पोकरण प्रशंसा पच्चीसी

pokhran-ii

सदन भलै रै संकरी, उपनी देवल आय।
पोकण आ पिछमांण में, वसू पेख वरदाय।।1
संडायच भलिये सदन, करणी ऊजळ कोम।
जनमी देवल जोगणी, भल पोढी री भोम।।2
वंसी मेघां मे बेगड़ा, धरी मात धणियाप।
कारू समरथ यूं किया, अवनी निज री आप।।3
महिपत गड़सी माड रो, पडियो आयर पाय।
मन तन पीड़ा मेटदी, महर करी महमाय।।4
जग पोढी रो जोयलो, परतख रांमो पीर।
ताळ तीजी मे तारदी, नाव डूबती नीर।।5
सरव धरम समभाव री, पोकण वसुधा पेख।
राज उदारण रांमदे, आखै भारत एक।।6
सबै मिनख है एक सा, है नी ऊंचो हीण।
साच संदेसो रामदे, दियो वजायर वीण।।7
गोडा गरू नाम सूं, संत हुवो सिवदान।
उडती बायां आंख सूं, अधर करी असमान।।8
इल़ उपनी अणदू अठै, मिकसाणी महमाय।
थिर मरजादा थापणी, गहर कहै जग गाय।।9
इणी धरा पर ऊपनी, जणणी चंदू जोय।
मांण बधायो मुलक में, देख सांसणां दोय।।10
सुध दासोड़ी सासरो, पीर माड़वो मात।
जग रँग चंदू जोगणी, वसू किया विखियात।।11
मेरो गैरो माड़वै, जुड़ियो गढ जैसांण।
डरियो ना डकरेल वो, मरियो राखण मांण।।11
महा मारको माड़वै, अडर मेर अजरेल।
जा भिड़ियो जैसाण सूं, जमदढ हाथां झेल।।12
वीठू ब्रह्मादास वो, चारण भक्ति चाव।
सुकव चढायो सांम नै, भगतमाळ रो भाव।।13
अळसो रतनू अवन इण, गुणी बारठ रै गांम।
सिरै कवेसर साच वो, निज कुळ करगो नांम।।15
रामनाथ रतनू रसा, जनम इयै धर जाण।
पाण पढाई पामियो, मुलक पूरै में माण।।16
मयाराम कवि माड़वै, अेड़ौ आसूदान।
पह साहित प्रताप सूं, महि खाटियो मान।।17
उदैराज कवि ऊजळां, सतवट दियो सँदेस।
साहित ज्यांरो सांवठो, दीपै वांरो देस।।18
ईहग छतरी एकसा, भलपण मीठा भास ।
ऊजळ करगो ऊजळां, कवियण वो कैळास।।19
ईहग भँवरो आज दिन, बीठू सधरी बांण।
सखरो कायब सिरजणो, मनसुध डींगळ माण।।20
वरतमान नवलो विपर, पद्य -गद्य परवीण।
पोढी बजावै प्रेम सूं, वर साहित री वीण।।21
संत सूरां री सांपरत, अवनी आदू ओद।
पोकण साचो पेखियो, माडधरा रो मोद।।22
परमांणू परकासियो, जग रा कंप्या जीव।
पोकण घाल्यो पेट में, सतवट धरा सदीव।।23
छकियो रजवट छाक सूं, थेटू अवनी थंब।
पोढी घाल्यो पेट मे, बंब उतरियो बंब।।24
कवि गीध कानै सुणी, दाखी जिसड़ी देख
साखी जिणरो सांवरो, आखी अळी न एक।।25

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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