रघुवरजसप्रकास [5] – किसनाजी आढ़ा

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अथ गाथा उदाहरण
गिरिस गिरा गौ गौरी, हर गिर हिम हंस हास सिस हीरा।
सुसरि सेस सुरेसं ए, स्रीरांम क्रत आरख्यं।।१३०

अथ गाथा गुण दोस कथन

छंद बेअखरी
निज आखै किव ‘किसन’ निरूपण, सुणौ गाहा गुण दोस सुलछण।
सात चतुरकळ अंत गुरु सज्ज, देह छठे थळ जगण तथा दुज।।१३१
बांधव पूरब अरध एण बिध, यम हिज जांण जगण उत्तरारध।
काय छठे थळ यक लघु कीजै, दुसट विखम थळ जगण न दीजै।।१३२
मत्त सतावन स्रब गाथा मह, कळातीस पूरबा अरध कह।
वीस सात कळ उतर अरध विच, रेणव अेम छंद गाथौं रच।।१३३
पाय प्रथम पढ़ हंस गमण पर, कह गत दुवै पाय विध केहर।
गज गत तीजै पाय गुणीजै, औण चवथ गथ सरप अखीजै।।१३४
एक जगण जिण मांहे आवै, कुळवंती सौ गाहा कहावै।
बे जगण परकीया बखांणौ, जगण घणा तिण गनका जांणौ।।१३५
जगण विनां सौ रांड गणीजै, किणी मांझ सौ गाहा न कीजै।


१३१. निरूपण-निर्णय। थळ-स्थान। दुज-चार मात्रा।
१३२. एण-इस। यम-ऐसे। हिज-ही। यक-एक।
१३३. मत्त-मात्रा। मह-में। रेणव-कवि। गाथौ-गाथा।
१३४. पाय-चरण। विध-विधि। औण-चरण। चवथ-चतुर्थ।
१३५. मांहे-में। गाह-गाथा, गाहा।
नोट-गाहा छंद में जगण ISI गण आना अनिवार्य माना गया है। जिस गाथा छंद में एक जगण होता है उस गाहा छंद को कुलवंती गाथा कहते हैं। जिस गाथा छंद में दो जगण हों उसको परकीया गाथा कहते हैं। जिस गाथा छंद में जगण अधिक आ जाते हैं उसे गणिका गाथा कहते हैं। जिस गाथा छंद में जगण न हो उसे विधवा गाथा कहेंगे।

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विप्री तेरह लघुव दीजै, लघु यकवीस खित्रणी लीजै।।१३६
सतावीस लघु वैसी सोई, है लघु अधिक सुद्रणी होई।
बिण अनुसार अंध का वाचत, सुज अनुसार एक कांणी सत।।१३७
ब्यंदु दोय सुनयणा बिसेखौ, बहु अनुसार मनहरा बेखौ।
विण सकार पदमणी विसेखत, एक सकार चित्रणी ओपत।।१३८
च्यार सकार हसतणी चावी, बहु सकार संखणी बतावी।
गण बोह करण जिका बाळा गण, मुगधा करतळ घणा तिका मुण।।१३९
भगण बहुत सौ प्रौढ़ा भंणजै, गण बोह विप्र वरध का गिणजै।


१३६. रांड-विधवा। मांझ-(मध्य) में। जिस गाथा छंद में १३ लघु वर्ण होते हैं उसे विप्र कहते हैं। २१ लघु वर्ण जिस गाथा में आ जाते हैं उसे क्षत्रिया संज्ञा दी गई है। इसी प्रकार जिस गाथा छंद में २७ लघु वर्ण आ जाँय उसको वैश्य संज्ञा दी गई है और जिस गाथा छंद में २७ से भी अधिक लघु वर्ण आ जाते हैं उसकी शुद्रा संज्ञा मानी जाती है।
१३७. गाथा छंद में अनुस्वार आना जरूरी माना गया है। जिस गाथा छंद में अनुस्वार न हो उसकी संज्ञा अंध मानी गई है। जिस गाथा छंद में एक ही अनुस्वार होता है उसे एकाक्षी कहते हैं। इसी प्रकार जिस गाथा छंद में दो अनुस्वार आते हैं उसको सुनयणा कहते हैं और जिसमें अनुस्वारों की बाहुल्यता होती है उसे मनोहरा गाथा कहते हैं।
१३८. जिस प्रकार गाथा छंद में अनुस्वार लेना ठीक माना गया है ठीक उसके विपरीत सकार अक्षर का न प्रयोग करना ही सुंदर गिना जाता है। जिस गाथा छंद में सकार नहीं होता है उसकी संज्ञा पद्मिनी मानी गई है। जिसमें एक भी सकार आ जाय उसे चित्रणी, जिसमें चार सकार आ जाय उसे हस्तिनी तथा सकार-बाहुल्या गाथा को शंखणी कहते हैं।
१३९. गण-गाथा छंद में चार मात्रा के नाम को गण कहते हैं। ऐसे चतुष्कलात्मक सात गण और एक गुरु के विन्यास से गाथा छंद का पूर्वार्द्ध बनता है। वे चतुष्कलात्मक पांच गण निम्न प्रकार के होते हैं-
प्रथम गण-(SS) चार मात्रा का। इसका दूसरा नाम कर्ण भी है।
द्वितीय गण-(IIS) चार मात्रा। इसका दूसरा नाम करतळ या करताळ भी है।
तृतीय गण-(ISI) चार मात्रा। इसका दूसरा नाम पयहर, पयोहर, पयोधर भी है।
चतुर्थ गण-(SII) चार मात्रा। इसका दूसरा नाम वसु, पय भी है।
जिस गाथा में दो दीर्घ मात्रा का करण (कर्ण) गण बहुत आता हो उसे बाला गाथा कहते हैं तथा जिस गाथा में करतळ या करताळ का [IIS प्रथम दो हृस्व मात्रा तथा एक दीर्घ मात्रा कुल चार मात्रा के समूह का] प्रयोग बहुत हो उसे मुग्धा कहते हैं। जिस गाथा छंद में भगण का [प्रथम दीर्घ फिर दो हृस्व के चार मात्रा के समूह का] प्रयोग बहुत हो उसे प्रौढ़ा कहा गया है। ठीक इसी प्रकार जिस गाथा छंद में विप्र का [दुज-द्विज, चार मात्रा के ही समूह का] प्रयोग बहुत हो उसे वरधका [वृद्धा] गाथा कहा जाता है।

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कका दोय मझ गौरी कहीयै, चंपा अंगीक केहि कच हीयै।।१४०।।
भीना अंगी तीन कके भण, तव बौह ककां नांम काळी तण।
भ्रांमी वसत्र सेत तन भासत, वसन लाल खित्रणी सुवासत।।१४१
पीत दुकूळ वैसणी पहरण, गाह सुद्रणी स्यांम वसन गण।
गौरे वरण विप्रणी गाहा, चंपक वरण खित्रणी चाहा।।१४२
भीनै रंग वैसणी सुभायक, लख सुद्रणी स्यांम रंग लायक।
मुगता भूखण विप्री मोहत, सुज खित्रिणि हिम भूखण सोहत।।१४३
रूपा भरण वैसणी राजत, सुद्रणि पीतळ भूखण साजत।
ऊजळ तिलक विप्रणी ओपत, तिलक सुद्रणी लाल ओपत।।१४४
पीळौ तिलक वैसणी परगट, रूच सुद्रणी स्यांम टीलौ रट।
गाहा तणौ छंद कुळ गायौ, वेद पिता कवि जणां बतायौ।।१४५
सरस भाख माता सुरसत्ती, उप राजक भ्रहमांण उकती।
स्रवण नखित्र मझ जनम तास सुण, कहियौं सरब गाह चौकारण।
गाथा नांम छवीस गिणावै, ग्रंथ अनेक वडा कवि गावै।।१४६


१४०. जिस गाथा छंद में दो ‘क’ होते हैं उसकी गौरी संज्ञा होती है। जिसमें एक ही ‘क’ हो उसकी संज्ञा चंपा वर्ण मानी गई है। जिसमें तीन ‘क’ होते हैं उसका वर्ण (रंग) श्यामता लिए हुए गौर माना गया है और जिसमें ‘क’ की बाहुल्यता होती है उसकी काली संज्ञा मानी जाती है।
१४१. सेत-स्वेत। खित्रणी-क्षत्रिया।
१४२. पीत-पीला। दुकूळ-वस्त्र। वैसणी-वैश्य (स्त्री)। सुद्रणी-शुद्रा। वसन-वस्त्र।
१४३. विप्री-विप्रा। खित्रिणि-क्षत्रिया। हिम-सोना।
१४४. वैसणी-वैश्य (स्त्री)। राजत-शोभा देती है। विप्रणी-ब्राह्मणी। ओपत-शोभा देती है।
१४५. टीलौ-तिलक।
१४६. भाख-भाषा। उकती-उक्ति। नखित्र-नक्षत्र। मझ-(मध्य) में। तास-उस।

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अथ गाथा छंद छबीस नांम कथन

कवित छप्पै
लच्छी रिद्धी बुद्धी, लज्जा विद्या खंम्या।
लहदेवी गौरी धात्री, कविस चूरणा छाया।।
कह कांती मह माया, ईस कीरती सिद्धी।
मांणणि रांमा गाहेणि, वसंत सोभा हरणी।।
सुण चक्कवी, सारसी, कुररी चवी, सिंघी हंसी साखिए।
छावीस नांम गाथा छजै, भल राघव जस भाखिए।।१४७

