पुस्तक समीक्षा – पखापखी विहुणी निरख-परख

साहित्य सिरजण रै सीगै बात करां तो सगल़ां सूं अबखो अर आंझो काम है आलोचना रो। आलोचना रै पेटै काम करणियो नामचीन ई हुवै तो बदनाम ई। इण छेत्र में तो वो ई काम कर सकै जिणरै मनमें “ना काहू सों दोस्ती, ना काहू सों बैर “री भावना हुवै। हकीकत में आज इणरै ऊंधो हुय रह्यो है, आज तो आलोचना ई मूंडो काढर तिलक करण री परंपरा में बदल़ रह्यी है।
राजस्थानी आलोचना री बात करां तो आपां रै सामी आलोचकां रा नाम कमती अर पटकपंचां रा नाम ज्यादा अड़थड़था लखावै। यूं भी आलोचना करणो कोई बापड़ो विषय नीं है जिको हर कोई धसल़ मार देवै। आलोचना करणो खांडै री धार बैवणो है। जिण खांडै री धार माथै सावजोग रूप सूं बैवणो सीख लियो वो आलोचना रै आंगणै आपरी ओपती ओल़खाण दिराय सकै कै थापित कर सकै।

राजस्थानी आलोचना री बाबत बात करां तो यूं लागै कै अजै ई घणकराक लोग आंधल़गोटो ई रम रह्या है या यूं कैयदां तो ई कोई अपरोगी बात नीं लखावै कै आज ई लोग पोथीगत अथवा विषयगत आलोचना करण री जागा आपसी खाबखस दरसावण रो हुनर ई दिखाय रह्या है। राजस्थानी आलोचना री जितरी ई पोथ्यां आई है उणां में घणकरीक तो “हूं र हुंकार दास! चेलो र चकारदास!” रै दायरै सूं बारै नीं आय सकी।

आज ई आलोचना पेटै आपां कनै सर्व स्वीकार्य नामां रो तोड़ो है। छतापण इण पेटै नाम गिणावां तो दस आंगल़ियां मांय सूं सायत एक दो तो उबरती रह जावै तो कोई घणै इचरज री बात नीं लागै। आलोचना पेटै जिकी पोथ्यां आई है उणां में दो च्यार नै छोडर बाकी री कै तो गुरु री गरिमा दरसावण रा पांपल़ा करती लागै कै चेलै रा दिनमान चमकावण रै जाझै जतनां री जुगत में। सो ऐड़ी आलोचना लोगां रै गल़ै नीं उतरै। क्यूंकै राजस्थानी रै मून साहित्य साधकां माथै तो अजै इण पेटै लिखणियां में दो तीन नै छोडर बाकी रा सिद्ध श्री करण सूं परहेज राखै। पण लारले दिनां इण विषय नै लेयर छपी एक पोथी राजस्थानी रै आम पाठक नै धीजो दिरावै कै अजै ई नीं तो मिंया मरिया है अर नीं रोजा घटिया है!

आ पोथी है ‘निरख-परख’। ‘निरख-परख ‘ रा लेखक है डॉ चेतन स्वामी। डॉ चेतन स्वामी रो नाम साहित्यिक जगत में चावो। डॉ स्वामी आपरै काम रै पाण नाम कमायो है। राजस्थानी री कमोबेश सगल़ी विधावां में लगोलग दखल राखणिया डॉ स्वामी कहाणीकार रै रूप में विशेष ख्याति राखै पण साथै ई शोध, लोक साहित्य अर आलोचना रै छेत्र.में ई पूरो दखल राखै। म्हारी निजू राय में शोध रै छेत्र मे ई डॉ स्वामी एक समर्पित नाम है, क्यूंकै इण छेत्र में जिकी निष्ठा अर समर्पण री जरूरत हुवै वा स्वामीजी में देखी जा सकै। आजरी बखत इण छेत्र में ई आंगल़ियां माथै गिणावै जिताक नाम है वां में डॉ स्वामी हरोल़। डॉ स्वामीजी आधुनिक अर परापरी साहित्य री पूरसल जाणकारी राखै। ओ ई कारण है कै स्वामजी कनै संचित पूरसल सबद संपदा है।

