स्वाभिमानी कवि नरुजी बारहट का आत्म बलिदान

दिल्ली पर बादशाह ओरंगजेब का राज था।  औरंगजेब बहुत ही कट्टर शासक हुआ।  जिसके राज्य में हज़ारों मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदों में बदल दिया गया। इससे भी संतुष्टि नहीं हुई तो औरंगजेब ने विक्रम संवत 1736 की वैशाख सुदी द्वितीया (2 अप्रैल 1679) को एक फरमान जारी कर के हिन्दुओ पर जजिया नामक कर लगा दिया। वह कर बड़ी ही कठोरता से वसूल किया जाने लगा,  जिसके फलस्वरूप अन्दर ही अन्दर हिन्दू प्रजा में इसके विरोध में आग सुलगने लगी, पर खुले रूप में इसका विरोध करने का साहस किसी ने नही किया।  इस विकट परिस्थिति में महाराणा राजसिंह प्रथम ने पहल करते हुए जजिया के विरोध में एक पत्र औरंगजेब को लिखा। पत्र की भाषा और तथ्य औरंगजेब नहीं पचा सका और राजसिंह पर
आक्रमण करके उनका दंभ कुचलने का निश्चय किया। वैसे भी बादशाह औरंगजेब मेवाड़ के महाराणा राजसिंह से बहुत ईर्ष्या रखता था। वह मेवाड़ पर आक्रमण हेतु हमेशा किसी न किसी बहाने की तलाश में रहता था सो अब इसी बहाने मेवाड पर चढाई करने हेतु विक्रम संवत 1736 भाद्रपद शुक्ला नवमी (15 सितम्बर 1679 ई.) को एक विशाल सेना लेकर औरंगजेब ने उदयपुर की तरफ कूच किया। इस सैन्य दल की विशालता और रौंद्र रूप का क्रन्तिकारी केसरीसिंह बारहठ ने “राजसिंह चरित्र” में बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया हैं;

ठननंकिय गज घंट, हींस हैवर हननंकिय।
भुननंकिय पखरालि, राग सिन्धुन रननंकिय।।
भननंकिय नभ गिद्ध, परिन नेवर छननंकिय।
टननंकिय बड़ बम्ब, मूंछ शूरन फननंकिय।।
अतिभार परत चतुरंग दल, भुम्मि धुज्ज घूमान भरी।
नागिन ही भूरि भ्रम डारतीय हय गन बागन उज्जरी।।

इस विशाल सेना ने 25 जनवरी 1680 को उदयपुर के पास देबारी नामक स्थान पर आकर पड़ाव डाला।  महाराणा को इस विशाल सैन्य दल के आने की सूचना गुप्तचरों ने दे दी थी। महाराणा राजसिंह ने अपने सभी विश्वस्त सामंतो से मंत्रणा करने के पश्चात् यह निर्णय लिया कि युद्ध में शहर को उजड़ने देने के बजाय, पहले उदयपुर को खाली करके पहाड़ो में पलायन किया जाये, तत्पश्चात राणा प्रताप की तरह पहाड़ों में मोर्चाबंदी कर गुरिल्ला युद्ध नीति का अनुसरण करते हुए डट कर मुग़ल सेना से युद्ध किया जाये।  इस आशय की सूचना पूरे उदयपुर नगर वासियों को दे दी गयी। सभी नागरिक राजकीय सुरक्षा के घेरे में पहाड़ो की तरफ चलने लगे।  महाराणा के महलो से भी रानियाँ, राजकुमार और अन्य अधिकारी पहाड़ो की तरफ जाने की तैयारी करने लगे। महल छोड़ने का समय आया तो रानियों कि पालकियाँ निकली साथ में कई सामंत भी निकले, दूसरे अधिकारी भी निकले। उसी समय मेवाड़ के एक सरदार ने वहां उपस्थित कवि नरुजी बारहठ से मजाक किया –

“बारहठ जी आप तो महाराणा के पोळपात हो आप पोळ (दरवाजा) छोड़कर थोड़े ही जावोगे !”

तभी एक दुसरे ने मजाक में कहा – “बारहठ जी आप तो घोड़ा लेने ही पोळ पर खड़े रहते थे अब सिर कटवाने के समय खड़े रहोगे या नहीं ?”

