गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-दूजो अध्याय

दूजो अध्याय – साङ्ख्ययोगः

।।श्लोक।।
तं तथा कृपयाविष्टं अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यं उवाच मधुसूदन:।।१।।

।।चौपाई।।
देख दुखी अर्जुन अति भारी,
नैना नीर बहे जिण वारी।
आ गत जाण लगावण थागा,
तद मधुसुदन यु कैवण लागा।।१।।

।।भावार्थ।।
संजय कैवै-हे महाराज! अर्जुन नै जद घणौ दुखी देखियो अर उण री आंख्यां में आंसुआं रौ समदर उमड़ियो तद मधुसूदन (भगवान श्री कृष्ण)उणनै थगी (सहयोग)देवण खातर कैवण लागा।
।।श्लोक।।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्य-जुष्टमस्वर्ग्यम् अकीर्ति-करमर्जुन।।२।।

।।चौपाई।।
इ पुळ मोह जग्यो बेजां ई,
पण यु मोह इण पुळ दुखदाई।
न औ मोह तुज सुरग पुगावै,
न कोइ इतरो मान बढ़ावै।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान कैय रया है-हे अर्जुन! थनै इण बगत इतरौ मोह कियां उमड़ियो है। घणौ मोह भला मिनखां खातर अच्छो नीं हुवै। इण मोह सूं न तो सुरग री प्राप्ति हुवे अर न ही थारो इण मोह सूं मान बढ़ै।
।।श्लोक।।
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपद्यते।
क्षद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्वोत्तिष्ठ परन्तप।।३।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन मत दुर्बल बणजै,
नपुसंक ज बण मतना फिरजै।
रण आंगण में जज्बो जगवा,
वैरी थारा ऊभा लड़वा।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण जी कैवै-हे परन्तप(अर्जुन) थूं नपुंसक व्हियोड़ो मत भटक। थारै शरीर री हीणापणौ(दुर्बलता ) बारे काढ़ दैइ अर रण आंगण में थारा दुसमी थां सू जुध करण नै तकियोड़ा ऊभा है वांरो सामनो कर।
।।श्लोक।।
कथं भीष्ममहं सड़्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभि: प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरि-सूदन।।४।।

।।चौपाई।।
भीष्म पिता अर द्रोण ज म्हारा,
पूजनीक मानीजे सारा।
किण विध यां पर बाण चलाऊं,
कीकर हत्यारो बण जाऊं।।

।।भावार्थ।।
अर्जून कैवै-हे मधुसूदन भीष्म पितामह अर गुरु द्रोणाचार्य म्हारै वास्ते पूजनीक है म्हैं यां पर कीकर बाण चलाय सकूं अर औ हत्या रो पाप कीकर चढ़ाय सकूं।
।।श्लोक।।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह रोके।
हत्वार्थ-कामांस्तु गुरूनिहैव
भुंजीय भोगांव रूधिर-प्रदिग्धान्।।५।।

।।चौपाई।।
आं गुरुआं नै बिन मार्यौ है
मांग खावणौ हित मान्यौ है।
मार रगत सूं रगबग होऊं
काम रूप ई भोगण जोऊं।।५।।

।।भावार्थ।।
इण वास्ते है केशव-आं वंदनीय मिनखां नै मारणां सूं तो बत्तो है कै म्हां भीख मांग नै म्हांरौ परिवार पाळ देवांला। आं पूजनीक पुरुषां नै मार र म्हांने रगत सूं रगबग होय र पछै काम रूपी भोग इज तो भोगणौ है।
।।श्लोक।।
न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीय:
श्रद्धा जयेम यदि वा नो जयेयु:।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम:
तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा:।।६।।

।।चौपाई।।
म्हां आ ई अजलग नीं जाणां
भिड़णौ चहिजै कै गम खाणां।
म्हां मरियां कुण व्है झीणौ है
मार उणां नै नीं जीणौ है।।६।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-है मधुसूदन म्हां आ नीं जाणां हां कै जुध करणौ चहिजै कै नीं करणौ चहिजै। म्हांरै खातर लड़णौ चोखो है कै गम खावणौ अच्छो है। हे भगवन म्हाने आ ई ठाह नीं है कै म्हां जीतांला कै हार हुवेला पछे म्हां म्हारा तात धृतराष्ट्र रा बेटां नै मारणा ई नीं चाहां।
।।श्लोक।।
कार्पण्य दोषोपहप-स्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्म-सम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मांत्वां प्रपपन्नम्।।७।।

।।चौपाई।।
कायरता कारण कळियोड़ौ
फंदा म मोह रै फसियोड़ौ।
आय र शरणागत तव ऊबो
ग्यान पाण रौ है मंसूबो।।७।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव म्हैं कायरता रै कारण पूरौ कळियोड़ो हूं अर धर्म रा मोह पास में फसियोड़ो हूं। अबे म्हैं आपरी शरणागत हूं म्हैं अग्यानी मती मूढ़ हूं। हे केशवानंद!म्हनैं ग्यान रूपी भिक्षा देय र म्हारो मारग दिखावो।
।।श्लोक।।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्न‌मृद्धं
राज्यों सुराणामपि चाधिपत्यम्।।८।।

।।चौपाई।।
मिल जावै सै राज धरा रौ
सुरपति म्हैं बण जाऊं न्यारौ।
पण नीं म्हारौ दुख जावेला
हे माधव कुण समझावे ला।।८।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे केशवानंद जै इण पृथ्वी रौ पूरौ राज म्हनै मिल जाय म्हैं देवताआं रौ राजा बण जाऊं तो ई म्हारौ औ दु:ख नीं मिटे। आप इज आय र म्हारौ औ कष्ट मेटो।
।।श्लोक।।
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुड़ाकेश: परन्तु।
न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव है।।९।।

।।चौपाई।।
संजय बोल्यो हे महराजा
अरज करी अर्जुन यदुराजा।
हे गोविन्द जुध नीं हुणौ है
अर्जुन चुप आ कैय हुयो है।।९।।

