागै आपरी जड़ां सूं जुड़्यो रैवण री दाठीक सीख देवण में कदै ई चूक नीं पड़ण दी। मुरारदानजी घर भाणजा नीं होयर गांव भाणजा हा। महेशदानजी रतनू दासोड़ी आप माथै सटीक ई लिख्यो है-

चारण कुल़ रो चानणो, आसल वंश उजाल़।
नवखेड़ै नर जलमियो, मिणधर एक मुरार।।
सुतन जेठु कव साबल़ो, चित हित चारणचार।
नवखेड़ै नर जलमियो, मिणधर एक मुरार।।

म्हारा बाजीसा महेशदानजी अर जीसा (दादोसा) गणेशदानजी आपरै हम ऊमर हा। आपस में अणूंती अपणास ही। मुरारदानजी जद ई दासोड़ी पधारता जद गोकल़जी बाजीसा री तिबारी में जोर हथाई जचती। म्हैं ई उण हथाई में जीसा रै सागै जावतो। गोकल़जी बाजीसा (गोकलदानजी आंरै मामाई हा)। गोकल़जी बाजीसा रै एक मरियल अर पांयलो पांगल़ियो हो जिको मरग्यो जणै उणां उणरो एक मरसियो बणायो। जिणमें उणरी घणी बडाई करी। जिणरी एक झड़ याद है-

हुवै न करहलो भल़ै इण होड रो,
तीखली तोड रो ऊंठ तातो।

जद मुरारदानजी नै सुणायो जणै उणां पाछो एक गीत कह्यो जिणमें ऊंठ री वस्तुस्थिति रो वरणन हो। उणरी ई एक झड़ याद है-

आसंग नह होती अंकै ई ऊठण री,
गिरज जिण मांस री वाट जोती।

अर छेहली झड़ होती-

देवो मत गोकल़ा कूड़ दोटा।

म्हैं उण दिनां टाबर ई हो अर ई बात रो महत्व ई नीं जाणतो कै कदै ई ऐ गीत ई संदर्भ में काम आवैला। सो लिख नीं सक्यो अर दो कवियां री मीठी मसखरी रै रूप में संवादपरक ऐ गीत उणांरै सागै ई सुरग पूगा।

म्हनै ई कविता सुणण अर कवियां रो अनुसरण कर कविता बणावण में प्रबल रुचि जागी। सो म्हैं ई मनै-गनै अपणै आपनै कवि मानतो। जैड़ो कै एख दूहो है-

रागी पागी पारखी, नाड़ी वैध रा न्याव।
इतरां रा गुरु को नहीं, हिंयै तणा उपाव।।

पण कविता में रुचि राखणियै नै आपरी कविता सरस, उत्कर्ष बणावण कानी जावणो है तो गुरु करणो या मानणो ई पड़सी।

संस्कृत रो एक श्लोक है जिणमें गुरु कुण-कुण होवै रो दाखलो है-

प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा।
शिक्षको बोधकश्चैव, षडेत गुरवःस्मृताः
अर्थात प्रेरणा देवणियो, सूचना देवणियो, साच बतावणियो, मार्ग दिखावणियो शिक्षा देवणियो अर बोध करावणियो। ऐ छ भांत रा गुरु होवै।

इण पेटे मुरारदानजी ई म्हारा गुरु हा। म्हैं पैल पोत आपनै म्हारै बणायोड़ो छंद रोमकंद-

नखड़ै हिरणाख विडारण नागर, सागर में तजी सैज सजी।
पहल़ाद उबारण कारण पाधर, भाल़ सुआविय नाथ भजी।
उण वेल़ धरा अर धूजिय अंबर, थंभ फटै नरसिंघ थयो।
रघुनाथ घणा रंग तो वड राजण, साजण देव सु मोख सयो।।

12छंद सुणाया तो वै इता राजी होया कै म्हैं उण बगत रो वास्तविक वर्णन करण में असमर्थ हूं। म्हैं ११वीं रो विद्यार्थी हो मतलब कठै राजा भोज अर कठै गंगू तेली वाली बात ही। उण दिन ओ ठाह लागो कै लोगां सही ई कह्यो है-