सहर सुन्य करिके-नृपति, गए पहारन ग्राम।
पोल पात्र पीछे रहयो, बारहठ नरु नाम।।
अब ज्यो ही जाने लगो, नरु रान के पास।
कियउ एक सरदार नें, यासों कछु परिहास।।
जहिं दरवाजे पर सुकवि, तोरन घोरा लेत।
आज रहेगो सून्य वह, तुम ताको तजि देत।।

बात बारहठ नरु के कलेजे में चुभ गयी, बात सही भी थी। बारहठ नरुजी राणा के महल के पोळपात थे, शादी ब्याह के हर अवसर पर वे पोळपात होने के नाते नेग में सिरोपाव आदि लेकर सम्मानित होते थे। राजपरिवार में जब कोई दूल्हा शादी के लिए आता तो पोळ पर तोरण मारने से पहले नेग में बारहठ जी को घोड़ा देने के पश्चात ही तोरण मारकर महल में प्रवेश करता। नरुजी को अपना चारण धर्म याद आया, अपनी देशभक्ति जागी, अपना स्वाभिमान जागा। निश्चय कर लिया कि “अब तो सिर कटने पर ही पोळ छूटेगी।”  अपने परिवार को महाराणा के परिवार के साथ भेज कर महाराणा को अपने निर्णय से अवगत कराया कि जिस पोळ में आज तक मुझे नेग दिए बिना किसी ने प्रवेश नहीं किया उस पोळ में मेरे रहते शत्रु कैसे आसानी से प्रवेश कर सकता है। अब तो मेरा सिर कटने के बाद ही शत्रु पोळ में प्रवेश कर पायेगा।

कहिय नरु सरदार सौं, याद दिलाई पूर।
हम तो अब रहि है यहीं आप जाइये शूर।।
तोरन घोरा यहीं लियो, यह मेरी प्रिय ठौर।
मम मरिबे पीछे यहाँ, आवहि शत्रु बहोर।।

जब महाराणा राजसिंह जी को बारहठ जी के निश्चय का पता चला तो महाराणा ने अपने कई विश्वासपात्र सामंतो को भेज कर बारहठ नरु को अपना हठ छोड़ कर अन्य लोगो के साथ पहाड़ों में पलायन हेतु आग्रह किया और कहा- “कविराज हम उदयपुर छोड़कर थोड़े ही जा रहे हैं, शहर को बिना उजाड़े युद्ध करने की नीति का अनुसरण ही तो कर रहे है, युद्धोपरांत वापस आ जायेंगे।”, परन्तु नरुजी अपने संकल्प पर दृढ रहे।

बारहठ नरु ने कहा:
“जिस पोळ पर घोड़े नेग लिए, उस प्रोळ को ऐसी विकट घडी में छोड़ कर जाना कायरता होगी,  अतः में तो इसकी रक्षार्थ कट मरूँगा।”

कहियो नरपाल आविया कटकां, धूण छडाळ धरापै ध्रोळ।
प्रोळ बड़ा गज बाज पामतो, पड़तै भार न छोडू प्रोळ।।
राजड़ कियो राण छल रुड़ो, कांनों दे नीसरूं कठे।
अरि घोड़ो फेरण किम आवे, (म्हे) तोरण घोड़ो लियो तठे।।

महाराज ! आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है, मैं आपका पोळपात हूँ मुझे यहीं रहने की आज्ञा दीजिये मुझे अपनी पोळ से अलग मत कीजिये। यह मेरी पोळ है जिस पोळ पर हाथ पसारकर सम्मान में सिरोपाव लिए, तोरण के घोड़े लिए उस पोळ में मेरे रहते शत्रु के घोड़े कैसे प्रवेश कर सकते है यह मैं नहीं देख सकता। ये पोळ अब मेरी है मेरे बाप की है मैं तो इसी पोळ के आगे कट मरूँगा पर हटूंगा नहीं।

सब चले गए पर बारहठ नरु के साथ बीस अन्य सरदार भी रुक गए। ये वे लोग थे जो जनानी ड्योढ़ी के बाहर मांचे (पलंग) पर बैठ अन्दर आने-जाने वालों पर नजर रखते थे। एक प्रकार से वे जनानी ड्योढ़ी के सुरक्षा प्रहरी थे।  इनको “मांचातोड़” सरदारों के नाम से जाना जाता था।

