पछै ओ माथो कांई काम रो?

आज जितरो भौतिक विकास हुयो है उतरी ईज मानसिक द्ररिद्रता बधी है। मिनखपणो, नैतिकता, संवेदनावां, अर जीवणमूल्यां रो पोखाल़ो इण लारलै वरसां में जिण तेजी सूं निकल़ियो है उणसूं इण दिनां आंरी दुहाई देवणियो अजै तो फखत गैलसफो ईज बाजै, बाकी आ ई गति रैयी तो लागै कै आवण वाल़ै दिनां में आंरो नाम लेवणियो बचणो ई मुश्किल है।

एक उवो ई बखत है जद चीकणी रोटी जरूर जीमता पण चीकणी बात करण सूं चिड़ता। आपरै साथै रैवणिये या आस-पड़ौस माथै आफत आयां उणरै साथै हरोल़ में रैता अर मदत कर’र परम सुख मानता। क्यूंकै उण काल़खंड रा मिनख वाच -काछ निकलंक हुवता। आपरै गांम कै पडौसी माथै आफत आयां पछै पाछ पगलिया नीं सिरकता बल्कि आगमना हुय आपरो माथो देवण में गुमेज मानता। जद ऐड़ै मिनखां री ऐड़ी बातां पढां कै सुणां तो इयां लागै कै उवै मिनख जावता उवै बातां अर बखत आपरै साथै लेयग्या-

वल़ता लेग्या वांकजी,
सदविद्या गुण संग।

ऐड़ी ई गीरबैजोग एक बात है मोरझर रै सुरताणिया पताजी वैरावत अर अकरी रै रतनू भोजराज खेंगारोत री।

बात इयां है कै मोरझर रै एक रावल़ (रावल़ एक जाति है जिणरा चारण जजमान है अर इण जात नै पूज्य मानै। ) माथै रोहा ठाकुर री कुठागरी हुयगी।

बात आगे लिखूं, इणसूं पैला थोड़ी रावल़ जात री ओल़खाण करावणी समीचीन रैसी।

विक्रम री नवीं सदी में चारण कुल़ में आवड़जी जैड़ी महाशक्ति रो अवतार हुयो। रावल़ उणी बखत सूं चारणां रा पूज्य है। कोई पण आ ई कैवै कै उणी सदी रा नामचीन चारण मावलजी वरसड़ा बामणां नै वानो पलटाय रावल़ किया अर आपरी जजमानी दी-

द्विज पलट रावल़ किया,
मावल शहर अंजार।

बातां दोनूं ई बैवै। खैर..

चारणां रै घरै किणी मांगल़िक अवसर माथै जे बामण हाजर नीं हुवै तो वै सब काम रावल़ रा हाथां संपन्न हुय सकै। रावल़ चारणां सारू पूज्य अर आदरणीय रैया अर है। इणी सारू चारण इणांनै रावल़देव री संज्ञा सूं अभिहित करै।

रावल़ दो वर्गां में बंटिया थका है। एक बहीवंचा (भाट रै टाल़) जिकै चारणां री पीढियां लिखण रो काम करै अर दूजा रांमत घालणिया। इण रांमत घालणियां री आ इधकाई है कै ऐ केवल चारणां रै गांम में ईज रांमत घालसी। जे कोई बीजी जात (क्षत्रिय आदि) रो आंनै रांमत घालण रो निवतो देवै तो ऐ जद ई उठै रांमत घालसी जद उठै कम सूं कम एक चारण तो हाजर हुवै ई हुवै, जे उठै एक ई चारण नीं हुवै तो भलांई आंनै कोई करोड़ पसाव करै तो ई रांमत नीं घालै। ऐड़ा दृढसंकल्पित लोग हा।
हालांकि दोनां में बेटी-रोटी रो व्यौहार है। कोई फरक नीं है।

इणी चारणां रै पूजनीक मोरझर रै एक रावल़ किणी जागा रोहा ठाकुर वजमालजी री किणी अजोगती बात री कठै ई खुलैखाल़ै निंदा करदी।

आ बात किणी जाय’र रोहा ठाकुरां नै बताई तो उणांनै उण रावल़ माथै तो रीस आई ई आई साथै ई पूरै मोरझर रै रावल़ां माथै ई कुठारगी हुयगी अर उणां आपरो कासीद मेल’र उठै रै जागीरदार पताजी सुरताणिया नै आदेश दियो कै हणै रा हणै मोरझर सूं रावल़ां नै काढिया जावै। नींतर म्हारी रीस झालणी पड़सी।

ओ समाचार सुण’र चारण गतागम में पजग्या। आगै कुवो अर लारै खाई। एकै पासै ठाकुरां री कुठारगी तो दूजै कानी आपरी पूजनीक जात रै माण री बात। चारणां, ठाकुरां नै रहीम रै इण दूहै में संदेश पूगायो-

सर सूखे पंछी ऊडै, और ही सर ठहराय।
मच्छ कच्छ बिन पच्छ के, कहु रहीम कित जाय?

