रघुवरजसप्रकास [1] – किसनाजी आढ़ा

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भूमिका

संस्कृत साहित्य में छंदशास्त्र का विशेष स्थान है। वेद के छः अंगों (१ छंद, २ कल्प, ३ ज्योतिष, ४ निरुक्त, ५ शिक्षा और ६ व्याकरण) में छंदशास्त्र भी एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका स्थान पाद (चरण) माना गया है। कारण कि इसके बिना गति-क्रिया किसी की सम्भव नहीं, अतः वेद में भी छन्दस्तु वेदपाद: कहा गया है। यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं कि हमारे पूर्वाचार्यों ने काव्य-रचना में छंदशास्त्र की उतनी ही आवश्यकता मानी है जितनी व्याकरण की। कालान्तर में अनेक भाषाओं का प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुआ जैसे कि प्राकृत, अपभ्रंश आदि। इन भाषाओं के साहित्य में भी छंदशास्त्र को उतना ही महत्त्व दिया गया जितना कि संस्कृत साहित्य में; फलस्वरूप प्राकृतपैंगलम् आदि रीति-ग्रंथों की रचना संस्कृतेत्तर छंदों के लक्षणों को बतलाते हुए प्राकृत भाषा में की गई।

भाषा का विकास निरंतर काल-गति के साथ होता रहा। अपभ्रंश भाषा से अनेक देशी भाषाओं तथा लोक भाषाओं का जन्म हुआ; उनमें मरु-भाषा भी एक है। इसी मरु-भाषा ने कालान्तर में डिंगल या राजस्थानी भाषा के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की। भाषा की विकास की गति के साथ साथ मरु-भाषा डिंगल या राजस्थानी का भी नवीन व मौलिक साहित्य बढ़ता गया। पूर्व पद्धत्यानुसार डिंगल भाषा के मर्मज्ञों ने अपने साहित्य में छंदशास्त्र को महत्त्व दिया जिसके फलस्वरूप उच्च कोटि के मौलिक छंद ग्रंथों की रचना की गई जिससे भाषा और साहित्य को पूर्ण बल मिला।

मरु-भाषा के मर्मज्ञ विद्वानों ने हिन्दी भाषा के समान ही कुछ संस्कृत एवं प्राकृत छंदों को ज्यों का त्यों अपना लिया और उनमें अपनी भाषा की रचना की। वेदों के बाद[1] पद्यमय रचना का सर्वप्रथम ग्रंथ वाल्मीकि रामायण है। उसमें तेरह प्रकार के छंदों का प्रयोग मिलता है। फिर महाभारत में भी यही प्रयोग वृद्धि को प्राप्त हुआ और महाभारत में १८ प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ। तत्पश्चात् श्रीमद्भागवत में छंदों की संख्या बढ़ कर २५ तक पहुँची। इसके बाद में ज्यों ज्यों भाषा और साहित्य का विकास हुआ त्यों त्यों छंदों के रूप भी


[1] भारत का प्राचीनतम साहित्य वेद प्रायः छंदोबद्ध है। इसके बाद के साहित्य की रचना भी विशेषकर छंदों में हुई है। साहित्य की वृद्धि के साथ-साथ छंदों की भी संख्या बढ़ी। वेदों में मुख्य सात छंद पाये जाते हैं, यथा – गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती।

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निरंतर बढ़ते ही गये, जिसके फलस्वरूप आगे के ग्रंथों में अनेक प्रकार के छंद हमें मिलते हैं।अन्य भाषाओं के समान ही राजस्थानी भाषा में विशिष्ट रीति-ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ हुई। रीति-ग्रन्थकारों ने अनेक मौलिक छंदों का भी निर्माण किया।