अथ लछी नांम गाथा लछण
सतावीस गुरु त्रय लघू, लछी आखर तीस।
यक गुरु घट बे लघु वधै, सौ सौ नांम कवीस।।१४८

लछी गाथा उदाहरण
अख्यर ३० गुरु २७ लघु ३
तौ सारीखौ तं ही, जै जै स्री रांम जीपणा जंगां।
सीता वाळा स्वांमी, भूपाळां मौड़ हूं भांमी।।१४९

गाथा नांम रिद्धी
अख्यर ३० गुरु २६ लघु ४
रै झौका स्रीरांमं, तूं सातै ताळ वेधण तीरं।
थूरै दैतां थौका, दीनांचा नाथ जगदाता।।१५०


१४७. चवी-कही। छजै-शोभा देते हैं।
१४८. त्रय-तीन। यक-एक।
१४९. तौ-तेरे। सारीखौ-सदृश, समान। जीपणा-जीतने वाला। जंगां-युद्धों। मौड़-अवतंश। हूं-मैं। भांमी-वलैया लेता हूँ, न्यौछावर होता हूँ।
१५०. झौका-धन्य-धन्य। ताळ-ताड़, वृक्ष। थूरै-नाश करता है। दैतां-दैत्यों। थौका-समूह।
नोट-गाथा की संख्या का छप्पय मूल प्रति के अनुसार ही है किन्तु ठीक प्रतीत नहीं होता।
गाथाओं के २६ नाम-लच्छी, रिद्धी, बुद्धी, लज्जा, विद्या, खंम्या, देवी, गौरी, धात्री, चूरणा, छाया, कांती, महामाया, कीरती, सिद्धी, मांणणि, रामा, गाहेणि, वसंत, सोभा, हरणी, चक्कवी, सारसी, कुररी, सिंही, हंसी।

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गाथा नांम बुद्धी
अख्यर ३२ गुरु २५ लघु ७
जीहा राघौ जंपै, मोटौ छै भाग जेणरौ भूमं।
तोटौ ना’वै त्यांरै, केसौ पय सेव अधिकारी।।१५१

गाथा नांम लज्जा
अख्यर ३३ गुरु २४ लघु ९
की कहणौ कौसल्या, मोटौ तैं कीध पुन्य अै भ्रममं।
जै कूं खै खळ जेता, आखै जग रांम औतारं।।१५२

गाथा नांम विद्या
अख्यर ३४ गुरु २३ लघु ११
वेदां भेदां वेखौ, पेखौ दह आठ हेर पौरांणं।
राधौ नांम सरीखं, नह कौ नर देव नागिंद्रं।।१५३

गाथा नांम खंम्या
अख्यर ३५ गुरु २२ लघु १३
है कांनै मौताहळ, कर पूंची कंठमाळ पै संकळ।
राघौ नांम विहूंग, अनखांणौ ढोर आदम्मी।।१५४

गाथा नांम देवी
अख्यर ३६ गुरु २१ लघु १५
सुंदर स्यांम सरीरं, बाधौ कट रांम पीत पीतंबर।
काळे वादळ सूं कै, वीटांणी वीज वरसाळै।।१५५


१५१. जीहा-जिह्वा। जंपै-जपता है। भूमं-भूमि। तोटौ-कमी। त्यांरे-उनके। केसौ-केशव, विष्णु। पय-चरण।
१५२. मोटौ-महान। कीध-किया। पुन्य-पुण्य। भ्रममं-ब्रह्म, परब्रह्म। जै-जिस। कूंखै-कुक्षि। खळ-असुर, राक्षसजेता-जीतने वाला। औतारं-अवतार।
१५३. वेखौ-देखिये, देखो। पेखौ-देखो। दह-दस हेर-देख कर। पौराणं-पुराण। सरीखं-समान, सदृश। नागिंद्रं-(नागेन्द्र) नाग।
१५४. कांनै-कानों में। मौताहळ-मोती। कर-हाथ। पूंची-हाथ की कलाई का आभूषण विशेष। विहूंण-बिना, रहित। अनखांणौ-अन्न खाने वाला। ढोर-पशु।
१५५. कट-कटि, कमर। पीत-पीला। वीटांणी-वेष्टित हुई। वीज-बिजली। वरसाळै-वर्षा ऋतु में।

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गाथा नांम गौरी
अख्यर ३७ गुरु २० लघु १७
सज्झी न राघव सेवं, सेवा सौ जाय घरोघर साझै।
निज सिर हरी न ना’यौ, उण ना’यौ सीस जग अग्गां।।१५६

गाथा नांम धात्री
अख्यर ३८ गुरु १९ लघु १९
पढ़ सीतावर प्रांणी, जगचा तज आंन आळ जंजाळं।
उंबर अंजुळि आब, नहचै आ जांण थिर नांही।।१५७

गाथा नांम चूरणा
अख्यर ३९ गुरु १८ लघु २१
रिख सिख गंगा रांम, सेवै पद कंज मंजु सीतावर।
सौ राघौ पै ‘किसना’, चींतव निस दिवस उर चंगा।।१५८

गाथा नांम छाया
अख्यर ४० गुरु १७ लघु २३
रट रट स्री रघुरांम, दस-सिर जे तार तार के दीनं।
करुण ऊदध कर कंजं, सीतावर संत साधारं।।१५९

गाथा नांम कांती
अख्यर ४१ गुरु १६ लघु २५
अजामेळ यक वारं, आखे अणजांण नारायण।
जांण आंण जम हरिजन, जुड़ियौ नह मग्गा घर जेणं।।१६०


१५६. सज्झी-हुई। सेवं-सेना। सौ-वह। ना’यौ-नमाया। उण-उस। अग्गां-अगाड़ी।
१५७. आंन-अन्य। आळ-असत्य, झूठ। जंजाळ-प्रपंच। उंबर-उम्र, आयु। आाब-पानी। नहचै-निश्चय। थिर-स्थिर।
१५८. कंज-कमल। मंजु-सुंदर। चींतव-स्मरण कर। चंगा-श्रेष्ठ, उत्तम, स्वस्थ।
१६०. यक-एक। वारं-समय। आखे-कहा। अणजांण-अज्ञानावस्था। जुड़ियौ-प्राप्त हुआ। मग्गा-मार्ग। जेणं-जिस।

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गाथा नांम महामाया
अख्यर ४२ गुरु १५ लघु २७
आळस न कर अजांणं, निज मन कर हरख भजन रघुनाथं।
सुपन रूप संसारं, विण संतां देहनां वारं।।१६१

गाथा नांम कीरती
अख्यर ४३ गुरु १४ लघु २९
कमळनायण कमळाकर, कमळा प्रांणेस कमळकर केसौ।
तन कमळ भातेसं, जे मुख च्यार कमळभू जं पै।।१६२

गाथा नांम सिद्धो
अख्यर ४४ गुरु १३ लघु ३१
रिखय मख कर रखवाळं, तारी रिख घरण चरण रज हूंता।
राख जनक पण रघुबर, भागौ कोदंड भूतेसं।।१६३

गाथा नांम मांगणी
अख्यर ४५ गुरु १२ लघु ३३
जिण दिन रघुबर जंपै, सुकिया अरथ दिवस सोय नर संभळ।
दखै न राघव जिण दिन, जांणे सोय आळजंजाळं।।१६४

गाथा नांम रांमा
अख्यर ४६ गुरु ११ लघु ३५
निज कुळ कमळ दिनेसं, चवि सुर गण नखत जांण तिण चंदं।
मुनि बन रखण म्रगाधिपं, रघुबर अवतं (स) राजेसं।।१६५


१६१. अजांणं-अज्ञान। सुपन-स्वप्न।
१६२. कमळाकर-विष्णु। कमळा-लक्ष्मी। प्रांणेस-पति। कमळभू-ब्रह्मा।
१६३. रिखय-ऋषि। मख-यज्ञ। रखवाळं-रक्षा। घरण-स्त्री, पत्नी। हूंता-से। पण-प्रण। कोदंड-धनुष। भूतेसं-महादेव।
१६४. जंपै-जपता है, स्मरण करता है। सुकियाअरथ-सफल। दिवस-दिन। सोय-वह। संभळ-समझ। दखै-कहता है। आाळजंजाळ-व्यर्थ।
१६५. दिनेसं-सूर्य। चवि-कह कर। नखत-नक्षत्र। म्रगाधिपं-मृगेन्द्र, सिंह। अवतं (स)-शिरोमणि। राजेसं-सम्राट।

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गाथा नांम गाहेणी
अख्यर ४७ गुरु १० लघु ३७
असमझ समझ अखीजै, तौ पण हरि नांम अवस जन तारत।
जिम परसत अजांणं, दगधत तन समथ्थ दावानळं।।१६६

गाथा नांम वसंत
अख्यर ४८ गुरु ९ लघु ३९
रघुबर सौ प्रभु तज कर औयण जे अवर अमर अभियासत।
त्रखित सुरसुरी तीरह, खिती कूंप खणत नर मूरख।।१६७

