ओपै सूं रूठै ! बो म्हांरै सूं रूठै! अर म्हांरै सूं रूठै उण सूं सिरोही रूठै

कवि विश्वास अर सम्मान रो एक ऊजल़ो प्रेरक प्रसंग
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सिरोही माथै वैरीसाल देवड़ा राज करै। उण रो एक सिरदार चांदो देवड़ो उण सूं रीसाय बारोटियो होयग्यो। सिरोही में घणा उजाड़ किया पण बख में नीं आयो। चांदो अपरबली । उण सूं कुण बाथां आवै –

चांदा चोरंगवार उरल़ां बगलां ऊबड़ै।
अरजण रो अवतार दुसासण तूं देवड़ा।।

छेवट वैरीसाल दरबार बुलाय उमरावां सूं सलाह करी कै चांदै नैं कीकर वश में कियो जावै। उमरावां सलाह दीनी कै आप पेशवा रा आढा ओपाजी नैं चांदै कन्नै मेलो। बो इणां नै ओपो भाई कैय बतल़ावै सो हरगिज ई ओपैजी नैं नट नीं सकै।

महाराव ओपैजी नैं बुलाया अर ताकीद करी कै “आप कीकर ई मनाय नैं चांदै नैं लावो।” ओपैजी कैयो कै “म्है ले तो आवूंलो पण आप रो कांई विश्वास कै आप चांदै नैं माफ कर दो ला।” राजा कैयो कै “म्हारा वचन है आप ले आओ म्है होठ रो फटकारो नीं दूं।”

ओपोजी वहीर होवण लागा जद दरबार थोड़ी घणी कविता री समझ राखणियै एक भाट रै डावड़ै नै ओपाजी री सेवा रै मिस आ जाणण नै मेलियो कै इण दोनां रै बिचै कांई बात होवै।

ओपोजी उठै पूगिया जठै चांदो आपरा डेरा दियां बैठो। ओपोजी, चांदो नै संबोधित करतां कीं दूहा कैया –

चंद मयंदां चूरणो करै गयंदां घाव।
पाधर हंदो पातसा आबू हंदो राव।।
चारण कहै अनेक नर बोलावै रावत्त।
भाई कहण अभंग भड़ म्हनै चांदो पीथावत्त।।
खासा दूहा है।

चांदै ओपैजी रो पूगतो सम्मान कियो। चांदै कैयो फरमावो म्हनै कांई आदेश है? ओपैजी बिनां किणी लाग लपट रै सारी हकीकत बतावतां आपरै साथै सिरोही हालण रो कैयो। चांदै कैयो आप म्हारा मोटा भाई जिको आदेश देवो हूं हाजर हूं। चांदो ई किणी ना नुकर रै ओपैजी साथै वहीर होयो। पण ओपैजी रो मन नीं मानियो। उणां सोचियो राजावां री उलटी रीत। जे उणां चांदै साथै घात करी तो म्हनै एक राजपूत मरावण रो कल़ंक लाग जावैला। गतागम में ओपोजी अर चांदो मारग बैय रैया हा। मारग में किसन रो मंदर आयो। ओपोजी दरसण करण ठंबिया। चांदो ई रुकियो। कवि भगवान नै संबोधित कर र चांदै नै एक दूहो सुणायो –

चाकर थारो चंद तूं ठाकर चांदा तणा।
मधुसुदन गोविंद वरजै वसुदेरावत।।

चांदो पूरी हकीकत समझ ग्यो। बिनां कीं कैयां पाछो घोड़ै माथै सवार होय चढग्यो। ओपैजी सिरोही आय रावजी नै बतायो कै चांदै आवण सूं मना कर दियो। दरबार उण डावड़ै नै पूछियो जद उण पूरी बात विगतवार बता दीनी। राजाजी, ओपैजी सूं रूठ दरबार में आवण सूं मना कर दियो।

ओपोजी दुरसाजी रै बणायै भगवान रै मंदिर मे बैठा रैता। एक दिन पाडीव ठाकुर अमरसिंह उठीनै सूं सवार होय निकल़ रैया हा कै उणां री मीट ओपाजी माथै पड़ी। उणां रुक ओपैजी नैं दरबार में हालण रो कैयो जद ओपैजी बतायो कै दरबार फलाणी बात सारु म्हारै सूं रीसाय गया अर दरबार सूं पलायो है। अमरसिंह पूछियो कै आप नै किण मना किया ! दरबार? म्हारै जीवतां आपनै कुण मना कर सकै सिरोही दरबार में? हालो म्हारै साथै ।

ओपोजी ई अमरसिंह रै साथै दरबार में गया। अमरसिंह जावतां ई दरबार नैं कैयो “ओपै सूं रूठै! बो म्हांरै सूं रूठै! अर म्हांरै सूं रूठै उण सूं सिरोही रूठै! सो सोचलो कांई करणो है?”

दरबार अमरसिंह री ताकत जाणता हा सो बे बिनां किणी जेज रै ओपैजी सूं रूसणो छोड ओपतो सम्मान दियो।

~~गिरधरदान रतनू “दासोडी”

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