वर्णवृत्त एवं मात्रिक छंद हिन्दी में भी बहुत अधिक संख्या में प्राप्त हैं, परन्तु गीत नामक छंद डिंगल की अपनी नवीनतम एवं मौलिक रचना है। यद्यपि राजस्थानी साहित्य के निर्माण में चारण कवियों की ही प्रधानता है, फिर भी यहां पर यह कहना होगा कि डिंगल गीत छंद के रचयिता तो चारण कवि ही हैं। छंदशास्त्र का सबसे प्राचीनतम संस्कृत का पिंगल मुनि कृत पिंगल छंद-शास्त्र है। ग्रन्थकार ने अपने पिंगल छंद शास्त्र में पूर्वाचार्यों का उल्लेख किया है परन्तु उन सबके नाम सूत्रों में ही रह गये उनके ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते हैं। पिंगल मुनि के छंदशास्त्र के बाद छंदों का विशद वर्णन अग्निपुराण में मिलता है परंतु पिंगल छंदशास्त्र और अग्निपुराण में वर्णन किये गये छंदशास्त्र का प्रकरण परस्पर मिलता-जुलता ही है। इसके बाद छंद शास्त्र पर अनेक ग्रंथ रचे गये। उनमें से ‘श्रुत-बोध’, ‘वाणी-भूषण’, ‘वृत्त-रत्नाकर’, वृत्त दर्पण’, ‘वृत्त-कौमुदी’, ‘सुवृत्त-तिलक’ और ‘छंदो-मंजरी’ बहुत प्रसिद्ध हैं। केदार भट्ट विरचित ‘वृत्त-रत्नाकर’ और गंगादास रचित ‘छंदो-मंजरी’ का तो घर-घर प्रचार है। ये दोनों ग्रंथ इस विषय के पूर्ण मान्य ग्रन्थ हैं।

हिन्दी भाषा में रीतिकालीन कवियों ने अनेक छंदशास्त्रों की रचना की। उनमें कई प्राकृत के छंदों और उपर्युक्त संस्कृत रीतिग्रंथों के छंदों को ग्रहण किया गया। इस प्रकार पूर्वापर पद्धत्यानुसार हिन्दी में भी छंदों के लाक्षणिक ग्रंथ पृथक लिखे गये।

इधर मरु भाषा डिंगल या राजस्थानी में भी समय समय पर छंदों के लाक्षणिक ग्रन्थ रचे गये। सर्वप्रथम पिंगल मुनि के संकेत मात्र लेकर नागराज पिंगळ[1] डिंगल छंदशास्त्र नामक बृहद् ग्रंथ रचा गया, परन्तु मूल ग्रंथ के रचयिता के नाम का पता न चला और यह ग्रन्थ पूर्णरूप में प्राप्त भी नहीं है। दो स्थानों पर मैंने इस ग्रन्थ की पांडुलिपियां देखी हैं; छंदों के साथ-साथ गीतों के भी लक्षण दिए गए हैं, परन्तु यह ग्रन्थ अभी अप्राप्य सा ही है।

उपर्युक्त ग्रन्थ के अतिरिक्त अद्यावधि डिंगल के छंदशास्त्र पर प्राप्त ९ ग्रंथ हैं जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं-


[1] नागराज पिंगळ छंदशास्त्र की एक प्रति सिवाना नगर में एक जैन यति के अधिकार में सुरक्षित है।

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  • १. पिंगळ-सिरोमणि. . . रावळ हरराज कृत
  • २. पिंगळ-प्रकास. . . हमीरदान रतनू कृत
  • ३. लखपत पिंगळ. . . हमीरदान रतनू कृत
  • ४. हरि-पिंगळ. . . जोगीदास चारण कृत
  • ५. कविकुळबोध. . . उदयराम बारहठ कृत
  • ६. रघुनाथरूपक. . . मंशाराम सेवग कृत
  • ७. रघुवरजसप्रकास. . . किसनाजी आढा कृत
  • ८. रण-पिंगळ दीवाण. . . रणछोड़जी द्वारा संग्रहीत
  • ९. डिंगल कोश. . . कविराजा मुरारिदानजी मीसण कृत

उपर्युक्त छंदों के लाक्षणिक ग्रंथों में लखपत पिंगळ को छोड़ कर छंदों के लक्षणों के साथ साथ गीतों के लक्षण व रचना-नियम दिये गये हैं। लखपत पिंगळ में केवल गीतों के रचना के नियम न देकर केवल गीत ही दिए गए हैं। हमने जिन ग्रंथों के नाम ऊपर दिए हैं उनमें केवल तीन ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं और चौथा यह रघुवरजसप्रकास है। शेष पाँच ग्रन्थ अप्रकाशित हैं।