गाथा नांम सोभा
अख्यर ४९ गुरु ८ लघु ४१
अघ हर सुख कर अमळं, रट रट जस अघट भाग धन रघुबर।
गावण जिण फळ गहरं, बगै बलमी करिख बिसुधा।।१६८

गाथा नांम हरिणी
अख्यर ५० गुरु ७ लघु ४३
नित जप जप जगनायक, वायक सत कहण सुजस कमळावर।
सुकरत करण सदीवत, सोहत अै करत सत पुरसं।।१६९

गाथा नांम चक्कवी
अख्यर ५१ गुरु ६ लघु ४५
अह मत तज भज ईसर, करणाकर सधर सु तन दसरथ कौ।
यक छिन तन ऊधारण, रत कर चित्त चरण रघुबर रे।।१७०


१६६. असमझ-अज्ञानावस्था। समझ-ज्ञान, बुद्धि। अखीजै-कहा जाय। पण-भी। अवस-अवश्य। जन-भक्त। तारत-उद्धार करता है। परसत-स्पर्श करते हैं। अजांणं-भूल से। दगधत-जलाता है। समथ्थ-समर्थ। दावानळं-दावाग्नि।
१६७. सौ-जैसा। प्रभु-प्रभु, ईश्वर। औयण-चरण। अभियासत-अभ्यास करते हैं, स्मरण करते हैं। त्रखित-त्रषित, प्यासा। सुरसुरी-गंगा नदी। तीरह-तट। खिती-पृथ्वी। खणत-खोदता है।
१६८. अमळं-पवित्र। गहरं-गंभीर। बलमी-बलमीकि, बांबी। करिख-कर्षण कर। बिसुधा-पृथ्वी।
१६९. कमळावर-कमलापति, विष्णु। सुकरत-श्रेष्ठ कार्य, सुकृत्य। सदीवत-सदैव, नित्य। १७० अह-अभिमान, गर्व। मत-बुद्धि। करणाकर-करुणाकर, दयालु। यक-एक। छिन-क्षण।

— 81 —

गाथा नांम सारसी
अख्यर ५२ गुरु ५ लघु ४७
जन लज रखण जरूरह,
दसरथ सुत सकळ सुजन सुखदायक।
सिरदस घायक समहर,
सत वायक रांम सरसत सुभ।।१७१

गाथा नांम कुररी
अख्यर ५३ गुरु ४ लघु ४९
भुज-बळ खळ-दळ भंजण,
निज जन सुख करण सरण राखण नित।
कहत वरण कथ जग कर,
आपण दत लंक चित अपहड़।।१७२

गाथा नांम सिंघी
अख्यर ५४ गुरु ३ लघु ५१
असन वसन जळ अहनिस,
मत कर मन फिकर समर महमाहण।
पोखण भरण दिवस प्रत,
निज जन फिकर चित्त रघुनायक।।१७३

गाथा नांम हंसी
अख्यर ५५ गुरु २ लघु ५३
जगत जनक हरि जय जय,
भय जांमण मरण हरण कर निरभय।
‘किसन’ सुकव सिर धर कर,
रखण चरण सरण रघुनायक।।। १७४

दूहौ
विध यण गाथा वरणिया, सुजस रांम कथ सार।
विध कोई चूकौ वरणतां, सत किव पढ़ौ सुधार।।१७५


१७१. जरूरह-अवश्य। सिरदस-रावण। घायक-संहारक, नासक। समहर-युद्ध। वायक-वाक्य, शब्द।
१७२. आपण-देने वाला। दत-दान। लंक-लंका। अपहड़-उदार।
१७३. असन-भोजन। वसन-वस्त्र। अहनिस-रात दिन। महमाहण-विष्णु, ईश्वर। दिवस-दिन। प्रत-प्रति।
१७४. जांमण-जन्म। हरण-मिटाने वाला।
१७५ विध-विधि। यण-इस। किव-कवि।

— 82 —

अथ गाहा १ गाहू २ विगाहा ३ उगाहा ४ गाहेणी ५ सीहणो ६ खंधांणा ७। विचार लछण वरणण।
गाहा विगाहा लछण

छंद बेअख्यरी
गाहा१ मात्र सतावन गावै, गाहौ२ उलट विगाह गिणावै।
चौपन मत गाहू३ उचरीजै, उगाहौ४ मत्त साठ अखीजै।।१७६
गाहेणी५ बासठ मत गावत, कियां उलट सीहणी६ कहावत।
चौसठ मत खंधांण७ चवीजै, कळ विभाग यां पद-प्रत कीजै।।१७७

गाथा रै पद-प्रत मात्रा वरणण
आद बार मत दुवै अठारह, बार त्रतीय चव पनर विचारह।

विगाह पद-प्रत मात्रा
पद धुर बार दुवै पनरह पुण, तीयै बार अठार चवथ तिण।।१७८

गाहू पद-प्रत मात्रा
प्रथम बार मत्त पनर दुवै पद, वळ तिय बार पनर चौथै वद।

उगाहा पद-प्रत मात्रा प्रमांण
पहला बार अठार दुवै पढ़, तीजै बार अट्ठार चवथ द्रढ़।।१७९


१७६ मात्र-मात्रा। उचरीजै-कहिए। अखीजै-कहिए।
१७७ मत-मात्रा। कहावत-कहा जाता है। चवीजै-कहिए। पदप्रत-प्रति पद, प्रति चरण।
१७८. पद-चरण। धुर-प्रथम। बार-बारह। दुवै-दूसरे। पुण-कह। तीयै-तृतीय। चवथ-चतुर्थ।
१७९. वळ-फिर। तिय-तृतीय।

— 83 —

गाहेणी पद-प्रत मात्रा
आद बार अट्ठार दुतीय अख, सुज तिय बार बीस चोथै सख।

सींहणी पद-प्रत मात्रा
बाद आद दूसरै वीस बळ, कह तिय बार अठार चवथ कळ।।१८०

खंधांणा पद-प्रत मात्रा
मात्र बतीस च्यार तुक मांही, दोय गुरु पद अंत दियांही।
निज किव किसन कियां यम निरणै, बड कवि सीय रांम जस वरणै।।१८१

अथ गाथा अथवा गाहा उदाहरण
महकुळ धिन पित मातं, सौ घर न धन्य सुरग पित्रेसुर।
सौ धन भवन सकाजं, बासै जै दास रघुबर कौ।।१८२

अथ विगाहौ उदाहरण
करणी धन कौसळ्या, उदरे जिण रांम औतारं।
भण दसरथ बडभागं, जिण घर सुत रामचंद्र जग जेता।।१८३

अथ गाहू उदाहरण
सुखदाता सरणायां, निज संतां जानुकी नायक।
दस सिर भंज दुबाहं, राहं जग क्रीत राजेस्वर।।१८४

अथ उगाहौ
तूं जौ चाहै तरबौ, जप मत मन आंन आळ जंजाळं।
नित जप राघव नांमं, तिण पाथर नाव उदध कपि तारे।।१८५


१८० आद-आदि, प्रथम। दुतीय-द्वितीय। अख-कह। सुज-फिर। तिय-तृतीय। कळ-मात्रा।
१८१. मात्र-मात्रा। मांही-में, अंदर। यम-इस प्रकार
१८२. धिन-धन्य। पित-पिता। मातं-माता। सुरग-स्वर्ग। धन-धन्य।
१८४. सरणायां-शरण में आया हुआ। दुबाहं-वीर।
१८५. तरबौ-तैरना, उद्धार करना। आंन-अन्य। आळ जंजाळं-व्यर्थ का प्रपंच। पाथर-पत्थर। उदध-उदधि, सागर। कपि-बंदर।

— 84 —

अथ गाहिणी
तन घणस्यांम तराजं, तड़िता छिब भात पीत पीतंबर।
सुकर बांण सारंगं, सीता अंग बांम रांम भज नृप सिध।।१८६

अथ सीहणी
आखर बखत उचारै, जीहवा धन रांम नांम रट झट जौ।
पोखणतौ भर पायौ, भोजन अढार भांतचौ भरणौ।।१८७

अथ खंधांणा
दीन करण प्रतपाळ दासरथ, भारत खळदळ सबळ बिभंजे।
धनख धरण तन बरण नीरधर, रघुबर जनक सुता मन रंजे।।१८८
सूंदर रूप अनूप स्यांमता, अंजण नयण मुनी रिख अंजे।
तीनकाळदरसी व्है ततपुर, गौरव कांम क्रोध अध गंजै।।१८९

अथ एकसूं लगाय छवीस तांई गाथा काढण विध
दूहौ
गाथारा लघु आखिर गिणि, जां मझ एक घटाय।
आध कियांसूं ऊबरै, सोई नांम सुभाय।।१९०

अरथ
हरेक गाथारा लघु आाखिर गिणणा ज्यांमें सूं पेली तौ एक अखिर घटाय देणौ, पछै बाकी रहै ज्यांने दोय भागमांसू एक भाग परौ काढ्यां बाकी रहै अखिर जतरमौ गाहौ छै, यूं जांणणौ।


