पुस्तक समीक्षा – विडरूपता अर विसंगतियां रै चटीड़ चेपतो : ‘म्रित्यु रासौ’


किणी खास अभिव्यंजना रै ओळावै कोई पण गंभीर बात सहजता सूं कैयी जावै, उणनैं व्यंग्य कहीजै। व्यंग्य रै मार्फत जकी चोट करी जावै वा सहज ई भुलाई नीं जा सकै अर पुरपुरावती रैवै। व्यंग्य करणो कै लिखणो हर कोई रै बूथै रो काम नीं है। इणनैं लिखणो कोई बापड़ो काम नीं है। इणनैं लिखणियो कंवळै काळजै रो कोई संवेदनशील आदमी हो सकै, जिणनैं आपां रै आसै-पासै री असंगतियां, असंतुलन, अबखायां, अंवळाया, विडरूपतावां, दोगलापण, धूर्तता आद नैं लखण अर इणां माथै खुलै खाळै चोट करण री ऊरमा हुवै। या यूं कैवां कै वो चालाकियां, चापलूसी अर चपर-चपर सूं कोसां अळगो रैय’र डांग माथै डेरो राखै अर ओ उद्घोस करै कै ‘संतन को कहा सीकरी सो काम। ’ कैवण रो मतलब ओ है कै व्यंग्य लेखक आपरै निजू जीवण में ई गंगा रै नीर ज्यूं निर्मळ होवणो चाईजै नींतर स्वामीजी बैंगण खावै अर दूजां नैं प्रमोद बतावै।

आज री रुळपट राजनीति, सिटळी सामाजिक स्थितियां, विटळी व्यवस्थावां, धरम रै नाम माथै पाखंड रो पोखण, नैतिक पतन, आर्थिक विखमतावां माथै चोट करणो कै पर्दोफाश करण रो काम जितरी चतराई अर खामचाई सूं व्यंग्य करै उतरो बीजी किणी विधावां रै मार्फत संज नीं आवै। आज ई क्यूं, आपां रै तो राजस्थान रै डिंगळ कवियां री विषहर रचनावां व्यंग्य रो ई अेक मंजियोड़ो रूप हो, जिणां रै माध्यम सूं अै कवि आपरी बात समाज अर जन हितैष्णा नैं मींट में राख’र डंकै री चोट करता। आ ई बात आज रा व्यंग्यकार करै, पण जिका राजस्थानी व्यंग्यकार इण जूनी परम्परा सूं जुड़ाव राखै, उणां रै व्यंग्य करण कै लिखण रो आंटो ई न्यारो-निरवाळो ठसकदार अर घसकै वाळो है।

अैड़ा ई अेक नामी व्यंग्यकार है शंकरसिंह राजपुरोहित। यूं तो शंकरसिंह राजपुरोहित साहित्य री केई विधावां में लिखै पण इणां री असली ओळखाण अेक नामी व्यंग्य लेखक रै रूप में बणी। इणां रो पैलो व्यंग्य-संग्रै ‘सुण अरजुण’ बीसेक बरसां पैली छप्यो। औ व्यंग्य-संग्रै राजस्थानी साहित्यिक जगत में आपरी जिकी लोकप्रियता बणाई वा इणां रै समवड़ियै लेखकां नैं कम ई मिली। अबार शंकरसिंह राजपुरोहित जको व्यंग्य-संग्रै चर्चित है उणरौ नाम है- ‘म्रित्यु रासौ’।

‘म्रित्यु रासौ’ में कुल बीस व्यंग्य है। बीसूं ई व्यंग्य अेक सूं अेक बध’र अवल। बीसूं ई व्यंग्यां में मध्यम वर्ग री अबखायां अर भुगतभोगी यथार्थ जीवण रो लेखो-जोखो है तो दोगलापण, विडरूपतावां, देखापो, भोपाडफरी, छळछंद, पाखंड, अफंड आद रो सांगोपांग भंडाफोड शंकरसिंह राजपुरोहित कर्यो है।

पोथी रै पैलौ ई व्यंग्य है-‘म्रित्यु रासौ’। इण व्यंग्य रै ओळावै राजपुरोहित थूक रा आंसू चेपणियां रै गाल माथै चटीड़ मेलण सूं नीं चूका है। मिनख री मिजळाई रो माजनो लेखक पाड़ण में कोई कमी नीं राखी है। अपणै आपनैं सामाजिक प्राणी मानणियै मिनख री असामाजिकता रा साव दरसाव इण रचना में लेखक कराया है। व्यंग्य री धार री मार तो आपां इण ओळ्यां सूं समझ सकां-

