गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-पैलो अध्याय

पैलो अध्याय – अर्जुनविषादयोगः

।।श्लोक।।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सुव:।
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।१।।

।।चौपाई।।
भाळ धरा कुरुखेत धुजाई
लड़ण भिड़ण री लोय लगाई।
मम सुत अर पाण्डव रा जाया
संजय हुय की देख बताया।।१।।
(लोय= लड़ण री इच्छा )
(बताया=बताना)
।।भावार्थ।।
संजय सूं धृतराष्ट्र कैवै-हे संजय! म्हनै आ बता कै धर्म री धरा कुरुक्षेत्र में म्हारा अर पाण्डव रा बेटा युद्ध करण खातर गया है उण ठौड़ इण बगत कांई होय रह्यौ है थारी दिव्य दीठ सूं देख ‘र बता।
।।श्लोक।।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसड़्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।

।।चौपाई।।
दळ पाण्डव देखत हुय दोरौ
प्रळय मचण रौ लाग्यौ ब्योरौ।
फट गुरु द्रोण रु पास पठायौ
दुर्योधन आ कहत दिखायौ।।२।।

।।भावार्थ।।
संजय कह्यौ-हे राजन! इण बगत दुर्योधन व्यूरचना करता पाण्डवां री सेना नै देख’र द्रोणाचार्य नै आ विगत बताय’र ऄ वचन कह्या।
।।श्लोक।।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।।3।।

।।चौपाई।।
भाळ गुरू तव चेलौ भारी,
द्रुपद रौ सुत करी तैयारी।
इण री आ व्यूह रचना कैड़ी,
दीसत तौ दळ दाटक छेड़ी।।

।।भावार्थ।।
दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य जी नै दिखावै कै हे!गुरुवर देखो आपरा चेला द्रुपद राज रौ बेटो धृष्टद्यूम्य कितरी जोरदार व्यूह रचना करी है।
।।श्लोक।।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।4।।

।।चौपाई।।
कितरा अठै वीर टणकेला,
अर्जुन भीम जिसा जबरेला।
सात्यकि जोधा सागै आया,
देखो द्रुपद माहरथि लाया।।


।।श्लोक।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः।।5।।

।।चौपाई।।
धृष्टकेतु अर चेकितान संग,
कासी राज बली उणरा अंग।
पुरुजित कुन्ति भोज सब आला,
सुमट सैन्य वर जोध विसाला।


।।श्लोक।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।6।।

।।चौपाई।।
युधामन्यु जिसड़ा बलसाली,
उत्तमोजा लागा उतवाळी।।
औ पूत सुभद्रा रौअभिमन्यु,
पाण्डू पांचां द्रोपदी जन्मयु।।

।।भावार्थ।।
हे!गुरुवर इण जुद्ध रा अखाड़ा में टणका टणका धनुर्धर जको अर्जुन अर भीम री बराबरी करणिया जोधा सात्यिक-धाकड़ महारथी राजा द्रुपद-धृष्टकेतु-चेकितान अर काशीराज-पुरूजित कुन्तिभोज अर उत्तम नगर शेव्य-युधामन्यु-बलवान उत्तमोजा नै सुभद्रा रौ पुत्र अभिमन्यु अर द्रोपदी था पांचू बेटा अर सगळा रा सगळा बड़ा महारथी हा।
।।श्लोक।।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्नि बोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थ तान्ब्रवीमिते।।७।।

।।चौपाई।।
आपां री सेना में सारा,
महारथी है न्यारा न्यारा।
दुर्योधन आ विगत बतावै,
ठावा ठावा नाम गिणावै।।७।।

।।भावार्थ।।
दुर्योधन द्रोणाचार्य जी नै अरज करै कै हे! विद्वान मनीषी म्हैं आप नै आपां लै सेना री विगत बताय रयौ हूं जिण में मोटा मोटा जोधा गिणाय रयौ हूं।
।।श्लोक।।
भावान्भीष्मश्श्च कर्ण श्च कृतश्च समित्ति ञ्जय:।
अश्वत्थामा विकर्ण श्च सौमदत्तिस्तथैव च।।८।।