आंब फल़ै नीचै रल़ो, इरंड आकासां जाय।

उण महामना म्हनै जिको लाड दियो वो म्हारै वास्तै हेमाणी सरूप हो। पछै जद ई दासोड़ी पधारता तो म्हनैं अवस याद करता। मुरारदानसा जैड़ो आदमी किणी टाबर नै याद करै आ घणी मोटी बात होया करती। म्हारै गांव रै किणी सैण, मुरारदानजी नै पूछ ई लियो कै आप गिरधर रो लाड घणो राखो? उण बगत उणां एक दूहो कैयो। जिको म्हारै वास्तै आज ई धरोहर है-

केसव सुत गिरधर कवी, आखै बात अमुल्ल।
रिसी मुनी होवै मसत, गिरधर री सुण गल्ल।।

म्हारै काव्य प्रेम नै बधावण अर परिस्कृत करण में आपरी जिकी मेहरबानी रैयी उणनै म्हैं नीं भूलाय सकूं। जद म्है बी. ए. दूजै वरस रो विद्यार्थी हो उण बगत जागती जोत रा संपादक पूज्य डॉ मनोहर शर्मा हा। उणांनै म्हैं मुरारदानजी आशिया माथै रचित म्हारो गीत दियो वो आप छापियो। जिको अविकल इणभांत है-

गीत मुरारदानजी नोखड़ा रो
आसल अवंत़स वंश उजवाल़ू,
पाल़ू प्रीत मुरार मुणां।
जेठू सुतन पेखां जोराल़ू,
सो विरदाल़ू सकव सुणां।।१

साचो मीत सैणपण साचो,
क्रीत किता कवियाण कहै।
चोगी चुतर नीत पर चालै,
रीत तणो रखवाल़ रहै।।२

दिल रो निमल़ वरण में दाखां,
हिव राखां जो बात हली।
आखां राघव तणो उपासी,
भू पर साखां ऐज भली।।३

परकाजू ऐम पात पहचाण्यो,
न्हाल़ बखाण्यो घणै नरां।
जोगो मिनख दुनी सह जाण्यो,
आण्यो अंजस सैण उरां।।४

गै’रो पुरख सचेलो ग्यानी,
दानी सांप्रत हैज दुथी।
मही सकल़ बात आ मानी,
नर अभिमानी है ज नथी।।५

डिंगल़ तणो उपासी दाटक,
कवत्त प्रकासी सैण कही।
आगल. भलप लैण अभलासी,
सो नह जासी बात सही।।६

सारा गुण भाल़ मनां में श्रद्धा,
लखवारां बल़िहार लयो।
पह सुभचीत पेखियो पख में,
(तो) गीध सोहणो गीत कयो।।

आपनै चारण साहित्य इतिहास अर संस्कृति रा मोकल़ा प्रमाणिक आख्यान याद हा। आप समाज में व्याप्त नशै री बुराई रा विरोधी हा। वै कैता कै नशो मिनख रै नाश रो कारण है, जिको प्रगति पथ में अटकाव अर गृहस्थी रै मारग में भटकाव लावणियो है।

आप रो सुपनो हो कै चारण समाज मांस-मदिरा री आदत सूं मुक्त होवै। उवांरो मानणो हो कै जिको समाज अपणै आपनै देव समाज अर देवीपूत मानै। उण समाज नै मांस-मद्य सूं परिया रैणो चाहीजै। मांस-मद्य सेवन री प्रवृत्ति तो आसुरी है अर जिको समाज आसुरी प्रवृति कानी अग्रगामी होवैलो वो समाज उत्थान कानी नीं जायर समूल़ पतन रै खाडै में जाय पड़ैला। वै कैता कै चारण रो चरित्र अर आचरण पवित्र होवणो चाहीजै। जिणांरो चरित्र पवित्र होवैला उठै बुद्धि ई होवैला अर विद्या ई। वै कैता कै महाराजा मानसिंहजी जोधपुर चारणां री इणी बधतायां रा कायल हा न कै मांस-मद्य सेवन री प्रवृत्ति रा-

अकल विद्या चित्त ऊजल़ो, इधको घर आचार।
बधता रजपूतां बिचै, चारण बातां च्यार।।

मुरारदानजी अतिथि सेवा नै परम धरम मानता। वै अतिथि री सेवा उमर कै पद देखर नीं अपितु अतिथि मानर करता।
म्हैं 1992 में बी एड करतो। एकबार आऊ सूं दासोड़ी जावण वाल़ी बस निकल़गी। म्हैं दूजी जागा नीं रुकर सीधो पाखती ई नोखड़ै मुरारदानजी रै कमरै पूगो। म्हनै देख वै घणा राजी होया अर पूछियो-

“गिरधर चाय मंगाऊं!”

