प्रतापसिंह बारहठ प्रशस्ति – ठा. उम्मेदसिंह जी धोल़ी “ऊम”

।।श्री।।
पूजनीय कविराज प्रताप सिंह जी बारहठ प्रति

अमर कविराज आपही, भारत अम्मर भाल।
अमर आप चेतावणी, अमर राण फतमाल।।1।।

अंगरेजां सु डरियो नह, शुत्रुवां रो उरसाल।
भारत मा रो लाडलो, खरवा रो गोपाल।।2।।

जोड़ बारठ राव जबर, भारत अजादि धार।
संगठन बण्यो सूरमा, भारत रा जूंझार।।3।।

कर्जन दल्ली दरबार हि, अंगरेजां री शान।
भूप उदेपर ढाबतां, मिटेज यां रो मान।।4।।

रांण उदेपर रामजी, जांणे बंशज हांन।
भेळा दरबार न मिले, (तो) फिकि अंगरेजां शान।।5।।

राव कहे बारठ सुणो, चारण सुरसत पूत।
लिखोज कागद साबतो, रेवे जग साबूत।।6।।

खरवे राव गोपाल हि, बारठ केशर सींघ।
मतो करयो ही बादरां, ढाबा उदेपर धींग।।7।।

बणां कलम अेकलिंग रि, सत री स्याही धोळ।
चेतावण रा चूंगठ्या, बारठ लिख्या अमोल।।8।।

कागद ले गोपालरा, चल्या सवार हि च्यार।
टेसण सरेड़ी उपरा, दीधो कागद आर।।9।।

कागद बांच्यो चेतरो, राणे कीध विचार।
दल्ली तो जास्यूं हि सही, (पण) जाऊ नह दरबार।।10।।

सझियो दरबार हि सही, खलक मलक रै पाण।
कुर्सीज उदियापुर तणी, बैठ्यो नहीं दिवांण।।11।।

फीकी कर्जन आ कळा, अकबर ज्यूं ही जांण।
आयो न पत्तो उण बगत, अबै न पूतमल रांण।।12।।

पेलो डाव खालि गियो, प्रथम ग्रास माखीह।
अँगरेजां अब (थे) जावस्वो, भारत मा भारवीह।।13।।

उर उमंग घण हरख ही, मन आदर मांडीह।
रिया सदा रजपूत रै, चारण मिन्त जेंठिह।।14।।

“ऊम” चाकर हि आपरो, गुरू चारण भारीह।
याज पनरवी चेतरी, प्रताप सदी लिखीह।।15।।

~~निवेदक: ठाकुर उम्मेद सिंह “ऊम” ठिकाना धौली, मेवाड़

~~प्रेषित: कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” 
मेड़तियां मेवाड़ री, भल की पावन भोम।
ओ ऊमो उण ओद रै, कल़श चढावै कोम।।
मेड़तिया मेवाड़ हित, बढिया रण में वीर।
ओ ऊमो उण ओद रो, गढपत मरद गँभीर।।
उम्मेदसिंह जी धोल़ी को मेरा कोटिशः प्रणाम

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