।।चौपाई।।
भीष्म पिता अर आप सरीसा,
कर्ण, कृपाचार्य जिसा मुनी सा।
अश्र्वत्थामा विकर्ण ज सागै,
भूरीश्रवा वीर है आगै।।

।।भावार्थ।।
हे! परम पुज्य म्हैं आपरी सेना रा महारथियां नै गिणावतो घणौ मोदीजूं हूं। जिण में भीष्म पितामह रै सागै आप खुद पधारिया हो अर कर्ण रै सागै कृपाचार्य जी अरु अश्र्वत्थामा, विकर्ण अर सौमदत्त रौ बेटो भूरिश्रवा इण सैन्य दळ री शोभा बढ़ाय रया है।
।।श्लोक।।
अन्ये च बहव:शूरा मदथै त्यक्त जीविता:।
नाना शस्त्रप्रहण:सर्वे युद्ध विशारदा:।।९।।

।।चौपाई।।
सगळा का सगळा है लांठा,
अस्त्र शस्त्र सूं सजिया काठा।

।।भावार्थ।।
दुर्योधन समझावतो कै’य रयो है
हे! प्राचार्य वर आपनै सोच विचार करण री जरूरत नहीं है। ए सगळा टणका जोधा है अर यांरै पास अस्त्र शस्त्र है।
।।श्लोक।।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्ममाभिरक्षित्।
पर्याप्तं त्ति्वदमेतेषा बलं भीमाभिर क्षितम्।।१०।।

।।चौपाई।।
भीष्म पिता सो कुण भड़ जायौ,
रक्षक बण तव सेना आयौ।
पाण्डू गिणै भीम नै भारी,
हारण री है उण री वारी।।१०।।

।।भावार्थ।।
हे! आचार्य श्री भीष्म पितामह आपां री सेना रा रक्षक है अर भीष्म पितामह नै हरावण वाळौ आज तक नीं जलमियौ। पाण्डवां री सेना रौ रुखाळौ भीम है उण नै हरावणौ भीष्म पितामह रै डावा हाथ रौ खेल है।
।।श्लोक।।
अयनेषु च सर्वषु यथा भागमव स्तिथा:।
भीष्ममेवाभिर क्षन्तु भवन्त: सर्व एवहि।।११।।

।।चौपाई।।
आप हुऔ थापित इण भांती,
घेर लहौ पितामह रक्षाती।
जिण री जितरी क्षमता लागै।।
उतरी आय लगावै आगै।।११।।

।।भावार्थ।।
दुर्योधन सगळा महारथियां नै संबोधित करतां थकां कह्यौ-आप आपरी योग्यता मुजब जगहां माथै खड़ा होय जाऔ। अर भीष्म पितामह नै बीच में राख र यांरै रक्षा खातर चारूंकांनी घेरो घाल दौ।
।।श्लोक।।
तस्य सञ्जनयन्हर्ष कुरु वद्ध: पितामह:।
सिंह नांद विन द्योच्चै: शंखदध्मौ प्रतापवान्।।१२।।

।।चौपाई।।
दुर्योधन नै हर्षित करवा,
भीष्म पितामह व्है इम अगवा।
सिंह नांद सम शंख गुंजायौ,
कौरव कुल रौ वृद्ध गरजायौ।।

।।भावार्थ।।
दुर्योधन रै हिय में मुळक लावण खातर कौरवां रौ सै सूं दानो (वृद्ध)आदमी शंख गुंजायौ। शंख री गरजणा इतरी जोरदार ही जाणै शेर आपरी नांद में गूंज रयौ है।
।।श्लोक।।
तत्:शंख श्च भेर्यश्र्च पणवानक गोमुखा:।
सह सैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।

।।चौपाई।।
शंख पछै लै ढोल नगारा,
ढोलक दुंदभि रा रंणकारा।
सगळा सागै सबद गुंजायौ,
एक एक आखर डरपायौ।।

।।भावार्थ।।
शंख री गरजणा रै पछै ढोल नगारा दुंदुभि री रंणकार सूं ऐड़ौ लागो जाणै सगळै भय व्यापगो है।
।।श्लोक।।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः।।१४।।