‘‘म्हारै मरियां पछै आड़ोसी-पाड़ोसी ई भेळा होय घरआळां नैं थ्यावस बंधावण नै आयग्या। बियां तो बांनै मरण री ई फुरसत कोनी, पण अबार केई दिनां सूं वै म्हारै मरण री झाक में हा; सुख-दुख में पाड़ोसी ई आडा आवै, सो वै ऊभा ई आयग्या। लोक में कैवत है कै जलम तो रात रो अर मरण परभात रौ। पण म्हैं मर्यौ जणै ना तौ रात ही अर ना परभात। सिंझ्या री चारेक बजी ही। औ बगत म्हारै चाय पीवण रौ होया करतौ, पण अबै कुण म्हारौ बाप चाय चढावै हो अर वा ई मुड़दै नैं पावण सारू? म्हारी लोथ नैं बाळ्यां बिना तौ पाड़ोस्यां रा चूल्हा ई नीं जग सकै। ’’

‘अथश्री जीमण कथा’ रै आंटै लेखक तूटतै सामाजिक बंधणा, मिटती जाण-पिछाण री चिंता करतां दरसावै कै आज आपां आधुनिकता री आंधी में जितरा सिकुड़ीज रैया हां उतरा मोफतखोरां रै कुड़कै में फंस’र घर रो माल मसकरां रै भेंट चाढ़ रैया हां, अर्थात गाय दूह’र कुत्तां आगै मेल रैया हां। ‘आलोचक री आलोचना’ में सूंठ रो गांठियो राख’र पंसारी बणण वाळां री बखियां उधेड़ी है। यानी जिकै लोग लिखण रै नाम माथै हरे! हरे! अर आलोचना रै क्षेत्र में आगीवाण। मतलब बांझड़ी नैं प्रसूत वेदना रो कियां ठाह लागै? आ ई बात लेखक आपरी खामचाई सूं इण व्यंग्य में लिखी है।

इणी गत रो व्यंग्य है ‘गजल सागै गैंगरेप’। इण व्यंग्य में उण गजलकारां रो घसको साव चवड़ै लावै जिकै गजल घड़त री मूळ प्रकृति सूं साव अणजाण पण गजल घड़ण में आगीवाण। आंनै तो गोळी भलांई कठीनै ई जावो, भूटकै सूं मतलब है। गजल सागै गैंगरेप पढ’र म्हनैं अेक दूहो याद आयग्यो जिको इण व्यंग्य री मूळ आत्मा कैय देवां तो कोई अजोगती नीं लखावै-

गुरू लघु रो भेद न जाणै, ले लठ पड़ियो लारै।
कविता जाय वरण में कूकी, माधो वीठू मारै।।

‘यूज अेंड थ्रो’ व्यंग्य आपां रै आज रै मतलबी व्यवहार माथै करारी चोट है। भलांई यूज एंड थ्रो बगत री मांग है पण आज जिण गत आपां रो नैतिक अर सांस्कृतिक पतन हुय रैयौ है, जिण गत आपां हर नाता-रिस्ता हाण-लाभ री ताकड़ी में तोलण लाग रैया हां, उण सूं आपां नैं औ ई ठाह नीं है कै आपां री दसा अर दिसा कांई है!

‘मसाणियौ वैराग’ तो खाली अेक क्षणिक आवेग है, जिको जिण दसा में उठै, उणी दसा में दूध वाळै उफाण दांई अेक छांटै सूं बैठ जावै। इण व्यंग्य में लेखक उण राजस्थानी लेखकां माथै चोट करी है जिका फगत सीजनल दुकान लगावण में विस्वास राखै अर सीजनल दुकानदारां री दसा देख’र ई लेखक ‘टोप टेन’ लिखै। कितरी अजोगती बात है कै आज ई समकालीन साहित्य-समाज में आपां रै अठै रो अेक ई लेखक या पोथी ‘टोप टेन’ में शुमार नीं है। फगत पुरस्कारां सारू पांपळा करता लेखकां रा उणियारा उगाड़ा करण में लेखक पूरो सफळ रैयो है। इणी गत रो व्यंग्य है-‘कानां में कवा’। यानी जागता घोरावणो। इण व्यंग्य रै ओळावै लेखक उण मिजळै मिनखां रो माजनो बतावै जिकै सै कीं जाण’र ई कीं नीं जाणण रो नाटक करता रैवै।

