प्रसिध्द ऐतिहासिक चिरजा – कवि हिंगऴाजदान जी जगावत

संदर्भः बीकानेर के पाँचवे शासक राव जैतसी और मुगल बादशाह हुमायूं के छोटे भाई कांमरान के बीच हुये युध्द, जिसमे विजयश्री का वरण माँ भगवती करनीजी की कृपा प्रसाद से जैतसी का हुआ था।

बीकानेर की इस ऐतिहासिक घटना पर अनेक कवियों ने रचनाऐं रची हैं, यथाः सूजाजी बीठू कृत राव (जैतसी रो छंद), हिंगऴाजदान कविया कृत (मेहाई-महिमा), मानदानजी कविया, गंगा दानजी कविया, बांकीदासजी आशिया, केसरा जी खिड़िया, रामदानजी लाऴस, पाबूदानजी आशिया, खेतसीजी बारहठ, हिमतजी बारहठ आदि अनेकानेक चारण कवियों ने तथा अन्य समाज के कवियों ने इस युध्द का काव्यात्मक वर्णन किया है और अत्युत्तम सुन्दर सरस भाव पूर्ण लेखन किया है पर गेयरूप (गायन शैली) पद्य “चिरजा” हिंगऴाजदानजी जगावत ने ही लिखी है।

यह युध्द विक्रमी संवत 1591 की मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष चतुर्थी व शनिवार के दिन हुआ था। इतिहास व तवारीख बीकानेर राज में भी यह तिथीमिति मिलान खा रही है। जागावतजी ने भी इसका वर्णन किया है जो कि डिंगऴ की सुन्दर विधा है।

मंयक=1, अंक=9, पख=15
अर्थातः….इस संख्यांक को पलटने पर 1591 बनते है।।

।।दोहा।।
मंयकअंक पख मांगसिर, सिध्दियोग शनिवार।
कृष्ण पक्ष की चौथ कौ, ले देव्यां घण लार।।

।।चिरजा।।
जंग नृप जैत जिताबा, लागी असवारी लोवड़ वाऴ री।।टेर।।

शोभित आप शक्ति संग केती,
(अरू) जो जोगण जगमांय।
आसव लेण बेर हिय आंरै,
ना कारो मुख नांय।।1।।

केहरि पै केशर खुबै,
लालां कटि लंकाऴ।
बऴधारी बबरीक बिराज्या,
फूल भरावै फाऴ।।2।।

मारै मलफ मयन्द मेहाई,
दौड़ धरा अधकोस।
गूंज्यां जेण गुड़ैं गज घोड़ा,
होय घणां बे होश।।3।।

प्रण कर पांव पागड़ै कीन्हो,
माँ आवड़ मृगराज।
हाला लेय हरी चढ हाँक्या,
हुय आगै हिंगऴाज।।4।।

धरि उर क्रोध अधिक दाढ्याऴी,
कर बड़ लीन्ह कृपाण।
दऴ काबुल सांमां धक्या,
लेण यवन बलिदान।।5।।

भैरव दाखि खमां मुख भाख्या,
बिरद तणां बाखाण।
खिल दाढी खाता खड़्या,
चक्र अधिक चलाण।।6।।

सुनि घण्टा घण्ट्याऴी श्रवणां,
हुवौ सूचित अहिराज।
देखण युध्द देवी रो जा दिन,
रोक लियो रवि बाज।।7।।

आई नाथ चढ्यो थां अधिको,
जिण पुऴ आनन जोश।
हरि हर ब्रह्मा आदि तिहारो,
रोक सकै नहि रोष।।8।।

नारद वेणु बजा द्विज नाचै,
हँसि हँसि मन हरषाय।
शँकर संचै हेतु सुमरणी,
मोटा शीश मंगाय।।9।।

पड़िया यवन खेत कहं पीरां,
जैत नरिंद पख जोर।
छत्र चढाय छोटड़े छटक्यो,
कमरो काबुल ओर।।10।।

मरिया वीर जिवा मेहाई,
पिण्डा मेटी पीर।
सांवत खड़ा हुया यों सोहैं,
ज्यों मुनि गंगा तीर।।11।।

बैठ विमान पुहुप बरषाया,
देव घणां उण दीह।
बड़ परवाड़ो भगवती ओ,
आंखूं किमि इक जीह।।12।।

ऐ ब्रद मात आपका इन्दू,
करि किरपा सुन कान।
कहै ‘हिगऴाज’ राखज्यो कऴू में,
ब्रद जूनां री बान।।13।।

जंग नृप जैत जिताबा लागी असवारी लोवड़वाऴ री।।

~~कवि हिंगऴाजदान जी जगावत

इस चिरजा का गायन सन 2011 के चारण छात्रावास सीकर के भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशि के वार्षिक जागरण में ऐक मुसलमान मिरासी ने बहुत ही सुन्दर सरस प्रस्तुति माड राग मे दी थी। उसके बाद में उस गायक से पुनः मिलना नहीं हो पाया।

~~प्रेषित: राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर (राज.)

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