नह लीधो हर नाम

नह लीधो हर नाम, कपट अर कूड़ कमायो।
नह लीधो हर नाम, गरथ संचियो गमायो।
नह लीधो हर नाम, चपट सँग कीनी चोरी।
नह लीधो हर नाम, गात तकियो नित गोरी।
भूलियो नाथ भोदूपणै, बातां करी विवाद री।
मोचणी पाप गीधा मुदै, एको गल्ल ना आदरी।।1

रटियो नीं मुख राम, काम ऊंधा सब कीना।
रटियो नीं मुख राम, डगर पग उलटी दीना।
रटियो नीं मुख राम, रुगट कर खाधी रोटी।
रटियो नीं मुख राम, विटल़ वल़ हिल़ियो बोटी।
राम रो नाम नह रेरियो, जपी न माल़ा जाप री।
कवियाण गीध सिरकै कियां, पछै सिलाड़ी पाप री।।2

सुणो ग्रंथ सुभियाण, कोटी पण तीरथ करलो।
करलो माल़ा कंठ, किता पण टीका करलो।
रूड़ी रागां मांय, सदा पण भजन सुणावो।
बैठ सभा रै बीच, बात बोह ग्यान बणावो।
बांधलै गांठ गीधा विमुढ, काम सबै जग कूड़िया।
राम रिदै में नह राखियो, बे नर निसचै बूड़िया।।3

की धन आवै काम, भूंड ले कीधो भेल़ो।
की जन आवै काम, समक्ष समसाण समेल़ो।
की तन आयो काम, जिकण री रखतो जुगती।
हुयगी बानी हेर, असर ना कीधो उगती।
आवसी काम एको अलख, जे तूं लखियो जाणले।
गीधिया साच सुणजै गुणी, मौज हरिरस माणले।।4

जद छूटेलो जीव, साच एको ना साथी।
माटी तन ओ मान, सदन सूं कढै सँगाथी।
सज मेल़ो समसाण, झारसी आंसू झूठा।
दे लकड़ां में देह, पुल़ेला घर दिस पूठा।
राम रो नाम रटियो नहीं, खला जमां रा खावसी।
गीधिया धूण माथो गजब, पछै घणो पछतावसी।5

अरबां जोड़ अरथ, करेलो कांई काला?
समै अंत में साच, ठीक कर रैसी ठाला।
गात देख ओ गाढ, मूढ नाहक मगरीजै।
जोबन तो ढल़ जाय, चाव ना पाव चलीजै।
जोड़ै तो प्रीत जगदीस सुं, जे तूं जाणै जोड़णी।
गीधिया मूढ साची गिणै, तटक फंद जम तोड़णी।।6

करै बडा कमठाण, भवन नामी हद भारी।
ठाय गोखड़ा ठीक, निजर भर सदा निहारी।
वसन अनोखा बदन, अंग धारै आभूखण।
सेवा सारू सकड़, जबर राखै हाजर जण।
विसन नै गीध निस- वासरै, भोदू पँपाल़ां भूलियो।
सब छोड आडंबर सठ सही, जम रै फंद झूलियो।।7

फिरै मन्न चहुंफेर, घाट भांगै अर घड़वै।
फिरै मन्न चहुंफेर, पाट बैठे अर पड़वै।
फिरै मन्न चहुंफेर, उमंग कदै उदियासी।
फिरै मन्न चहुंफेर, उरड़ सथ खाय उबासी।
चहुंफेर फिरै मन चोवटै, पास न पूगै परम रै।
पातकी गीध नर प्रतख ही, भरम्यो रह जग भरम रै।।8

जिण दीनो ओ जलम, करम सतवाट कमावण।
जिण दीनो ओ जलम, जाजमां सुजस जमावण।
जिण दीनो ओ जलम, गाढ सूं हरिजस गावण।
जिण दीनो ओ जलम, गिलज मन भाव गमावण।
अहसान भूल उणरो उदँड, अहर निसा रह आंतरै,
गीधिया मूढ करवै गजब, परमेसर नै पांतरै।।9

भरम भाखलो ओढ, नींद नित लेय नचींतो।
भरम भाखलो ओढ, बखत वैवाद वितीतो।
भरम भाखलो ओढ, सांपरत भूल्यो सांई।
भरम भाखलो ओढ, तूं रहियो तन तांई।
भरम रो ढाळ भाखल भलो, सच निरभै इम सोवियो।
गीधिया मूढ कीधा गजब, खट जमवारो खोवियो।।10

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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