रघुवरजसप्रकास [11] – किसनाजी आढ़ा

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अथ गीत उवंग सावझड़ौ लछण
दूहौ
सगण सोळ मत प्रथम तुक, दो गुर अंत दिपंत।
आंन च. . . वद. . . अख, उभै वीपसा अंत।।१८९

अरथ
पै’ली तुक रै आद तौ सगण नै सोळै मात्रा होय। और साराई गीत री पनरै ही तुकां मात्रा चवदै होय। तुकांत दोय गुरु अखिर होय जिण सावझड़ा गीत नै उमंग कहीजै तथा कोई कवि उवंग पण कहै छै। चौथी तुक में दोय वीपसा आवै छै।

अथ गीत उवंग सावझड़ौ उदाहरण
गीत
जगनाथ अंतरतणौ जांमी, गाहणौ खळ गुरड़ गांमी।
साच वायक सिया सांमी, भुजां भांमी भुजां भांमी।।
थूरण रिण दैतां थोका, लाज रक्खण संत लोका।
रांम रिण दसमाथ रोका, करां झौका करां झौका।।
देण सेवग लंक दाता, घल्ल व्याध कबंध घाता।
बिसू रखण क्रीत वातां, हद्द हातां हद्द हातां।।
मीढ ना अज इस माधौ, थाह दिल नावै अथाघौ।
देव दीनां कसट दाधौ, रंग राघौ रंग राघौ।।१९०

अथ गीत अरधगोखौ सावझड़ौ वरण छंद लछण
दूहौ
रगण जगण गुरु लघु हुवै, जिगरै तीन तुकंत।
होय वीपसा चवथ तुक, अरघ गोख आखंत।।१९१

अरथ
जिण गीत रै पै’ली दूजी तीजी तीनां तुकां तो पै’ली रगण गण। पछै जगण गण। पछै गुरु लघु। ई क्रम सूं आठ अखर तीन तुकां होय। चौथी तुक पै’ली रगण। पछे जगण छ अखिर होय। ईं क्रम सूं च्यार तुकां होय सौ अरधगोख वरण छंद सावझड़ौ कहीजे नै जींके ईं क्रम सूं आठ तुकां होय जिणनै व्रधगोख कहीजै, सौ व्रधगोख तौ आगै कह्यौ ईज छै सौ देख लीज्यौ।


१९०. अंतरतणौ-भीतर का, अन्दर का। जांमी-पिता। गाहणौ-नष्ट करने वाला। खळ-राक्षस। वायक-वाक्य, वचन। सिया-सीता। भांमी-बलैया, न्यौछावर। थूरण-नाश करना, ध्वंश करना। दैतां-दैत्यों। थोका-समूह। दसमाथ-रावण। झौका-धन्य-धन्य। घातां-नाश। विसू-पृथ्वी, संसार। क्रीत-कीर्ति। मीढ-समान, सदृश्य। अज-ब्रह्मा। ईस-शिव। माधौ-माधव। थाह-गहराई, गंभीरता। अथाघौ-अपार, असीम। दाधौ-जलाने वाला। रंग-धन्य-धन्य। राघौ-श्री रामचन्द्र।

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अथ गीत अरधगोखौ सावझड़ौ उदाहरण
गीत
बंद पाय राघवेस, जोध मेघनाद जेस।
बंध वांमणी विसेस, सेस सेस सेस।।
पाड़िया जुधां बिपच्छ, रांम पाय सेव रच्छ।
और मेर रूप अच्छ, लच्छ लच्छ लच्छ।।
सूर धीर तास संत, मांण पांण तेज मंत।
दाहणौ जुधां दयंत, नंत नंत नंत।।
चीत प्रीत क्रीत चाह, दैत राज सेस दाह।
लेण रांम सेव लाह, वाह वाह वाह।।१९२

अथ गीत धमळ तथा रिणधमळ, सम तथा असम चरण लछण
दूहा
धुर तुक मत छाईस धर, छै बीजी छाईस।
तीस मत तुक तीसरी, चौथी मात्र चौवीस।।१९३
अवर दवाळा अवर विध, नहीं मत्त निरबाह।
ईसर बारठ अक्खियौ, असम चरण यणराह।।१९४


१९२. बंद-नमस्कार कर। पाय-चरण। राघवेस-श्री रामचन्द्र। जोध-योद्धा। मेघनाद-इन्द्रजीत। जेस-जैसा। पाड़िया-मारे। बिपच्छ-विपक्षी, शत्रु। दाहणौ-मारने वाला, ध्वंश करने वाला। दयंत-दैत्य। सेव-सेवा। लाह-लाभ। वाह-वाह-धन्य धन्य।
१९३ धुर-प्रथम। तुक-पद्य का चरण। मत-मात्रा। छाईस-छब्बीस। छै-है। बीजी-दूसरी। मझ-मध्य, में। दवाळा-गीत छंद के चार चरण का समूह।
१९४. अवर-अन्य। निरवाह-निर्वाह। अक्खियौ-कहा। यणराह-इसके।

