परमवीर प्रभु प्रकाशःअदम्य साहस रो अमिट उजास

paramveerprabhuprakashरजवट (साहस) रो वट जिण सूरां आपरै रगत सूं सींच र पोखियो उणां रो नाम ई अमर रैयो है। कायर अर वीर रै मरणै में ओई फरक है कै कायर तो मरर धूड़ भेल़ा होवै अर वीर जस देह धार अमरता नै प्राप्त होवै। आजरै इण नाजोगै जमानै में ई आपरो जोगापणो बतावणिया जनम लेय, देश रै कारण मरण खाट, ऊजल़ै वेश सुरग पथ रा राही बणै। ऐड़ो ई एक वीर लारलै दिनां देश भक्ति रो दीप दीपाय अमरता नै प्राप्त होयो।

इण वीर रो नाम हो प्रभुसिंह गोगादेव। शेरगढ रै खिरजां खास में जनम्यो ओ जोधार पाक रै आतंकियां सूं अडरता रै साथै लड़तो थको जूंझार होयग्यो। फगत पच्चीस वरसां री उम्र में समरांगण में जिको साहस बतायो बो सदैव आवण वाल़ी पीढी सारु प्रेरणादायक सिद्ध होवैला। प्रभुसिंह री वीरता, उणरै अंतस आलोक अर हृदयगत भावां नैं किणी कवि कितरै सतोलै शब्दां में व्यक्त किया है-

डर सूं सस्तर नांखदै, कायर फोट कपूत।
मरणै सूं डरपै मुदै, जिकै किसा रजपूत।। ?

इण रजपूती नै जिण मजबूती सूं प्रभुसिंह दरसाई उणनैं आजरै लगैटगै चाल़ीस डिंगल़, राजस्थानी कवियां आपरी संवेदनशीलता सूं शब्द सुमनां में पिरोय मार्मिक भावांजल़ि दी.है। इणी संवेदनशीलता सूं डॉ लक्ष्मण सिंह गड़ा इण वीर री वंदान्य वीरता रै प्रति नतमस्तक भावां सूं इण रचनावां नैं संपादित करर आवण वाल़ी पीढी नै एक प्रेरणादायक दस्तावेज उपलब्ध कराय उपकृत किया है। इण स्वारथी जुग में डॉ गड़ा रो ओ काम नीं खाली सरावणजोग है बल्कि अनुकरणीय ई है। डॉ गड़ा रै इण काम पेटै म्हनै ऊकजी बोगसा रो एक दूहो याद आयग्यो जिको उणां आपरी मोत सूं एक-दो पैला खांडप ठाकुर प्रताप सिंहजी नै लिखियो-

ऊभां पगां अनेक, केता नर सल़वल़ करै।
पड़ियां पूठी पेख, पत तूं राखै पातला!!

आ ई बात लक्ष्मण स़िह गड़ा रै इण काम पेटै कैयी जा सकै। जिणरी रगां में वीरता रो रगत संचरित होवै बो ई सही मांयनै में वीरता री कूंत कर सकै, नीतर ईलोजी वाल़ा घोड़ा है। डॉ गड़ा, समर्पण, संवेदना, अर निष्ठा रै पाण इण पोथी रो शानदार संपादन कियो है।

डिंगल़ रै वरिष्ठ कवियां में रेवंत दान रतनू, वीरेन्द्र लखावत, मोहन सिंह रतनू, नखत दान बारठ, कल्याण सिंह शेखावत, रै साथै गिरधर दान रतनू, डॉ गजादान चारण, नरपतदान आसिया, रतन सिंह चांपावत, काल़ुसिंह गंगासरा, संग्राम सिंह सोढा, श्रवण सिंह राजावत, नारायणदान बांधेवा, शंभुसिंह चौहान, शंभुदान कजोई, मीठा खान मीर, जगमाल सिंह ज्वाला, ऊदाराम विश्नोई, नारायणसिंह महिया, गिरधारीदान बारठ, प्रेमदान रतनू, नारायणसिंह सुरताणिया, किसनदान रतनू, राजेन्द्रदान झिणकली, सरदारसिंह सांदू, शेषकरण बारठ, हर्षवर्धन राव, साथै मोटयार कवियां में महेंद्र सिंह छायण, मनोज चारण, रविदर्शन सांदू, हिंगल़ाज ओगाल़ा, जोरावर दान रतनू, कृष्णपालसिंह राखी, रिड़मलदान झांफली, मदनसिंह राठौड़, मनोज देपावत, लक्ष्मणसिंह गड़ा रै साथै तरुण कवि लाखमसिंह अर करणीशरण रतनू री रचनावां ई पढणजोग है।