१८६. घण-घन, बादल। तराजं-समान। तड़िता-बिजली छिब-कांति-कांति, शोभा। भात-शोभा। सुकर-हाथ। बांण-तीर। सारंगं-धनुष।
१८७. आखर-आखिर, अंतिम। बखत-समय। जीहवा-जिव्हा, जीभ। पोखणतौ-पोषण करता हुआ।
१८८. दीन-गरीब। प्रतपाळ-पालन-पोषण। विभंजै-नाश किये। नीरधर-बादल। रंजे-प्रसन्न किया।
१८९. तीनकाळदरसी-त्रिकालदर्शी।
१९०. अखिर-अक्षर। जां-जिन। मझ-मध्य। आध-आधा। सोई-वही। ज्यां-जिन।

— 85 —

अथ गद्य छंद लछण विध
दूहौ
गद्य पद्य बे जगत में, जांण छंद की जात।
सम पद पद्य सराहजै, छूटक गद्य छ जात।।१९१
दवावैत फिर बात दख, जुगत वचनका जांण।
औछ अधक तुक असम अे, बीदग गद्य बखांण।।१९२

अथ दवावैत
माहाराजा दसरथ के घर रामचंद्र जनम लिया।
जिस दिन सै आसरू नै ऊदेग देवतूं नै हरख किया।
विसवामित्र मख-रख्या के काज अवधेस तैं जाच लिये।
माहाराजा दसरथ उसी बखत तईनाथ किये।
सात रोज निराहार एकासण सुनद्ध रहै।
रिखराजका जिगकी रछ्याकाज रजवाटका बिरद भुजदंडूं गहे।
सुबाहूकं बांण से छेद जमराज के भेट पुंहुंचाया।
मारीचके तांई वाय बांण से मार उडाया।
रज पायसे तारी गौतम की धरणी।
खंडपरसका कोदंड खंड कर जांनुकी परणी।


१९१. सम पद-यहां छंद-शास्त्रानुसार छंदों के नियम में बंधे हुए शब्द व वाक्य। सराहजै-सराहना कीजिए। छूटक-जिन पदों में छंद-शास्त्रानुसार नियम न हो, गद्य।
१९२. औछ-कम। अधक-अधिक। बीदग-विदग्ध, पंडित, कवि।
१९३. आसरू-असुर, राक्षस। ऊदेग-उद्वेग, चिंता। मख-रख्या-यज्ञकी रक्षा। जाच लिये-मांग लिये। तईनाथ-तैनात, किसी काम पर लगाया या नियुक्त किया हुआ। निराहार-बिना भोजन। एकासण-एक ही आसन या बैठक। सनद्ध-(संन्नद्ध) कटि-बद्ध। जिग-यज्ञ। रछ्या-रक्षा। रजवाट-क्षत्रियत्व, वीरता। बिरद-बिरुद। गहे-धारण किये। तांई-लिये। रज-धूलि। पाय-चरण। घरणी-स्त्री, पत्नी। खंड-परसका-खंडपरशु महादेवका। कोदंड-धनुष।

— 86 —

अवधकूं आते दुजराजकूं सुद्ध भाव किया।
जननी से सलांम कर सपूती का बिरद लिया।
ऐसा स्री रामचंद्र सपूतूं का सिरमोड़।
अरोड़ का रोड़।
गौ विप्रूं का पाळ।
अरेसूं का काळ।
सरणायूं-साधार।
हाथका उदार, दिलका दरियाव।
रजवाटकी नाव।
भूपूं का भूप साजोत का रूप।
काळवाच का सबूत।
माहाराज दसरथ का सपूत।
भरथ लछमण सत्रुघण का बंधु।
करुणा का सिंधु। १९३

वचनका
हांजी ऐसा माहाराजा रांमचंद्र असरण-सरण।
अनाथ नाथ बिरदकूं धारै।
सौ ग्राहकू मार न्याय ही गजराज कूं तारे।
और भी नरसिंघ होय प्रवाड़ा जगजाहर किया।
हरणाकुस कूं मार प्रहलाद कूं उबार लिया।
प्रळै का दिन जांण संत देस उबारण कूं मच्छ देह धारी।


१९३. जननी-माता। सलांम-प्रणाम। सपूती-सुपुत्र होने का भाव। अरोड़-वह जो किसी के बंधन या रोक में न रह सके। रोड़-रोक, बंधन। अरेसूं-अरीश, शत्रु। काळ-मृत्यु। सरणायूं-साधार-शरण में आने वाले की रक्षा करने वाला। साजोतका रूप-ज्योति-स्वरूप। काछवाचका सबूत-जितेन्द्रिय नियतात्मा और सत्य-संध। सिंधु-समुद्र।
१९४. असरण-सरण-जिसे कोई शरण न देने वाला हो उसे भी शरण देने वाला। प्रवाड़ा-महान् कार्य, चमत्कारपूर्ण कृत्य। हरणाकुस-हिरण्यकशिपु। प्रळै-प्रलय, नाश। मच्छ-मत्स्यावतार।

— 87 —

सतब्रत की भगती जगजाहर करी।
ऐसा स्रीरांमचंद्र करणानिध।
असरण-सरण न्याय ही वाजै।
जिसके तांई जेता बिरद दीजै जेता ही छाजै।।१९४

वारता
रांमचंद्र जिसा सिध रजपूत कोई वेळापुळ होवै छै।
ज्यांके प्रताप देव नर नाग खटब्रन सुख नींद सोवै छै।
राजनीत का निधांन सींह बकरी एक घाटै नीर पावै छै।
पंछी की पर बागां बाज दहसत खावै छै।
तप के प्रभाव पांणी पर सिला तरै छै।
भ्रगुपत सा त्रबंक ज्यांका बळ काढ़ सणंकसुधा करै छै।
बाळ दहकंधसा अरोड़ानूं रोड़ जमींदोज कीजै छै।
सुग्रीव भभीखण जिसा निरपखानूं केकंधा लंक दीजै छै।
जांका भाग धन्य जे रामगुण गावै छै।
जांमण मरण भय मेट अभैपद पावै छै।।१९५

दूहौ
असम चरण मात्रासु यम, कहीया छंद ‘किसन’।
राघव जस छंदां रहस, बुध सारीख. . . . . . . . . न।।१९६
इति मात्रा असम चरण छंद संपूरण।


१९४. करणानिध-करुणानिधि, दयासागर। तांई-लिए, निमित्त। जेता-जितने। छाजै-शोभा देते हैं, शोभित होते हैं।
१९५. जिसा-जैसा। सिध-सिद्ध, वीर। वेळा पुळ-समय, कभी। खटब्रन-षडवर्ण, ब्राह्मणादि छ जातिएँ विशेष। निधांन-खजाना। पर-पंख। बाज-शिकारी पक्षी विशेष। दहसत-भय, डर। सिला-पत्थर। भ्रगुपत-परशुराम। त्रबंक-विकट, बांकुरा अथवा त्र्यंबक, महादेव। बळ-गर्व। सणंकासुधा-बिलकुल सीधा। बाळ-बालि बंदर। दहकंध-दशकंधर, रावण। अरोड़ा-जबरदस्त। जमींदोज-जो गिर कर जमीन के बराबर हो गया हो, जमीन के अंदर। भभीखण-विभीषण। निरपखां-जिसका कोई पक्ष या सहायक न हो। केकंधा-(सं० किष्किंधा)-मैसूर के आसपास के देश का प्राचीन नाम। जांका-जिनके। जांमण-जन्म। अभैपद-मोक्ष।
१९६. यम-ऐसे। रहस-रहस्य, भेद।

— 88 —

अथ मात्रा दंडक छंद वरणण

दूहौ
भगवत गीताऊ भणै, बीता अघ सरबेण।
सीता नायक संभरै, जन भीता नह जेण।।१९७

सोरठौ
पेट हेक कज पात, मेट सोच सांसौ म कर।
रे संभर दिन-रात, नांम विसंभर नारियण।।१९८

अथ मात्रा दंडक छंद लछण

दूहौ
बे छंदां मिळ छंद व्है, मात्रा दंडक सोय।
छप्पे कुंडळियौ कवित्त, फिर कूंडळिया होय।।१९९

अथ छप्पै लछण

दूहौ
कायब उल्लालौ मिळै, छप्पै तिण थळ होय।
ग्यार तेर मत च्यार पय, पनर तेर पय दोय।।२००

छप्पै उदाहरण

कवित छप्पै
पंखी मुनि मन पंख, तीर भव-सिंधु तरायक।
मुकत त्रिया सुख मूळ, स्रवण ताटंक सुभायक।।


१९७. भणै-कहते हैं। बीता-व्यतीत हो गये। अघ-पाप। सरबेण-सब, समस्त। संभरै-स्मरण कर। भीता-भयभीत। जेण-जिससे।
१९८. पेट हेक कज-एक पेट के लिए। पात-पात्र, कवि। सोच-चिंता। सांसौ-संशय, शक। संभर-स्मरण कर। विसंभर-विश्वंभर, ईश्वर। नारियण-नारायण।
१९९. सोय-वह।
२००. कायब-काव्य, काव्यछंद। थळ-स्थान। मत-मात्रा। पय-चरण।
२०१. पंखी-पक्षी। तीर-तट, किनारा। भवसिंधु-संसार रूपी समुद्र। तरायक-तैरने वाला। मुकत-मुक्ति। स्रवण-कान। ताटंक-कर्ण-भूषण। सुभायक-सुन्दर।