कवि परिचय

प्रस्तुत रीतिग्रन्थ रघुवरजसप्रकास की समाप्ति पर स्वयं कवि ने एक छप्पय लिख कर अपना वंश परिचय दिया है, वह इस प्रकार है

छप्पै
‘दुरसा’ घर ‘किसनेस’, ‘किसन’ घर सुकवि ‘महेसुर’।
सुत ‘महेस’ ‘खुमांण’ ‘खांन साहिब’ सुत जिण घर।।
‘साहिब’ घर ‘पनसा’ है ‘पना’ सुत ‘दुलह’ सुकव पुण।
‘दूलह’ घर खट पुत्र ‘दांन’ ‘जस’ ‘किसन’ ‘बुधो’ भण।।
‘सारूप’ ‘चिमन’ मुरधर उतन, परगट नगर पांचेटियौ।
चारण जात आढ़ा विगत, ‘किसन’ सुकवि पिंगळ कियो।।

स्वयं कवि द्वारा प्रदत्त वंश-परिचय से हमें ज्ञात होता है कि लाक्षणिक ग्रंथ रघुवरजसप्रकास के रचयिता सुकवि किसनजी राजस्थान के प्रसिद्ध एवं राष्ट्र-भक्त कवि आढ़ा गोत्र के चारण श्री दुरसाजी की वंश-परम्परा में थे। प्रस्तुत ग्रंथ रचयिता के परिचय के पूर्व उनके पूर्वज चारण-कुल भूषण सुकवि दुरसाजी का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यकीय होगा।

सुकवि दुरसाजी आढ़ा गोत्र के चारण थे जिनका जन्म जोधपुर राज्यांतर्गत सोजत तहसील के धुंधला नामक ग्राम में अमरा के पुत्र मेहा के घर संवत् १५६२ में हुआ था।

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दुर्भाग्य से बाल्यावस्था में ही पितृ-प्रेम से वंचित हो गये[1]। अतः बगड़ी गाँव के ठाकुर श्री प्रतापसिंहजी सूंडा ने इनका पालन-पोषण किया और वयस्क होने पर अपने यहां कार्य पर रख लिया। दुरसाजी अपनी काव्य-प्रतिभा के कारण शीघ्र ही विख्यात हो गये और दिल्ली के सम्राट अकबर के दरबार में भी अच्छा सम्मान प्राप्त किया। दुरसाजी राजस्थान के बहुत लोकप्रिय और यशस्वी कवि हुए हैं। आप ने कविता के नाम से बहुत सम्मान व धन प्राप्त किया।

काव्य-रचना के दृष्टिकोण से भी दुरसाजी का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इनके लिखे तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं- १. बिरुद-छिहत्तरी, २. किरतारबावनी और ३. श्रीकुमार अज्जाजीनी भूधर मोरीनी गजगत। इन ग्रंथों के अतिरिक्त दुरसाजी के लिखे पचासों डिंगल गीत उपलब्ध होते हैं।

दुरसाजी के दो स्त्रियां थीं जिनसे चार पुत्र हुए। ये अपने सबसे छोटे पुत्र किसनाजी के साथ पांचेटिया में ही रहते थे। वहीं सं० १७१२ में इनका देहावसान हुआ। इन्हीं दुरसाजी की वंश-परम्परा में किसनाजी ने मारवाड़ राज्यांतर्गत पांचेटिया ग्राम में जन्म लिया जिसका वंश क्रम इस प्रकार है-

  • १ दुरसौ,
  • २ किसोजी,
  • ३ महेस,
  • ४ खुमांन,
  • ५ साहिबखांन,
  • ६ पनजी
  • ७ दूल्हजी,
  • ८ किसनोजी

इस प्रकार कवि परिचय के प्रारम्भ में दिए हुए छप्पय के अनुसार रघुवरजसप्रकास के रचयिता सुकवि किसनाजी आढ़ा का जन्म दुरसाजी आढ़ा की आठवीं पुश्त में (पीढ़ी में) दूल्हजी नामक कवि के घर हुआ। दूल्हजी के कुल छः पुत्र थे जिनमें किसनोजी तीसरे थे। इनके जीवन के सम्बंध में श्री मोतीलालजी मेनारिया