डॉ स्वामी री इण पोथी में आधुनिक राजस्थानी साहित्य री टाल़वी विधावां यथा कहाणी, निबंध, उपन्यास रै साथै उथल़ै री खामचाई, सेठियाजी री मिंमझर रो कमनीय पख, महामनीषी सहलजी री साहित्य साधना रै साथै डिंगल़ गीतां में स्वातंत्र्य चेतना रो पख उजागर करण सारु सांगोपांग अर सावजोग रूप सूं खेचल करीजी है। इण बातां नै डॉ स्वामी आपरी जथाजोग प्रज्ञा अर प्रतिभा रै पाण आम पाठक रै सीधै काल़जै उतरण वाल़ी सहज भाषा में पूगावण री कोशिश करी है। पूरी पोथी पढियां कठै ई नीं लागै कै लेखक किणी विशेष विचारधारा रै वांनै में छांनैमानै कोई बात माडै ई आपांनै बतावणी चावै।

पोथी में कठै ई किणी विचारधारा कै व्यक्तिपरक पूर्वाग्रह कै घाईघुती निगै नीं आवै। यानी एक निरपेख आलोचक रो रूप लियां स्वामीजी सहज रूप सूं वा बात कैवण री हीमत दरसाई है जिणनै कैवण में कै तो भलां-भलां रा गांघा अमूझै कै मिनख भला बजण री गरज में चालाकी सूं बचता निगै आवै पण डॉ स्वामीजी तो “आपां नीं तो पछै कुण?” री तर्ज माथै आपरी असहमति कै सहमति दर्ज करावण सूं आंख टाल़ो नीं करै। सही मायनै में ओ ईज आलोचक रो धरम है कै वो आपरी बात पाठक री दीठ सूं पाठक तक बिनां किणी लागलपट कै पखापखी रै पूगावै।

पोथी री विगतवार बात करां तो पैलो निबंध ‘आगूंछ उतराधी कहाणी’ है। राजस्थान रो उतराधो अंचल अबार गद्य लेखन रै सीगै हणै बाकी रां सूं धकै बह रह्यो है, विशेषकर कहाणी रै हवाले सूं। कहाणी नै समकालीन सोच अर दीठ सूं सबल़ करण सारु ओ अंचल अविचल रूप सूं अविरल न केवल दिख रह्यो बल्कि लिख ई रह्यो है। कहाणी लिखण री होडाहोडी में उतराधिया आपरी एक निकेवल़ी हथोटी थापित करण में कामयाब रह्या है। इण लेखकां वर्तमान में आया सामाजिक बदल़ावां, संबंधां अर सामाजिक संघर्षां री खदबदाहट नै महसूस ई नीं करी बल्कि पूरी संवेदनशीलता रै साथै आपरी बात राखण सारु आपरी ऊरमा री ओल़खाण देतां थकां एक नवो मुकाम हासिल करण में सचेष्ट सफल़ रह्या है। डॉ स्वामी खासकर च्यार कहाणीकारां री बधतायां सूं पाठकां नै परिचित कराया है। ऐ कहाणीकार है-भरत ओल़ा, रामस्वरुप किसान, रामेसर गोदारा, अर डॉ सत्यनारायण सोनी।

भरत ओल़ा नै प्रतिबद्धता रै साथै उतरणिया कहाणीकार मानतां थकां स्वामजी इणां नै जथारथ सूं जुड़िया कहाणीकार मानै तो इणां री कहाणियां में संवेदना रा जीवंत चितरामां नै अंगेजता पाठक रै साथै अपणास रो थिर रिस्तो थापण री खामचाई नै ई रेखांकित करै।

इणी अंचल़ रै नामी कहाणीकार ‘किसान’ जिको सबदां री साख बावतो रैवै। स्वामीजी किसान री इण खांमचाई नै सावजोग रूप सूं प्रगटी है कै ओ आदमी किणगत एकै हाथ में बेई अर दूजै हाथ में कलम धार र आपरै लेखकीय कड़पाण री निकेवल़ी ओल़खाण थापण में सफल़ रह्यो है। ‘किसान ‘आपरी साख री सबल़ तैयारी में खुरा खांचियां आपरी मैणत रो आपाण बतायो है।
श्री रामस्वरूप ‘किसान’ सूड़ करतो, हल़ोतियो करतो अर खल़ो खंखैरतो आखरां सूं मून बंतल़ करतो कहाणी री कोरणी अर सिट्टां री मोरणी समरूप सूं करै तो कोई अडोपमी बात नीं लागै।