— 268 —

अथ धमळ गीत अन्य विध लछण
दूहा
वदिया लछण अवर विध, खट तुक होय विसक्ख।
चवद प्रथम दूजी चवद, अठाईस त्रिय अक्ख।।१९५
चवदह चौथी पांचमी, छट्ठी वीस विचार।
असम चरण तौपण अवस, वद यम धमळ विचार।।१९६
त्रकुटबंधरी आद तुक, पांच देख परमांण।
उभै तुकां मिळ अंतरी, जुगत धमळ यम जांण।।१९७

अरथ
धमळ गीत कै मात्रा वरण प्रमांण नहीं जिणसूं असम चरण छै। पै’ली तुक मात्रा छाईस होय। दूजी तुक मात्रा छाईस होय। तीजी तुक मात्रा तीस होय। चौथी तुक मात्रा चौबीस होय। बाकी रा और दूहा ईं प्रकार तथा और ही तरै मात्रा होय पण सम मात्रा को निरबाह नहीं। आगै बारठजी स्री ईसरदासजी क्रत गीत धमळ स्री परमेसर में छै सौ पण इण तरै छै जींनै देख नै मैं कह्यौ छै तथा और लछण करनै मात्रा कौ निरूपण करां तौ पण असम चरण छै। और विध मात्रा प्रमांण करां छां। छ तुक करने सौ कवेसर देख विचार लीज्यो।

गीत रणधमळ कै छ तुकां हुवै छै। पै’ली तुक मात्रा चवदै। दूजी तुक मात्रा चवदै। तीजी तुक मात्रा अठावीस। चौथी तुक मात्रा चवदै। पांचमी तुक मात्रा चवदै। छठी तुक मात्रा चौबीस। अंत लघु तौ पिण रणधमळ असम चरण छंद छै और सुगम लछण कहां छां। गीत त्रकुटबंधरी पांच तुकां तौ आदरी नै दोय तुकां दूहा रै अंत री, अेक कंठ री नै अेक दूजी यां दोयां री अेक तुक करणी। यां छ ही तुकां नै भेळी कर पढजै, सोही धमळ जांणणौ। सोई ग्रंथ में पण त्रकुटबंध कह्यौ छै सौ देख लीज्यौ। इति रणधमळ गीत लछण निरूपण समापत। इण गीत रौ नांम धमळ कह्यौ छै।


१९५. वदिया-कहे। लछण-लक्षण। विसक्ख-विशेष। चवद-चौदह। दूजी-दूसरी। त्रिय-तीसरा। अक्ख-कह।
१९६. तौ पण-तो भी। अवस-अवश्य। वद-कह। यम-इस प्रकार। आद (आदि)-प्रथम। उभै-दो, दोनों। जुगत-युक्ति। पण-परन्तु। पण-भी। निरूपण-विचार, निर्णय। कवेसर-कवीश्वर।
१९७. अठावीस-अठाईस। आदरी-आदि की। कंठ-अनुप्रास। यां-इन। दोयांरी-दोनों की।
भेळी-साथ।

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अथ गीत धमळ उदाहरण
गीत
सांमाथ तूं सुरनाथ तूं, रिमघात तूं रघुनाथ।
रघुनाथ तूं दसमाथ रांमण, भांजवा भाराथ।।
अणबीह तूं नरसीह ओपै, लीह संतां नकूं लोपै।
ईस वात अघात हाथां, व्रवण रंकां आथ।।
लंकाळ सेवग तूझ लांगौ, भ्रात लिछमण खळां-भांगौ।
पती-कुळ स्वारथी पांगौ, करण असह निकंद।।
जांनकी नायक जंग में, रोसेल बीरत रंग में।
बिरदैत जस रथ धमळ बँका, निमौ दसरथनंद।।
जुध दुसह दस सिर जारणा, मह कूंभसा खळ मारणा।
धनुबांण धारण पांण धजबंध, जबर जोम जिहाज।।
जटजूट सिर बन पट झलै, अंग अघट रजवट ऊझळै।
अणभंग जैतां जंग आसुर, रंग कोसळराज।।
रख पय भभीखण रंकरा, लहरे’क आपण लंकरा।
काकुसथ खळदळ भसम कर, साधार-सरण सभेव।।
निज बिरद नाथ अनाथरा, सुज धरण भुजां समाथरा।
किव ‘किसन’ बेग सुनाथ कीजै, दीनबंधव देव।।१९८


१९८. सांमाथ-समर्थ। सुरनाथ-देवताओं का स्वामी। रिमघात-शत्रु का विध्वंशक या संहारक। दसमाथ-दस शिर। भांजवा-नाश करने को। भाराथ-युद्ध। अणबीह-निर्भय, निडर। लीह-रेखा, मर्यादा। नकूं-नहीं। लोपै-उलंघन करता हूँ। व्रवण-देने को, देने वाला। रंकां-गरीबों। आथ-धन। लंकाळ-वीर, श्री रामचन्द्र भगवान। तूझ-तेरा। लांगौ-हनुमान। लिछमण-लक्ष्मण। खळां-भांगौ-राक्षसों का नाश करने वाला। पांगौ-पंगु। असह-शत्रु। निकंद-नाश। रोसेल-जोशीला। बीरत-वीरत्व। बिरदैत-विरुद धारण करने वाला। पांण (पाणि)-हाथ। धजबंध-अपनी ध्वजा या झंडा रखने वाला वीर। जबर-जबरदस्त। जोम-जोश। जिहाज-जहाज। जटजूट-जटाजूट। अघट-अपार। रजवट-क्षत्रियत्व। ऊझळै-उमड़ता है। आपण-देने वाला। साधार-सरण-शरण में आए हुए की रक्षा करने वाला। किव-कवि। बेग-शीघ्र।