‘गाथा ग्यापन-विग्यापन री’ रै ओळावै लेखक रो अेक संवेदनशील अर सजग चित्राम पाठकां रै साम्हीं आवै। आज जिण गत दुखी, दर्दी अर दोझकी जीवण जीवणिया, मंत्री कै अफसर नैं ज्ञापन तो इण आस साथै देवण नै जावै कै कोई समाधान हुवैला, पण उण ग्यापनां री वै कांई गत करै! उणनैं पढियां पाठक रै मन में वितृष्णा जाग जावै कै आज री व्यवस्था कितरी फर्जी अर बेदर्दी है।

‘हथाई ऑन फेसबुक’ आज री युवा पीढ़ी नैं अेक सुभग संदेस है! तो फेसबुक माथै आखै दिन-रात कूड़ी बडाई रा भूखा कीं न कीं पांपळा करता रैवै। ‘राजनेतावां रौ रासिफळ’ अर ‘चुणावी उम्मीदवार सूं इंटरव्यू’ दोनूं ई व्यंग्य आज री रुळियार राजनीति में रगदोळीजतै आम जन नैं चेतावण री जुगत करै, पण जनता तो गाडरचाल चालै, देखादेखी गोडा फोड़ै या फिड़कला ज्यूं बासदी में पड़ै, बियां ई आ बैल मुझे मार री गत पींचीजण सारू गोधां नैं खिल खड़ावै।

‘अैनी टेम अेटीअेम’ ई हांती थोड़ी अर हुलहुल घणी वाळी बात है। लेखक री बात आम जन री व्यथा नैं प्रकासै कै कोठै में हुवैला तो खेळी में आवैला! यानी अेटीअेम कार्ड बणावण सूं अेटीअेम आपनैं नाणो नीं देवै। ऊपरली जेब में पांच-सात अेटीअेम कई जणा राखै पण काम पड़्यां पईसा माचिस री डब्बी मोलावै जितरा ई नीं मिलै। अैड़ी कूड़ी धजा फरकावणियां री पोल लेखक सहज में खोली है। इणी भांत ‘चलवां च्यारूंमेर’ में लेखक पटक पंचां री पोल खोलण में प्रवीण निगै आवै। यानी लापसी में लूण घतावणिया अर ‘नाम थारो अर गाम म्हारो’ री डांडी बैवणियां नैं लेखक साच री आरसी बतावण में कोई चूक नीं करै।

‘विदेसी गधां री वैल्यू’ अेक धारदार व्यंग्य है। इण व्यंग्य रै ओळावै लेखक आपरी बदळती मनगत माथै व्यंग्य कर्यो है। जका लोग होडाहोडी गोडा फोड़’र, भाव-भासा अर भूषा नैं छोड’र विदेसी बानो धार’र देस री गधी अर पूरब री चाल चाल रैया है, उणंा नैं आपरो असली उणियारो देखण रो लेखक आह्वान करतो निगै आवै। ‘बिल्लो राणी री कहाणी’ नैं म्रित्यु रासौ रा भूमिका लेखक चेतन स्वामी कहाणी मानी है अर उणां मानियो है कै कहाणी में ई अेक धारदार व्यंग्य है। अेक आप टैक्सी ड्राईवर अर आप टैक्सी मालिक री दोवड़ी मानसिकता नैं लेखक सहज रूप सूं जिण व्यंग्यात्मकता राखी है, उणनैं पाठक पूरी पढियां बिना नीं छोड सकै।

‘करलो दुनिया मुट्ठी में’ अेक कंपनी रै विग्यापन री ओळी ही, इणी नैं आधार बणा’र लेखक अेक व्यंग्य लिखियो। इण व्यंग्य में मोबाईल सूं हुवण वाळी हाण कांनी लेखक आपरी कलम चलाई है। दुनिया भलांई मुट्ठी में हुई कै नीं, पण आज आम आदमी री अकल मुट्ठी में जरूर हुयगी है। आम आदमी रै नित रा अकारण चांदी रा जूत लाग रैया है। यानी मैणत रो माल मसकरा खा रैया है।