।।भावार्थ।।
संजय कह्यौ-हे राजन! नींद नै जीतण वाळौ अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै बतायो कै वो जुध नीं करेला। अर अर्जुन चुप होयगो
।।श्लोक।।
मतमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच:।।१०।।

।।चौपाई।।
हे धृतराष्ट्र भरत रा वंशी
संजय आ कैवै बण दंसी।
दुमणौ अर्जुन सेन बिचाळै
यदु राजा मुळकंता भाळै।।१०।।

।।भावार्थ।।
संजय कैवै-हे भारत वंशी धृतराष्ट्र दोनू सेना रै बिचाळै ऊभा अर्जुन नै दुमणौ देख र भगवान श्री कृष्ण मुळक र कैवण लागा
।।श्लोक।।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।११।।

।।चौपाई।।
भगवन बोलै अर्जुन भ्राता
शोकातुर व्है मत बिन बाता।
मत पण्डित बण कर व्यवहारा
तजो शोक जीवत मरियां रा।।११।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कह्यो हे अर्जुन!थूं नीं तो शोक करण जोग मिनखां खातर शोक कर रह्यौ है अर नहीं ई पण्डितां जैड़ा वचन कैय रह्यो है। पण जकां रा प्राण गया परा है अर जको जीवता है वांरे खातर पण्डित लोग कदेई दु:ख नीं जताया करै।
।।श्लोक।।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमतें जनाधिपा:।
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्।।१२।।

।।चौपाई।।
नीं इसड़ो कै म्हैं नीं कद हो
नीं इसड़ो कै थूं नीं कद हो।
थूं नीं व्है कै राजा नीं व्है
नीं इसड़ो कै थूं म्है नीं व्है।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान समझाय रह्या है कै नीं तो एड़ो होय सके कै कोई काल में म्हैं नीं हो या थूं नीं हो या कै ए राजा महाराजा नहीं हां अर न ई एड़ी है कै आपां आगे ई नीं रैवांला।
।।श्लोक।।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं योवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्ति: धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।

।।चौपाई।।
देह मिलनतांई बालपणौ
जोबण अर आसी बूढ़पणौ।
उण भांत मिलेला तन इसड़ौ
इण सूं मोहित हुवणौ किसड़ौ।।१३।।

।।भावार्थ।।
जिण तरह जीवात्मा देह मिलतां ई बालपणौ जवानी अर बुढापा री अवस्था पार करै उण इज तरह देह त्याग र आ आत्मा दूजो शरीर धारण करले इण वास्ते हे कौन्तेय! धीर गंभीर मिनख इण मोह माया रा जाळ में नीं पड़े। आ देह त्यगणी अर नवी देह धारण करणी आत्मा खातर सहज है।
।।श्लोक।।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखद:खदा:।
आगमापायिननोऽनित्या: तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।

।।चौपाई।।
सर्दी गर्मी अर सुख दुख व्है
इन्द्रिय भोगां रा पड़पच व्है।
जलमे ला उण रौ मरणौ व्है
इण खातर इण नै सहणौ व्है।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन नै कैवै-हे कुन्ती पुत्र! सर्दी-गर्मी अर सुख दुःख तो इन्द्रिय भोगां रा पंपाळ है ए संजोग कुजोग, जलमणौ, मरणौ अर अनित्य जूण री अबखायां है। इण खातर हे भारत! आं नै तो सहन करणौ इज पड़ेला।
।।श्लोक।।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदु:खसुखं धीर सोऽमृतत्वाय कल्पते।।१५।।

।।चौपाई।।
नीं कायो व्है ज इन्द्रियां सूं
धीर वान नर वो व्है सै सूं।
सुख दुख में व्है एक समाना
विषयां सूं करदे वो काना।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जको नर आपरी इन्द्रिया अर विषयां सूं कायो (परेशान) नीं व्है वो नर सुख नै दु:ख नै एक सरीका समझै वो मिनख धीर वान हुया करै। अर मोक्ष पावण रौ हकदार व्है।
।।श्लोक।।
नसतो विद्यते भाव: नाभावो सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्त: त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:।।१६।।

।।चौपाई।।
साच पदारथ झूट न होई
झूट घणा दिन टिकत न कोई।
उभय तत्व नै जाणण वाळा
तत्व ग्यानी यु है दीठाळा।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! साची चीज नै कोई झूटी नीं ठहराय सकै अर झूट घणा दिन तक टिक नीं सकै। इण भांत आं साच अर झूट रा दोन्यु तत्वां नै परखणियौ इज तत्व ग्यानी मिनख मिले है।
।।श्लोक।।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्यस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।१७।।

।।चौपाई।।
नाशवान सगळी दुनियां है
जो जो निजरां सूं दिठ्या है।
कोई नीं समरथ होयो है
म्हारो अजै विनाश कियो है।।१७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन इण दुनिया री सगळी चीजां ज्यानै आपां देख सकां व्है सगळी चीजां नाशवान है। पण म्हनै अविनाशी नै आज तक कोई नाश नीं कर सक्यो है।
।।श्लोक।।
अन्तवन्त इमें देहा: नित्यस्योक्ता: शरीरिण:।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत।।१८।।

।।चौपाई।।
अजर अमर जीवात्मा वीरा
अर विनाश कारी यु शरीरा।
इहि कारण हे भरत विलाला
करले जुध यो बाण उठा ला।।१८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे भारतवंशी अर्जुन! आ आत्मा अजर अमर है अर आ आत्मा जीण शरीर रै मांय रैवै वो शरीर नाशवान है। इण खातर थूं जुध करले।
।।श्लोक।।
य एनं वेति हन्तारं यश्र्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।१९।।