किसान एक आम लेखक है सो इणां री बात आम आदमी खातर ई हुवै क्यूं कै जिणभांत नरसी कह्यो ‘जै पीर पराई जाणै रै’ तो आ सही है कै जिको संवेदनशील हुवैलो, वो ई संवेदना रा कणूका बोवैलो। जिको पीड़ भोगैलो बो ई पीड़ नैं महसूसतो आपरी कलम सूं मलम लगावण री खेचल करैलो अर आ बात किसान रै आखर आखर में है। सहजता सूं दरसै। विद्रूपतावां, विसमतावां, अर दोगलैपण री बखियां उधेड़तो किसान राजनीति रै रुगटापणै, छाकटापणै, सलू साटै भैंस बाढणियै अर लासां माथै रोटी सैकणियां सू सचेत करतो निगै आवै। किसान री इण इधकायां नै लेखक सावजोग रूप सूं परोटी है।

रामेसर गोदारा री कहाणियां नै लेखक काल़झै कलझल़ती झाल़ सूं उपजण वाल़ी अर सोनीजी री कहाणियां नै गांव घर री यानी थारी म्हारी राम कहाणी मानतां संवेगात्मक कहाणियां री संज्ञा दी है।

दूजै निबंध में राजस्थानी वीर गीतां में स्वातंत्र्यता री अलख रा सुर कितरा सजोरा रह्या है री, एक पड़ताल़ करी है। लेखक रो मानणो है कै स्वतंत्रता नै राखण सारु धीरता, वीरता अर गंभीरता री दरकार हुवै अर इण तीनूं गुणां रो संचार करण वाल़ी कलम चारण कवियां री अबीहता साथै चाली। कई प्रेरणादायक प्रसंगां अर दाखलां साथै लेखक आपरी बात री प्रमाणिकता सिद्ध करी है। इण लेख में म्हनै थोड़ी आ कमी अखरी कै लेखक दाखलां साथै कवियां रा नाम देवण में आल़स.करग्यो। गोरधनजी बोगसा, पदमा सांदवण, बांकीदास जी सूरजमलजी मीसण आद नामां साथै दूजा नाम ई इणां रै उद्धृत दाखलां साथै हुवता तो आम पाठक नै ई जाणकारी रैवती।

तीसरो निबंध आलोचना रै आंझै मारग माथै है। लेखक रो मानणो है कै आलोचना कानी बैवणियै नै ऊजड़वाट बैणो पड़ै। राजस्थानी आलोचना री सांगोपांग पड़ताल़ करतो लेखक आ मानै कै भलांई घणा लोग सूंठ रो गांठियो राख र खुद नै पंसारी घोषित करण नै आखता पड़ै पण असल में अजै ई इण पेटै नाचन जानूं! , आंगन टेढा वाल़ी ई स्थिति है।

चौथो निबंध, राजस्थानी ललित निबंधां माथै.है। राजस्थानी ललित निबंध लेखन रै अंजसजोग इतियास सूं लेयर वर्तमान तक री विगतावली देतां लेखक राजस्थानी ललित निबंधां री स्थिति माथै धीज-पतीज राखै।

डॉ शक्ति दानजी कविया, जहूरखांजी मेहर, किरणजी नाहटा, मूल़दानजी देपावत, आद सिरै लेखकां री ओल़ में ई गिरधरदान रतनू रै निबंधां री सावजोग चर्चा करतां ‘जल़ ऊंडा थल़ ऊजल़ा’ नै नामी निबंध संग्रह बतायो है। पांचवो निबंध में अनुवाद री इधकाई माथै चर्चा करतां लेखक इण विधा में आपरो हाथ आजमावणियां नै सलाह दी है कै जिणनै बिच्छू रो झाड़ो नीं आवै उणनै नाग रै फण कानी आंगल़ी नीं करणी चाहीजै। क्यूंकै अनुवाद मूल़ सूं आंझो काम है। अनुवाद उणनै ई करणो चाहीजै जिणनै मूल़ अर उथल़ै री भाषा री प्रवृति अर प्रकृति री गहरी जाणकारी हुवै नीतर भैंसो मारर वैसवांरां सूं बिगाड़ण वाल़ी बात है! छठो निबंध है-सहलजी री सूझ।