— 270 —

अथ गीत त्रिभंगी लछण
दूहौ
धुर अठार बी बार धर, ती सोळह चव बार।
बि गुरु अंत सौ पूणियौ, सोय त्रिभंगी सार।।१९९

अरथ
त्रिभंगी गीत रै पै’ली तुक मात्रा अठारै। दूजी तुक मात्रा बारै। तीजी तुक मात्रा सोळै। चौथी तुक मात्रा बारै होय। पछै सारा ही दूहां पै’ली तुक मात्रा सोळै। दूजी तुक मात्रा बारै। ईं प्रमाणै होय सौ गीत त्रिभंगी कहावै नै सोई पूणियौ सांणोर कहावै। नांम दोय छै। लछण दोय नहीं जींसूं पूणियौ सांणोर आगै पहली कह दीधौ छै जींसूं नहीं कह्यौ छै। कांम पड़े तो सात सांगोरां मांय देख लीज्यौ।

अथ गीत सीहलोर लछण
दूहौ
सीहलोर पिण पूणियौ, सुध लछणां सुभाय।
अठ दस बारह सोळ अख, बार बि गुरु पछ पाय।।२००

अरथ
सीहलोर पिण पूणियौ सांणोर छै। इणमें कोई भेद नहीं। पै’ली तुक मात्रा अठारै। दूजी तुक मात्रा बारै। तीजी तुक मात्रा सोळै। चौथी तुक मात्रा बारै। तुकांत दोय गुरु। पछला दूहां पै’ली तुक मात्रा सोळै। दूजी तुक मात्रा बारै। ईं क्रम होय। त्रिभंगी सीहलोर अे दोई पूणिया गीत छै। नांम कौ भेद, लछण भेद नहीं जींसूं आगै पूणियौ कह दीधौ छै सौ फेर नहीं कह्यौ। इति सीहलोर लछण निरूपण।

अथ गीत सारसंगीत लछण
दूहौ
गीत बडा सांणोर गण, सकौ सार संगीत।
तेवीसह अट्ठार मत, वीस अठार अठार अवीत।।२०१

अरथ
सार संगीत गीत नै बडौ सांणोर गीत एक छै। नांम दोय छै। लछण एक। पै’ली तुक मात्रा तेवीस। दूजी तुक मात्रा अठारै। तीजी तुक मात्रा बीस। चौथी तुक मात्रा अठारै अंत लघु। सौ बडौ सांणोर सोई सारसंगीत कहावै। सौ आद में सुध सांणोर सतसर कह्यौ छै सौ देख लीज्यौ। इति गीत सारसंगीत निरूपण।


१९९. बी-दूसरी। बार-बारह। तो-तीन, तीसरी। चव-चार, चौथी। बि-दूसरी। सोय-वह, वही। अठारै-अठारह। बारै-बारह। ईं-इस। दीधौ-दिया। जींसू-जिससे। कह्यो-कहा।
२००. पिण-भी, परन्तु। अख-कह। बार-बारह। बि-दो, दूसरी। पछ-पश्चात, वाद। पाछला-पश्चात का, बाद का। दीधौ-दिया।
२०१. सकौ-वही, वह। अट्ठार-अठारह। मत-मात्रा।

— 271 —

अथ गीत सीहवग सांणोर लछण
दूहौ
धुर अठार चवदह धरौ, सोळ चवद गुरु अंत।
वेखह सोई सीहवगौ, किव सांणोर कहंत।।२०२

अरथ
जिण गीत रै पै’ली तुक मात्रा अठारै होवै। दूजी तुक मात्रा चवदै होवै। तीजी तुक मात्रा सोळै होवै। चौथी तुक मात्रा चवदै आवै सौ सोहणौ सांणौर, सोई सीहवग कहीजै। नांम भेद छै, लछण भेद नहीं। पै’ली सांणोर कह्यौ छै सो देख लीज्यौ। इति सीहवग गीत निरूपण।

अथ गीत अहिगन सांणोर लछण
दूहौ
धुर अठार मत्त सुधर, पनर सोळ पनरेण।
अंत लघु सौ अहिगन, जपै वेलियौ जेण।।२०३