।।चौपाई।।
मार सकै ना आतम प्यारा
नीं मर सकै मतै दिलदारा।
दोउ न जाणै भैद इयारौ
आतम रौ विग्यान नियारौ।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन !
जको इण आत्मा नै मारणियौ जाणै कै वो इण आत्मा नै मार दी है अर दूजा इण नै मरियोड़ी जाण लै ए दोन्यू नीं जाणै कै आत्मा नीं तो अपने आप मरै है अर नीं कोई दूजो मार सकै है।
।।श्लोक।।
न जायते म्रियते वा कदाचित
नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणं
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।२०।।

।।चौपाई।।
नीं आ जलमे मरै कदाई
आत्म अजल्मा रवै सदाई
आ है नित्य सनातन वाळी
मरियां जीव न मरवा वाळी।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! आ आत्मा नीं तो जलमे अर नीं इणनै कोई मार सकै क्यूं कै आ आत्मा अजल्मा है। आ नित्य सनातन वाळी अर पुरानी है। आपरौ शरीर मरै जद आ शरीर रै सागै नीं मरै है।
।।श्लोक।।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरूष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।२१।।

।।चौपाई।।
नित्य अजलमा नाशरहीता
आतम अव्यय जाण र जीता।
वो नर कीकर मारण आता
नीं किणने ई वो मरवाता।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे कौन्तेय! जकौ मिनख इण आत्मा नै नाशरहित अजल्मा अर अव्यय जाणै है वो नर कीकर कोई नै मार सकै है अर किणविध किणने ई मरवाय सकै है।
।।श्लोक।।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहाणति नरोऽपराणि।
तथा शरीरणि विहाय जीर्णानि
अन्यानि संयाति नवानि देही।।२२।।

।।चौपाई।।
पै’रै जिम गाभा नर ताजा
तज जूना वस्तर वो राजा।
बदळै है आतम इम चोळा
तज शरीर बण जावै धोळा।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पृथा पुत्र! जिण तरह मिनख आपरा जूना गाभा उतार र नवा कपड़ा पै’रै इण इज भांत आ आत्मा आपरी जूनी देह नै बदळ र नवी देह नै धारण कर लैवै है।
।।श्लोक।।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्याप: न शोषयति मारुत:।।२३।।

।।चौपाई।।
सस्तर सूं कद आतम काटी
कद इण नै अगनी में दाटी।
गाळ सकै नीं जळ में भाया
पवन सुखाय सकै नीं आयां।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पार्थ इण आत्मा नै कोई शस्त्र सूं नीं काट सकै नीं कोई इणनै पाणी में गाळ सकै अर पवन इणनै नीं सोख सकै है
।।श्लोक।।
अच्छेद्योऽयमदाह्योयं अक्लेद्योऽशोष्य एवं च।
नित्य: सर्वगत: स्थाणु: अचलोऽयं सनातन:।।२४।।

।।चौपाई।।
आ आतम अच्छेद गिणीजै
नीं आ किण सूं ई दाझीजै।
कुण इण नै सोखण आयौ है?
सनातनी आतम छायौ है।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन इण आत्मा नै कदेई कोई भेद नीं सक्यो नीं कोई इण नै जळाय सक्यो है अठा तक कै पवन इण नै उड़ाय नीं सकै आ आत्मा नित्य अचल स्थिर सर्वव्यापी कर सनातनी है।
।।श्लोक।।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयं अविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुममर्हसि।।२५।।

।।चौपाई।।
आ आतम अचिन्तय गिणीजै
अव्यक्त इ अविकारक लीजै।
इहि कारण हे अर्जुन जाणौ
इण रौ अब ना शोक मनाणौ।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे कौन्तेय! आ आत्मा अव्यक्त है आ अचिन्तय है अर साथै ई आ आत्मा विकार रहित है इण वास्ते इण नै वाजिब जाण नै इण रौ शोक नीं करणौ आ थारै हिये में बैठाय लै।
।।श्लोक।।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मान्यसे मृतस्य च।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।२६।।

।।चौपाई।।
नित आतम नीं जलमण वाळी
नित की नित नीं मरवा वाळी।
मत ए जोधा थूं पछताजै
इण रौ शोक मती करवाजै।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन आ आत्मा नीं तो सदा जल्मे है अर नीं ई आ सदा मरै है इण खातर थूं इण रौ शोक मती करजै इण रौ शोक करण जोग काम औ नीं है।
।।श्लोक।।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपिहार्योऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।२७।।

।।चौपाई।।
जलमणिया नै मरणौ पड़सी
मरियां जलम अवस ई मिलसी।
जिणरौ नीं यु उपाय दिठाणौ
उण खातर क्यूं कर पछताणौ।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पार्थ!इण मान्यता रै मुजब जको जलम सी उण री मरतू तो निस्चै होणी है अर जिण री मौत हुई है उण रौ जलम अवस व्हैणौ है जिण रौ कोई दूजो उपाय है इज नीं तो इण बात खातर क्यूं पछताणौ।
।।श्लोक।।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त-मध्यानि भारत।
अव्यक्त-निधनान्येव तत्र का परिवेदना।।२८।।

।।चौपाई।।
जलम सूं पैली अपरकट व्है
मरियां पछै ई अपरकट व्है
फगत बीच में परकट जाणौ
इणरौ शोक न हरगिज लाणौ।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन(भारत) ! संसार रा सगळा जीव जलम सूं पैली कठै दीखिया(प्रकट व्हिया) मतलब ए सगळा प्राणी अप्रकट (अणदीठा) हा अर मरियां पछै ई अप्रकट (अणदीठा) इज रैवै। ए फगत बीच वाळा काल में इज (अपरा असली रूप में) प्रकट हुवै तो पछै इण बात रौ क्यूं शोक करणौ।
।।श्लोक।।
आश्र्चर्यवत्पश्यति कश्र्चिदेनमाश्र्चर्यवद्वदति तथैव चान्य:।
आश्र्चर्यवच्चैनमन्य: श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्र्चित्।।२९।।