— 89 —

अघ कळ घोर अंधार, बिंब रवि चंद्र बिकासण।
प्रगट धरम द्रुम उभय यम स्रुति नयण सुभासण।।
बद ‘किसन’ रकार मकार बिंहु, सत रथ चक्र समाथका।
भव जन तमांम कारक अभय, नांम अंक रघुनाथका।।२०१

अजय नांम छप्पै लछण
दूहौ
बिध यकहत्तर छपय बद, सतर गुरु लघु बार।
अजय जिकौ गुरु घट बधै, बेलघु नांम निहार।।२०२

अजय छप्पै उदाहरण
छप्पय
जै जै भूपां भूप, सदा संतां साधारै।
दीनां दाता देव, मेछ आनेकां मारै।।
सीता स्वांमी सूर, बीर बागां बांणासां।
लंका जैहा ले’र, दांन देणौ तूं दासां।।
सेहाई संतां सेवगां, ताई देणा तापरां।
औनाड़ा राघौ भू अखै, पांणां धाड़ा आपरां।।२०३

अथ यकहतर छप्पै नांम कथन
छप्पै
अजय १ बिजय २ बळ ३ करण ४,
बीर ५ वैताळ ६ व्रहंजळ ७।
मरकट ८ हरि ९ हर १० ब्रहम ११,
इंद १२ चंदण १३ सुभकर १४ वळ।


२०१. अघ-पाप। कळ-समूह, कलियुग। बिब-प्रतिबिंब। भव-संसार। कारक-करने वाला।
२०३. साधारै-रक्षा करता है। मेछ-म्लेच्छ असुर। आनेकां-अनेक। सूर-सूरवीर। बागां-बजने पर, चलने पर। बांणासां-तलवारों। जैहा-जैसा। दासां-भक्तों। सेहाई-सहायक। ताई-आततायी, दुष्ट। ताप-कष्ट। औनाड़ा-वीर। पांणां-हाथों। धाड़ा-धन्य-धन्य।

— 90 —

स्वांन १५ सिंघ १६ सादूळ १७,
कूरम १८ कोकिल १९ खर २० कुंजर २१।
मदन २२ मछ २३ तालंकर २४,
सेस २५ सारंग २६ पयोधर २७।
कह कुंद २८ कमळ २९ बारण ३० सरभ ३१,
जंगम ३२ जुतिस्ट ३३ बखांण जग।
दाता ३४ सर ३५ सुसरह ३६ समर ३७ दख,
सारस ३८ सारद ३९ कह सुभग।।२०४

फेर नांम
छप्पै
मेर ४० मकर ४१ मद ४२ सिद्ध ४३,
बुद्धि ४४ करतळ ४५ कमळाकर ४६।
धवळ ४७ सुमण ४८ फिर मेघ ४९,
कनक ५० क्रस्णह ५१ रंजन ५२ धर।
ध्रुव ५३ ग्रीखम ५४ गरुड़ह ५५,
गिणा (य) ससि ५६ सूर ५७ सल्य ५८ सख।
नवरंग ५९ मनहर ६० गगन ६१,
रतन ६२ नर ६३ हीर ६४ भ्रमर ६५ अख।
सेखर ६६ कुसम ६७ कहि दीप ६८ संख ६९,
बसु ७० सबद ७१ बाखांणीये।
कवि छपय नांम जसराम कज,
जग यकहतर जांणीये।।२०५

— 91 —

१. अजय-अ० ८२ गु० ७० ल० १२।
२ विजय-अ० ८३ गु० ६९ ल० १४।
३. बल-अ० ८४ गु० ६८ ल० १६।
४. करण-अ० ८५ गु० ६७ ल. १८।
५. बीर-अ० ८६ गु० ६६ ल० २०।
६. बैताल़ — अ० ८७ गु० ६५ ल० २२।
७. ब्रहंजल-अ० ८८ गु० ६४ ल० २४।
८. मरकट-अ० ८९ गु० ६३ ल० २६।
९. हरि-अ० ९० गु० ६२ ल०२८।
१०. हर अ० ९१ गु० ६१ ल० ३०।
११ ब्रहम-अ० ९२ गु० ६० ल० ३२।
१२ इंद-अ० ९३ गु० ५९ ल० ३४।
१३. चंदण-अ० ९४ गु० ५८ ल० ३६।
१४ सुभकर-अ० ९५ गु० ५७ ल० ३८।
१५. स्वांन-अ० ९६ गु० ५६ ल० ४०।
१६. सिंघ-अ० ९७ गु० ५५ ल० ४२।
१७ सारदूल़-अ० ९८ गु० ५४ ल० ४४।
१८. कूरम-अ० ९९ गु० ५३ ल० ४६।
१९. कोकिल-अ० १०० गु० ५२ ल० ४८।
२०. खर-अ० १०१ गु० ५१ ल० ५०।
२१. कुंजर-अ० १०२ गु० ५० ल० ५२।
२२ मदन-अ० १०३ गु० ४९ ल० ५४।
२३. मछ अ० १०४ गु० ४८ ल० ५६।
२४. तालंक-अ० १०५ गु० ४७ ल० ५८।
२५ सेस- अ० १०६ गु० ४६ ल० ६०।
२६. सारंग-अ० १०७ गु० ४५ ल० ६२।
२७. पयोधर-अ० १०८ गु० ४४ ल० ६४।
२८. कुंद-अ० १०९ गु० ४३ ल० ६६।
२९ कमल़-अ० ११० गु० ४२ ल० ६८।
३०. बारण-अ० १११ गु० ४१ ल० ७०।
३१. सरभ-अ० ११२ गु० ४० ल० ७२।
३२. जंगम-अ० ११३ गु० ३९ ल० ७४।
३३ जुतिष्ट-अ. ११४ गु० ३८ ल० ७६।
३४. दाता – अ० ११५ गु० ३७ ल० ७८।
३५ सर- अ० ११६ गु० ३६ ल० ८०।
३६ सुसर (सुस्सू)-अ० ११७ गु० ३५ ल० ८२।
३७ समर (व्रद्ध नाळीक जात)-अ० ११८ गु० ३४ ल० ८४।
३८. सारस-अ० ११९ गु० ३३ ल० ८६।
३९. सारद (ईंने वळता संख कैवै छै)-अ० १२० गु० ३२ ल० ८८।
४० मेर- १२१ गु० ३१ ल० ९०।
४१. मकर- अ० १२२ गु० ३० ल० ९२।
४२. मद – अ० १२३ गु० २९ ल० ९४।
४३. सिंघ-अ० १२४ गु० २८ ल० ९६।
४४. बुद्धि-अ० १२५ गु० २७ ल० ९८।
४५. करतल़ (मुगता ग्रह)-अ० १२६ गु० २६ ल० १००।
४६. कमलाकर-अ० १२७ गु० २५ ल० १०२।
४७. धवल़-अ० १२८ गु० २४ ल० १०४।
४८. सुमण-अ० १२९ गु० २३ ल० १०६।
४९. मेघ-अ० १३० गु० २२ ल० १०८।
५०. कनक (कमळबंध अंत नगण सरवत्र)-अ० १३१ गु० २१ ल० ११०।
५१. क्रष्ण अ० १३२ गु० २० ल० ११२।
५२ रंजन-अ० १३३ गु० १९ ल० ११४।
५३. ध्रुव-अ० १३४ गु० १८ ल० ११६।
५४. ग्रीखम (ग्रीष्म)-अ० १३५ गु० १७ ल० ११८।
५५. गरुड़ (ईं कवित को नांम समवळति विधांन कहै छै)-अ० १३६ गु० १६ ल० १२०।
५६. ससि-अ० १३७ गु० १५ ल० १२२।
५७. सूर-अ० १३८ गु० १४ ल० १२४।
५८. सल्य (शल्य)-अ० १३९ गु० १३ ल० १२६।
५९. नवरंग– अ० १४० गु० १२ ल० १२८।
५९ नवरंग-अ० १४० गु० १२ ल० १२८।
६० मनहर (मनोहर)-अ० १४१ गु० ११ ल० १३०।
६१ गगन-अ० १४२ गु० १० ल० १३२।
६२ रतन-अ० १४३ गु० ९ ल० १३४।
६३ नर-अ० १४४ गु० ८ ल० १३६।
६४ हीर-अ० १४५ गु० ७ ल० १३८।
६५ भ्रमर-अ० १४६ गु० ६ ल० १४०।
६६ सेखर-अ० १४७ गु० ५ ल० १४२।
६७ कुसम (ईंकौ नांम जातासंख कैवै छै)-अ० १४८ गु० ४ ल० १४४।
६८ दीप-अ० १४९ गु० ३ ल० १४६।
६९ संख-अ० १५० गु० २ ल० १४८।
७० वसु-अ० १५१ गु० १ ल० १५०।
७१ सब्द-अ० १५२ गु० ० ल० १५२।

— 92 —

अथ छप्पै नांम काढण विध।

छप्पै रा लघु आखर व्है ज्यां में सूं दस घटाय दोय भाग करणा, एक भाग घटायां बाकी रहै जतरमौ छप्पै छै।

अथ अजयादिक यकहत्तर छप्पै नांम काढण विध।

दूहा
गिण छप्पयंचा बरण लघु, त्यां मज्झे दळ टाळ।
आधा कीधां ऊबरै, वेडर नांम वताळ।।२०६