अरथ
गीत अहिगन नै वेलियौ सांणौर अेक छै। नांम में भेद छै, लछण में भेद नहीं। पै’ली तुक मात्रा उगणीस तथा अठारै होय। दूजी तुक मात्रा पनरै होय। तीजी तुक मात्रा सोळै होय। चौथी तुक मात्रा पनरै होय। तुकांत लघु होय। पछै मात्रा सोळै, पनरै होय। ईं क्रमसूं होय सौ वेलियौ सांणोर, सोई अहिगन सांणोर, पै’ली आगे सांणोरां में कह्यौ छै सो देख लीज्यौ। इति अहिगन गीत निरूपण।

अथ गीत रेणखरौ लछण
दूहौ
रटां गीत रेणखरौ, सौं जांणजै प्रहास।
तिल भर भेदन तेण में, सुध लछण सर रास।।। २०४

अरथ
रेणखरौ गीत नै प्रहास सांणोर दोन्यूं गीत अेक छै। नांम दोय छै। लछण एक छै। पै’ली तुक मात्रा तेवीस। दूजी तुक मात्रा सतरै। तीजी तुक मात्रा बीस। चौथी तुक मात्रा सतरै होय। अंत दोय गुरु पछै बीस सतरै इण क्रमसूं मात्रा होवै छै। आगै सांणोर में प्रहास कह्यौ छै सो देख लीज्यौ। इति रेणखरा गीत निरूपण।


२०२. सोळ-सोलह। चवद-चौदह। वेखह-देख। कहंत-कहते हैं। सोई-वही।
२०३. पनर-पनरह। पनरेण-पनरह से। जेण-जिसको। सोळै-सोलह। पछे-पश्चात, बाद में। सोई-वही।
२०४. तेणमें-उसमें। अगाड़ी-पहिले। ज्यां-जिन। हर-अर, और। सोई-वह, वही।

— 272 —

अथ गीत मुड़ियल सावझड़ौ लछण
दूहौ
मुड़ियल सावझड़ौ हुवै, पालवणीस दुमेळ।
सावझड़ौ जयवंत सौ, सुध लछणां समेळ।।२०५

अरथ
मुड़ियल गीत सावझड़ौ दुमेळ तथा पालवणी तथा जयवंत नांम सावझड़ौ। अगाड़ी पै’ली प्रथम तीन सावझड़ा कह्या ज्यां मध्ये जयवंत सावझड़ौ जिणनै दुमेळ कर पढणौ। सोई पालवणी, हर सोई मुड़ियल कहावै। मात्रा प्रमांण। पै’ली तुक मात्रा उगणीस तथा मात्रा अठारै होय और पनरै ही तुकां मात्रा सोळै सोळै री होय। तुकांत दोय गुरु अखिर आवै सौ मुड़ैल (मुड़ियल) सावझड़ौ तथा पालवणी दुमेळ जयवंत अेक छै। आगै जयवंत पालवणी कह्या छै सौ कांम पड़े तो देख लीज्यौ। इति मुड़ियल गीत निरूपण।

अथ गीत प्रौढ सांणोर निरूपण लछण
दूहौ
सोरठिया हर प्रोढ मझ, भेद रती नह भाळ।
सोरठियौ यण ग्रंथ मझ, दीधौ प्रथम दिखाळ।।२०६

अरथ
प्रोढ सांणोर हर सोरठियौ सांणोर अेक छै। यांरा लछण अेक छै। रती भेद नहीं। नांम दोय छै। मात्रा प्रमांण पै’ली तुक मात्रा उगणीस तथा सोळै। बीजी तुक मात्रा दस। तीजी तुक मात्रा सोळै होय। चौथी तुक मात्रा दस होय। तुकांत लघु होय। पछै मात्रा इग्यारै, दस, सौळै दस ईं क्रम सूं होय। आगे इण ग्रंथ में कह्यौ छै सौ देख लीज्यौ। इति गीत प्रोढ निरूपण।


२०६. हर-अर, और। मझ-मध्य। भेद-फरक। नह-नहीं। भाळ-देख। यण-इस। दीधौ-दिया। दिखाळ-दिखलाई। यांरा-इनके। पछे-बाद में। ईं-इस।

— 273 —

अथ गीत दीपक वेलियौ सांणोर लछण
दूहा
दीपक सोही वेलियौ, भेद अधिक तुक हेक।
तीजी तुक व्है बेवड़ी, वद तुक पंच विवेक।।२०७
धुर उगणीस अठार धर, पनरह दुती पढंत।
त्रती चवथी सोळ मत, पंच पनर पुणंत।।२०८

अरथ
गीत दीपक नै गीत वेलियौ सांणोर अेक होवै छै। यणां में इतरौ भेद छै। वेलिया सांणोर रै तुक च्यार होवै छै। पै’ली तुक मात्रा अठारै तथा उगणीस होवै। दूजी तुक मात्रा पनरै होवै। तीजी तुक मात्रा सोळै होवै। चौथी तक मात्रा सोळै होवे। पांचमी तुक मात्रा पनरै होवे। इण भांत दीपक रै पांच तुकां दूहा एक प्रत होवै। दूजा दूहां मात्रा सोळै पनरै सोळै सोळै पनरै ईं प्रमांण होय। तुकांत लघु होय सौ गीत दीपक। वेलिया रै च्यार तुक यौई फरक। इति दीपक लछण।