।।चौपाई।।
किता क आतम गिणै अचम्बौ
किता बखाण करै है लम्बौ।
सुण र करै कइ इचरज इणनै
नीं समझे कइ सुण नै जिणनै।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-कैई लोग इण आत्मा नै कदेई नीं देख र जद इण नै जाणै तो व्है अचम्बौ करै। कितरा ई महापुरुष इण रा बखाण करता ई नीं थाकै अर इचरज करै तो घणकरा मिनख इसड़ा है जको देख नै, सुण नै, अर कैय नै ई इण आत्मा नै नीं जाणै इण खातर हे अर्जुन!इण बात रौ पछतावो नीं करणौ।
।।श्लोक।।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।३०।।

।।चौपाई।।
आतम रै’वै सब देहां में
आ अविनाशी रै’वै यां में।
जिण नै मार सकै नीं कोई
तो पछताणौ क्यूं कर होई।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!आ आत्मा सर्वव्यापी है सब रा शरीर मांय थिर रै’वै अर जद जीव आपरी देह त्यागै उण बगत आत्मा रौ नाश नीं व्है इण नै कोई नीं मार सकै इण खातर थनै पछतावो नीं करणौ चाहिजै।
।।श्लोक।।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।३१।।

।।चौपाई।।
जुद्ध क्षत्रिय रौ धर्म ज वाजै
इण सूं डरियां कर्म ज लाजै।
इण स्वधर्म सूं अळगो होणौ
क्षत्रिय रौ जिम व्है मार्ग खोणौ।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन जुद्ध करणौ क्षत्रिय रौ स्वधर्म है इण कारण जुद्ध करण सूं थनै नीं डरणौ चाहिजै। मतलब औ थारौ स्वाभाविक धर्म है इण सूं अळगौ हुवणौ थनै शोभा नीं दै प्रजा री रक्षा करणौ क्षत्रिय रौ फर्ज हुवै इण सूं इज क्षत्रिय रौ कल्याण हुवै औ काज इज क्षत्रिय नै फबै।
।।श्लोक।।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वद्वारमपावृतम्।
सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीद‌शम्।।३२।।

।।चौपाई।।
जै बिन मांगै सै मिल जावै
उण खातर पट सुरग खुलावै।
औ जुध धर, नर रक्षण वारौ
तद इज तो सुख मिलणौ सारौ।।३२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! बिना मांगियां जै सै सुख मिल जाय जिण जुद्ध करण सूं सुरग रा द्वार खुल जाय उण रौ हकदार औ क्षत्रिय व्है तौ बता क्षत्रिय सुखी नीं है कांई?
।।श्लोक।।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सड़़्ग्रामं न करिष्यसि।
तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।३३।।

।।चौपाई।।
नीं जै धर्म युक्त जुध करसी
तो तव पाप इ पाप ज बढ़ सी।
महादेव दीदो जो लीजै
जस मिलियौ सो पाछो कीजै।।३३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पृथा पुत्र! जै थूं औ धर्म युक्त जुध नीं करियौ तो थूं पाप रौ भोगी हुवै ला। थारै जुध नीं करण सूं थनै जुध करण री प्रवीणता जकौ महादेव सूं प्राप्त करी जिण सूं थनै जस मिलियौ वौ सगळौ नष्ट व्है जावै ला अर पाप रौ भोगी बणै ला।
।।श्लोक।।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।३४।।

।।चौपाई।।
घणा दिनां तक अपजस व्हैला
जै थूं औ नीं जुद्ध करै ला।
जोधा कै धरमी भूंडीजै
उण सूं पैली मरण गिणीजै।।३४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! लोग थारी घणा दिनां तक अपकीर्ति करै ला। जकौ धरमात्मा अर शूरवीर व्है उण रौ अपजस मरणा सूं ई घणौ बत्तो व्है है मतलब सैणा समझणा रै वास्तै अप कीर्ति मरणा सूं ई बुरी बात व्है।
।।श्लोक।।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्।।३५।।

।।चौपाई।।
धीर वीर सगळा तव मानै
जुध छोड़्यां डरियोड़ा जाणै।
महारथीं तव गिण सी पोचा
छत्ते जोर लवै क्यूं लोचा।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं सगळा मिनखां री निजरां मेंं घणौ सूर वीर अर धीर गंभीर जोधो गिणीजै है सगळा महरथी दुर्योधन अर करण रै खातर थूं जुध सूं भागियोड़ै कायर जोधौ वाजे ला। थूं ताकतवार व्हैतां थको औ लोचो क्यूं लागण दै।
।।श्लोक।।
अवाच्यवादांश्र्च बहून्वदिष्यन्ति तवहिता:।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दु:खतरं नु किम्।।३६।।

।।चौपाई।।
अरि सगळा देवे ला मेणा
कायरता गिणवासी सैणा।
इण सूं बत्तो की दुख होसी
कुळ रै दाग लगाय र रोसी।।३६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थारा सगळा दुसम थारी भूंडियां करे ला। थनै कायर गिणाय र मेणा देवे ला। थारा कुळ रै बिन कारण दाग लागे ला। थारै वास्तै इण सूं बत्तो कांई दुःख होय सके ला।
।।श्लोक।।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्य से महीम्।
तस्मादुतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय:।।३७।।

।।चौपाई।।
मरियां मिलसी सुरपुर ठायौ
जीत व्हियां जुध राज कमायौ।
दोन्यू कानी लाभ इ जाणौ
उठ अर्जुन जुध करणी ठाणौ।।३७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जै थूं जुध में मारीजगो तो थनै सुरग अवस मिलणौ है नै अगर थूं जुध जीतगो तो थनै पृथ्वी रौ राज भोगण नै मिलेला। थारै तो दोई कानीं लाभ ई लाभ है इण खातर हे कौन्तेय! उठ अर जुध करण री निस्चै कर।
।।श्लोक।।
सुख दु:खे समे कृत्वा लाभा लाभौ जया जयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं प्रापमवाप्स्यसि।।३८।।