उदयपुरवासी पहाड़ों में चले गए थे, शहर सुनसान पड़ा था।  बारहठ नरु और उसके बीस मांचातोड़ वीर सरदारों ने जगदीश मंदिर में मोर्चा संभाल लिया। इन बीस के अतिरिक्त दो अन्य व्यक्ति जो नरु से मिलने आये थे उनमे से एक सैणोंद गाँव का कल्ला भी था। इन दोनों को बारहठ नरु ने चले जाने को कहा कि क्यों तुम नाहक मरते हो ? परन्तु उन्होंने बारहठ नरु के साथ रुकने का निश्चय करके कहा कि यहाँ से जाना हमारे लिए लज्जास्पद होगा। अतः हम भी मेवाड़ की रक्षार्थ तुम्हारे साथ स्वर्गारोहण करेंगे। वे भी वहीं रहे। बारहठ नरु के साथ कुल बाइस योद्धा अपनी तलवारें लेकर शत्रुदल के आने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगे।

उधर बादशाह को खबर मिली कि महाराणा उदयपुर खाली कर पहाड़ों में मोर्चाबंदी कर बैठ गए हैं। पहाड़ों की लड़ाई के परिणाम बादशाह जानता था, अत: “इस्लाम की फतह” कह फ़ौज को वापस लौटने का हुक्म देकर लौट गया।  ताजखां एक सैनिक टुकड़ी ले उदयपुर शहर को लूटने हेतु चांदपोल दरवाजे से शहर में दाखिल हुआ। आगे बढ़ा तो देखा त्रिपोलिया पोळ पर कवि नरुजी बारहठ पगड़ी में तुलसी बाँध हाथ में तलवार ले अपने कुछ साथियों सहित घोड़े पर सवार हैं।

पूर्व योजना अनुसार “मांचातोड़” बीस सरदारों में से एक योद्धा जगदीश मंदिर की खिड़की से निकला और मुग़लो को धराशायी करते हुए वहीं कट मरा। फिर दूसरा, फिर तीसरा, चौथा ……….इस प्रकार सभी बाइस योद्धा धर्म की रक्षार्थ कट मरे। अंतिम योद्धा बारहठ नरु रहा। विकराल रूप धारण किये हुए बारहठ नरु की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। वह भूखे शेर की तरह मुगलों पर एक कोने से टूट पड़ा ….:

मुगलां हुं रण मुंड, छोह वीरारस छायो।
सौदे व्रन सणगार, सांपडे खाग सम्भायो।।
अमरावत नाम राखण अमर, दळ बिच उर दरियाव रो।
पड़ीयो नरु पड़ीयां पछे देवळ राणे राव रो।।

बारहठ नरु अपनी तलवार को चलाते हुए लगातार सर काटते हुए आगे बढ़ रहा था ……एक बार तो मुगलों की उस अग्रिम पंक्ति में अफरातफरी मच गयी थी …… जिधर भी बारहठ नरु की तलवार घूमती …चार पांच मुग़ल मस्तक गिर पड़ते ….उस चारण कवि बारहठ नरु को घाव पर घाव लग रहे थे पर उसमे जोश अभी भी पहले जैसा था और तलवार भी पहले की तरह ही तेजी से चल रही थी।  बारहठ नरु लड़ता हुआ त्रिपोलिया की तरफ बढ़ने लगा . . . .त्रिपोलिया में पहुँचने पर एक मुग़ल घुड़सवार ने उस पर पीछे से वार किया जिस से बारहठ नरु का मस्तक जमीन पर आ गिरा। सिर गिरने के बाद भी कबंध (धड) तलवार चलाता रहा। अनेक शत्रुओं का संहार करके वीरवर नरु का धड जगदीश मंदिर के उत्तरार्ध द्वार पर गिर पड़ा। इस प्रकार बारहठ नरु एक महान योद्धा के रूप में वीर गति को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को चला। अपने जीते जी बारहठ जी ने शत्रु सैनिकों को पोळ में नहीं घुसने दिया।

जहाँ बारहठ जी शहीद हुए वहां उनके वंशजों ने उनकी स्मृति में एक चबूतरा बना दिया पर कालांतर में उस चबूतरे की जगह एक कब्र ने ले ली।  काल की गति बहुत बलवान होती है। उनका स्मारक कब्र में तब्दील हो गया, पत्थर चूने से बने स्मारक तो बनते बिगड़ते रहते है पर मातृभूमि पर बलिदान होने वाले वीरों की गाथाएँ दोहों, कविताओं, कहानियों व जन श्रुतियों में युगों युगों तक अमर रहती है। कवि नरुजी बारहठ की स्मृति भी आज गीतों व कहानियों में अमर है।

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