इति यकहत्तर विध छप्पय अख्यर गुरु लघु प्रमांण नांम कथन संपूरण।
सुभं भवतु

अथ मात्रा छंद, मात्रा उपछंद, मात्रा असम चरण, मात्रा दंडक छंद गुरु लघु काढण विध।

अथ दूहौ
पूछै अन कवि छंद पढ़ि, गिण जिण मत्त प्रमांण।
घटै स गुरु कह गुरु घटै, सेख रहै लघु जांण।।२०७

अरथ

पैला कवेस्वर दूहौ पढे नै कहै–यण में गुरु कितरा, लघु कितरा सौ कहौ। जठे दूहा री सरब मात्रा अड़तालीस गिणणी, पड़ताळीस में घटै जतरा गुरु अखर जांणणा नै गुरु हुवै सौ घटायां बाकी रहे सौ लघु जांणणा। यूं सरब मात्रा छंद गीत कवितादिक जांणणा।


२०५. ज्यांमें सूं-जिनमें। जतरमौ-उतना। यकहत्तर-इकहत्तर।
२०६. वेडर-निर्भय। बताळ-बतला।
२०७. काढण-निकालने। अन-अन्य। सेख-शेष। पैला-प्रथम। कवेस्वर-कवीश्वर। यण-इस। कितरा-कितने। जतरा-उतने, जितने। यूं-इस प्रकार।

— 93 —

उदाहरण
दूहौ
रे चित व्रत द्रढ़ एम रख, मूरत सांम मझार।
मेल्ह सुरत नट वांसमें, प्रगट वरत व्है पार।।२०८

अरथ

इण दूहा रा अड़तीस अखिर छै, नै दूहौ छंद अठताळीस मात्रा रौ व्है छै। अठताळीस मांहा सूं दस अखिर गिया जद अड़तीस रहया।
सौ ईं दूहा में दस गुरु आखिर छै, नै अड़तीस मांसूं दस गुरु आखिर घटाया जद अठाईस रहया, सौ अठाईस आखिर लघु छै, यूं समस्त मात्रा छंद जांणणा।

दूहौ
वळ अह-पिंगळ कवितरी, वदी जात बावीस।
तवूं नांम सारा तिकै, वळ नोखा वरणीस।।२०९

अथ बावीस छप्पै नांम
कवित छप्पै
वळता १ जाता संख २ कमळबंधह ३ समबळ ४ कह।
लघु ५ वृद्धनाळीक ६ छत्र ७ नीसरणीबंधह ८।।
नाट ९ चोप १० संकळह ११ अनै मुगताग्रह १२ अक्खव।
कुंडळियौ १३ चौटियौ १४, वेध-हीरा १५ कर-पल्लव १६।।
एक-लवयण १७ मज्झ अक्खरौ १८,
विधांनीक १९ हल्लव २० विहद्द।
ताळूर-व्यंव २१ हरेअळग २२,
वीस दोय छप्पय सुवद।।२१०


२०८. एम-इस प्रकार। मूरत-मूर्ति। सांम-श्याम, स्वामी, श्रीरामचंद्र भगवान। मकार-मध्य, में। मेल्ह-रख। सुरत-ध्याव। वरतन-वस्त्र, चमड़े का मोटा रस्सा।
२०९. वळ-फिर। अह-पिंगळ-नागराज पिंगल, शेषनाग। वदी-कही। तवूं-कहता हूँ। तिकै-वे
२१०. २२ छप्पय कवित्तों के नांम–१. वळता (वळता-संख), २ जाता संख, ३. कमळबंध ४. समवळ (समवळ विधान अथवा समवळ विधांनीक), ५. लघुनाळीक, ६. ब्रद्धनाळीक, ७. छत्रबंध, ८. नीसरणी-बंध, ९. नाट, १०. चोप, (मतांतर से चोपई, छप्पै, कवित), ११. संकळ (संकळजात), १२. मुकताग्रह, १३. कुंडळियो, १४. चौटियो (चौटीबंध), १५. वेधहीरा (हीराबेधी) १६. करपल्लव। १७. एकळवयण (हेकलवयण), १८. मज्झअखरौ, १९. विधांनीक, २०. हल्लव, २१. ताळ रब्यंब, २२. अहरेअळग (अहरअळग)।
नोट-उपर्युक्त २२ ही छप्पय कवित कवि ने आगे इसी क्रम से नहीं दिये हैं।

— 94 —

अथ अनुक्रम से छप्पै नांम
दूहा
वळता १ जाता २ संख लघु ३ ब्रद्ध-नाळीक ४।
समवळ ५ नाट ६ चौटियौ ७, ताळ व्यंव ८ तहतीख।।२११
चोप ९ हल्लव १० कवीत ए, दिया नाग दरसाय।
यकहतरसं अधिक कहि, कीधी जुगत न काय।।२१२
कर विचार मनहूं कहूं, वरणण सुद्ध वणाय।
तगसीरी छिम जोतका, ‘किसन’ कहै कविराय।।२१३

उक्त छप्पै
दूहा
कमळ १ छत्रबंधह २ कवित, निसरणीबंध ३ नांम।
मुगताग्रह ४ करपल्लवी ५, तव कुंडळियौ ६ ही तांम।।२१४
हीरावेधी ७ हिक वयण ८, मझ अखिरौ ९ विधान १०।
अहरअळग ११ संकळयता १२, मुणिया नाग सुमांन।।२१५
द्वादस छपय अह दखे, जुगत रूप सुध जांण।
बावीसह छप्पय वदूं, वरणे रांम वखांण।।२१६


२११. यकहतर-इकहत्तर। कीधी-की। जुगत-युक्ति।
२१२. काय-कुछ। तगसीरी-तकसीर, कमी। छिम-क्षण, क्षीण।
२१३. तव-कह।
२१४. मुणिया-कहे। नाग-नागराज पिंगल, शेषनाग।
२१६. बदूं-कहता हूँ। वखांण-यश, कीर्ति।

— 95 —

अथ समवळ विधांन छप्पै मात्रा वरण लछण
दूहौ
याद अंत छप्पय नगण, गुरु पनरहै उगुणीस।
यक सौ सैंतीसह अखर, बद लघु सौ बावीस।।२१७

अरथ

छ ही चरण के आद अंत नगण आवै, एक सौ सैंतीस सरब अखिर। पनरै गुरु अखिर होवे, लघु अखिर एक सौ बावीस होवै अर उपमे उपमांन कौ सम भाव वरणै सौ समवळ विधांन कवित छप्पै।

दूहौ
जिणमें समता वरणजै, उपमे अर उपमांन।
जांणौ छप्पे अह जपै, सौ सम वळह विधांन।।२१८

समबळ विधांन छप्पै उदाहरण
नयण कंज सम निपट, सुभग आंगण हिमकर सम।
जप सम ‘ग्रीवह’ जळज, तवत सम हीर डसण तिम।।
अधर ब्यंब सम अरुण, समह भुज नागरौ जसख।
सिल समांन उर समर, अथघ सम स्यंध उदर अख।।
कह सम मयंद अतछीण कट, जयत खंभ रिण सुपय जिम।
समवळ विधांन खटपद ‘किसन’, सुज राघव रवि कोट सम।।२१९

जाता संख लछण दूहौ
रस स्यंगार य हासरस, बिच जिण कवित बखांण।
जाता संख जिणनुं कहै, वरणव रांम वखांण।।२२०


२१७ उगणीस-उन्नीस।
२१८. समता-समानता, सादृश्य। उपमे-उपमेय, जिसकी उपमा दी जाय, वर्णनीय। उपमांन-वह पदार्थ जिससे किसी दूसरे पदार्थ को उपमा दी जाय। अह-शेषनाग।
२१९. कंज-कमल। सम-समान। निपट-अत्यन्त। सुभग-सुंदर। आंणण-आनन, मुख। हिमकर-चंद्रमा। जळज-शंख। हीर-हीरा। डसण-दाँत। अधर-ओष्ट। व्यंब-बिंब। अरुण-लाल। समह-समान। नागरौ-हाथी का। समर-युद्ध। अथघ-अपार। स्यंध-सिंधु। मयंद-सिंह। छीण-क्षीण। कट-कटि, कमर। खंभ-स्तंभ। सुपय-चरण, पैर। खटपद-छप्पय।
२२०. स्यंगार-श्रृंगार। हास रस-हास्यरस। वखांण-वर्णन। वरणव-वर्णन कर। वखांण-यश, कीर्ति।

— 96 —

जाता संख छप्पै उदाहरण हास्यरस
सगर सुतण जिग करत, अगत हकनाहक दीनी।
वर करतां सुपनखा, कांन नासा विण कीनी।।
जाचंतां निज रूप, कियौ नारद मुख बंदर।
त्यागी सौळ हजार, घाल कुबज्या घर अंदर।।
कैळासे नरग उधार कीय, अजामेळ उतावळां।
आदेस करै ‘किसनौ’ अनंत, राघव कौतक रावळां।।२२१

अथ वळता संख छप्पै लछण
दूहौ
वदीस तुक पाछी वळै, पर लाटानुप्रास।
वळता संख बखांणजै, सकौ कवित सर रास।।२२२