।।चौपाई।।
सुख दुख दोई एक समाना
हार जीत में चित रख ठाणा।
लाभ हाणि तो आणी जाणी
जुध करणा सूं पाप भगाणी।।३८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सुख अर दु:ख तो एक समान है। जीत हार में थूं विचलित मत व्है।
लाभ हाणि नै ई थूं बराबर गिण पछै थूं जुध करण खातर तैयार व्है जा। इण भांत जुध करण खातर तैयार होण सूं थारा सगळा पाप नाश व्है जावे ला।
।।श्लोक।।
एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।३९।।

।।चौपाई।।
आ बुध ग्यान जोग तव दीधी
कर्म जोग विधि दूजी कीधी।
करमां रा बंधण छूटेला
उण पुळ अर्जुन ए खूटेला।।३९।।
(खूटेला=नष्ट हो जाएगी)

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पार्थ! आ बुद्धि थारै वास्तै ग्यान जोग खातर बताई है अर अबै थूं इण नै कर्म जोग विषय में सुण-इण बुधबळ में भरमिजियोड़ौ थूं कर्म बंधण नै आछी तरियां सूं त्याग देवै ला। मतलब कै थूं इण नै समूळ नष्ट कर देवै ला।
।।श्लोक।।
यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।४०।।

।।चौपाई।।
कर्म जोग यु बीज नीं खूटै
नीं रैवेला दोष इ पूटै।
जलम मरण रा दंश मिटेला
कर्म जोग रक्षक ऊभे ला।।४०।।
{(कर्म जोग= कर्म योग)
(खूटै=नाश होना)(पूटै=पिछे )}
।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! इण कर्म जोग रौ सुरु रौ अर्थ बीज रौ नाश व्हैणौ नीं है अर इण रौ फळ रूप दोष इ नीं व्है। हां अलबत्ता कर्म जोग रूप धर्म रौ थोड़ौ सो ई साधन जलम मरण रा डर सूं रक्षा करै है।।
।।श्लोक।।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरै केह कुरूनन्दन।
बहुशाखा ह्यन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।४१।।

।।चौपाई।।
हे कुरुनन्दन बुध घण सारी
थिर सुभाव री होवै न्यारी।
बुध रा भेद अनन्त बताया
जिण रा अजलग पार न पाया।।४१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे कुरुनन्दन! इण कर्मजोग(कर्मयोग)में थिर बुद्धि फगत एक इज है पण अस्थिर विचार वाळी विवेक हीण मिनखां री बुद्धियां निस्चै ई घणा भेदां वाळी व्है। ए अनंत हुया करै।
।।श्लोक।।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:।।४२।।

।।चौपाई।।
वाणी जिण री फूल बिछावै
वेद वचन रा वाचा ठावै।
कर्म फळां रा गुण गिणवावै
आ बोदी बुध वाळा चावै।।४२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकां री वाणी में वृक्षां रै पुष्प जैड़ी सुगंध आवती व्है जकौ अग्यानी अविवेकी बुध हीणा वेद वाक्य सूं कर्म फल गिणावै वै झूठा है।
।।श्लोक।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।४३।।

।।चौपाई।।
इम कामी बण नामी वाजै
सुरग पावणा री धुन गाजै।
जलम कर्म फळदायक लाणै
भांत भांत किरयावां जाणै।।४३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जको भोगकामना नै इज खुद रौ सुभाव बणाय लियौ जको कै सुरग प्रधान मानण वाळा मिनख कर्म फळ नै देवण वाळी इज बातां करै वै बार बार इण संसार चक्र में भमता रैवै।
।।श्लोक।।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।४४।।

।।चौपाई।।
भोग कामना में रत रैवै
चित विवेक बुध हीणा ह्वैवै।
क्रिया भेद रा कूट रचाळा
वाणी सूं बिलमावण वाळा।।४४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ भोग अर ऐश्वर्य में आसक्त (रत, लीन) रैवै अर क्रिया भेद नै विगसाय र बतावण वाळा बिलमावण वाळी वाणी सूं चित्त हर लियौ है। उठै बुद्धि रौ टिकाव(ठहराव) घणी जेज तक नीं हुवै।
।।श्लोक।।
त्रैगुण्य विषया वेदा निस्त्रै गुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वद्वों नित्य सत्त्वस्थो निर्योग क्षेम आत्मवान्।।४५।।

।।चौपाई।।
वेद करै तिरगुण परकाशा
थूं निस्कामी अर्जुन खासा।
योगक्षेम नीं चावण वारा
थिर बुध सूं परमातम धारा।।४५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं निर्द्वन्द्व है अर्थात सुख दु:ख खातर द्वंद्व रहित है अर सागै ई सत्वगुणी है
भगवान समझावै-थूं निर्योगक्षेम है जिण रौ मतलब अप्राप्य वस्तु नै प्राप्त करण जोग इण रौ इज नाम योग है अर प्राप्य वस्तु री रक्षा करण रौ नाम क्षेम है। इण रौ मतलब थूं योगक्षेम नै नीं चावण वाळौ है अर आत्मवान है, परमात्मा में थिर बुध राखण वाळौ है।
।।श्लोक।।
यावानर्थ उदपाने सर्वत:सम्प्लुतोदके।
तावान्सवर्षु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत:।।४६।।

।।चौपाई।।
नद नाळां सूं बांध बणाया
तद नद नाळा मान घटाया।
ब्रह्म तत्व नै जाणण वाळा
ब्राह्मण लेय वेद सूं टाळा।।

।।भावार्थ।।
सगळी कानी सूं (नदी, नाळां सूं)भेळौ होय र जद पाणी सूं बांध बणै उण रै पछै वां नदियां, नाळां, नाडियां रौ महत्व कम व्है जाय उण इज भांत ब्रह्म तत्व नै जाणण वाळा ब्राह्मण(महात्मा, संन्यासी) खातर वेद रौ ग्यान (उण मांय समाय जाय) घणौ मेहताऊ नीं मानी जै।
।।श्लोक।।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।४७।।

