राधारमण देव स्तवन

।।दोहा।।
नील वरण! अशरण-शरण, हरण भक्त संताप।
दर्प-दलन ! गिरिवरधरण!, रमण राधिका आप।।१

।।छंद त्रिभंगी।।
हे हरि मन हरणं, अशरण शरणं, राधा रमणं, गिरिधरणं।
आपद उद्धरणं, नित प्रति स्मरणं, सुधा निझरणं, बरु चरणं।
ब्रजधाम विचरणं, कुंडल़ करणं, वारिद वर्णं, जगवंद्या।
माधव मुचकुंदा!, नागर नंदा!, बालमुकुंदा! गोविंदा!!१!!

नीरद घन नीलं, श्याम सुशीलं, कुंज करीलं, गो-चारी!
पहने पटपीतं!कर नवनीतं!, लाल सुललितं! सुखकारी!
धर गूंजामालं, गल गोपालं, संग ब्रजबालं, किलकंदा।।
माधव मुचकुंदा!, नागर नंदा!, बाल मुकुंदा! गोविंदा!!२!!

“तिरकिट तिक धाधा”, संग ले राधा, गोप अगाधा, अरु माधा!
“कहते सुन राधा! मैं हूं माधा!, “धा तिक धाधा”, सुर साधा।
“धम !धम! धम! धा! धा!”, राधा माधा, रास अराधा, आनंदा!
माधव मुचकुंदा!, नागर नंदा!, बाल मुकुंदा!गोविंदा!!३!!

मोहन सुख मूला!, यमूना कूला, हरे दुकूला, गोप त्रिया!
तरू का कर झूला, बैठा फूला, जो है भूला, लाज जिया!
जग है प्रतिकूला! रह अनुकूला, रूप अतूला, नँदनंदा।।
माधव मुचकुन्दा!, नागरनंदा, बाल मुकुंदा गोविंदा!!४!!

शिखि पंख मुकुट धर, माधव मन हर, ले लकुटि कर, राधा वर!
पिचकारी भर भर, मारत तन पर, किंशुक का कर, रंग चितहर!
नित प्रत नटनागर! श्री रस सागर, खेलत ब्रज नर के वृंदा!
माधव मुचकुन्दा! नागर नंदा, बाल मुकुंदा!गोविंदा!!५!!

गीता उद्गाता, जगसुखदाता, शुचि जलजाता, सम नैनम।
बलदाऊ भ्राता, देवकि माता, पुनि तव ताता, वसुदेवं।
जब बेणू बजाता, चित सुख पाता, मन खो जाता, लय मंदा।
माधव मुचकुन्दा, नागरनंदा, , बालमुकुन्दा, गोविंदा!!६!!

वेणू सुर अटपट, छेडे झटपट, जा जमुना तट, बंसी वट।
पहुँचे फिर पनघट, पीत वसन पट, फोडे महि घट, मटकी खट।
विभु व्यापक घट घट!, मन मम मरकट, मय है तरकट, छल छंदा।
माधव मुचकुंदा, नागर नंदा, बाल मुकुंदा गोविंदा।।७।।

वपु धर बनमालं, रूप रसालं, भाल विशालं, गोपालं।
कुंचित कच व्यालं, धरे मृणालं, मतगज चालं, ब्रजपालं।
करतल ध्वनि तालम, करत धमालम, “नृपत” निहालं, देखंदा।
माधव मुचकुंदा, नागर नंदा, बाल मुकुंदा, गोविंदा।।८।।

।।कलश छप्पय।।
गोविंद आनंद कंद, नंद जसुमति के नंदा।
पूजित सुरमुनि वृंद, द्वंद दुख मेटण फंदा।
यदुकुल कैरव चंद, गोप जन सरसिज कुंदा।
श्रीवृंदा ह्रदि वास, रसिक माधव मकरंदा।
नित खेलत नंद अलिन्द जो, मंद मंद मुसका रहा।
कवि नरपत उस नंदलाल का, स्तवन त्रिभंगी गा रहा।।

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

2 comments

  • गणपत सिंह आढ़ा

    वाह नरपत भाबा वाह,
    कविराज नवल दान सा की परम्परा को जिस तरह आधुनिक यत्नों से आगे बढ़ाते हुये अल्पायु में ही आपने अपनी काव्य प्रतिभा का लोहा मनवाया है , वह बहुत प्रशंसनीय है । आपने कविराज अजय दान सा के शेष कार्य को बहुत प्रगति दी है।
    महाकवि लाडू दान सा की भक्ति काव्य विधा को आपने पुनर्जीवित किया है।
    कविराज नवल दान सा, महाकवि लाडू दान सा और कविराज अजय दान सा के काव्य को मैने अच्छी तरह पढा है, मेरे पिताजी चंडीदान जी आढ़ा श्री नवल दान जी के दौहीत्र एवं अजय दान सा के परम स्नेही व कृपा पात्र मित्र थे ।
    आपका डींगल भाषा मे योगदान अतुल्य है।
    साधुवाद । जय माताजी की । कृपया आपके वॉट्सएप्प ग्रुप डींगल री दण्कार मैं मेर नम्बर 8432896785 जोड़ने की कृपा करें3ताकि मैं भी अपनी काव्य पिपासा शान्त कर सकूं।

    • आभार गणपत भाई। सादर जय माताजी। आप नें बाजीसा नवलदानजी, ब्रह्मानंदजी और मेरे नानोशा का जिक्र किया तो दिल गद गद हो गया। उनके मुकाबले.हमारी कविताएँ सूर्य को दीपक या जूगनु के बराबर समझता हूँ। यह उन सब बुजुर्गों की ही कृपा है जिनके सतसंग और साहित्य अध्ययन नें हमें कविता लिखना सीखाया है। चंडीदान जी बाजीसा को भी एक बार नानोशा के साथ व्यकतिगत मिला था। सरल मन और सच्चे साहित्यकार थे। उनकी मेधा को नमन।

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