[1] नोट-इनके पिता ने सन्यास ले लिया था।

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द्वारा लिखित राजस्थानी भाषा और साहित्य में बहुत संक्षिप्त परिचय ही प्राप्त है। किसनाजी संस्कृत, प्राकृत, वृजभाषा एवं राजस्थानी भाषा के उद्भट विद्वान थे। लाक्षणिक ग्रंथों का भी इनका ज्ञान पूर्ण परिपक्व था। इतिहास की ओर भी आपकी विशेष रुचि थी। कर्नल टॉड को अपना राजस्थान का वृहद् इतिहास लिखने में किसनाजी के अथक परिश्रम से पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध हुई थी।

ये उदयपुर के तत्कालीन महाराणा भीमसिंहजी के पूर्ण कृपापात्र थे। महाराणा भीमसिंहजी ने आपको काव्य रचना से प्रभावित होकर सीसोदा नामक ग्राम प्रदान किया था जो अद्यावधि इन्हीं के वंशजों के अधिकार में रहा।

महाराणा भीमसिंहजी द्वारा इस ग्राम को किसनाजी को प्रदान करने का किसनाजी कृत निम्नलिखित एक डिंगल गीत हमारे संग्रह में है-

गीत
कीजै कुण-मीढ न पूजै कोई,
धरपत झूठी ठसक धरै।
तो जिम ‘भीम’ दिये तांबा पत्र,
कवां अजाची भलां करै।।१।।

पटके अदत खजांना पेटां,
देतां बेटां पटा दिये।
सीसोदौ सांसण सीसोदा,
थारा हाथां मौज थियै।।२।।

मन महारांण धनौ मेवाड़ा,
दाखै धाड़ा दसूं दसा।
राजा अन बांधे रजवाड़ा,
तूं गढवाड़ा दिये तसा।।३।।

अधपत तनै दियारौ अंजस,
लोभी अंजस लियारौ।
भांणै साच जणायौ ‘भीमा’,
हाथां हेत हियारौ।।४।।

किसनाजी द्वारा रचे हुए मुख्य दो ग्रंथ उपलब्ध हैं-एक भीमविलास और दूसरा रघुवरजसप्रकास। भीमविलास महाराणा भीमसिंहजी की आज्ञा से संवत् १८७९ में लिखा गया था,

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जिसमें उक्त महाराजा का जीवन-वृत्त है। रघुवरजसप्रकास प्रकाशित रूप में आपके समक्ष है। इनके अतिरिक्त कवि के रचे हुए फुटकर गीत अधिक संख्या में उपलब्ध होते हैं जो कवि की विशिष्ट काव्य-प्रतिभा एवं प्रौढ़ ज्ञान का परिचय देते हैं।

रघुवरजसप्रकास

प्रस्तुत ग्रंथ रघुवरजसप्रकास राजस्थानी भाषा का छंद-रचना का उत्कृष्ट लाक्षणिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश व हिन्दी के छंदों का अपनी मौलिक रचना में पूर्ण विवेचन है।

ग्रंथ में कवि ने मुख्य विषय छंद-रचना के लक्षणों व नियमों का बड़ी सरल व प्रसादगुणपूर्ण भाषा में वर्णन किया है। छंदों के वर्णन में कवि ने अपनी राम-भक्ति का पूर्ण परिचय दिया है। राम-गुणगान ही कवि का मुख्य ध्येय था। अतः छंद-रचना के लक्षणों के साथ-साथ रामगुण-वर्णन करते हुए कवि ने एक पंथ दो काज की कहावत को पूर्ण रूप से चरितार्थ किया है।

प्रकाशित रीति ग्रन्थ रघुनाथरूपक में भी लाक्षणिक वर्णन के अतिरिक्त उदाहरण के गीतों में रामकथा का ही सहारा लिया है। इसमें रामायण की भांति रामगाथा क्रमबद्ध चलती है। परन्तु किसनाजी ने अपने ग्रन्थ में मुक्तक रूप से राम-महिमा का वर्णन किया है। इसमें कोई कथा का क्रम नहीं है। कवि ने रीति के अनुसार ग्रंथ को पांच भागों में विभाजित किया है। छंद-लक्षण जैसे अरुचिकर विषय को अत्यंत सरल बना कर ग्रन्थ को पर्ण प्रसादगुणयुक्त कर दिया है। ग्रंथ का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–