अरथ

पैली कही सौ तुक फेर पाछी कहै, लाटानुप्रास अलंकार ज्यूं तथा सीह चला गीत ज्यूं सौ वळता संख कवित तुकां पाछी वळै जींसूं।

अथ वळता संख उदाहरण
कवित छप्पै

जिण भजियौ जगदीस, जिकौ जमहूंत न भजियौ I
नह तजियौ रघुनाथ, तेण म्रत जांमण तजियौ।।
निज लीधौ हरि नाम, जिकण जम नांम न लीधौ।
तिण नंह अम्रत त्रखा, रांम नांमांम्रित पीधौ।।


२२१. सुतण-सुत, पुत्र। जिग-यज्ञ। अगत-अधोगति। हकनाहक-व्यर्थ। दीनी-दी। वर-पति। नासा-नाक। विण-बिना, रहित। कीनी-की। केळा-क्रीड़ा, खेल। नरग-नरक। ऊतावळां-शीघ्रता करने वालों। आदेस-नमस्कार। अनंत-विष्णु, ईश्वर। कौतक-कौतुक, खेल, क्रीड़ा। रावळां-आपके।
२२२. वदीस-कही जाती। वळै-फिर। वखांणजै-वर्णन कीजिये। सकौ-वह। ज्यूं-जैसे। जींसूं-जिससे।
२२३. जिण-जिस। भजियौ-भजन किया, स्मरण किया। जिकौ-वह। जमहूंत-यमराज से। भजियौ-भागा। म्रत-मृत्यु। जांमण-जन्म। लीधौ-लिया। जिकण-जिसका। त्रखा-तृषा, प्यास। नांमांम्रित-नाम रूपी अमृत। पीधौ-पिया।

— 97 —

नर च्यार असी नाचै निकूं, निज हरि आगळ नाचियौ।
जाचणौ जिकां रहियौ न जग, ज्यां रघुनायक जाचियौ।।

अथ संकल़ जात छप्पै लछण
एक सबदकी तेवड़ी, व्है आवरत विसेस।
कहियौ अह तिण कवितरौ, संकळ नांम कवेस।।२२४

सांकळ कवित उदाहरण
छप्पै
पूर अपूरिय आस, तौ पिण उमरथी पूरिय।
हाथ जुड़त तिल चढ़ न, हाथ डुळ हाथ हजूरिय।।
दिल ऊजळ नर उजळ, लखिन ऊजळ सिर लेखीय।
दौलत दौलत मिलि न, लगी दो लत द्रिढ़ लेखीय।।
कवि क्रिस्ण क्रिस्ण चित दुरन किय, क्रस्ण जगत देखीय कपट।
रे रांम मंत्र रट रांम रट, रांम रांम रट रांम रट।।२२५

कमळबन्ध लछण
दूहौ
द्वादस दळ द्वादस तुकां, अखर एक तुक अंत।
सौ अधबिच तुक चौतरफ, कमळबंध स कहंत।।२२६


२२३. आगळ-अगाड़ी, अग्र। जाचणौ-याचना। जिकां-जिनको।
२२४. तेवड़ी-तीन वार। आवरत-आवृति।
२२५. पूर-पूर्ण। अपूरिय-अपूर्ण। पिण-भी। दौलत-परिभ्रमण। दौलत-धन, संपत्ति। लेखीय-समझिये।
२२६. द्वादस-बारह। दळ-फलों की पंखड़ी। सौ-वह। अधबिच-ठीक मध्य में। चौतरफ-चारों ओर। -वह। कहंत-कहा जाता है।

— 98 —

कमळबंध उदाहरण
कौसळ्या सुख करण, नेत-बंध दसरथ नंदण।
व्रत खित्रवट निरवहण, दुसट ताड़का निकंदण।।
रिण सुबाह संघरण, असुर मारीच उडावण।
रज पै अहल्या तरण, संत जम त्रास छुडावण।।
ब्रत जनक राख सीताबरण, धांनुखभंजण जटधरण।
मुण ‘किसन’ सुजस रघु-बंस-मण, सीतापत असरण सरण।।२२७


२२७. नेत-बंध-अपना निज का भंडा या ध्वजा रखने वाला, वीर। नंदण-पुत्र। ब्रत-वृत, आचार। खित्रवट-क्षत्रियत्व, वीरता, शौर्य। निरवहण-वहन करने वाला, धारण करने वाला, निभाने वाला। निकंदण-संहार करने वाला, मारने वाला। रिण-युद्ध। संघरण-संहार करने वाला, मारने वाला। रज-धूलि। पै-चरण, पैर। तरण-उद्धार करने वाला। जम-यम, यमराज। त्रास-भय, डर। ब्रत-प्रण। सीताबरण-सीतापति, श्रीरामचंद्र। धांनुख-धनुष। भंजण-तोड़ने वाला। जटधरण-महादेव। मुण-कह, वर्णन कर। रघु-वंस-मण-रघुवंशमणि। सीतापत-सीतापति।

— 99 —

अथ छत्रबंध छप्पै लछण
दूहौ
सरब कवित कौ अरथ सौ, अंत चरण आभास।
आद अखर तुक नीसरै, जपै छत्रबंध जास।।२२८

छत्रबंध उदाहरण

छप्पै
कह सेवा की कहै १ ?, नांम परजंक कवण भण २ ?।
अख के मासां अयन ३ ?, नांम की सिंभ जयौ जिण ४ ?।।
कहजै देवां किसूं ५ ?, महत आदरैन केनू ८ ?।
दूधां सिंघ कुण दूध ७ ?, मित्र दाखत कीजै नूं ८ ?।।
रिप पंड कवण कह नांम जिण ९ ? संतां तार सुरेस के।
किव ‘किसन’ छत्रबंधह कवित, ओप छत्र अवधेस कै।।२२९


२२९. परजंक-पर्यंक, पलंग। कवण-क्या। भण-कहै। अख-कहै। के-कितने। अयन-सूर्य अथवा चंद्र की उत्तर दक्षिण की ओर गति या प्रवृत्ति जिसको उत्तरायण और दक्षिणायन भी कहते हैं। जयौ-जीता। रिप-शत्रु। पंड-पंडव। कवण-कौन। सुरेस-इंद्र।
नोट-१ ओयण (चरण)। २ पलंग। ३ छ मासां। ४ त्रपुर। ५ अमर। ६ वडाई। ७ धेनकौ। ८ सजण। ९ कैरव। इन शब्दों के आदि अक्षर के पढ़ने से ‘ओप छत्र अवधेस कै’ इस तुक का छत्रबंध बनता है।

— 100 —

अथ मझ अखिरा छप्पै लछण
दूहौ
कवित अरथ बाहर लिखै, अखिर मझ विचार।
और जठै प्रगटै अरथ, सौ मझ अख्यर धार।।२३०

अथ मझ अखिरा छप्पै उदाहरण
स्वाद मीठा कह किसौ १ ?, किसूं मूरखनूं कहजै २ ?।
की कह भ्रात कनेठ ३ ?, नांम रेखा की लहजै ४ ?।।
कहै धरानूं कसूं ५ ?, रंक किण नांम जितूं कह ६ ?।
मंदभाग की मुणे ७ ?, ठहै तारा किया ठांमह ८ ?।।
रघुनाथ भगौ की जनकघर ९ ?,
भल बुध किसूं भणीजियै १० ?।
कवि ‘किसन’ कवित मझ अख्यिर कह,
जस रघुनाथ जपीजिये।।२३१

अथ लघुनाळीक छप्पै लछण
दूहौ
अखर अठारह चरण चव, बे चरणां बावीस।
कवित लघु नाळीक कहि, बरणत सरब कवीस।।२३२

अथ लघुनाल़ीक छप्पै
तिण मारी ताड़का, जिकण रिख मख रखवाळे।
हरण सुबाह मारीच, पैज खित्रवट ध्रंम पाळे।।
नग रज गौतम नार, जेण उधरी जग जांणै।
धनुख भंज सीय बरी, प्रथी भुज जोर प्रमांणै।।
रे अधम समझ मुख नांम रट, सीत-बर समराथ कौ।
कह जीहहूंत ‘किसना’ कवी, नितप्रत जस रघुनाथ कौ।।२३३


२३०. जठै-जहां। प्रगटै-प्रकट होता है। अख्यर-अक्षर।
२३१. मोठ-मीठा। किसौ-कौनसा। किसूं-क्या। की-क्या। कनेठ-कनिष्ठ। धरा-अवनी, पृथ्वी। जितूं-जीता। मंद भाग-अभाग्य। मुणै-कहते हैं। ठहै-ठहरते हैं। ठांमह-स्थान। भगौ-तोड़ा। अख्यिर-अक्षर।
नोट-१ मिश्रीको। २ अजांण। ३ अनुज। ४ लकीर। ५ अवन। ६ मल्लको। ७ अभागी। ८ गयण। ६ धनख। १० सुमत। इनके मध्याक्षर के पढ़ने से श्री जांनुकी वल्लभाय नाम बनता है।
२३२. अखर-अक्षर। चव-चार। बे-दो।
२३३. तिण-जिस, उस। जिकण-जिस। रिख-ऋषि। मख-यज्ञ। रखवाळै-रक्षा की। हण-मार कर। पैज-मर्यादा, नियम आचरण। खित्रवट-क्षत्रियत्व, वीरता, शौर्य। ध्रंम-धर्म। पाळे-पालन किया। नग-चरण। रज-धूलि। नार-नारी, स्त्री। जेण-जिस। अधम-नीच, पतित। सोत-बर-सीतावर, श्री रामचंद्र भगवान। समराथ कौ-समर्थ का। जीहहूंत-जिह्वा से। नितप्रत-नित्य प्रति।