म्हैं श्रद्धा, संकोच अर शंकै री त्रिवेणी में झूलतै कैय दियो कै-
“नीं हुकम! म्हैं तो चाय पीऊं ई कोनी।”

उणां कह्यो कै-
“आ तो अंकै ई चोखी बात है कै तूं पीवै कोनी पण कठै शंकै मत रैयी। म्हैं भलांई नीं पीऊं पण म्हैं पीवणियै नै चाय पाऊं अवस हूं। उणां धनजी लाल़स चांचल़वा रो एक दूहो सुणायो-

अमल तमाखू था अगै, समझ लियो जग सार।
चालू हुयग्यो चाय रो, तीजो दुखड़ो त्यार।।

दूहो सुणतो ई म्हनै उबासी आयगी। ज्यूं ई उबासी आई अर वै उठिया अर आपरै भतीज जोरजी रै घरै हेलो कियो कै कमरै में एक कप चाय मेलिया।

म्हैं शंकै रै मारियै घणो ई कह्यो कै
“दाता ! म्हैं तो पीऊं ई कोनी।” पण उणां कह्यो कै
“थारी उबासी अर आल़सियो उणियारो बतावै कै तूं चाय पीवै। अर तूं चाय पीवै जणै म्हैं तनै पाऊंलो क्यूंकै तूं भलांई म्हारो टाबर है पण मैमाण है अर मैमाण सेवा मिनख रो फरज है।”

आपरी साचड़ियैपण री बाण, अर सबरै सागै रिल़मिल़र रैवण री आदत रै कारण दूजै समाजां में ई जिको आदर हो वो गिरबैजोग हो।

मुरारदानजी इण लारली सदी रा भक्त कवि हा। आपरी रचनावां में भक्त हृदय रा निरमल़ भाव अर समाज नै सद्मार्ग माथै बैवण रो एक सुभग संदेश समाहित है। डिंगल़ काव्य धारा रा आप मोटा कवि हा। आपरी रचनावां जड़त अर घड़त री दीठ सूं ठावकी है। आपरी काव्य मेधा अर शब्द संपदा रो एक दाखलो दैणो समीचीन रैसी।

आपरै रोमकंद छंद रो एक द्वालो आप विद्वानां री निजर कर रैयो हूं सो आप नै ठाह पड़ै कै उण मनीषी रो उक्ति चातुर्य कैड़ो हो–

सिरिया चिणिया नव वासणिया सथ, मांय मिनी जिणिया सिमटै
इम धावणिया विसनू भणियां बिन, पार कजु किणियां न पटै
अबखी वणियां पत राखणिया जद, ते पर कुंभणयान तपै
प्रतदी उर धार करो भवपार ही, जांच सुनाम मुरार जपै।
जिय जांच मना मुरधीश जपै।।

जिणां रो जस कै कीरति आप सुणां वै सगल़ा मनीषी सदैव अमर है अर अमर रैसी। भीखजी रतनू वणलिया रै आखरां में-

जगत रा सुजस नै जाप जगदीसरा,
समझिया जिकां दुइ बात साजी।

इणी सारू तो किणी कवि कह्यो है–

हेर सुजस मग हालिया, काटण काल़ करूर।
मंडिया रहसी भू मथै, ज्यांरा खोज जरूर।।

ऐड़ै महामनीषियां नै साची श्रदांजलि फखत उणांरै बताये मारग रो अनुसरण कर’र ई दी जा सकै।

भाई चंडीदानजी आशिया बधाई रा पात्र है, जिणां आपरै दादोसा री स्मृति में उणांरी अप्राप्य पोथी ‘सरस कविता संग्रह’ रो पुनः प्रकाशन करवायर सर्व सुलभ करावण रो बीड़ो उठायो है। म्हैं किणी कवि रै इण दूहै सूं बात रो समाहार करूं-

सुख भायां सैणां अंजस, आयां सिघ अवसांण।
पितु मनसा पूरावियां, ज्यां जायां धिन जांण।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान, दासोड़ी

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