अथ गीत दीपक उदाहरण
गीत
सुंदर तन स्यांम स्यांम वारद सम, कौटक भा रद कांम सकांम।
नायक सिया दासरथ नंदण, विमळ पाय सुरराजा वंदण।
रीझवजै महराजा रांम।।
कमर निखंग पांण धनु सायक, सुखदायक संतां साधार।
कीधां कहर माथदस कापे, अेकण लहर लंक गढ आपे।
आठ पहर जिण नांम उचार।।


२०७. सोही-वही। बेवड़ी-दोहरी। वद-वह। पंच-पांच।
२०८. दूती-दूसरी। पढंत-पढ़ते हैं। त्रती-तीसरी। चवथी-चौथी। पुणंत-कहते हैं। पण-परन्तु। इण भांत-इस प्रकार। योई-यही।
२०९. वारद-बादल। सम-समान। कौटक-करोड़। भा-हुए। दासरथ-दसरथ। नंदण-पुत्र। विमळ-पवित्र। पाय-चरण। सुरराजा-इन्द्र। रीझवजै-प्रसन्न कीजिए। निखंग-तर्कश। पांण-हाथ। धनु-धनुष। सायक-तीर, बांण। सुखदायक-सुख देने वाला। साधार-रक्षक। कीधां-करने पर। कहर-कोप। माथदस-रावण। कापे-काट दिये, मारा। आपे-दे दिया।

— 274 —

ते रज पाय तरी रिख तरणी, मझ वेदां बरणी भ्रहमेण।
डहिया विरद वडा भुजडंडे, तीख करे मिथळापुर तंडे।
जटधर चाप विहंडे जेण।।
जनकसुता मनरंजण जगपत, भंजण खळ रांवण भाराथ।
सरणसधार काज जन सारण, ‘किसन’ अहौनिस गाव सकारण।
नृप रघुनाथ अनाथां नाथ।।२०९

अथ गीत अहिबंध वरण छंद लछण
दूहा
रगण सगण अंतह गुरू, तुक खट यण बिध कीन।
यगण रगण अंतह लघु, चौथी आठम चीन।।२१०
अठाईस पूरब अरध, ऊतर अठाईस।
अेम गीत अहिबंध अख, बरण छंद बरणीस।।२११

अरथ
अहिबंध गीत बरण छंद छै, मात्रा छंद नहीं। तिण रै गण तथा तुक प्रत अखिरां री गिणती छै। दूहा अेक प्रत तुक आठ आठ होवै। तुक अेक प्रत अखर सात सात होवै। दूहा एक प्रत आखर छपन होवै। सारा गीत रा दूहा च्यार आखर दोय सौ चौबीस होवै। पै’ली तुक दूजी तीजी तुक रगण सगण अेक गुरु सवाय होवै। यूंही तुक पांचमी छठी सातमी तुक रगण सगण अेक गुरु होवै। तुक चौथी और आठमी यगण रगण अेक लघु सवाय होवै। आठ ही तुकां प्रत आखर सात सात होवै। तुक पै’ली दूजी तीजी रा तुकांत मिळै। तुक चौथी तुक आठमी सूं मिळै। यण प्रकार गीत अहिबंध कहीजै। जूं बंध हुवौ थकौ साप संकड़तौ चालै जूं तुकां ठसती संकड़ती चालै, जीं ताबै गीत रौ नाम अहिबंध छै। गीत अड़बड़ाट सूं पढ्यौ जावै, जीं ताबै नांम रौ यौ लछण लख्यौ है।


२०९. ते-उस। रज-धूलि। रिख-ऋषि। तरणी (तरुणी)-स्त्री। भ्रहमेण-ब्रह्मा से। डहिया-धारण किये। तीख-विशेषता। तंडे-जोशपूर्ण आवाज की। जटधर-महादेव। विहंडे-नाश किया। मनरंजण-मन को प्रसन्न करने वाला। जगपत (जगतपति)-ईश्वर, श्री रामचन्द्र। भंजण-नाश करने वाला। खळ-राक्षस। भाराथ-युद्ध। सरणसधार-शरण में आए हुए की रक्षा करने वाला। काज-कार्य। जन-भक्त। सारण-सफल करने वाला। अहौनिस-रात-दिन। गाव-स्मरण कर, गुणगान कर।
२१०. यण-इस। विध-प्रकार। कीन-की, रची।
२११. अख-कह। यूंही-ऐसे ही

— 275 —

अथ गीत अहिबंध उदाहरण
गीत
राम नांम रसा रे, जाप संभ जसा रे।
बोल तू म बिसा रे, पहारै कौड़ पाप।।
सेस भ्रात सही रे, कंज जात कही रे।
दैत थाट दही रे, चहीरै बांण चाप।।
तेण संत तराया, गाथ बेदस गाया।
लेख हाथ लगाया, दळां आसंख दाट।।
तार बांम रखीते, सू चंदर सखीते।
पाळ दीन पखीते, कळेसां सत्र काट।।
कोसकेस कंजारां, लीध वंस लजारां।
हांण दैत हजारां, धजारां ब्रद धार।।
ग्राह गोह गयंदां, देख ब्याध मदंधां।
पेख ग्रीध पुलिंदां, पयोध नध पार।।
आच साह अनेकां, कीध वार वसेकां।
मांण राख वमेकां, करे के संत कांम।।
हेळ पाप हताजे, जमंवार जीताजे।
माह ऊंच मताजे,. . . .. . . . . .।।२१२


