नमो चंडिका रुप चाळक्कनेची-वजमाल महेडू

चाळकनेची स्तुति

।।दोहा।।

सेवग काज सुधारणी, समयां देणी साद।
चाळकनेची चंडिका, देवी आदू अनाद॥1

।।छंद भुजंगी।।

तुही आदि अन्नादि वाणी विधाता।
तुंही रिध्धि सिद्धि नवेनिध्धि दाता।
वदे क्रोड तैतीस सुरं वरेची।
नमो चंडिका रुप चाळक्कनेची॥1

कळा चंद्र ज्योति झळेळे कपाळं।
वळे कुंडळं कान शोभंत माळं।
धरे शूल पाणं कृपाणं धरेची।
नमो चंडिका रुप चाळक्कनेची।2

प्रथी देश पारां करं प्रत्तपाळी।
वसे थान कालिंझरा टेक वाळी।
हरे शोक संताप तापं हरेची।
नमो चंडिका रुप चाळक्कनेची॥3

कई दैत मारे दळे झेर कीधा।
देवी देवनूं सुक्ख आणंद दीधा।
चळा चप्पळा तोतळा तुं चरेची।
नमो चंडिका रुप चाळ्ळकनेची॥4

इद्रांदिक देवां करे सेव आवी।
बृहमादिक जोगी तणां मन्न भावी।
नमे दाणवां देव नागं नरेची।
नमो चंडिका रुप चाळ्ळकनेची॥5

सुरं सात पाताळ भोमं निवासं।
वसे वास व्रहमंड एकासवासं।
डरे डुंगरे वन्नरे डुँगरेची।
नमो चंडिका रुप चाळ्ळकनेची॥6

गुणातीत रुपा वदी वेद ग्याता।
षटं शास्त्र पुराण वाचंत ख्याता।
भवं तारणं कारणं भव्वनेची।
नमो चंडिका रुप चाळ्ळकनेची॥7

जयो अंबिका त्र्यंबका जोगमाया।
परा पार ॐकार पारं न पाया।
गिण्यां पार नावे अपारं गणेची।
नमो चंडिका रुप चाळ्ळकनेची॥8

।।कळश छप्पय।।
प्रबळ तेज परचंड, इष्ट ब्रह्मांड उपावण।
सुरति सुरपुर मंड, खंड काव्यादि खपावण।
चंड मुंड मधु कीट,शुंभ निश्शुंभ संहारण।
रक्तबीज कर रोख़ , शोख़ महिखाषुर मारण।
त्रयलोक लोक रक्षा करण,मंगळ रुप महेसरी।
कवि दास वजो वंदे सदा,आदि शगति इशरी॥

~~कवि वजमाल महेडू
(प्रेषक: नरहरदानजी बाटी)

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