नाथी का बाड़ा के निमित्त

किसी भी भाषा के मुहावरे एवं कहावतें उस भाषा के सांस्कृतिक इतिहास एवं सामाजिक विकास की कहानी के साक्षी होते हैं। इन कहावतों में उस क्षेत्र के लोगों की मानसिकता भी परिलक्षित होती है। हमारे यहां पुरुष प्रधान मानसिकता हावी रही है अतः बहुधा उसके प्रभाव से कहावतों के निर्माण को देखा समझा जा सकता है। पापां बाई रो राज,  नाथी रो बाड़ो, खाला रो घर, पेमली रा परचा आदि कहावतों के पीछे भी कहीं न कहीं हमारी कुंठाओं का हाथ है।

कई बार कहावतों के निर्माण में तो कई बार निर्मित कहावतों के अर्थ में इस तरह की कुंठाएं, मानसिकताएं, अल्पज्ञता या अज्ञानता अपनी नकारात्मक भूमिका अदा करती है कि कहावत अपने मूल अर्थ से कोसों दूर हो जाती है।

बहुत बार ऐसा होता है कि कुछ कहावतें अपने मूल अर्थ से बिल्कुल विपरीत या आपत्तिजनक अर्थ में प्रयुक्त होने लग जाती है। उदाहरणार्थ राजस्थानी की कहावत है “आसोजां रा तप्या तावड़ा, जोगी हुग्या जाट” (अर्थात आश्विन मास की धूप के कारण जाट जोगी हो गए) यहां ‘जाट’ शब्द किसान का द्योतक है तथा ‘जोगी होने’ का अर्थ “योगियों के पंचाग्नि तप’ की तरह किसान आश्विन माह में फसलों से लहलहाते खेत में कठिन मेहनत करते हुए आनन्द की अनुभूति करता है। जिस तरह एक योगी को पंचाग्नि तप के दौरान अपने शारीरिक कष्ट का भान ही नहीं रहता, वह तो अपनी मुक्ति के मार्ग पर आनंदित कदम बढ़ता है तथा अतुलित सुख की अनुभूति करता है, उसी प्रकार आश्विन के समय अपने खेत में काम करते हुए कर्मठ किसान तीक्ष्ण धूप से मिलने वाले कष्ट को भूलकर उत्तम खेती के सपने को साकार करने में लगा रहता है।

इस कहावत का अर्थ करते समय बड़े-बड़े विद्वान भी चूक कर गए तथा ‘जोगी होने’ का अभिधार्थ ग्रहण कर यह कह गए कि आश्विन मास की तेज धूप से घबराकर किसानों ने लहलहाते खेतों को छोड़ दिया तथा भगवां वेश धारण कर संन्यासी बन गए।

कितना भ्रांतिपूर्ण अर्थ लिया, जो किसान की कर्मठता के लिए शर्मनाक मज़ाक़ है वहीं व्यावहारिक धरातल से कितना दूर है। कौन ऐसा किसान होगा, जो धूप के कहर से डरकर योगी बन जाएगा ? खैर!

इसी तरह का खेल नाथी रो बाड़ो कहावत के साथ चला है। राजस्थानी में एक कहावत है ‘नाथां रै घर ना कोनी’ अर्थात नाथों के घर पर किसी को ना नहीं है। इस ना के दो अर्थ है एक तो आने की सर्वदा अनुमति है एवं दूसरी जो कुछ उपलब्ध है, उसके लिए कोई ना नहीं है। यहां नाथ योगियों के लिए प्रयुक्त है। वे मठ में रहते हैं अतः वहां आने जाने एवं वहां की चीजों को इस्तेमाल करने के लिए सबको समान अधिकार है।

यहाँ यह ध्यातव्य है कि नाथों के मठ के लिए यह कहावत प्रसिद्धि का कारण एवं प्रशंसा की सूचक है। वह स्थान जिसके द्वारा सबके लिए खुले हो, वह तो सबके लिए उपयोगी माना ही जाता है।