२११. जूं-जैसे। संकड़तौ-संकुचित होता हुआ।
२१२. जाप-जप कर। संभ (शम्भु)-महादेव। जसा-जैसा। -मत, नहीं। बिसारे-भूलना। पहारै-मिटाता है। सेस-लक्ष्मण। कंज जात-ब्रह्मा। दैत-दैत्य। थाट-दल, समूह। दही रे-नाश किया। गाथ-कथा। बांम-स्त्री। रखी-ऋषि। सूर-सूर्य। चंद-चंद्रमा। सखी ते-साक्षी दी। पाळ-पालक। पखी ते-पक्ष करने वाला। हांण-हानि। धजांरां-ध्वजा, ऊंचा। गोह-गुह नामक निषादराज। गयंदां-गज, हाथी। पुलिंदां-एक प्राचीन पिछड़ी जाति। पयोध (पयोधि)-समुद्र।

— 276 —

अथ गीत अरट मात्रा छंद लछण
दूहौ
धुर अठार ग्यारह दुती, सोळ त्रती चव ग्यार।
सोळै ग्यार क्रम अंत लघु, अरट गीत उचार।।२१३

अरथ
अरट गीत सांणोर गीत है पण सात सांणोर गीतां सूं भिन्न छै। दूजी चौथी तुक ग्यारै मात्रा, यौ भेद छै जींसूं जुदौ कही दिखायौ छै। पै’ली तुक मात्रा अठारै होय। दूजी तुक मात्रा ग्यारै होय। तीजी तुक मात्रा सोळै होय। चौथी तुक मात्रा ग्यारै होय। पछै सोळै ग्यारै ईं क्रम सूं पाछली तीन ही दूहां मात्रा होय। दूजी चौथी तुकरै तुकांत लघु होय, जीं गीत नै अरट नांम सांणोर कहीजै। कोई ईनै उमंख नांम गीत पिण कहै छै। त्राटकौ पण योही कहीजै, जींसूं त्राटको पण जुदौ नहीं कह्यौ है।

अथ गीत अरट सांणोर उदाहरण
गीत
धन राघव हाथ अभंग धुरंधर, आथवरीस असंक।
दीघ भभीखण आस्रय देख कर, लीध बिना दत लंक।।
बाळ महाबळ घायक भूबळ, सारंग सायक संठ।
भ्रात कहेस किकंधपुरी भल, कीध नरेस सुकंठ।।
संत अनाथ. . . . . . दस सायक, धू पहळाद उधार।
कांम उबारण आय सकारण, बारण तारण बार।।
कोट गयंद सतौल निधे कर, तोलण हेक तराज।
पात ‘किसन’ अडोल रघुपत, बोल गरीबनवाज।।२१४


२१३. ग्यार-ग्यारह। दुती-दूसरी। सोळ-सोलह। त्रती (तृतीय)-तीसरी। चव-चौथी, चतुर्थ। पण-परन्तु। यौ-यह। जुदौ-पृथक, अलग। पछै-पश्चात। पाछली-पीछे की। पिण-भी। पण-भी। योही-यही।
नोट-रघुनाथरूपक में जो त्राटका गीत है वह गीत इस गीत से भिन्न है।
२१४. आथवरीस-रुपयों का दान देने वाला। दीध-दिया। भभीखण-विभीषण। लीध-लिया, ली। दत-दान। बाळ-बालि वानर। घायक-संहारक। सारंग-धनुष। सायक-तीर, बाण। संठ-मजबूत, दृढ़, जबरदस्त। किकंधपुरी-किष्किंधापुरी। भल-ठीक। कीध-किया। नरेश-राजा। सुकंठ-सुग्रीव। धू-भक्त ध्रुव। पहलाद-भक्त प्रह्लाद। बारण-गज। तराज-समान, तुल्य।

— 277 —

अथ गीत अठताळौ लछण
दूहौ
ले धुरसूं तुक सोळ लग, चवद चवद मत चीत।
अंत गुरु जस नांम अख, गण अठताळौ गीत।।२१५

अरथ
जिण गीत रै पैली तुक सूं लगाय नै च्यार ही दूहां री सोळै ही तुकां में चवदै-चवदै प्रत तुक मात्रा होय। अंत गुरु होय। सावझड़ौ होय, जिण गीत नै अठताळौ कहीजै।