प्रथम प्रकरण में मंगलाचरण, गणागण, गणागणदेव, गणागण का फलाफल, गण मित्र शत्रु, दोषादोष, आठ प्रकार के दग्धाक्षर, गुरु, लघु, लघु गुरु की विधि, मात्रिक गण, मात्रिक गणों के भेदोपभेद व उनके नाम तथा छंदशास्त्र के आठ प्रत्ययों–१ प्रस्तार, २ सूची, ३ उद्दिष्ट, ४ नष्ठ, ५ मेरु, ६ खंडमेरु, ७ पताका, एवं ८ मर्क्‌कटि का संक्षिप्त वर्णन व विवेचन किया गया है।

द्वितीय प्रकरण में मात्रिक छंद का वर्णन किया गया है। कवि ने इस प्रकरण में कुल २२४ मात्रिक छंदों के लक्षण देकर उनके उदाहरण भी दिए हैं। लक्षण कहीं-कहीं पर प्रथम दोहों में या चोपई में दिये गये हैं। फिर छंदों के उदाहरण दिये हैं। कहीं-कहीं लक्षण और छंद सम्मिलित ही दे दिये गये हैं।

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इस प्रकरण में राजस्थानी की साहित्यिक गद्य रचना के नियम भी समझाए हैं। उनके भेदोपभेद[1] संक्षिप्त रूप में दिये हैं जो राजस्थानी साहित्य का ही एक मुख्य अंग है। ऐसी गद्य रचनाओं का हिन्दी में अभाव ही है। इस प्रकरण में चित्र-काव्य के भी उदाहरण कमलबंध, छत्रबंध आदि समझाए गये हैं।

तृतीय प्रकरण में छंदों के दूसरे भेद, वर्णवृत्तों के लक्षण व उदाहरण दिए हैं। प्रारम्भ में कवि ने एक अक्षर से छब्बीस अक्षर के छंदों के नाम छप्पय कवित्त में गिनाए हैं। ये सब छंद संस्कृत छंद हैं- इनका स्वतंत्र उदाहरण राजस्थानी में नहीं मिलता। तत्पश्चात् क्रमशः ११७ वर्णवृत्तों के लक्षण व उदाहरण दिये हैं। कवि ने अपनी अनन्य रामभक्ति प्रकट करते हुए छंदों के उदाहरणस्वरूप रामगुणगान किया है।

ग्रंथ के इस चौथे प्रकरण में राजस्थानी (डिंगल) गीत का (छंदों का) विस्तार-पूर्वक विशद् वर्णन है जो इस ग्रंथ का मुख्य विषय है और साथ में डिंगल भाषा के छंदशास्त्र या लाक्षणिक ग्रन्थ की अपनी विशेषता भी है। गीत नामक छंद, उसके भेद डिंगल भाषा के कवियों की अपनी मौलिक देन है। ग्रन्थकार ने गीतों के वर्णन में गीतों के अधिकारी, गीतों के लक्षण, गीतों की भाषा, गीतों में वैणसगाई, वैणसगाई के नियम, वैणसगाई और अखरोट, अखरोट और वैणसगाई में अंतर, गीतों में नौ उक्तियाँ, गीतों में प्रयुक्त होने वाली जथाएं, गीत-रचना में माने गये ग्यारह दोष एवं विभिन्न गीतों की रचना, नियम आदि का पूर्ण और सरल भाषा में विशद् वर्णन दिया है।

राजस्थानी में प्राप्त छंद-रचना के लाक्षणिक ग्रन्थों में इतना विस्तारपूर्ण एवं इतने गीतों का वर्णन किसी भी ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता है। प्राप्त ग्रन्थों में जो गीत दिये गये हैं उनकी जानकारी यहां दी जाती है-