‘माथो बचावण री माथाफोड़’ यातायात व्यवस्था री धज्जियां उडावणियां अर आंख फोड़’र अपसुगन करणियां री चिंता करतो अेक धारदार व्यंग्य है। ‘आवो चालां, अस्पताळ’ रै मार्फत राजपुरोहित उण डाक्टरां री असलियत बताई है जिकै मरीज रो मर्ज नीं देख’र फगत उणरी माली हालत देखै। यानी जेब रो भार देखै। डाक्टर नैं भगवान रो दूजो रूप मानियो जावै, पण औ उणां रो ऊपरी उणियारो है, असली उणियारो उणां माळी-पानां सूं ढक राख्यो है। ‘कांदां री करामात’ में कांदा री सगळी बधतायां अर करामात कांनी इसारो करतो लेखक इणरी महत्ता व्यंग्यात्मक रूप सूं दरसाई है। आथूणै राजस्थान में कांदो जनसाधारण रो ओलण है। धूड़जी मोतीसर लिख्यो है-ऊनाळै ओलण इसो, कांदै जिसो न कोय। कांदो भारतीय राजनीति में कांई-कांई गुल खिलायो है, इण सगळी बातां रो खुलासैवार अर गुदगुदावणो वरणन कर्यो है।

आं व्यंग्य रै कथ्य री बात कर्यां पछै थोड़ी बात शंकरसिंह री भासा बाबत करणी समीचीन रैसी। शंकरसिंह री भासा ठेठ, ठेळ अर ठसकदार है। लिखण री हतोटी अर घसको सरावणजोग है। सगळै व्यंग्यां में राजस्थानी री ठेठ मठोठ, सहज प्रवाह अर अेक भांत री काव्यात्मकता मौजूद है। गद्य में काव्य री भळक लावणी हर कोई लेखक रै बूथै री बात नीं है। आ भळक तो वो ई लेखक ला सकै, जिण कनै संवेदनशीलता, सहजता, सजगता अर संप्रेषणीयता री कळा सबद-सबद में समाहित हुवै तो साथै ई राजस्थानी रंग-ढंग री सांगोपांग जाणकारी हुवै। सबद संपदा री अंवेर करणियो लेखक ई इण भांत रो गद्य-गजरो गूंथण में प्रवीण हुय सकै, नींतर हीला करो हजार।

शंकरसिंह राजपुरोहित रै व्यंग्यां री मारक खिमता री बात छोड’र जे व्यंग्य में ई लालित्य री बात करां तो ई लेखक री करड़ाण ‘फेरी भलांई दाय आवै तो घालो पण मोडै री मरोड़ तो देखो’ वाळी सिद्ध हुवै। राजस्थानी रो ठेठ तुकांत गद्य लिखण री लकब हर कोई लेखक रो भ्रम पाळणियै कै म्हनैं घड़गी जिकी बाड़ में बड़गी’ री बात करणियै रै वस री बात नीं है। शंकरसिंह रा व्यंग्य विविधतापूर्ण अर विसद है। आपरा व्यंग्य पाठक रै सहज रूप सूं काळजै उतरै, यानी कोई घणी माथाफोड़ी री बात नीं है कै व्यंग्य समझण सारू पाठक नैं थोड़ो विश्राम करणो पड़ै। सहज हास्य सूं सराबोर आपरा व्यंग्य इण बात री पूरी हामळ भरै कै हास्यां हरि मिलै या हियो खिलै।

आपरै व्यंग्यां में आई कहावतां री कोरणी अर मुहावरां रो मेळ पढणियै रै मन में उझेळ अर केळ उपजावै। या यूं कैयदां कै अै कहावतां अर मुहावरा व्यंग्य नैं धारदार अर असरदार बणावै, जिणसूं पाठक री सोचण शक्ति, बौद्धिक खिमता अर अेक वैचारिक दीठ बणै। शंकरसिंह री इण नवी पोथी सूं राजस्थानी व्यंग्य विधा राती-माती हुवैला अर व्यंग्य रै क्षेत्र में लिखणियां नैं अेक नवी दीठ, गति अर मारग मिलैला। आसा ई नीं, पतियारो है कै ‘म्रित्यु रासौ’ रो साहित्यिक जगत में आघमान हुसी अर नवा लिखारां नैं शंकरसिंह राजपुरोहित भासा री कसावट सूं अेक सीख मिलसी।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

पोथी: म्रित्यु रासौ
विधा: व्यंग्य
व्यंग्यकार: शंकरसिंह राजपुरोहित
प्रकाशक: ऋचा (इण्डिया) पब्लिशर्स, बिस्सां रो चौक, बीकानेर
संस्करण: 2017
पाना: 96
मोल: 200 रुपिया
प्राचीन राजस्थानी साहित्य संग्रह संस्थान
दासोड़ी, तैसील-कोलायत, जिलो-बीकानेर (राजस्थान)

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