पत तूं राखै पातला!!

सरवड़ी बोगसां रो गांम। साहित्य अर संस्कृति रो सुभग मेऴ।

एक सूं एक टणकेल अर जबरेल कवियां री जनम-भोम सरवड़ी कविराजा बांकीदासजी आसिया अर शब्द-मनीषी सीतारामजी लाल़स रो नानाणो। जैड़ो पीवै पाणी ! वैड़ी बोलै वाणी अर जैड़ो खावै अन्न ! वैड़ो हुवै मन्न!! शायद ओ ईज कारण रैयो होवैला कै ऐ दोनूं मनीषी राजस्थानी साहित्य रा कीरतथंभ हा। होणा ई हा ! क्यूंकै नर नाणाणै अर धी दादाणै रो कैताणो आदू!! पछै ‘मामा ज्यारां मारका, भूंडा किम भाणेज!!’

सरवड़ी में गंगारामजी ऊकजी, बांकजी, सादूलजी, ईसरदासजी, रासाजी, विजयदान जी जैड़ा आद कवि जनमिया, जिणांरी प्रभा साहित्य जगत में पसरी!! सरवड़ी री साहित्यिक आभा रो एक दूहो उल्लेखणजोग है-

अरथ करै कवि ईसरो, वाचै पोथी वंक।
सुणै बोगसा सरवड़ी, आडा वल़िया अंक।।
~~धूड़जी मोतीसर

ईसरदासजी बोगसा गिरधरदासजी बोगसा रा बेटा हा, जिणांरी रचना “ईसरदास की वेर दयानिधि, देर करी कन आऴस लायो!!” घणी चावी है।

लगैटगै इणी बखत में ऊकजी बोगसा नामी कवि अर मिनखाचार सूं मंडित मिनख होया।

अवस्था परमाण मांदा पड़िया ! लोगबाग मिलण अर साता पूछण आवण लागा। ऐड़ी ई बखत में एक किरसै नै ठाह लागो कै बाजीसा बीमार पड़ग्या अर साजा होवणा मुसकल है, जणै बो ई मिलण आयो!!

लोगबाग बैठा जणै बो ई बैठग्यो। लोग साता पूछर-पूछर जावण लागा। लगैटगै सगऴा ई लोग खिंडग्या जणै बो ई उठियो !ऊकजीसा नै रामा-सामा किया!! अर उणरै आंख्यां में चौसरा छूटग्या!!

उणरी बरसती आंख्यां देख बाजीसा कैयो-
‘रे गैला ! धीरप राख, रैणा नीं देस विराणा है!! आयो सो जीव मात्र जावैला-
सोवत मसान मध्य एक दिन जाना है!! पछै म्हारी तो ऊमर ई आयगी सो पाका पान झड़ण रा!! माठ झाल। जीव काठो कर इयां कांई टाबर री गऴाई रोवै!!’

जणै उण किरसै कैयो कै-
“बाजीसा !आप साची फुरमावो !! आयो सो जावैला, म्है कांई अठै रैवूंला ? एक दिन तो म्है ई जावूंलो!!’

“तो तूं इतरी जाणै, जणै पछै क्यूं गऴगऴो होवै?” ऊकजीसा पूछियो जणै उण कैयो-
“हुकम ! म्हे ठैर्या रोही रा वासी! धन-माल राखां अर आपांरै अठै चोरी-चकारी तो आम बात है!! म्हांरै चोरी होवती जणै मियै री दोड़ मसीत तक!! म्हे आप कनै आवता अर म्हांरो धन आपरी मेहर सूं पूठो ठांयै आय जावतो!! हमे आपरी काया तो लाखै ई रैवै नीं तो म्है किण आगै जाय रोवांला अर कुण म्हांरा आंसू पूंछैला? इण डर रै मारियै नै धीरप झलियो नीं अर आंख्यां में पाणी आयो!!”

“बस इतरी ईज बात है !! तो रुको ला लिखदूं!! कदास ऐड़ो काम पड़ ई जावै तो डोड्याऴी ठाकर प्रतापसिंहजी नै दे देई!!बाकी काम उणां रो !!” आ कैय ऊकजीसा उण चौधरी नै एक रुको लिख दियो।

जोग ऐड़ो बणियो कै बारै महिणां पछै उण किरसै रै घरै सूं किण ई उणरी बऴधां री जोड़ी ऊचकाली!! किरसै पाग्यां नै पग बताया पण सांधो कीं लागो नीं!! सेवट उणरी घरवाल़ी झूंपड़ै रै कातरै में खसोल्योड़ो रुको लायर उण किरसै नै देती कैयो कै-“लो ओ बाजीसा वाऴो कागदियो !! जे कीं सांधो लागै तो ले जावो ठाकरां कनै!!”

किसान रुको ले डोड्याऴी प्रतापसिंह जी कनै गयो!!
ठाकरां सूं जंवारड़ा कर र कैयो-
“हुकम आपरै नाम ऊकजी बाजीसा एक म्हनै रुको दियो है!!”

आ सुणर ठाकर चमकिया अर बोल्या कै-
“चौधरी कांई बात है? खासो समझणो दीसै!! बाजीसा नै सुरग सिधायां नै एक वरस बीतो है!! पछै तनै कठै मिलिया अर कठै रुको दियो ?”

चौधरी कैयो
“हुकम मरण सूं थोड़ाक पैला!! लो ओ पढलो!!”

ठाकरां रुको खोल्यो तो उणां नै संबोधित एक सोरठो लिख्योड़ो हो-

ऊभां पगां अनेक, कैता नर सऴवऴ करै।
पड़ियां पूठी पेख, पत तूं राखै पातला।।
अर्थात जोगै मिनख रै जीवतां तो घणा ई उणरो काम काढण में आखता पड़ै पण मरियां पछै कोई उण रो नाम नीं लेवो ! पण हे प्रतापसिंह! तूं एक ऐड़ो जोगतो आदमी दीसै जिको मरियोड़ै रो ई अड़ियो काम काढ उणरी बात राखै!!

दूहो पढ ठाकरां री आंख्या वरसण लागी!! उणां गऴगऴां होय कैयो-
“हां चौधरी बता ! बाजीसा में थारो कांई काम बाकी रैयो?”

उण आपरी पूरी बात बाजीसा सूं होई जकी ठाकरां नै मांडर सुणाई!!
ठाकरां कैयो-
“देख भाई जे बऴध मरग्या है तो गोवोड़ो ला दूं ला अर जीवता है तो थारा बऴध तीजै दिन थारै ठाण पूग जावैला!! बाजीसा रो मारग सऴियो कर अर फारगत कर!!”

इण बात री साख आज रा सिरै कवि डॉ शक्तिदानजी कविया इण भांत भरै-

सुरगां ऊको बोगसो, करसो दुखी उकेल।
पर पाल़ी खत पातलै, डोड्याली डकरेल।।

तीजै दिन प्रभात रो चौधरी उठियो तो देखियो कै उणरी जोड़ी ठाण माथै बंध्योड़ी ऊभी है।
क्रमशः
~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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