।।चौपाई।।
धवळा हय रथ चढ़ लै आया,
अर्जुन अर श्री कृष्ण सवाया।
दोनू ई जद सागे आया।
आप आप रा शंख गुंजाया।।१४

।।भावार्थ।।
थोड़ी दूर पछै धवळा घोड़ां वाळौ सजियोड़ो रथ लेय र अर्जुन अर भगवान श्री कृष्ण जी पधारिया नै वे ई आप आप रा शंख ज़ोरदार गुंजाया।
।।श्लोक।।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्त धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः।।१५।।

।।चौपाई।।
पाञ्चजन्य श्री कृष्ण गुंजायौ,
देव दत्त अर्जुन ई बजायौ।
पौण्ड़्क शंख भीम लै आयौ,
सगळा मिल नै नभ गुंजायो।।१५

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण पाञ्चजन्य नाम रौ शंख बजायौ तो अर्जुन रै हाथ में देव दत्त नामक शंख हो अर कर्मवीर भीम रै हाथ में पाण्ड्क नामक शंख हो ए सगळा मिल नै एक साथै गुंजायमान करिया।
।।श्लोक।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।१६।।

।।चौपाई।।
कुन्ती सुत यु युधिष्ठिर राजा,
अनन्तविजय यु शंख ज साजा।
नकुल सहदेव सघोष बजायो
मणि पुष्पक दोउ भ्रात गुंजायो।।१६।।

।।भावार्थ।।
कुन्ती रा बेटा राजा युधिष्ठिर अनन्तविजय नामक शंख अर नकुल सहदेव मणि पुष्पक नामक शंख बारी बारी सूं बजायो।
।।श्लोक।।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१७।।

।।चौपाई।।
काशी राज धुरंधर मोटो,
सकड़ शिखण्डी महारथि ओटो।
धृष्टद्युमन सो टणको जोधो,
सात्यकि जिसड़ो किण दिस सोधो।।१७।।
।।श्लोक।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१८।।

।।चौपाई।।
द्रुपद, द्रोपदी सुत है पांचां
भुज लम्बा रो अभिमन्यु सांचो।
एक एक सूं धाकड़ सारा,
शंख बजाया न्यारा न्यारा।।१८

।।भावार्थ।।
आप आप रा धनुष हाथ में लेय’र धुरंधर काशी राज महा बली शिखण्डी, धृष्टद्युमन जिसड़ा टणका राजा रै सागै द्रुपद, द्रोपदी रा पांचो पुत्रां अर सुभद्रा रा लम्बा भुजां वाळो अभिमन्यु जद आप आप रा शंख गुंजायमान करिया।
।।श्लोक।।
स धोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभ श्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।।१९।।

।।चौपाई।।
काळजियो कांप्यो तव पूतां,
शंखनाद रौ भय अणहूतौ।
आभौ अर धर धूजण लागा,
गरजण रा है ए लय रागा।।।१९।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र नै कयौ हे! राजन इण सामुहिक शंखनाद री गरजणा इतरी जोरदार ही कै आपरै बेटां रा काळजा कांपण लागगा अर आभो नै धरती धूजण लागा।
।।श्लोक।।
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज:।
प्रवृते शस्त्र सम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव:।।२०।।

।।चौपाई।।
कपिध्वज सागै रथ यु सजायौ,
तव पूतां नै यो दरसायौ।
अर्जन जद गाण्डीव उठायो,
शस्त्रां सागै माधव आयौ।।२०।।

।।भावार्थ।।
“अर्जुन कै वै”
(अर्जुन सेना नै निरखी उणरै गाण्डीव री इधकाई)
।।श्लोक।।
हृषीकेशं तथा व्याकरण मिदमाह महीपते।
सेनयोरु भयोर्मध्यै रथं स्थापय मेऽच्युत:।।२१।।

