पुस्तक समीक्षा – चारण चंद्रिका – महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

साहित्य अर इतिहास रै आभै में उजास करती ‘चारण चंद्रिका’

~~महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’


राजस्थान रौ इतिहास जितरौ लूंठौ अर गौरवमय हैं उतरौ ई अनूठौ अठै रौ साहित्य हैं। राजस्थानी साहित्य री डिंगळ परंपरा नै देखां तो लागै कै इणमें वीरां री अजरी वीरता रै वरणाव साथै सामाजिक अर सांस्कृतिक परंपरावां, रीति रिवाज अर लोक-जीवण री छिब साकार व्हैती निगै आवै। इणी ज डिंगळ साहित्य रौ ऊजळौ अध्याय हैं–चारण चंद्रिका। डिंगळ रै प्रख्यात कवि -निबंधकार गिरधरदान रतनू इण कृति नै जिण लगन अर निष्ठा सूं संपादित करी, इणरै लारै वांरी गै’री सोच अर वडेरां रै प्रति असीम श्रद्धा लखावै। संपादित कृति ‘चारण चंद्रिका’ में श्री रतनू आदिकाल सूं लैय’र आज तक रै चारणां माथै लिख्योड़ा गीत अर छंद संकलित करण रौ जसजोगो काम कर्यो हैं।

राजस्थानी साहित्य रै पेटे आपां देखां तो आ कृति अणमोल धरोहर हैं, हेमांणी हैं। म्हैं मानूं कै वौ साहित्य, जिकै सूं इतिहास ई जुड़ियोड़ो व्है, उणनै संपादित करणौ घणौ अबखौ अर आंझो काम हैं। इण दुरूह काम नै करण सारूं हूंस चाईजै, साथै ई निरपेख अर तटस्थ रैय’र खुली आँख्यां सूं रचनावां नै निरखण-परखण री दीठ चाईजै क्यूं कै पुराणै समै रौ साहित्य घणकरौ अप्रकाशित हैं, साथै ई कईयक रचनावां माथै लेखकां नै लेय’र मत वैभिन्य ई हुया करै। प्राचीन डिंगळ कवियां री शोध-खोज में सलंग्न श्री रतनू जैड़ा सुळझियौड़ा साहित्य-मनीषि ई ओ काम पूरी ईमानदारी साथै कर सकै। अैड़ी पोथी नै संपादित करतां बखत संपादित करणियौ संपादक अैक कवि/लेखक नीं होय’र घणकरौ आलोचक री भूमिका में सांमी आया करै, जो साहित्य रूपी उदधि रौ मंथण कर’र हळाहळ अर इमरत नै अलग-अलग रूपां में लोक सांमी लावै।

इण 191 पानां री पोथी में श्री रतनू 104 डिंगळ गीतां रौ संग्रै करतां थकां आपरी प्रखर मेधा शक्ति अर प्रतिभा सूं साहित्य-मंथन कर’र समाज नै पाछौ आपरी जड़ां माथै ऊभौ करण रौ जाझो जतन कर्यो हैं। अनेकूं पुराणां अनाम कवि इण पोथी में पैलड़ी बार प्रकाश में आया हैं तो चारण-साहित्य री बधताई पण सांमी आई हैं। चारणां केवल साहित्य रौ सिरजण ई नीं कर्यो। अै कलम रै साथै करवाळ अर सुरसत रै साथै दुर्गा रा ई अनन्य उपासक हा। सांच कैवण में कदै ई संको नीं करणियां चारण-कवि एक कांनी रजवट नै सींचणियां महाभड़ां नै विड़दावतां तो दूजै कांनी कायर अर कुमांणसां नै भूंडौ कैवण सूं नीं चूकिया। ओईज कारण हैं कै जिकां भूपतियां नै जगत लुळ-लुळ निंवण करतौ वै महीपत चारणां नै निंवण करतां, अठै तक कि पालकियां नै ई खांधौ दैतां।

इण पोथी नै देखण सूं लागै कै चारणां केवल डिंगळ रा गीत ईज नीं गाया हैं अपितु तत्कालीन समाज अर देश में बदळाव रा सुर ई दीना हैं, जकौ इतिहास रै ऊजळै पानां में मंडियोड़ा हैं। इण काळजयी कृति रै अनेकूं गीतां में सूं महाराजा मानसिंह, रावल हरराज रै कैयोड़ा गीत अर महाराणा राजसिंह रौ केयौड़ो छप्पय इणरी आतमा हैं। इण महनीय काव्य-सरिता सूं ठाह लागै कै चारण किता पूजनीक हैं। महाराजा मानसिंह जोधपुर रा अै आखर कितरा सतोला हैं कै–

आखै मांन सुणो अधपतियां, खत्रपतियां मकर जो खीझ।
बहता हुवै जिका मद वारण, चारण वडी अमोलख चीज।।