अथ गीत अठताळौ सावझड़ौ उदाहरण
गीत
अंग धार आरख ऊजळा, करतार चित चढती कळा।
विसतार जस चहूँवैवळा, साधार सेवग सांवळा।।
सिर-जोर खग दत संजणा, पह रोर आंमय पंजणा।
भड़ जुध असंतां भंजणा, रघुराज संतां रंजणा।।
विपळ सत सघण नवीनरा, अत गाय दुज आधीनरा।
भुज दहण खळ जस भीनरा, दिल महण बंधव दीनरा।।
मह सीत वर महराज रे, लख जनां राखण लाज रे।
किव ‘किसन’ वसै सकाज रे, रघु चरण सरणे राज है।।२१६


२१५. सोळ-सोलह। लग-तक। चवद-चौदह। मत-मात्रा। चीत-विचार कर। अख-कह।
२१६. आरख-चिन्ह, लक्षण। चहूंवैवळा-चारों ओर। साधार-रक्षक। रोर-निर्धनता। आंमय-रोग। पंजणा-मिटाने वाला। भंजणा-नाश करने वाला। रंजणा-प्रसन्न करने वाला। दुज (द्विज)-ब्राह्मण। महण (महार्णव)-सागर। सोत-सीता। लेख-देवता।

— 278 —

अथ गीत काछौ मात्रा समचरण छंद लछण
दूहा
धुर-अठार चवदह दुती, बारह तीजी बेस।
तीन कंठ धुरतुकतणा, मत चौमाळ मुणेस।।२१७
मुण बी तुक छाबीस मत, तीन कंठ तिण माह।
पूरब अरध तुकंतरै, अंत लघु आ राह।।२१८
तुक तीजी अठवीस मत, बेद छबीस बिचार।
त्रण त्रण कंठ तुकंत लघु, चौथीतणै उचार।।२१६
अन दूहां धुर तुकतणै, मत चाळीस मंडांण।
छावी बीजी चतुरथी, ती अठवीस प्रमाण।।२२०
अनुप्रास गुरु अंत अख, भण तुकंत लघु भाय।
जपियां आछौ रांम जस, काछौ गीत कहाय।।२२१

अरथ
काछा गीत तुकां च्यार दूहा प्रत जिण रै मात्रा प्रमांण। पै’ली तुक मात्रा चौमाळीस। कंठ तीन पै’ली तुक में होय। पहलौ कंठ तौ मात्रा अठारै ऊपर होवै। दूजो अनुप्रास मात्रा चवदै पर होवै। तीजौ अनुप्रास मात्रा बारै पर होवै। पै’ली तुक तीन अनुप्रास गुरुवंत होवै। मात्रा चौमाळीस होवै। तुक दूजी मात्रा छाईस होवै। अनुप्रास तीन। पै’ली कंठ मात्रा नव पर। दूजी कंठ मात्रा सात पर। तीजी कंठ मात्रा दस पर। तीसरौ पूरवारध नै उतरारध दोनों ही लघु अंत होय। तुक तीजी मात्रा अठावीस (अठाईस) तीन कंठ होय। चौथी तुक मात्रा छाईस तीन कंठ होय। यूं ही सारा गीत री अेक तुक प्रत कंठ तीन तीन गुरु कंठ होय। दूहा रै तुकंत लघु होय। और सारा ही गीत रा दूहां प्रत मात्रा प्रमाण कहां छां। पै’लो तुक मात्रा चाळीस होवै। दूजी तुक मात्रा छावीस होवै। तीजी तुक मात्रा अठावीस होवै। चौथी तुक मात्रा छावीस होवै। यूं तीन ही लारला दवाळां मात्रा होवै, जिण गीत नै काछौ कहीजै। चार ही तुकां मात्रा सम नहीं, जीसूं असम चरण छंद छै।


२१७. दुती-दूसरी। कंठ-प्रनुप्रास। धुरतुकतणा-प्रथम चरण के। मत-मात्रा। चौमाळ-चवालीस। मुणेस-कह।
२१८. मुण-कह। बी-दूसरी। छाबीस-छब्बीस। तिण-उस। माह-में।
२१९. अठवीस-अठाईस। बेद-चार, चतुर्थ। छबीस-छब्बीस। त्रण-तीन। चौथीतणै-चौथी के।
२२०. अन-अन्य। दूहां-गीत छंद के चार चरणों के समूह का नाम। धुरतुकतणै-प्रथम चरण के। मंडांण-रख। छावी-छब्बीस। बीजी-दूसरी। ती-तीसरी। अठवीस-अठाईस।
२२१. अख-कह। यूं-ऐसे। गुरुवंत-जिसके अन्त में गुरु वर्ण हो। छाईस-छब्बीस।