।।चौपाई।।
कर्म मांय ने व्है अधिकारा
फळ में जाण मती हक थारा।
कर्म करण री तज मत तासा
मोह त्याग कर कर्म ज खासा।।४७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थारौ अधिकार कर्म करण रौ इज है। ग्यान निष्ठा रौ अधिकार थारौ नीं है। मतलब कै फळ प्राप्ति रौ अधिकार थारौ नीं है। थनै किणी अवस्था कर्म करणौ नीं छोड़णौ है पण फळ प्राप्ति रौ मोह त्यागणौ पड़ेला।
जे थारी तृष्णा कर्मफळ प्राप्ति री व्ही तौ थूं कर्मफळ प्राप्ति रौ कारण बणै ला।
।।श्लोक।।
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।४८।।

।।चौपाई।।
थिर मन व्है कर कर्म ज प्यारा
कर्म बिना नीं तव उद्धारा।
सिद्धी असिद्धि गिण सम भावा
यो इज कर्मयोग कहलावा।।४८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे धनंजय! थूं थिर होय र फगत कर्म करतो जा अर पछै फळ मिलण री आसा तज दै।
बिना फळ री तृष्णा रै अंतस सूं करियोड़ा कर्म सूं इज मिलवा वाळौ ग्यान सिद्धि वाजै है। अर जे ग्यान प्राप्त नीं व्है तो उणनै असिद्धि कैवै। जद आपां सिद्धि अर असिद्धि नै सम भाव बरतता थका कर्म करां उणनै कर्मयोग कैवै।
।।श्लोक।।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धि योगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छकृपणा:फलहेत्तव:।।४९।।

।।चौपाई।।
कर्म रूप सकाम एओछा
इणनै गिणौ धनंजय लोचा।
सम बुध योग ज कर्म निहारौ
फळ रौ हेतु बणै दुखियारौ।।४९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!इण समत्व रूप बुद्धि योग सूं सकाम कर्म योग घणौ ओछो है। इण खातर हे धनंजय! थूं सम बुद्धि में इज रक्षा रौ उपाय सोध। मतलब कै बुद्धियोग रौ इज आसरौ अंगेज (ग्रहण कर) क्यूं कै फळ रौ हेतु (कारण) बणण वाळौ दुखियारौ व्है।
।।श्लोक।।
बुद्धि युक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्।।५०।।

।।चौपाई।।
तजै पाप पुन समबुध वाळौ
समत्व रूप उबारण गाळौ।
छूटण कर्म बंध रा पाया
पारंगत यु समत्व उपाया।।५०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! समबुद्धि वाळौ मिनख पुन अर पाप दोनू इण लोक में इज छोड़ दै है। मतळब वौ उण सूं मुक्त व्है जावै है। इण खातर थूं समत्व रूप योग में लाग जा। ओ समत्व रूप योग इज कर्मां में कुशलता (पारंगतता) लावै है। मतळब कर्म बंध सूं छूटण रौ उपाय है।
।।श्लोक।।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण:।
जन्मबन्ध-विनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम्।।५१।।

।।चौपाई।।
सम बुध रा ग्यानी सब जागै
कर्म फलां रा बंधण त्यागै।
जलम रूप सूं मुगत हु जावै
निर्विकार रौ पद वै पावै।।५१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!सम बुद्धि वाळौ ग्यानी मिनख कर्म सूं होवण वाळा फळ नै तज नै जलम रूप बंधण सूं मुगत व्है निर्विकार परम पद ने प्राप्त होय जाय है।
।।श्लोक।।
यदा ते मोह-कलिलं बुद्धिर्व्यति-तारिष्यति।
तथा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

।।चौपाई।।
जिण पुळ थारी बुध जागे ला
मोह रूप दळदळ लांघे ला।
तद सुणि सुणवा वाळा रागी
उठै बणै ला थूं वैरागी।।५२।।
{(लांघे ला = पार कर जाएगा़)
।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण व़गत थारी बद्धि मोह पास सूं आछी तरियां दळ दळ पार कर जावेला उण व़गत थारौ सुणियोड़ी अर सुणण जोग, इह लोक अर परलोक सूं जुड़िया सगळा भोगां सूं वैराग होय जावेला।
।।श्लोक।।
श्रुति-विप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धि: तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।।

।।चौपाई।।
तरह तरह सुण बातां न्यारी
बुध हुयगी तद विचलित थारी।
चित थिर लावण लेय समाधी
योग कर्म रौ बणजा आदी।।५३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं तरह तरह रा वचनां नै सुणणा सूं थारी बुद्धि विचलित व्हैगी है। जिण दिन थारी बुद्धि परमात्मा में थिर व्है जावेला उण व़गत थूं योग नै प्राप्त कर लेवै ला। मतळब थारौ परमात्मा सूं नित संयोग (योग कर्म युक्य) हो जावेला।
।।श्लोक।।
स्थिर-प्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीति व्रजेत किम्।।५४।।

।।चौपाई।।
केशव वै लक्षण दिखला जा
थिर बुध वाळा करलै साजा।
किम बोलो, बैठो किण जागा।
किण किण ठौड़ लिजावै आगा।।५४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे केशव! समाधी में लीन परमात्मा नै अंगेजणिया मिनख रा कांई लक्षण हुया करै है। ऐड़ौ थिर बुध वाळौ मिनख कीकर बोलै है, उण री उठक बैठक केड़ी व्है अर वौ कीकर चालै है?
।।श्लोक।।
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।५५।।

।।चौपाई।।
मन में बसी कामना त्यागै
व़गत इसो इज हिय में जागै।
आतम तुष्ट आत्म सूं व्हैजा
वौ पुळ थिर बुध ग्यान कहै जा।।५५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण व़गत में मिनख आपरै मन री सगळी कामनावां नै तज दै अर उण रै अंतस री आत्मा सूं आत्मा तरपत (संतुष्ट) व्है जाय। वा अवस्था थिर बुद्धि वाळी वाजै।
।।श्लोक।।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।५६।।