अर्थात एक सरवर रै सूखियां पंछी उडै तो उणां नै दूजो सरवर रोकलै पण मछलियां, काछपा अर पंख खूस्योड़ा पंछी कठै जावै? ऐ रावल़ म्हांरै पूजनीक। खारै जाया अर ओडाणै परणाया मतलब आंरै म्हे सासरो अर म्हे ई पीहर!! सो रावल़ अठै सूं कठै ई नीं जावै।

ठाकुरां पाछो समाचार करायो कै –
“मोरझर म्हांरै वडेरां थांनै दियो। म्हे अठै रा धणी। म्हांरो काम भल़ायो चोखो हुवो भलांई माड़ो ! म्हांरी में रैवणिये नै करणो पड़सी। थे सुणी नीं कै जिणरी खावै बाजरी उणरी बजावै हाजरी। सो ऐ रावल़ म्हांनै भूंडणिया कुण? आंनै काढो नींतर म्हें म्हांरी सेना लेय’र आवांला अर निखूना मिनख मरैला। जिणरी दूनो थांनै आसी।”

पताजी पाछो कैवायो कै – “इतरो ऊनो मत थूको। म्हैं कोई डेरो दियां नीं बैठा हां सो आप आदेश देवोला अर म्हैं लद लेसां। आप आ तो जाणो ईज हो कै म्हांनै एक’र किणी गांम दे दियो मतलब दे दियो। अब म्हे उठै रा धणी। आ म्हांरी मरजी कै म्हे किणनै अठै सूं काढां अर किणनै अठै राखां। ओ सांसण गांम है अठै मरजी म्हांरी चलसी आपरी नीं।”

आ सुण’र ठाकुरां आपरा आदमी मेलिया अर कह्यो कै –
“चारणां नै बिनां दखल पूगायां रावल़ां नै उठै सूं कूट काढो।”

ज्यूं आ खबर मोरझर पूगी तो चारणां पताजी सुरताणिया रै नेतृत्व में उठै धरणो दियो। जोग सूं उणी बखत आंरा भाणेज अकरी गांम रा रतनू भोजराज खेंगारोत आं सूं मिलण मोरझर आया। आगे देखियो तो नानाणिया धरणो दियां अर तागै री त्यारी करियां बैठा है। तागो करणियां रो एक अलिखित नेम है कै उठै कोई पण चारण आ ज्यावै अर तागा करणियां रै भेल़ा पग कर दे तो उणनै, उणां रै साथै तागो करणो ईज पड़ै। पछै उवो पाछो नीं सिरक सकै। असली चारण इण नेम नै पाल़’र अपणै आपनै गौरवान्वित मानतो।

जोग सूं भोजराजजी ई उण दिन उठै आय नानाणियां भेला हुया तो उणांनै नेम मुजब तागो करणियां रै भेल़ो बैठणो पड़ियो।
भोजराजजी नै धरणै में भेल़ो बैठतां देख पताजी कह्यो –
“रे भाणूं भोज! तूं सवासणी(हमारी कन्या का पुत्र है) रो जायो है! थारो अठै खोपरो लेवण रो हक है माथो देवण रो नीं। तूं थारो रगत अठै मत खिंडाजै। म्हें पाप रा भागी बणसां। तूं म्हांरो मेहमाण है। थारी रक्षा करणो म्हांरो धरम है। तूं आ मरण री कालाई मत कर।”

आ सुण’र रतनू भोजराजजी कह्यो –
“मामा आपरी बात खरी म्हारो हक फखत मोल़ियै तक रो है। पण आप बतावो कै कांई ऐ रावल़देव फखत आपरै ईज पूजनीक है? म्हांरै नीं! पछै थे आ तो सुणी ईज हुवैला कै – मामा ज्यांरा मारका, भूंडा किम भाणेज।

कै तो ओ कैताणो कूड़ो है कै-
‘धी दादाणै अर नर नानाणै’ अर जे साचो है जणै हूं धरणै सूं काठमनो कीकर हुय सकूं? क्यूंकै म्हारै हाडां में ई मोरझर हेला करै। सो म्है थांरै भेल़ो ईज मरसूं अर भेल़ू ई जीवसूं। थे मरो अर हूं अठै बैठो जुल़क जुल़क जोवूं तो कठै तो म्हारै नाक रैसी अर कांई हूं ई माथो रो करसूं? नाक बायरो माथो म्हारै कांई कामरो?-