।।चौपाई।।
मन में मोद भिड़ण रौ जागो,
हृषीकेश नै कैवण लागो।
म्हारो रथ दोउ दळ बिच हांको
कित कुण कुण जोधा है भाखौ।।२१।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र जी नै क्यों हे! राजन उणरै पछै अर्जुन रा रथ माथै हडुमान जी री धजा फहरायोड़ो आपरा सगळा अस्त्रां शस्त्रां सागै माधव नै लेय र आयो जद साम्ही आपरा रिश्तेदारां(धृतराष्ट्र रा बेटां) नै देखिया तद भगवान श्री कृष्ण नै कह्यौ-हे!माधव म्हारौ रथ दोनू सेना रै अधबीच में लेय र चालो।
।।श्लोक।।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे।।२२।।

।।चौपाई।।
जद तक निरखूं नीं जोधां नै,
कुण कुण आयौ है लड़वा नै।
निरख परख कर लूं जित राखौ,
हे! माधव रथ मत नां हांकौ।।२२

।।भावार्थ।।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै अर्ज करै-हे ! केशव म्हैं जठा तक औ नीं जाण लूं कै इण रण क्षेत्र में कुण कुण महारथी लड़ण नै आया है तद तक आप म्हारा रथ नै मत हांक जो अठै इज खड़ौ राख जौ।
।।श्लोक।।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।२३।।

।।चौपाई।।
अंध पिता रै‌ दुर्बुद्धि सुत संग,
सेना लाया करवा नै जंग।
वे कहवावै सब हितकारी,
जाण सकूं वांरी तैयारी।।२३।।

।।भावार्थ।।
संजय कैवै-हे!राजन अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै कैवै-हे!माधवा म्हारां आंधा पिता रै कम अक्ल वाळा दुर्योधन री हिमायती करणिया जको जको जोधा आप आपरी सेना लेय र लड़ण खातर आया है म्हैं वां नै देखणी चाहूं हूं। अर जाण सकूं कै वांरी कितरी तैयारी है।।
।।श्लोक।।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।२४।।

।।चौपाई।।
अर्जुन री आ मरजी जाण र,
माधव करियौ वौ सब ठाण र।
थापित करियौ रथ अधबिच में,
दोउ सेन रख सामी चित् में।।२४
।।श्लोक।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति।।२५।।

।।चौपाई।।
रथ उण ठौड़ ज जाय र रुकिया,
भीष्म, द्रोण रा रथ जित खड़िया।
कौरव कुल रा जबरा जोधा,
भड़ ऊभा भिड़वा ज समोदा।।२५।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन हृषीकेश नै कह्यौ-हे ! राजन म्हारौ रथ उण ठौड़ जाय र ऊभो करौ जठै दोनू सेना आमा-सामी व्है। भगवान श्री कीसन रथ दोई सेना रै अधबिच में जाय र खड़ौ कर दियौ जठै भीष्म पितामह अर आचार्य द्रोण जी रा रथ युद्ध करण खातर खड़ा हा।
।।श्लोक।।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।२६।।
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।

।।चौपाई।।
जद अर्जुन देख्यौ दोउ कांनी,
पिता पुत्र काका सब ग्यानी।
दादा परदादा अर मामा,
भ्रात भतीज मित्र सा सामा।।२६।।
ससुर सहोदर गुरुवर न्यारा
पोता नाती सगळा प्यारा।

।।भावार्थ।।
संजय कैवै हे – ससुर सहोदर भायां रा रिश्तेदार साथी आचार्य गुरुवर अर सगळा सगा संबंधी सामी ऊभा देख्या।
।।श्लोक।।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्।।२७।।
कृपया परयाविष्टो विषीदतन्निदमब्रवीत्।

।।चौपाई।।
शोकाकुल हुय अर्जुन बोल्यौ,
ओ कुटम्ब म्हारौ बहुमोल्यौ।।२७।।
हे!गोविन्द नहीं हिम्मत म्हारी,
अस्त्र उठाय सकूं इण वारी।

।।भावार्थ।।
शोकाकुल होय’र अर्जुन बोल्यौ ओ कुटुम्ब म्हारौ है हे माधव! म्हारी हिम्मत नीं है कै म्हैं यां रै सामी अस्त्र-शस्त्र उठाय सकूं
अर्जुन आपरा सगा संबंधियां नै सामी ऊभा देख’र हताश होयगौ उण रा हाथ’र होठ सूखण लागगा।
।।श्लोक।।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सं समुपरिस्थत्तम्।।२८।।
।।चौपाई।।
सगा संबंधी सामी ऊबा,
जाण्या जद वांरा मंसूबा।।२८।।