१ पिंगल-सिरोमणि — इसमें कुल तेंतीस गीतों के लक्षण व उदाहरण दिए गए हैं।
२ हरि-पिंगल — इसमें प्रथम छंदों के लक्षण दिये गये हैं। तत्पश्चात् बाईस गीतों के भी लक्षण दिये गये हैं। इसकी रचना का समय संवत् १७२१ है।
३ पिंगळप्रकास — इसमें केवल ‘छोटा सांणोर’ और उसके तीस भेदों तथा ‘वडौ सांणोर’ और उसके चार भेदों का ही वर्णन है; शेष पुस्तक में छंदों के लक्षण हैं।


[1] इस प्रकरण में राजस्थानी की गद्य सम्बन्धी रचनायें दवावेत, वचनिका और वारता आदि समझाई गई हैं।

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४ लखपत पिंगल़ — इसमें गीत-रचना के लक्षण तो नहीं हैं परंतु ग्रन्थ के अंत में चौबीस भिन्न-भिन्न गीतों की जाति व गीत दिए गए हैं।
५ कविकुल़बोध — इसमें चौरासी प्रकार के गीत, अट्ठारह उक्तियाँ, बाईस जथाएं आदि का बड़ा विशद् वर्णन है। यह अत्युत्तम लाक्षणिक ग्रंथ है |
६ रघुनाथरूपक — यह प्रकाशित ग्रन्थ है। इसमें बहत्तर प्रकार के गीतों का वर्णन है।
७ डिंगल-कोश — यह ग्रन्थ प्रधान रूप से पद्यबंध शब्दकोश है। इसमें भी पंद्रह गीतों के लक्षण दिए हैं और उदाहरण के गीतों में डिंगल के पर्यायवाची कोश के शब्दों का वर्णन है।
८ रण-पिंगल़ — यह छंदशास्त्र का बृहद् लाक्षणिक ग्रंथ है। इसके तीन भाग हैं। इसके तृतीय भाग में भिन्न-भिन्न प्रकार के तीस गीतों के लक्षण व उदाहरण दिए गये हैं। अधिकांश रघुनाथरूपक के ही गीत इसमें हैं। यह ग्रंथ प्रकाशित है किन्तु अप्राप्य है।
९ रघुवरजसप्रकास — प्रस्तुत ग्रन्थ रघुवरजसप्रकास में ९१ प्रकार के गीतों के लक्षण आदि का विस्तृत वर्णन है। केवल गीतों का ही वर्णन नहीं, गीतों के विभिन्न अंगों का वर्णन भी बड़े ही सुन्दर एवं विस्तृत ढंग से किया गया है। गीतों के ग्यारह प्रकार के दोष, गीतों में वैणसगाई के प्रयोग का महत्त्व आदि का सुन्दर वर्णन है। गीतों में वैणसगाई के प्रयोग के जो उदाहरण दिए गये हैं वे कवि की रचना के महत्त्व को द्विगुणित कर ग्रंथकार की काव्य-प्रतिभा का परिचय देते हैं।

छंद शास्त्र में चित्र काव्य का अपना एक विशेष स्थान है। साहित्यकारों ने इसे एक स्वतन्त्र रूप से अलंकार माना है जो शब्दालंकार का एक भेद माना गया है। संस्कृत व व्रज भाषा में चित्र काव्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है परन्तु राजस्थानी (डिंगल) गीतों में चित्र काव्य का उल्लेख नहीं मिला। अद्यावधि डिंगल गीतों के लाक्षणिक ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं–उनमें किसी में भी चित्र-काव्य सम्बन्धी विवरण नहीं है; परन्तु रघुवरजसप्रकास में एक ‘जाळीबंध वेलियो सांणोर’ गीत का चित्र-काव्य के रूप में उदाहरण मिला है। मेरे निजी संग्रह में इस जाळीबंध गीत के चित्र बने हुए हैं। एक-दो उदाहरण प्राचीन भी मिलते हैं। इन उदाहरणों से पता चलता है कि डिंगल गीत में भी चित्रकाव्य की रचना प्रारंभ हो गई थी।