— 279 —

अथ गीत काछौ उदाहरण
गीत
पहपत रघुपती दत झौक पांणां।
वदत सुज कथ वेद-वांणां सधर पांणां साहणौ।
सारंग बांणां, जुध सझांणौ पण मुड़ांणां पूठ।।
सुखवर सुरांणां, गौ दुजांणां माघवांणां सुख मिळै।
मह जिग मंडांणां थांणथांणां दैत घांणां दूठ।।
धनक सायक भुजाधारी, तेण रज रिख नार तारी,
पायचारी पंथ में।
मिथळाविहारी स्रीमुरारी रमां नारी रंज।।
पह छत्रधारी मिळ अपारी मांग हारी मंडळी।
धनु जेणवारी रांवणारी जटाधारी भंज।।
पित आय सचित प्रकासे, वीर वट-पंच वासे,
असुर नासे आहवां।
भय मेट दासे विरद भासे, खळां त्रासे खूर।।
पड़ लंक पासे जंग जासे, अत प्रकासे आवधां।
ग्रीधां ढीगासे मांस ग्रासे, सुज हुलासे सूर।।
करण भूपत देव काजा, मांण रख गौदुज समाजा,
क्रीत पाजा दध कहै।
ते सुकव ताजा ब्रवण बाजा, गजां राजा गांम।।
छज ऊंच छाजा दिलदराजा, जेत वाजा जंगियं।
लख राख लाजा संत साजा, महाराजा रांम।।२२२


२२१. यूंही-ऐसे ही।
२२२. पहपत (पृथ्वीपति)-राजा। दत-दान। झौक-धन्य-धन्य। पांणां-हाथों। वदत-कहता है। सुज-वह। कथ-कथा। वेद-बांणां-वेदवाणी। सधर-दृढ़। साहणौ-धारण करने वाला। सारंग-विष्णु के धनुष का नाम। वांणां-तीरों, बाणों। सुरांणां-देवताओं। दुजांणां-ब्राह्मणों। माघवांणां-इन्द्र। मह-पृथ्वी, महान। जिग-यज्ञ। मंडांणां-रचा गया। थांणथांणां-स्थानों-स्थानों। दैत-दैत्य। घांणां-नाश। दूठ-दुष्ट। धनक-धनुष। सायक-बाण, तीर। तेण-उस। रज-धूलि। रिख-ऋषि। पायचारी-पदचारी। पंथ में-मार्ग में। रमां-शत्रुओं। रंज-दुख। पह-योहा। छत्रधारी-राजा। अपारी-असीम। मांण-मान, गर्व। मंडळी-समूह। धनु-धनुष। जेणवारी-जिस समय। जटाधारी-महादेव। भंज-तोड़ दिया। वट-पंच-पंचवटी। वासे-निवास किया। नासे-नाश किया। आहवां-युद्धों। खळां-राक्षसों। खूर-समूह। ढीगासे-ढेर, समूह। ग्रासे-भक्षण किया। हुलासे-प्रसन्न हुए। सूर-सूर्य। दुज-ब्राह्मण। क्रीत-कीर्ति। पाजा-पुल। दध-समुद्र, सागर। ब्रवण-देने को। बाजा-घोड़े। छज-शोभा। ऊंच-ऊंची। छाजा-शोभा देती है। दिलदराजा-उदार दिल, दातार।

— 280 —

अथ गीत सवैयौ वरण छंद लछण
दूहौ
दोय सगण पद च्यार दख, पंचम चव सगणांण।
सावझड़ौ कह चरण ब्रती, जिकौ सवायौ जांण।।२२३

अरथ
सवायौ गीत वरण छंद होय जिणरै तुक पांच, दूहा अेक प्रत होय। तुक अेक प्रत सगण दोय आवै। अखिर छ आवै। इसी तुक च्यार होय। पांचमी तुकमें च्यार सगण गण पड़ै। अखिर बारा होय। पांच ही तुकांरा मोहरा मिळै, जिणसूं सावझड़ौ सवायौ गीत जांणजै।

अथ गीत सवैयौ उदाहरण
गीत
थिर बूध थटौ क्रतहीण कटौ, दुख ओघ दटौ मह पाप मटौ।
रिववंसतणौ रिव रांम रटौ।।
तन खेत तजौ मत सुद्ध मजौ, सुभ रीत सजौ वड संत वजौ।
भव तारण कौसळनंद भजौ।।
हिय लोभ हरौ धख पुन्य धरौ, क्रत ऊंच करौ सुरराज सरौ।
रघुनायक दायक मोख ररौ।।
मन भाव मढौ दुज सेव दढौ, गुरु वेण गढौ चित रंग चढौ।
पतसीत सप्रवीत सप्रवीत पढौ।।२२४


२२३. दख-कह। चव-कह। सगणांण-सगण गण। अखिर-अक्षर।
२२४. थिर-स्थिर, अटल। बूध-बुद्धि। थटौ-धारण करो। क्रतहीण-पाप। कटौ-काट डालो। ओघ-समूह। दटौ-नाश कर दो। मह-महान। मटौ-मिटा दो। रिववंसतणौ-सूर्यवंशका। रिव-सूर्य। खेत-क्षेत्र। तजौ-छोड़ दो। वजौ-कहे जाओ, प्रसिद्ध हो। भव-जन्म, संसार। कौसळनंद-श्री रामचंद्र भगवान। धख-इच्छा। क्रत ऊंच-उत्तम कार्य। सुरराज-इन्द्र। दुज-ब्राह्मण। दढौ-दृढ़ करो। पतसीत-श्री रामचन्द्र। सप्रवीत-पवित्र।

~~क्रमशः    

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