।।श्लोक।।

सीदन्ती मम गात्राणि मुखंच परिशुष्यति।।
वेपथु शरण शरीरे मे रोम हर्ष श्च जायते। २९।।

।।चौपाई।।
इण हालत रौ म्यानो जोयौ,
कंठ सूख मन विचलित होयौ।
हे!माधव इण मन री जाणौ,
अंग अंग पड़ियौ ढीलाणौ।।२९।।

।।श्लोक।।

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्रोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:।।३०।।

।।चौपाई।।
औ गाण्डीव थमें नह कर में,
कम्प-कपी ऊठै है उर में।
मन थिर नह रहवै घण नामी,
आ गत जाणौ अन्तर जामी।।३०

।।भावार्थ।।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै कैवै-हे! माधव जद म्हारा सगा संबंधियां अर म्हारा कुटम्बियां रा मंसूबा (इच्छा शक्ति) युद्ध करण रा जाणिया तद म्हारा सगळा अंग ढीला पड़गा म्हारौ कंठ सूखण लागगो म्हारै डील (शरीर)रा रोम रोम ऊभा होयगा। म्हारा हाथ सूं गाण्डीव छूटण लागगौ है। हे!अन्तरजामी (अन्तर्यामी) म्हारौ मन थिर नीं रैवै और बार बार भटक रयौ है।
।।श्लोक।।
निमितानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजन मामले।।३१।।

।।चौपाई।।
ऐ सगळा म्हारा संघाती,
मार्यां यांने बैठै छाती।
इण सूं कद म्हारौ हित होसी,
अंतस म्हारौ गिण सी दोषी।।३१।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! केशव ए सगळा म्हारा स्वजन है यांरै सागै युद्ध करण में अर यां नै मारण में म्हनै कोई सार नीं लागौ। इण सूं म्हारौ कद भलो हो सकै। म्हारी आत्मा म्हनै औ करण सूं बरजै है, म्हनै खुद नै दोषी गिणै है।
।।श्लोक।।
न काड़्क्षे विजयं कृष्ण, न च राज्यं सुखानिच।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।।३२।।

।।चौपाई।।
नहीं जीत री मंसा(इच्छा)म्हारी
नीं सुख भोगण री म्हैं धारी।
हे ! गोविन्द नीं इण सूं मतलब,
म्हनै विरक्ति होगी है अब।।३२।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै कैवै-हे! केशव म्हैं नीं तो इण युद्ध नै जीतणी चाहूं अर नीं म्हारी सुख भोगण री इच्छा रही है। म्हनै इण राज नै प्राप्त करण रौ कोई मतलब नीं लखावै है।
।।श्लोक।।
येषामर्थ कांक्षितं नो राज्यं भोगा: सुखनि च।
तोइमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यकत्वा धनानि च।।३३।।

।।चौपाई।।
जिण खातर सुख सुविधा लावां,
वां रै सामी लड़वा जावां।
वे अपणा सुख त्यागण डूबा,
प्राण घमावण नै ए ऊबा।।३३।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे!माधव म्हां सगळा म्हारा परिवार वाळां रै वास्तै राज सुख प्राप्त करण खातर लड़ रया हां जठै कै म्हारा सगा संबंधी धन अर प्राण त्यागण खातर युद्ध करण नै जल्दी कर रया है।
।।श्लोक।।
आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा:।
मातुला:श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा।।३४।।

।।चौपाई।।
गुरु काका-बाबा रा भाई,
मामा साळा सुसरा हा ई।
दादा पोता सगळा होता,
आं रिश्ता नै यूं उळझोता।।३४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! केशव आज म्हारा गुरुवार-काका-बाबा वां रा बेटा-दादा-मामा–सुसरा-साळा ए सगळा म्हारा रिश्तेदार ई रिश्तेदार है जकां रै सामी म्हनै लड़णौ है।
।।श्लोक।।
एतान्न हन्तु मिच्छामि, ध्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्य राज्यस्य हेतो: किं नु यही कृते।।३५।।