— 101 —

अथ ब्रधनाळीक छप्पै लछण
दूहौ
उगणीसह चव पद अखिर, अकवीसह बे औण।
कवित ब्रधनाळीक कवि, भणै नाग त्रय-भौण।।२३४

अथ ब्रधनाल़ीक छप्पै उदाहरण
जिण राघव जापियां, थरू घर नवनिध थावत।
जिण राघव जापियां, प्रसध ईजत नर पावत।।
जिरा राघव जापियां, सुलभ भवसागर तरसी।
जिण राघव जापियां, सरब मन कारज सरसी।।
जापियां जेण रघुबर सुजस, धरै ऊंच विरदां धरा।
तैं नांम जोड़ नां ज्याग तप, नित राघव जप जप नरा।।२३५

अथ निसरणीबंध छप्पै लछण
दूहौ
एक दोय त्रण ऐण क्रम, छप्पय करै वखांण।
गत जिम चढजे गातियां, निसरणीबंध जांण।।२३६


२३४. अकवीसह-इक्कीस। बे-दो। औण-चरण। त्रय-भौण-त्रिभुवन।
२३५. जिण-जिस। जापियां-जपने या भजन करने पर। थरू-स्थिर। नवनिध-नवनिधि। थावत-हो जाती है। प्रसध-प्रसिद्धि। पावत-प्राप्त करता है। भवसागर-संसार रूपी समुद्र। कारज-कार्य, काम। सरसी-सफल होंगे, सिद्ध होंगे। जेण-जिस। विरद-विरुद, कीर्ति। तै-उस, उसके। जोड़-समान, बराबर। नां-नहीं। ज्याग-यज्ञ।
२३६. गत-प्रकार, तरह। गातियां-काष्ट या लोह की बनी निश्रेणी के बीच-बीच में लगे वे डंडे जिन पर पैर रख-रख कर चढ़ते व उतरते हैं, पांवदान।

— 102 —

अथ निसरणीबंध छप्पै कवित उदाहरण
एक रमा अहनिसा, दोय रवि चंद त्रिगुण दख।
च्यार वेद तत पंच, सुरत छह सपत सिंध सख।।
आठ कुळाचळ अनड़, नाग नव नाथ निरंतर।
दस द्रिगपाळ दुबाह, रुद्रह एकदस सर तर।
सझ सझ उमंग बारह सघण, बिसुध चित्त कायक बयण।
तेरहा भांण पय रांमतौ, भल सेवै चवदह भुयण।।२३७

अथ नाट नांम छप्पै लछण
दूहौ
नाट सबद जिण कवित में, आद अंत लग होय।
नाट नांम तिणनूं कहै, सुकव महा-मत सोय।।२३८

अथ नाट छप्पै उदाहरण
लाभ नहीं अहलोक, नहीं परलोकह निरभय।
सुमति नहीं ज्यां स्यांन, खांत ज्यां नहीं पाप खय।।
जीवण सुख नहिं जिकां, नहीं ज्यां मुवां मुकत निज।
नहीं जिके नहच्यंत, कदे ज्यां नहीं सरै कज।।
निकलिंक बांण ज्यांरी नहीं, दसा नहीं सुभ ज्यां दपै।
ज्यां नहीं सफळ मनखा जनम, जिके नहीं रघुबर जपै।।२३९


२३७. अहनिसा-रात-दिन। रवि-सूर्य। चंद-चंद्र। दख-कह। तत-तत्त्व। पंच-पांच। सपत-सात। सिंध-समुद्र। कुळाचळ-आठ पर्वतों का समूह, मतांतर से सात पर्वतों का समूह, कुलपर्वत। अनड़-पर्वत। द्रिगपाळ-दिकपाल। दुबाह-महान, दृढ़। उमंग-तरंग, इच्छा। सघण-घन, बादल। पय-चरण। भल-ठीक, श्रेष्ठ। भुयण-भवन।
२३८. नाट-नहीं, नहीं अर्थ का शब्द। महा-मत-महामतिवान। सोय-वह।
२३९. अहलोक-इह लौक, इस संसार में। सुमति-श्रेष्ठ मति। स्यांन-बुद्धि। खांत-विचार। ज्यां-जिन। खय-नाश। मुकत-मुक्ति, मोक्ष। नहच्यंत-निश्चित। कज-काम। दपै-शोभायमान होती है। मनखा जनम-मनुष्य जन्म।

— 103 —

अथ चौपई नांम छप्पै लछण
दूहौ
बीस बीस चोपद बरण, दोय बीस दो पाय।
चोप किवत जिण चोपसुं, रटीयौ पनंगांराय।।२४०

अथ चौपई छप्पै उदाहरण
चोप अरच हरि चरण, चोप फिर रे परदछण।
चोप करे करजोड़, जनम सरजत आगळ जण।।
चोप करे चित बीच, नांम सिर अगर सु नर हर।
चंनण घस जुत चोप, कमळ त्यूं तिलक चोप कर।।
अत चोप भजन सी-वर उचर, ध्यांन हृदय जुत चोप धर।
कवि चहै चोप रघुराज कौ, कर कर चोप स भजन कर।।२४१

अथ मुकताग्रह नांम छप्पै लछण
दूहौ
आद अंत तुकरै झमक, अरथ अवर उर आंण।
गूंथ मुकत जिम छपय गत, मुगता ग्रह परमांण।।२४२

अथ मुकताग्रह कवित उदाहरण
भव ब्रह्मा जिण भजै, भजै तिण नांम पाप भर।
भर टाळण सह भूम, भूम-पतन कौ जेण सर।।
सर धनुं धार समाथ, माथ दस भंज समर मह।
मह राखण मुरजाद, जादपत पब्बै तार जह।।
जह दुसह पाळ जन सांमरथ, रथ खगेस मारुत सजव।
सज मख सिहाय भंजण सुभुतज, भज रघुबर तर उदध भव।।२४३


२४०. चोपद-चार पद या चरण। बरण-अक्षर। पाय-चरण। चोप-बुद्धि, चतुराई, दक्षता। पनंगांराय-शेषनाग।
२४१. अरच-पूजा कर। परदछण-प्रदक्षिणा। जनम सरजत-जो जन्म देता है, जन्म रचता है। आगळ-अगाड़ी। जण-जिस। चोप-ध्यान। कमळ-शिर, मस्तक। सी-वर-सीतावर, श्री रामचन्द्र। उचर-उच्चारण कर, भजन कर। चोप-कृपा, दया।
२४२. झमक-यमकानुप्रास। गूंथ-रच, बना। मुकत-मोती।
२४३. भव-महादेव, शिव। व्राहम-ब्रह्मा। भर-भार, बोझ। भूम-भूमि। भूमपत-भूमिपति। सर-बाण, तीर। धनुं-धनुष। समाथ-समर्थ। माथ-मस्तक, सिर। समर-युद्ध। मह-में। मह-महि, पृथ्वी। मुरजाद-मर्यादा। जादपत-यादपति, समुद्र। पब्बै-पर्वत। जह-जिस। सांमरथ-समर्थ। खगेस-गरुड। मारुत-पवन। सजव-वेग सहित। मख-यज्ञ। सिहाय-सहाय। उदध-उदधि, समुद्र। भव-संसार।

— 104 —

अथ छप्पै नांम कवित कुंडळिया लछण
दूहौ
पहलां दूहौ एक पुण, आद अंत तुक जेण।
पलटै धुर पूठा कवित, तव कुंडळियौ तेण।।२४४

अथ कुंडल़िया उदाहरण
जपै रसण रघुबर जिकै, अध त्यां कपै अमांण।
जनम मरण सुधरै जिकां, जे बड़भागी जांण।।
जे बड़भागी जांण, लाभ तन पायां लीधौ।
त्यां जिग किया तमांम, कांम सुक्रत ज्यां कीधौ।।
वां व्रत किया अनेक, हिरण दे दे विप्रां हथ।
ज्यां सधिया अठ जोग, त्यां किया कौटक तीरथ।।
धन मात पिता जिण वंस धर, कळुख तिकां दरसण कपै।
कवि ‘किसन’ कहै धन नर तिकै, जिके रसण रघुबर जपै।।२४५


२४४. पहलां-प्रथम। पुण-कह। धुर-प्रथम। तव-कह।
२४५. रसण-रसना, जिह्वा। अघ-पाप। कपै-नाश होते हैं। अमाण-अपार। वडभागी-बड़े भाग्यशाली। जांण-समझ। जे-वे, जो। लीधौ-लिया। त्यां-उन्होंने। जिग-यज्ञ। तमांम-सब, समस्त। सुक्रत-पुण्य। कीधौ-किया। वां-उन्होंने। हिरण-हिरण्य, सोना। हथ-हाथ। सधिया-साधन किये। अट-जोग-अष्ट-योग। कौटक-करोड़ों। धन-धन्य। मात-माता। कळुख-पाप। तिकां-जिनके, उनके। जिके-जो, वे।

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