इण कृति में लगैटगै सगल़ी रचनावां डिंगल़ शैली में रचित है। डिंगल़ रै गीत, दूहां अर सोरठां में प्रणीत प्रभु प्रकाश रै नायक प्रभुसिंह री रगां में महावीर गोगादेव रो ऊजल़ो रगत प्रवाहित हो। ओ ई कारण हो कै प्रभुसिंह जितै तक कायरो पणो नीं जतायो जितै तक फुरणियां में वायरो फुरकतो रैयो। प्रभुसिंह रै स्वगोतीय पूर्वज हरपाल गोगादेव पातसाही सेना रै आतंक सूं डरर खींपां रा बोदा खोलड़ा नीं छोडिया तो उणां री पौरस री बातां सुण मोटो होवणियो प्रभु आपरै देश री सीमा जीवतो कीकर छोड सकतो हो? इणी भावां नै इण संवेदनशील डिंगल़ कवियां आपरै आखरां रै ओल़ावै अभिव्यक्ति दी है।

श्री मोहनसिंह रतनू कितरी सटीक लिखी है कै मांचां में मरणियां नै फगत खांपण मिल़ै क्यूंकै ओ लोकिक ढारो है पण तिरंगो तो बो ई ओढर पोढै जिको इणरी आण खातर आपरा प्राण समर्पित करै-

जुध मांही भिड़ियो जबर, अरि आगल़ अगराज।
प्राण देय धर पोढियो, ओढ तिरंगो आज।।

ऐड़ै देशभक्तां री आण आवण वाल़ी पीढी लेय आपरी सत्यता सिद्ध करेली तो सैण अंजस करेला क्यूंकै देशभक्त सदैव अमर रैवै। नखत दान बारठ रै आखरां में-

सीनो ताणै शान सूं, सौगंध लैसी सैण।
बैसी जुग जुग वारता, वार तिवारां वैण।।

नरपत आसिया कितरी सतोली लिखी है कै मरै तो सगल़ा ई है पण जिका कीरत लंक लगाय अर देशहित जूझर मरै बै ई सही मांयनै में सुरगगामी है-

रणबंका डंका बजा, लंका कीरत लूट।
कीरत थूं खाटै प्रभु, वसियो जा बैकूंठ।।

भलांई आपां आज रजपूती(वीरता) रै विषय में न्यारी-न्यारी दीठ दरसाय दां पण इणमें कोई दो राय नीं है कै मध्यकाल़ में राठौड़ां आपरी वीरत रै पाण ई ‘रणबंका राठौड’ रो विरद पायो। शंभुसिंह बावरला रै शब्दां में-

उण कुल़ प्रभु ऊपनो, देवै नीं रण पीठ।
भड़ भिड़ियो भारथ करण, जबर मचाई रीठ।।

ऐड़ा नर -नाहर जिणण वाल़ी जामण नै तो नमन है ही तो उण नारियां नै ई नमन है जिकै इणां री वीरगत पछै धवल़ वसन धार मोद सूं आपरो जोबन इणां री याद में गाल़ कीरत नैं निस्कलंक राखै-

नमूं छतराणियां जिणण नर नाहरां,
नमूं उण नारियां धीर नामी।
मोद सूं साचपण रखै मजबूत मन,
                                    जबर कुल़वाट रा नमूं जामी।। (गिरधरदान रतनू दासोड़ी)

म्है इण वीर री वीरत नै कीरत रै आखरां पिरोय प्रसारित करण वाल़ै सगल़ै कवेसरां नै रंग देवूं कै उणां वीरता री कूंत कर रजपूती ऊजल़ करण वाल़ै वीर नै चितार प्रभुसिंह रै चारु चरित्र री चंद्रिका नै चतुर्दिक चमकावण सारु आपरो फूल सारु पांखड़ी रै रूप में सैयोग दियो तो पोथी रा संपादक डॉ लक्ष्मणसिंह गड़ा रै नै ई रंग देवूं कै उणांइतरै कम बगत में एक काल़जयी कृति रो सिरै संपादन कर र इण महान वीर रै सुजस री सोरम शब्दां में समाहित कर संजोय राखी।

आखिर में म्है म्हारी बात इण वीर नै नमन करतां थकां किसनदान रतनू रै शब्दां में समेटूं-

रंग प्रभु री रजवट नै!
रंग खिरजां री थल़वट नै!!

~~गिरधर दान रतनू दासोड़ी

पोथी रो नाम – परमवीर प्रभु प्रकाश
संपादक – डॉ लक्ष्मण सिंह गड़ा
प्रकाशक – श्री गोगादेव इतिहास शोध केंद्र, शेखाल़ा
ठा.भीमसिंह गोगादेव स्मृति संस्थान, गड़ा
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान दासोड़ी कोलायत बीकानेर।

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