।।चौपाई।।
चाहे मार म्हनै ए जावे,
चाहे राज त्रिलोकी भावै,
हे ! माधव तिल भोम कमाऊं,
इण खातर नीं मारण जाऊं।।३५।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! जनार्दन म्हैं यां नै मारण खातर हरगिज नीं जाऊं। चाहे ए म्हनै मार दै कै भलांई इण युद्ध सूं म्हनै तीन लोक रौ राज मिल जावै। वो ई फगत तिल भर भूमि (पृथ्वी रा टुकड़ा ) रै वास्तै इण खातर म्हैं औ धार लियो कै म्हैं यां नै नीं मारूं।
।।श्लोक।।
निहत्य धार्तराष्ट्र :का प्रीति: स्याज्जनार्दन।
पापमेवा श्रयेदस्मा न्हत्वैनाततायिन:।।३६।।

।।चौपाई।।
धृतराष्ट्र पुत्र मारण जाऊं,
क्यूं कर मो पर पाप चढ़ाऊं।
दुष्टि दुराचारी ए मोटा,
ए माधव है सुख रा टोटा।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे जनार्दन आं धृतराष्ट्र रा बेटां नै मारण सूं म्हनै कांई सुख मिलेला। ए तो मोटा दुराचारी अर दुष्ट है। आं नै मारण सूं म्हैं पाप रौ भागी होवूं ला।
।।श्लोक।।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सवबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव।।३७।।

।।चौपाई।।
म्हां भ्रातज काका बाबा रा,
नीं जोगा बाजां हत्यारा।
खुद रा बंधव खुद मारेला,
कद माधव वै सुख पावे ला।।३७

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे-जनार्दन म्हैं म्हारा बड़ा पिता रा बेटां नै मारण जोगा हाल नहीं होया हां। क्यूं कै म्हैं म्हारा इज कुटम्ब नै मार नै सुखी नीं होय सकूं ला।
।।श्लोक।।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहत चेतस:।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्र द्रोहे चपातकम्।।३८।।

।।चौपाई।।
कुलघाती रौ दोष मंडाणौ,
दोसत सूं इज दगो कराणौ।
ए सगळा लालच रा फंदा।
ए नीं समझै आ गोविन्दा।।३८

।।श्लोक।।
कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापदस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षय कृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।३९।।

।।चौपाई।।
हे! माधव क्यूं बणूं अजाणौ,
जाणन्तौ सिर पाप मंडाणौ।
इण खातर म्हैं बचणौ चाऊं।
इण में इज हित म्हारौ पाऊं।।३९

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव ए सगळा लालची हैं अर इण लालच रै कारण यां री मती फिरगी है इण मलीन बुद्धि रै कारण इज आं में आ समझ नहीं है कै कुळरौ नाश करण सूं अर दोस्त रै सागै दगो करणौ मोटो अपराध व्है, पाप रा भोगी बणां। पण है जनार्दन म्हैं आ जाणतो थको कीकर अजाण बण सकूं। इण खातर म्हनै आ जची है कै इण पंपाळ सूं बचणा में इज भलाई है।
।।श्लोक।।
कुल क्षये प्रणश्यन्ति कुल धर्मा: सनातना:।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभि भवत्युत।।४०।।

।।चौपाई।।
कर नाश कुटम्ब विनाश लवै,
नह धर्म सनातन वैष्णव वै।
इहि कारण पाप अपार बढ़ै,
कुळ मांय कलंक इ अंक गढ़ै।।४०।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव जद आप आपरै कुटम्ब कबीला रौ नाश करण री तेवड़ लो तद सनातन धर्म अर वैष्णव धर्म रौ नाश होवणो तय है अर इण कारण सूं उण कुळ रै
मांय पाप री बढ़ोतरी हुवे है।
।।श्लोक।।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण संकर:।।४१।।

।।चौपाई।।
जिण कुळ में अधर्म बढ़ जावे,
तिरिया वंश बिगाड़ण लावै।
पूत वर्ण संकर बण आवे।
हे! माधव उत कुण समझावे।।४१