खत्रवट रा रूखाळा अर पौरूष रा हिमाळा महाराणा राजसिंह रौ औ छप्पय ‘चारण चंद्रिका’ रै मांयनै च्यार चांद लगावै–

जग अमर नाम चाहो तिको, सुणो सजीवण अक्खरां।
राजसी कहै जग रांण रौ, पूजो पांव कवेसरां।।

जैसलमेर महारावल हरराज रा अै आखर तो चारण-राजपूतां सनातन संबंधां री प्राणवायु हैं–

जावै गढ़ राज भलां भल जावै, राज गया नह सोच रती।
गजब ढहै कविराज गया सूं, पलटै मत बण छत्रपती।।

वै आगै ई केवै कै—

आद छत्रियां रतन अमोलो, कुळ चारण अपणास कियो।
चोळी-दामण समंध चारणां, जिण वळ अळ रूप जियो।।

इणी तरै मध्यकाळ रा प्रखर कवि पीथल(पृथ्वीराज राठौड़) चारणां री वीरत रा गीत गाया है।

इण पोथी रै मांयनै चारण कवियां रै अलावा महाराजा बलवंतसिंह रतलाम, कल्याणसिंह गांगियासर, मंगळो जी ढोली आद कवियां रा चारणां माथै लिख्योड़ा अनेकूं गीत हैं, जकौ चारण -वरण री वधताई सूं लोक नै परिचित करावै। साथै ई कई अज्ञात कवियां रै लिख्योड़ा गीत हैं, जकौ साहित्य रै आभै में सौरभ बिखैरे। इण ‘चारण-चंद्रिका’ री माळा में पिरौयोड़ो हरे’क गीत मोतियां रौ मूंगौ मिणियों हैं, जकौ आपां री जड़ां नै पुख्ता करै।

आ पोथी चारण वर्ण रै सुजस रै साथै राजस्थान रै इतिहास, संस्कृति अर साहित्य री त्रिवेणी हैं, जिणमें स्नान कर’र आपां पवित्र हुय सकां। इणमें आयौड़े डिंगळ गीतां रै मांयनै कई ऐतिहासिक जुद्धां, समकालीन घटनावां री पुरसल जांणकारी हैं, जकौ इतिहासकारां, शोधार्थियां अर साहित्यकारां सारूं महताऊ साबित व्हैला। साथै ई डिंगळ गीतां रै अनेकूं प्रकारां री जांणकारी ई व्हैलां, जकौ नवोदित कवियां नै वर्तमान राजस्थानी साहित्य री डिंगळ-परंपरा सूं जोड़’र रातो-मातो करण री हूंस देवैला।

पोथी री शुरूआत में श्री रतनू 36 पेजां री भूमिका लिखी हैं, जकौ वांरी ऐतिहासिक अर साहित्यिक दीठ नै समझण सारूं काफी हैं। इण रै मांयनै वै अेक-अेक कर इण पोथी रै हरे’क गीत नै संदर्भ साथै राख्यौ हैं, ताकि पाठक इण ‘साहित्य-सुरसरि’ रौ रसास्वादन लेता थकां महनीय अध्यायां सूं परिचित होय सकै। विद्वान संपादक इण पोथी नै जिण मनीषियां नै समर्पित करी हैं, वीं रै लारै ई वांरी असीम श्रद्धा अर निष्ठा लखावै। चारण-राजपूत सनातन संबंध, सांमधरम रौ पालन, त्याग-वीरता अर बलिदान, तत्कालीन लोक-जीवण अर मानवीय मूल्य इण पोथी री केंद्रीय विषय-वस्तु हैं। भाव-भाषा री दीठ सूं आ पोथी साहित्य समृद्धि रौ कारण बणैला। म्हैं इणमें आयै सनातन संबंधां नै याद करतां थकां कैवणो चावूं कै–

चूंटियां भरीनै जगायां चारणां,
धारणां प्रबळ रख दियौ धीजौ।
कारणां इणी ज पूजनीक कौम रा,
वारणां इणां रा वधक लीजौ।।

साथै ई आ कैवतां म्हनै अंजस व्है कै–

सीर सनातन सांपरत, राखण रजवट रीत।
अमर सदा इल़ ऊपरां, पातां हंदी प्रीत।।

निश्चित रूप सूं कैयो जा सकै कै आ पोथी राजस्थानी साहित्य अर इतिहास रै आभै में उजास करैला।

~~महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
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पोथी – चारण चंद्रिका
संपादक – श्री गिरधरदान रतनू ‘दासोड़ी’
समीक्षक – महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
संस्करण – 2018, मौल-तीन सौ रूपिया, पेज -191
प्रकाशक – जगदीशराजसिंह शुभमसिंह गाडण

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