कन्हैयालालजी सहल राजस्थानी साहित्य रा सिरोमणी शोध साधक हा। डिंगल काव्य, लोक काव्य, कहावतां, लोककथावां, गाथावां, सांस्कृतिक अर ऐतिहासिक आख्यानां रै माध्यम सूं राजस्थानी लेखन कल़ा नै राती-माती करी। स्वामी इण काम री उपयोगिता अर आजरै लेखकां सारु इण काम री महत्ता नै असरदार ढंग सूं दरसाई है तो सहलजी री मिटती परंपरा माथै ई चिंता दरसाई है। आगलो निबंध है-कविता री मींझर लड़ाझूम है। इण आलेख में स्वामीजी राजस्थानी रा दिग्गज कवि कन्हैयालालजी सेठिया रै आध्यात्मिक अर दार्शनिक चिंतन नै सहज रूप सूं बतावतां मिनख अर प्रकृति रै आदजुगादी रागात्मक संबंधां नै दरसावण री खेचल करी है अर इणमें ऐ पूरा कामयाब रह्या है। इणी भांत राजस्थानी रा नामी कवि, कथाकार, चिंतक, आलोचक अर सिरै अनुवादक पदमश्री सी, पी, देवल रै एक बेजोड़ उथलै सूं सुविज्ञ पाठकां नै परिचित कराया है। प्रसिद्ध हिंदी कवि केदारनाथ सिंह री कविता पोथी ‘अकाल में सारस’ रो चंद्रप्रकाश जी देवल ‘काल़ में कुरजां’ नाम सूं उथल़ो कियो है। अनुवाद इतरो सजोरो है कै ओ भाव, भाषा, अर शिल्प री दीठ सूं आ कृति मूल़ रो आभास ई नीं करावै बल्कि मूल रा भोल़ा भांगै। डॉ स्वामी, देवल साहब नै सिरै अर ऊर्जावान लेखक रै साथै एक समर्थ अर समर्पित अनुवादक मानण में कोई संकोच नीं कियो है।

आगलै दो आलेखां में स्वामीजी एक में भारतीय जनमानस अर विशेषकर राजस्थानी गांवेड़ूं भांयखै में जातीय जकड़ण री बखियां उधेड़तै भरत ओल़ा रै उपन्यास ‘घुलगांठ’ री बधताया निसंक बताई है तो कथाकार श्याम जांगिड़ री कलम माथै ई पतियारो करतां कहाणी लेखन री दिशा अर दशा माथै आपरी चिंता सूं पाठकां नै रुबरु करावै। श्याम जांगिड़ रो कहाणी छेत्र में पगफेरो भरोसेमंद मानियो है जिको वाजिब ई है। श्याम जागिड़ रै कहाणियां री इधकाई सहजता अर सपाटबयानी है।

कुल मिरायर कह्यो जा सकै है कै ‘निरख-परख ‘आलोचना री दीठ सूं लारली पोथ्यां सूं आगेडाल नीं तो लारैडाल़ ई नीं है। डॉ स्वामी आपरी बात रखापखी बिनां परखी सूं परख र राखी है। कहाणी, ललित निबंध, कविता, वीरगीत, उपन्यास, आलोचना, अनुवाद आद माथै आपरा विचार निरपेख भाव सूं राखिया है। निश्चित रूप सूं आजरै नवा लिखारां नै इण पोथी सूं एक दिशा मिलैली तो आलोचना रै पागड़ै पग राखणियां नै ई एक सीख मिलैला कै पखापखी सूं नीं तो लेखक नै लाभ है अर नीं साहित्य सिरजण में बधोतरी।

आश ई नीं बल्कि पूरो पतियारो है कै आलोचना रै सीगै काम करणियां सारु आ पोथी एक दिशा देवण वाल़ी सिद्ध हुवैला।

पोथी-निरख-परख
विधा-आलोचना
लेखक-डॉ चेतन स्वामी
प्रकाशक-बालाजी प्रकाशन
फतेहपुर शेखावाटी (सीकर)राज.
मोल-एक सौ पचास रुपिया

प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी कोलायत बीकानेर 334302
मो.9982032642

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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