नरपत खुद लिखिया नँही

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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नरपत खुद लिखिया नँही, मां रा आखर मां ज।
लिखिया लोवडवाळ खुद, मेहाई महराज।।३३१
म्हारै मन में उमडिया, आखर बणे अवाज।
मुख सूं तद में भाखिया, मेहाई महराज।।३३२
द्रग देखो देशाणपत, रसन रटो रिधु राज।
करण सुणो किनियांण रव, मेहाई महराज।।३३३
सरळ ह्रदय री डोकरी, रखो नोकरी राज।
तूं अधिपत तिहुलोक री, मेहाई महराज।।३३४
आणंदकंद अनदायिनी, मन दु:ख द्वंद मिटा ज।
फंद फना कर मात मम, मेहाई महराज।।३३५
लकडी ठूंठ लगावियो, महि बिलोवण काज।
हरियौ तरुवर जिण कियो, मेहाई महराज।।३३६
खडी आज लग खेजडी, नेडीजी रे मांझ।
सूखौ तरु हरियौ कियौ, मेहाई महराज।।३३७
महि बिलोवत मावडी, छांट्या दधि छांटा ज।
है एडा ही आज लग, मेहाई महराज।।३३८
कर न सकै करणी बिना, जग में औ वड काज।
करणी अद्भुत कारणी, मेहाई महराज।।३३९
दधि मंथन कर डोकरी, नेडीजी रे मांझ।
भगतां नें नवनीत दे, मेहाई महराज।।३४०
करै बिलोवण करनला, घरर घरर रव गाज।
प्रात ऊठ परमेसरी, मेहाई महराज।।३४१
राती, काळी औ धवळ, विध विध रंगी गा ज।
दोवत खुद देशाणपत, मेहाई महराज।।३४२
घास नीरती गाय नें, करनल कन कन जा ज।
माता नित मन मोद कर, मेहाई महराज।।३४३
आलोकित आकास है, दीठा दिनमणि राज।
मढ सूं जागो मावडी, मेहाई महराज।।३४४
ललित लखाणी लालिमा, गई कालिमा भाज।
जाग जांगळू जोगणी, मेहाई महराज।।३४५
ढोली ढोल वजाडता, साथै झांझ पखाज।
प्होर हुऔ परभात रो, मेहाई महराज।।३४६
चारण मिळ चिरजा ललित, गावत सुर लय साज।
जगो मात जांगळ धणी, मेहाई महराज।।३४७
भुंगळ भेरि त्रमागळां, मंगळ धुनि मढ मांझ।
जांगळ धर जोगण जगो, मेहाई महराज।।३४८
घमर बिलोवण घर घरां, घरर घरर रव गाज।
जागो अरजी जोगणी, मेहाई महराज।।३४९
पंछी प्होर प्रभात रा, मढ रे बैठा मांझ।
चूगौ दिरावौ चारणी, मेहाई महराज।।३५०
किरणमयी किनियांण सूं, जग मग जग मढ मांझ।
दिनकर देशाणां तणी, मेहाई महराज।।३५१

~~वैतालिक

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