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पंचम प्रकरण ग्रन्थ का अंतिम प्रकरण है। इसमें ग्रन्थकार ने एक राजस्थानी छंद विशेष निसांणी का वर्णन करते हुए इसके मुख्य बारह भेदों के साथ इसके भेदोपभेदों का तथा एक मात्रिक छंद कड़खा का भी वर्णन किया है। प्रकरण के प्रारम्भ में प्रथम निसांणी के लक्षणों को देकर उदाहरणों को प्रस्तुत किया है। फिर रामगुण-गाथा गाते हुए निसांणी के अन्य भेदों का उत्तम रीति से वर्णन किया है। प्रकरण के अंत में कवि ने अपनी वंशपरम्परा का परिचय देकर ग्रंथ को समाप्त किया है। स्वयम् कवि द्वारा दिए गये इस वंश-परिचय से कवि के जीवन-वृत्त को जानने में बहुत सहायता प्राप्त होती है।

ग्रन्थ रचना-काल

इस ग्रन्थ की रचना का प्रारंभ और समाप्ति सम्बन्धी स्वयं कवि ने अपने वंश-परिचय के पश्चात् एक छप्पय कवित्त इस प्रकार दिया है जिससे पता चलता है कि यह ग्रन्थ वि. सं. १८८० की माघ शुक्ला चतुर्थी बुधवार को प्रारंभ किया गया था। कवि ने अपनी कुशाग्र बुद्धि और प्रौढ़ ज्ञान के सहारे वि. सं. १८८१ के आश्विन शुक्ला विजयादशमी, शनिवार को ग्रंथ पूर्ण रूप से तैयार कर लिया। ग्रन्थ-रचना के सम्बन्ध में स्वयं कवि ने अपने ग्रन्थ के समाप्ति प्रकरण में लिखा है-

छप्पय कवित्त
उदियापुर आथांण रांण, भीमाजळ राजत।
कवरां-मुकट ‘जवान’ नीत मग जग नीवाजत ।।
अठ्ठारै से समत वरस अैसियौ माह सुद |
बुद्धवार तिथ चौथ हुवौ प्रारम्भ ग्रन्थ हद।।
अठारै अनै अकयासिये, सुद आसोज सराहियौ।
सनि बिजैदसमी रघुबर सुजस ‘किसन’ सुकवि सुभक्रत कियौ।।

भूमिका समाप्त करने के पूर्व हम राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के प्रति आभार प्रदर्शित किए बिना नहीं रह सकते। कारण कि प्रतिष्ठान इस प्रकार के अमूल्य ग्रन्थ जो, साहित्य की अप्राप्य निधि हैं “राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला” के अन्तर्गत प्रकाशित कर साहित्य के कलेवर को बढ़ाने में सतत प्रयत्नशील है। प्रस्तुत ग्रन्थ को इस रूप में प्रकाशित कराने का श्रेय श्रद्धेय मुनिवर श्रीजिनविजयजी को है जिन्होंने राजस्थानी के छंद-शास्त्र के इस अमूल्य ग्रन्थ का प्रकाशन राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा करना स्वीकार किया। श्रीगोपालनारायणजी बहुरा, एम. ए. व श्रीपुरुषोत्तमलालजी मेनारिया, एम. ए. प्री. साहित्यरत्न का भी पूर्ण रूप से आभार मानता हूँ कि इन्होंने समय-समय पर पुस्तक के प्रूफ-संशोधन और सम्पादन-कार्य में योग दिया।

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हमारे संग्रह में ग्रंथ की प्रतिलिपि मौजूद थी परन्तु उसके क्षतविक्षत होने के कारण उसका सम्पूर्ण प्रकाशन सम्भव नहीं था। इस कार्य के लिए मेवाड़ के अन्तर्गत मेंगटिया ग्राम के ठा. श्री ईश्वरदानजी आसिया ने प्रस्तुत ग्रन्थ की हस्तलिखित प्रति, जो पूर्ण सुरक्षित थी, हमें प्रदान कर अपूर्व सहयोग दिया है। उसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं और मैं उनके इस सहयोग के लिए कृतज्ञता प्रकट करता हूँ ।

जोधपुर,
२१ फरवरी, १९६० ई.
सीताराम लालस
सम्पादक

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