प्रताप – प्रशंसा

।।गीत चित इलोल़।।
इक इकां सूं हुवा आगल़
पुणां बप्पां पूत।
माण कज रण बीच मूवा
रूक ले रजपूत।
तो रजपूतजी रजपूत रंग धर राजिया रजपूत।।१

विमल़ कीरत बहै वसुधा
ऊजल़ी धिन ओद।
सीस देता नहीं संकिया
मही कज कर मोद।
तो सीसोदजी सीसोद सधर्म पाल़णा सीसोद।।२

अडर गढ चित्तोड़ ऊंचो
अनम ऊभो ऐम।
अकल़ंक राखण प्राण अपिया
नरां रखियां नेम।
तो नितनेमजी नितनेम नितप्रत पाल़ियो नितनेम।।३

इणी आसण तप्या अणडर
वीर मिणधर बेख।
सांग उदिया राण सरखा
पाण तप बल़ पेख।
तो पह पेखजी पह पेखजी पाल़ण आण रा पह पेख।।४

वीर सागी धीर बहियो
बाप वाल़ी वाट।
भाखरां बिच फिर्यो भमतो
कायरां दल़ काट।
तो समराटजी समराट संकिया पतै सूं समराट।।५

बण बतूल़ो अयो अकबर
ढया ब़बल़ ढेर।
अडग वड़ जड़ रोप ऊभो
वीर बिखमी वेर।
तो उणवेरजी उणवेर बल़ तण जुझियो उणवेर।।६

तरण घरणी पूत तनिया
चढण चेतक एक।
कंदरां घर बस्यो कीको
त्याग गढ रख टेक।
तो तद टेकजी तद टेक तारां रही सत पत टेक।।७

मिसठान त्यागै त्याग मेवा
धुर रखै मन धीर।
मीर मारण वीर माता
भील ताता भीर।
तो हमगीरजी हमगीर हर दिस पतै रा हमगीर।।८

पाग अनमी पमंग अणदग
धरम हिंदू हेर।
संकट भोग्य रख्या सरतर
रण बजा रणभेर।
तो कर जेरजी कर जेर जंग में झूड़ अरियां जेर।।९

रसा थिरचक बात रैसी
दुनि जस सह दाख।
असी गल कवि ऊचरै इम
ससी सूरज साख।
तो रख साखजी रख साख साची धरा पातल साख।।१०

कवियाण गिरधर करी कीरत
निरमल़ो पढ नाम।
मेवाड़ रा नर तनै मोटा
पात रो परणाम
तो परणामजी परणाम पातल सूर नै परणाम।।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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