पाबू-प्रभा

एक महान जननायक, जिन्होंने अपनी अल्पवय में ही लोक ललक की पूर्ति हेतु तन-मन-धन समर्पित कर संसार में सुजस अर्जित कर अमरता प्राप्त की।  दीन-हीन, पद दलित, स्त्री सम्मान व मूक प्राणियों की रक्षार्थ समरांगण में जूझते हुए वीरगति प्राप्त की। विख्यात डिंगल कवि लधराजजी मूहता सही ही लिखते हैं कि सबल की सहायता करने का खेल खलक में विश्रुत है लेकिन अबल की भीर करने वाले पाबूजी जैसे विरले ही हैं-

सबल़ तणी पख व्है सदा, खलक तणो ओ खेल।
तैं कीधी धांधल तणा, वीर गरीबां वेल।।

आज के तथाकथित दलित मसीहियों को ऐसे चरित्र नायक के चारू चरित्र पर यदाकदा दृष्टिपात डालना चाहिए।  महापुरुष सार्वजनिक व सार्वभौमिक होते हैं, वे किसी जाति विशेष से नहीं पहचाने जाते हैं अपितु अपने सत्कर्मों से श्रद्धेय होते हैं।  इस महान जननायक को एक समर्पित मेरी एक रचना-

।।पाबू-प्रभा।।

विदगां वित वारीह, तैं प्यारी तजदी तदन।
पाबू प्रणधारीह, कुण थारी समवड़ करै।।१
पख जुपियो पातांह, गायां जातां गाढ सूं।
विसरां किम बातांह, तैं हाथां रचदी तिकै।।२
चटपट चिरताळीह, खट भिड़ियो जा खिचियां।
रजवट रखवाळीह, सतवट पाळी सूरमै।।३
कमधज क्रोधाळाह, भुरजाळा चढियो भिड़ज।
खिच्यां रतखाळाह, किरमाळां तैं काढिया।।४
साहळ सुण सारीह, कारी तूं करजै कमंध।
मांटी मिणधारीह, वारी इण बण वाहरू।।५

।।छंद-त्रिभंगी।।
केसर नखराळी, अस वा काळी, जींद निहाळी, जोराळी।
आयो हठियाळी, बैय उंताळी, मांगी जाळी, मतवाळी।।
मीसण मछराळी, रूठ रढाळी, नहीं संभाळी, गल सारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।1
सतवट बातां, धर सारी।।

आगळ चढ आयो, कमंध उमायो, सगत बधायो, सरसायो।
बैनड़ विरदायो, यूं बतळायो, कमंध कोडायो, किम आयो।।
वरधर मोदायो, कांम बतायो, थिर मन थायो, अस थारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।2
सतवट बातां, धर सारी।।

सुरभी सींघाळी, सको संभाळी, चर हरियाळी, चिरताळी।
वन मे दूधाळी, रह विरदाळी, करै रुखाळी, ज्यां काळी।।
अस नेस उजाळी, किम दूं काळी, मिणधर भाळी, सत म्हारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।3
सतवट बातां, धर सारी।।

सुण पाल उचारी, कमंध सचारी, बात अटारी, बंधवारी।
तद तंब तिहारी, चवड़ै चारी, भय ना धारी, मनभारी।।
बिखमी री वारी, देह हमारी, करसूं कारी, कटवारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।4
सतवट बातां, धर सारी।।

सज परण सिधायो, पाल पोमायो, तोरण आयो, तकड़ायो।
हमरोट सरायो, रँग रचायो, सोढी भायो, वर चायो।।
अध फेरै आयो, सगत सुणायो, खीची तायो, धन हारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।5
सतवट बातां, धर सारी।।

गंठबंध छुडायो, सिंघ छेड़ायो, कमंध क्रोधायो, खड़ आयो।
संग्राम मचायो, नीं संकवायो, धांधल जायो, विढवायो।।
रज ध्रम निभायो, रण रीझायो, सुरभी लायो, गिण सारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।6
सतवट बातां, धर सारी।।

विदगां वित वाहर, जग मे जाहर, वणियो चाहर, उणवारां।
खायो मन खाहर, खीची लाहर, जुड़ियो जायर, खगधारां।।
नांमी नर नाहर, आयो थाहर, खीची खायर, खगधारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।7
सतवट बातां, धर सारी।।

देवल विरदायो, वित्त गिणायो, वीर न लायो, बाछड़ियो।
धकचाळां धायो, धुर धुब्बायो, अडर अचायो, आ अड़ियो।।
रिम नाह रंजायो, सुजस रखायो, सुरग सिधायो, सतधारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।8
सतवट बातां, धर सारी।।

कमंधज किरपाळा कोळूवाळा सीर संभाळा सचियाळा।
कळजुग विकराळा कर मुख काळा रहै रुखाळा रढियाळा।।
भामी भुरजाळा तो प्रतपाळा गह जस माळा गिरधारी।
पाबू पणधारी, भू पर भारी, वीरत थारी, बळिहारी।।9
सतवट बातां, धर सारी।।

।।कवत्त।।
पखो पातवां पाळ खार खीच्यां पर खायो।
सुरभ्यां तणी संभाळ आण रखवाळण आयो।
भिड़ियो इम भुरजाळ काळ जिम उठै कराळो।
सधर पाळियो सीर धीर धिन धांधल वाळो।
वीतसी समो अरबां वरस जस तोई नह जावसी।
आवसी गीध पाबू उठै (जठै) गीत सुजस रा गावसी।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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