।।चौपाई।।
जिण रौ हिय दुख में नीं दाझै
सुख में तृष्णा मिटती गाजै।
जिण रा राग, क्रोध भय भागा
इसड़ा मुनि थिर बुध रा लागा।।५६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण रै दु:ख आयां मन में उथळ पुतळ नीं मचै अर सुख मिलियां मन री तृष्णा मिट जाय अर्थात इतरावै कोनी थिर रैय जाय। जिण रा राग भय क्रोध मिट जाय ऐड़ा इज संत (मुनि)थिर बुद्धि वाळा वाजै।
।।श्लोक।।
य: सर्वत्रानभिस्नेह: तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठता।।५७।।

।।चौपाई।।
जकौ रवै बिन नेह सदा ई
राग द्वेष राखै हिय ना ई।
शुभ ‘र अशुभ‌ गिणै इक ढाळा
इसड़ा नर व्है थिर बुध वाळा।।५७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जको मिनख सब जगा बिना नेह रै रैय जाय। जको शुभ अर अशुभ दोनू ई अवस्था में बिना खुश व्हियां या बिना द्वेष राखियां ऐक सरीको रैय जाय वो मिनख हमेशां थिर बुद्धि वाळौ कहावै।
।।श्लोक।।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽड़गानीव सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्य: तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।५८।।

।।चौपाई।।
काछब ज्यूं ढक लेय शरीरा
त्यूं इन्द्रिय नै वस कर वीरा।
इतरा गुण जिण नर रै साजै
वौ इज थिर बुध वाळौ वाजै।।५८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण भांत काछबौ विपत पड़तां ई आपरै शरीर रा सगळा अंगां नै समेट र मांय छिपाय दै उण इज भांत सावचेत मिनख आपरी इन्द्रियां नै संसार रा सगळा भोगां रा विषयां सूं अळगी राख लै।
इण अवस्था रौ मिनख इज थिर बुद्धि वाळौ वाजै।
।।श्लोक।।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।
रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते।।५९।।

।।चौपाई।।
जे नर इन्द्रिय विषय ज त्यागे
लवणा वांरै ई तो जागै।
परम तत्व नै जाणण वाळा
इण लवणा रा तज दै जाळा।।५९।।
(लवणा=आसक्ति)

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जको मिनख इन्द्रियां सूं विषयां नै ग्रहण करणौ छोड़ दै तो वांरौ विषय भोग तो अळगौ रैवै पण उणनै ग्रहण करण री लवणा (आसक्ति) वां सूं अळगी नीं व्है।
पण जको परम तत्त्व नै जाणण वाळा है वांरै तो आ लवणा ई समाप्त व्है जाय है। वै इण लवणा सूं निवृत व्है जाय है।
।।श्लोक।।
यततौ ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:।।६०।।

।।चौपाई।।
विषय वासना जको पुराणी
इन्द्रिय रै वस में नीं आणी।
हे अर्जुन ग्यानी नर ने ई
भख में लै लै ए माडै ई।।६०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जठा तक लवणा(आसक्ति) रौ नाश नीं व्है तद तक पूराणा सुभाव री इन्द्रियां कोशिश करती थकी ग्यानी मिनख रा मन नै ई माडाणी हर लै।
।।श्लोक।।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।।

।।चौपाई।।
हिय मेंं चिंतन हरि री राखै
इन्द्रिय व्है वस में नित जांकै
साधक री मरजी आ जाणी
थिर बुध उण री अवस बखाणी।।६१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकण रौ ध्यान परमात्मा में लीन व्है, जिण री इन्द्रियां वस में व्है उण मिनख री बुद्धि थिर व्है जाय है मतलब वो थिर बुध वाळौ मिनख कहावै।
।।श्लोक।।
ध्यायतो विषयान्पुंस: सड्गस्तेषूपजायते।
सड्गात्सन्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते।।६२।।

।।चौपाई।।
जब लग ध्यावै विषय विकारा
मन लागै उण ठौड़ जिहारा।
तिहि कारण उपजे हद कामा
काम सु आवै क्रोध सुनामा।।६२।।
(सुनामा=सुनामी)

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जका मिनखां री विषयां रा चिंतन में लवणा लाग जाय तद इण लवणा रै कारण उणरी वां विषयां रै प्रति कामना जागृत व्है जाय अर जद कामना में व्याधान आय जाय तद क्रोध आवण लाग जाय मतलब क्रोध री सुनामी उपड़ जाय।
।।श्लोक।।
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाश: बुद्धिनाशात्-प्रणश्यति।।६३।।

।।चौपाई।।
क्रोध मोह सूं जाय विवेका
गयां विवेक भरम उत देखा।
तिण सूं होवै बुध रा नाशा
बुध नाशा सूं मिनख विनाशा।।६३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मिनख नै जदै रीस (क्रोध) आवै छंद इण क्रोध रा मोह सूं अविवेक जलमें यानी स्मृति रौ भ्रम पैदा व्है। मतलब भूल पड़ै अर इण इज स्मृति भ्रम सूं(अविवेक सूं, भूल पड़ण सूं) बुद्धि रौ नाश व्है। बुद्धि रौ नाश होवण सूं मिनख रौ नाश व्है जाय मतलब मिनखपणौ समूळौ नष्ट व्है जाय।
।।श्लोक।।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।६४।।

।।चौपाई।।
राग द्वेष बिन इज वै लेवै
इन्द्रिय रै विषयां में रैवै।
अंतस री मिटजा नाराजी
वौ नर रैवै राजी राजी।।६४।।
(करेड़ो=वश में किया हुआ)
।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जको मिनखआपरा अंतस नै आपरी इन्द्रियां सूं वश में करियोड़ौ है जिण में राग द्वेष नेड़ौ आगो ई नीं है वौ मिनख इन्द्रिया कानी सूं विषयां में विचण करतो थको अंतस सूं प्रसन्नता री प्राप्ति करै मतलब साजो ताजो रैवतौ थक़ो राजी खुशी रैवै।
।।श्लोक।।
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवृतिष्ठते।।६५।।

