नाथजी रा सोरठा

NathJi

जपतां जपतां जाप, आप बण गया औलिया।
पंड रा म्हारा पाप, नष्ट करौ अब नाथजी।१
तन रो कर तंबूर, मन वाणी मनमोवणी।
जोगी छेड जरूर, निज अंतर सूं नाथजी।।२
नीरमळ गंगा नीर, ऊजळ चित इम आपरो।
तिण सूं बैठौ तीर, नरपत न्हावण नाथजी।।३
पडूं तिहारै पाय, चरणां रो चाकर रखौ।
रीझौ हे गुरूराय, नुगरौ हूं घण नाथजी।।४
अलख निरंजण आप, वपु पर राख रमावता ।
अनहद रो आलाप, नित उठ करता नाथजी।।५
दिग-अंबर गुरूदेव, व्याध्र चर्म आसन वळै।
हिव है दरसन हेव, निरखण दो छबि नाथजी।। ६
आदि, मध्य, अवसान, कर्ता, कारण, काळ थे।
गावै जग गुणगान, नित प्रत थोंरा नाथजी।।७
दीपक जळहळ दोय, सूर -दिवस, रातां -ससी।
जगमग जिणसूं जोय, नभमंडऴ -मढ नाथजी।।८
अलख पुरूष आदेश, गगन गहन जिण घर कियौ।
सदगुरू हे सिध्धेश, नमन नमन शत नाथजी।। ९
अहनिश कह अहलेख, वात करौ व्रहमंडसूं।
भगवौ धरनें भेख, नभ सिंदूरी नाथजी।।१०
नित नयणां में नूर, सांई रे बरसै सदा।
दीसै भल वा दूर, नैडौ है पण नाथजी।११
लोयण थोंरा लाल, भाल आड शुभ भसम री।
वळै जटा ज्यूं व्याल, नभ सूं अडती नाथजी।। १२
कुंडळ वलयाकार, करां कमंडळ कनक रो।
सरल सहज सिणगार, नयण लुभावै नाथजी।।१३
धोबौ पचै न धान, पांणी टिकै न पेट में।
निरखे करौ निदान, नजर उतारो नाथजी।। १४
ऊंचे गगन अनंत, धजा फरहरै तौ धणी।
सिध, चारण, मुनि संत, निरखै जिणनें नाथजी।।१५
वात, अगन, जल, व्योम, पिरथी री रच पूतळी।
महामंत्र जप ओम, नर सिरजो नित नाथजी।। १६
पूजा वेद पुराण, कलमा वळै कुरान री।
पक्की पडी पिछाण, निरखत थोंनें नाथजी।। १७
कनफट !कंथाधार!, कुंडळ कनकम् कान धर।
गढ ऊँचै गिरनार, निरभय रमता नाथजी।। १८
भांग पियौ भरपूर, गांजौ फूंकौ थें गजब।
धूर्जटि! आक, धतूर, नित नित जीमौ नाथजी।। १९
बैठौ आंगण बार, मन ले आसा मिलण री।
देखाडौ दीदार, ना मत कहजो नाथजी|| २०
उर हंदो अंधार, मेटणहारा मालकां!
वंदन बारंबार, नरपत करतौ नाथजी! ।।२१
अगडबंब! आदेश, सिध्धौ बम- लहरी सहज!
विध विध धर वपु वेश, नित प्रत विचरौ नाथजी!२२
निरंकार !निर्वाण!, निरगुण! नाद- निरंजणां!
निरभय नरपतदान, नित नित नमियां नाथजी!२३
नैण अखाडे नेह री, धुंणी धखती जोर।
रैण दिवस अर भोर, निरखौ आय’र नाथजी।।२४
साधु,मुनि सिध साथ, अरिहंत औघड औलिया।
निरगुण, दत्त, नवनाथ, नमन क्रोड नित नाथजी।।२५
चिमटा चेपौ चार, दिल सुध किवा दुलारजो।
तन मन सूं हूं त्यार, नेडो राखौ नाथजी।२६
मन उसर जिम मोय,तपतौ बल़तै तावडै।
सावण घन सुख होय,नीं बरसो क्यूं नाथजी।।२७
घणी भले दे गाल़,रूसै तो राखूं ह्रदै।
रीझ्यां है रखवाल़, निरमल़ मूरत नाथजी।।२८

~~ नरपत आसिया “वैतालिक”

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