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! केशव जिण कुळ में पाप बढ़ जाने उण कुळ री लुगायां कलंकित होय जावे अर वांरा कोक सूं वर्ण संकर औलाद इज जलम लेवे है।
।।श्लोक।।
संकरो नरकायैव कुल घ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदक क्रिया:।।४२।।

।।चौपाई।।
कुळ में वर्ण संकर जलमणा,
पण व्है नर तो नरक पहुँचणा।
पितरां रा दुखदाई हुवणा,
वांनै अन्न नीर नीं मिलणा।।४२

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे त्रिलोकी नाथ जिण कुळ में वर्ण संकर जलम लेवै तद वांरा नरक जावणा तय है वांरा पितर दुखदाई हुवै। जको आपरा पितरां नै सुरग सूं पाछा नरक में धकेल दै। वर्ण संकर रै अर्पण करियोड़ो श्राद्ध मेंअन्न जळ वांरा पितरां नै नीं मिले। वै अधोगति जावै।
।।श्लोक।।
दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्ण संकर कारके:।
उत्साद्यन्ते जाति धर्मा: कुल धर्माश्चशाश्चता:।।४३।।

।।चौपाई।।
जात धरम कुळ धरम विनासा,
जित व्है वर्ण संकर ज वासा।
यां सूं सनातनी रा नासा,
ए कुळघाती बणजा खासा।।४३।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! दीनानाथ इसड़ी वर्ण संकर औलाद जलमणा सूं आपरौ कुळ धर्म जाति धर्म सब रौ विनास हुवै है।
।।श्लोक।।
उत्सन्नकुल धर्माणां, मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनशुश्रुम।।४४।।

।।चौपाई।।
इण कुळ रा ए दंश होवसी,
जुगॉं जुगॉं तक नरक भोगसी।
हे! केशव औ गुर पिछाणियौ
आखी जूण खपाय मानियौ। ४४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! जनार्दन म्हनै आ ठाह पड़गी है कै इसड़ा कुळ में जलम लेवणिया मिनख जुगॉं जुगॉं तक नरक भोगता रैवै है।
।।श्लोक।।
अहो बत महत्त्पापं कर्तु व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुख लोभेन हन्तु स्वजन मद्यता:।।४५।।

।।चौपाई।।
क्षणिक राज पावण नै भागा,
इतरौ दाग लगावण लागा।
हे! माधव अब म्है नीं मारूं,
आ मरजाद मिटावण सारू।।४५।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे! माधव आ जिन्दगाणी क्षण भंगूर है। इण थोड़ी सी जिन्दगी खातर फगत राज भोगण रा लालच में इतरौ मोटो पाप करण वास्तै राजी व्है जाय। हे! माधव म्हैं यां नै हरगिज नीं मारुंला। म्हैं आ मरजादा नीं मिटाऊं।
।।श्लोक।।
यदि मामप्रतीकारकम् अशस्त्रं शस्त्रपाणय:।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्यु: तन्मे क्षेमतरं भवेत्।।४६

।।चौपाई।।
शस्त्र त्याग बणगो निर्दोषी,
धृतराष्ट्रहरा होसी दोषी।
जे निहत्था री मरतु व्हैला,
म्हारौ उत कल्याण हुवेला।।४६।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन आपरा अस्त्र शस्त्र नीचा न्हाक दै नै आ तेवड़ लै कै अर्जुन वांरे माथै शस्त्र नहीं चलावेला। भलांई धृतराष्ट्र रा बेटां उण निहत्था माथै वार करै अर उण नै मार भी देवे तो ई उण (अर्जुन) रो तो कल्याण इज होवणो है।
।।श्लोक।।
एवमुक्त्वार्जुन:सड़्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य स्वयं चापं शोक-संविग्नमानस:।।४७।।

।।चौपाई।।
समरांगण में शोक मनातो,
मन मसोस जुध नै विसरातो।
व्याकुल हुय अर्जुन तज बाणा,
जाय बैठगो लारै काना।।४७।।

।।भावार्थ।।
संजय कैवै-हे महाराजा(धृतराष्ट्र नै)अर्जुन रण क्षेत्र में घणौ दुखी होय र आपरा अस्त्र शस्त्र नीचा न्हाक र रथ रै लारै कांनी जाय र बैठ जाय।

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