।।चौपाई।।
अंतस सूं जद वौ खुश होवै
तद वौ सगळा दुख नै खोवै।
हरखित चित रौ थिर बुध वाजै
परमेश्वर में चित्त विराजै।।६५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मिनख में जद अन्त:करण री प्रसन्नता हुवै तद उण रा सगळा दु:खां रौ नाश हुय जावे। अर हरख करणिया कर्म योगी री बुद्धि सब जगा सूं हट र परमात्मा में लीन होय जाय है अर्थात आछी तरियां थिर व्है जाय है।
।।श्लोक।।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम्।।६६।।

।।चौपाई।।
जिण री इन्द्रिय वश में नाही
निश्चयवाळी बुध थिर काही।
जको काम रा माठा व्है है
वो किण विध सुख पाय सकै है।।६६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जका मिनख री इन्द्रियां संयमित नहीं व्है उण मिनख री निश्चयात्मक बुद्धि नीं व्है। उण मिनख रै अंतस री भावना ई जागियोड़ी नीं व्है इण कारण उण नै शान्ति नीं मिलै अशान्त मिनख सुख कीकर पाय सकै।
।।श्लोक।।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।६७।।

।।चौपाई।।
विषयां सूं विचरित इन्द्रिय जा
मन नै अपणै सागै लिय जा।
जिम कस्ती नै पवन भमावै
तिहि मन बुध नै औ हर लावे।।६७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! ज्यूं कै पाणी में चालण वाळी नाव नै हवा (पवन)भमाय (दिशा मोड़ लै)दै उण इज भांत विषयां में विचरतोड़ी इन्द्रियां सूं मन जिण इन्द्रिय रै साथै रै’वै वा एक इज इन्द्रिय उण मिनख री बुद्धि हर लेवै है।
।।श्लोक।।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश:।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६८।।

।।चौपाई।।
इणी वास्ते सुण महाबाहो
इन्द्रिय है जिण रै वस माहो
परमेश्वर में चित्त लगाळी
तिण री बुध गिण है थिर वाळी।।६८।।
(लगाळी=लगाने वाली)
।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे महाबाहो! मिनख री इन्द्रियां इन्द्रियां रै विषयां में सब तरह सूं निग्रह(वश में) करियोड़ी है उण मिनख रीबुद्धि (प्रज्ञा) थिर (प्रतिष्ठित) है।
।।श्लोक।।
या निशा सर्वभूतानां तस्या जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।६९।।

।।चौपाई।।
सब प्राणी कूं जिम निश लागै
परमतत्व वाळौ उत जागै।
सुख भोगणिया दिन गटकावै
पण मुनि वै दिन रात जगा्वै।।६९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जको बगत (सर्वु भूतानाम्)सगळा प्राणियों रै वास्ते(निशा) रात रै ज्यूं लखावै है उण (तस्याम) परमतत्व नै पावण वाळौ(संयमी)मिनख जागतो रैवै है। अर जको इण नाशवान संसार रा सगळा सुख भोगणिया मिनख परमात्म तत्व कानी सूं सोयोड़ा जैड़ा है। जठै कै परमात्मा रा तत्व नै जाणणिया, स्थित प्रज्ञ (थिर बुध वाळा) मुनि ग्यानी वास्तै औ दिन रात रै जैड़ौ घोर अंधारा ज्यूं इज है अर वै दिन रात जागता रैवै परमात्मा में लीन रैवै।
।।श्लोक।।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामा कामी।।७०।।

।।चौपाई।।
नद मिलियां समदर नीं फूलै
तिहि नर सुख दुख में नीं झूलै।
गिण लै सुख दुख एक समाना
थिर बुध राखै शान्त जिहाना।।७०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण तरह न्यारी न्यारी नदियां रौ पाणी समुद्र मांय आय र मिलियां सूं समुद्र प्रभावित नीं व्है वौ अविचल इज रैवे अर सगळी नदियां उण मांय समाय जाय तो ई वो नहीं तो फूलै अर नदियां रौ पाणी घटियां सूं समदर विचलित नहीं व्है। उण इज भांत थिर बुध वाळौ मिनख जको परमात्मा में लीन हैं वो ई अविचल इज रैवै। सुख दुख में एक सो रैवै।
।।श्लोक।।
विहाय कामान्य: सर्वान् पुमांश्चरित नि:स्पृह:।
निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति।।७१।।

।।चौपाई।।
सैंग कामना तजवा वाळौ
ममता अहं ‘र चिंत विहाळौ।
जिण जिण ठौड़ विचरतो जावै
उहा ठौड़ वौ धीरज पावै।।७१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जको मिनख कामनाआं नै तज दै(विहाय) अर जको ममता रहित, अहंकार रहित नै चिंता रहित स्पृहारहित(जीवन निर्वाह खातर आवश्यक वस्तुआं री परवाह नीं करण वाळौ मिनख स्पृहा रहित या निस्पृहा जाणिजे)होवतोड़ौ इज शान्ति प्राप्त कर सकै।
।।श्लोक।।
एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।७२।।

।।चौपाई।।
आ दसा ईज ब्राह्मी वाजै
इण में रैय पछै नीं त्याजै।
अन्त काल में इण में रैवै
इण में रैय ब्रह्म नै सेवै।।७२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पार्थ!(पृथानन्दन)आ(एषा) ब्राह्मी स्थिति (दशा ) है जिण में वौ अंहकार रहित ममता रहित अर स्पृहा रहित व्है जाय। मतलब कै ब्रह्म नै प्राप्त करण री दसा में आय जाय, जद उण नै आ अवस्था प्राप्त व्है जाय तद वौ इण दसा नै छोड़णी नहीं चावै अन्त काल तक वौ इण दसा में रैवणी चावै। वो ब्रह्म री प्राप्ति करलै।

<<पिछला अध्याय<< ============ >>अगला अध्याय>>

अनुक्रमणिका


Leave a Reply

Your email address will not be published.