सिर जाज्यो सौ नाक सूं, नाक न जाज्यो चक्ख।
पाणी पुटक न जावज्यो, लोही जाज्यो लक्ख।।

जितरै रोहा ठाकुरां रा मेलिया आदमी मोरझर धरणा स्थल़ माथै आय पूगा। पताजी सुरताणिया रोहा ठाकुरां माथै आमनै में गल़ै कटार खाधी। मामै नै रावल़ां री रक्षार्थ गल़ै खावतां देख’र अकरी रै रतनू भोजराज आपरो कमल़(सिर) तरवार सूं आपै ई उतार’र उठै राखियो।

चारणां री रावल़ां री रक्षार्थ आ रूड़ी रांमत देखर, रोहा ठाकुरां रा खांचा ढीला पड़िया। उणां पछतावो करतां चारणां सूं माफी मांगी अर भविष्य में ऐड़ी अजोगती बात नीं करण री सोगन काढी। जणै चारणां उणांनै माफी दी।

पताजी सुरताणिया अर भोजराजजी रतनू री कमनीय कीरत समकालीन कवियां घणै अंजस सूं उकेरी।

पताजी री सरणायां सारू कटारी खाय प्राणांत करण रो वर्णन करतां एक कवि लिखै-

वडो खाटियो विरद भारी वधारी चकारां वात,
ऊजल़ा करेवा राव सुरताणां ऐम।
वाह! वाह! कहै सौ पृथ्वी राखवां वातां,
त्रापवी कटारी वेरा-सुत तेम।।

तो किणी दूझै कवि लिखियो कै ज्यूं त्रिकम गजराज नै बचायो त्यूं ई त्रिकम रै पोतरै पतै रावल़ां नै बचाया-

वडै भूप वजमाल, खीझ कीधी रोहापत्त।
मोरांझर मांहे, सही ना राखां साबत्त।
सजै कहै सुरताण, सुकव भावै तहां जावो।
चारण दोझी चाल, जंह भावै तंह जावो।
तिणवार ग्रहित पातां तणो, सूरज चंदर साखियो।
त्रिकमहरे त्रिभुवन ज्युंही, पातले रावल़ राखियो।।

भोजराज रतनू रै त्याग नै बखाणतां किणी कवि लिखियो कै पतै नै कटारी खावतै नै देख भोजराज मनमें विचारी कै कठै ई शरणायां सारू पैला प्राण देय मामो सुजस रो सेहरो एकलो नीं पैरलै! इण सारू उण महामनै कीरती रो कोट खाटण सारू आपरो कमल़ पैला उतार रावल़ां सारू अर्पित कियो–

अंग में धारवी सुरताण गल़ ऊगवी,
क्रोध कर खेंग सुत कमल़ कापै।
——-
गल़ा बिच कटारी पातलै घातवी,
देख भोजै परब कमल़ दीधो।।

सायत ऐड़ै मोटमनै वीरां सारू ई किणी कवि ओ लिखियो हुसी–

सूर मरै कायर मरै, अंतर दोनां ऐह।
कायर मर धरती धसै, धसै सूर जस देह।।

साचाणी ऐ दोनूं महाभड़ आज ई जस देह में अमर है। इण ओल़्यां रै लेखक रै आखरां में श्रद्धा सुमन-

मही धिनो धिन मोरझर, किया सही सह काज।
शरणायां रखिया सधर, सुरताण्यां सिरताज।।1

रूठो ऊपर रावल़ां, बूरीगार वजमाल।
अडरपणै उण बखत में, पतै रखी प्रतपाल।।2

शरणायां कज सूरमै, पतै वरी प्रतमाल़।
पसरी कीरती परघल़ी, वसुधा सकल़ विचाल़।।3

सखरी कीनी साचमन, लखरी गल्ल ललाम।
पकरी वरती प्रगट में, अकरी भोज अमाम।।4

अकरी कीनी ऊजल़ी, अनड़ धीर धिन ओज।
लाख मुखां जस लाटियो, भल भल रतनू भोज।।5

ऐह रख्यो व्रिद आदरो, शरणायां साधार।
भल रे रतनू भोजिया, भुजां उठायो भार।।6

कमल़ दियो कज कीरती, आपै खाग उतार।
खरो हुवो खेंगार रा, हिव हर भोजा हार।।7

भोजा तैं रखियो भलो, गढवी अंतस गाढ।
सुरगां पूगो सधरमन, च्यार पखां जल़ चाढ।।8

रावल़ शरणै राखिया, हित चित साचै हेज।
प्राण दिया प्रण पाल़ियो, भल मामै भाणेज।।9

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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