अब हम नाथां रै घर ना कोनी की तर्ज पर नाथी रै घर ना कोनी करके देखें। सारा का सारा अर्थ ही उलट जाएगा। जहां नाथों का सर्वजन के लिए हर समय खुला घर उनकी प्रसिद्धि एवं ख्याति का द्योतक है, वहीं नाथी के लिए उसका खुला हुआ घर बदनामी एवं कुख्याति का कारण बन जाता है। स्पष्ट करने के लिए जरा सोचिए कोई स्त्री जैसे ही कहे कि उसके द्वार सभी के लिए सदा सर्वदा खुले हैं, इसका सकारात्मक की बजाय नकारात्मक अर्थ ही लगाया जाएगा, जो हमारी मानसिकता का कहर ही समझिए।

यद्यपि विगत दिनों में नाथी का बाड़ा को लेकर कई सारी कथाएं सोशल मीडिया पर एवं मित्रों से सुनी। सबके अलग अलग मत है, जिनमें ऐक्य ढूंढना मुश्किल है। वस्तुतः पोपां बाई, नाथी बाई, खाला आदि नामों के पीछे भी कोई न कोई कहानी होगी।

हिंदुस्तान में गांवों के नामकरण को लेकर कहा था कि हमारे यहां अधिकांश गांवों के नाम खुद उस गांव वालों ने नहीं वरन पड़ोसी गांव वालों ने रखे हैं तथा वे भी व्यंग्य या हास्य रूप में मजाक करते हुए रखे हैं, यही कारण है कि बहुत से गांवों के नाम का कोई अर्थ ही नहीं निकलता। इसी आधार पर बात करें तो नाथी बाई एवं पोपां बाई आदि ने स्त्रियां होकर पुरुषों की तरह प्रसिद्धि पाने वाले काम किए होंगे, जिसे पुरुषिया-रौब कैसे सहन कर पाता। जिस पुरुष प्रधानता ने भक्तिमती मीराबाई जैसी साधिका को नहीं स्वीकार किया वे पोपां एवं नाथी को क्या स्वीकारते। यही कारण रहा है कि उन्हें उनके परोपकारी एवं सहज व्यवहार के कारण ही कटघरे में खड़ा किया गया होगा और उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जिस नाथी का घर सबके लिए सकारात्मक एवं मानवीय दृष्टि से आनन्द एवं अपनत्व का दर था, वह इतना बदनाम हुआ कि शब्दकोशों में उसका अर्थ वेश्यालय एवं चकला लिखा जाने लगा तथा इसी अर्थ में यह कहावत प्रयुक्त होने लगी।

ऐसी अनेक कहावतें होंगी, जिनके लिए ध्यानपूर्वक शोध की आवश्यकता है।

यह कहावत का दोष नहीं प्रयुक्त करने एवं अर्थ समझने वालों का दोष है। आप और हम सबसे नाथीबाई कुछ कहना चाहती है, सुनिएगा, गुनगुना सकें तो गुनगुनाइएगा-

तर्ज-मत कर माया को अभिमान

मत कर नाथी को अपमान, मत कर नाथी नैं बदनाम
नाथी श्याम री दासी…
नाथी श्याम री दासी रे नाथी पुण्य री रासी
मत कर बाड़ा को…

नाथी नार थी जबरेल, जैसे हो धरम की रेल
जैसे हो धरा कासी.
जैसे हो धरा कासी कै जैसे संत-संन्यासी
मत कर नाथी को अपमान…

आछो ओपतो व्यवहार, करती हेत सूं मनवार
नाथी थी मधुर भासी
नाथी थी मधुर भासी, नाथी बोलती आछी
मत कर नाथी को अपमान…

नाथी कर रही अरदास, नेता नांगळां सूं खास
मत दो बिन गुनैं फांसी
मत दो बिन गुनैं फांसी कै थांरै हाथ के आसी
मत कर नाथी को अपमान…

सब हित खोल देवै द्वार, इसड़ा है कठै सरदार
हुवतां जोर घण आसी
हुवतां जोर घण आसी कै अधबिच थाक रुक जासी
मत कर नाथी को अपमान…

~~डॉ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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