नायिका शिख नख वर्णन (राम रंजाट)

यह छंद महाकवि सूर्यमल्ल रचित खंडकाव्य राम रंजाट से लिया गया है। उल्लेखनीय है कि महाकवि ने इस ग्रन्थ को मात्र १० वर्ष की आयु में ही लिख डाला था।

।।छंद – त्रिभंगी।।

सौलह सिनगारं, सजि अनुसारं, अधिक अपारं, उद्धारं।
कौरे चख कज्जळ, अति जिहिं लज्जळ, दुति विजज्जळ, सुभकारं।।
इन रीत अभीतं प्रमुद प्रतीतं, रूचि रम रीतं, रिझवारं।
चोटी जिम नागिनि, है बड़ भागिनि, सरब सुहागिनि, सुखसारं।।
लहि रूप ललाटं, सोम सुघाटं, भौंह भलाटं धनु जैसे।
मृग खंजर मीनं नैन नवीनं (सरस) सुदीनं, जल कैसे।।
नासा सुक नेमं, ओपम एमं, नथ पर नेमं, अति सोभा।
छँद वयं समानं, अति अरुणानं, दाडिम दानं, रह लोभा।।
अति ही उनमादं कोकिल सादं, वरण बिभादं, चंद्रकला।
कल कंठ कपोतं पोत उदोतं, जगमग जोतं दरस भला।।
कुच बोहोत कठोरं, गोरम गौरं, कंज कल्होरं, जानि कळी।
सुभ नाभि सुरंगनि, फूल गुलाबिनी, रूप तरंगनि, ज्यों त्रिवळी।।
कटि केहरी कैसी, जानहु जैसी, यह न अनैसी बात गनौं।
कदली जिमि जंघा, उलटि उलंघा, पीकर भंगा, मसत मनौं।।
गावति गज गामिनि, भाग सुभामनि, सौलह सामनि, वरख वयं।
भासति अति भू पर, धरि पटद्दर पर, बाजत नूपर, नाद पयं।।
निकसी बहु नारिय, सहर संगारिय, लागत प्यारिय, सहज सबै।
मिलि झुंड इकट्ठै, बनि बनि लट्ठै, धरि पग मट्ठै तुरति तबै।।
अति भीर अपारं, परि अनपारं, गलि मझारं निकसी गई।
सब समटि सहेली, कुंड रुकेली, जहां सब भेली, जाई भई।।
अब करि असवारी, चढी छत्रधारी, मूरति मुरारि, मदन जसी।
हैमर चढि हाड़ौ, महमति माड़ौ, गाहड़ गाड़ौ, ओप असी।।

~~महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण (ग्रन्थ: राम रंजाट)

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