गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-तीजो अध्याय

तीजो अध्याय – कर्मयोगः

।।श्लोक।।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्माणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

।।चौपाई।।
ग्यान बतायो कर्म सु ज्यादा
हे माधव कर कर ए वादा।
घोर ज कर्म करावण भेजो
हे केशव यो लेखो देजो।।१।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे जनार्दन! जै (चेत्) आप बुध्दि (ग्यान) नै कर्म सूं ज्यादा(ज्यायसी, बत्तो) मानो (मता) तो पछै आप म्हनै घोर कर्म करण वास्ते क्यूं लगाय रह्या हो। मतलब म्हनै युद्ध करण खातर (युद्ध करणौ क्रूर(घोर)कर्म है) क्यूं प्रेरित कर रह्या हो।
।।श्लोक।।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्।।२।।

।।चौपाई।।
एक सरीका आं वचनां से
म्हारी आ बुध भमती जा से।
इहि कारण आ तय कर कैवौ
इम मुझ मुगती रौ मग दैवौ।।२।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे मधुसूदन! आपरा ए मिलता-जुलता आं वचनां सूं आप म्हारी बुद्धि नै मोहित कर रह्या हो सा इण कारण आप उण एक बात नै निश्चय कर नै म्हनै बताओ जिण सूं म्हारै कल्याण रौ मार्ग मिल सकै। अर म्हैं मोक्ष प्राप्त कर सकूं।
।।श्लोक।।
लोकऽस्मिन्द्वविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

।।चौपाई।।
दोय तरह री निष्ठा व्यापी
आ अर्जुन नै पैली आपी।
सांख्य योग इज ग्यान योग व्है
योगी सूं इज कर्म योग व्है।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे निष्पाप अर्जुन! इण लोक में दोय प्रकार री निष्ठावां व्है (साधन री परिपक्वता रौ नाम निष्ठा व्है) ए दो ई निष्ठावां म्हैं थनै पैली इज बताय दी ही(आपी ही) जिण मांय सूं सांख्य योगियां री निष्ठा तौ ग्यान योग सूं मतलब कै सगळी क्रियाआं में करण वाळा रौ घमण्ड अळगो राख र परम पिता परमेश्वर में एक मेक होवणौ इज *ग्यान योग* है इण नै इज *सांख्य योग* अर औ इज *संन्यास योग* कैवे है। अर योगियां री निष्ठा इज *कर्मयोग वाजै है* (फल अर आसक्ति नै त्याग नै त्याग र भगव्द ग्यान अनुसार फगत भगव्दर्थ समत्व बुद्धि सूं कर्म करण रौ नाम *निष्काम कर्म योग* है इण नै इज *समत्व योग*, *बुद्ध योग*, *कर्म योग*, *तदर्थ योग*, *मदर्थ योग*, *मत्कर्म* रै
नामां सूं जाणी जै।
।।श्लोक।।
न कर्मणामनारम्भात् नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्रनुते।
न च सन्नयसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।४।।

।।चौपाई।।
कर्म जठै अकर्म व्है जावै
योग निष्ठ वो बण नीं पावै।
फगत त्यागणौ कर्म न भायो
सांख्य योग ई नीं मिल पायो।।४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मिनख नीं तो कर्मों नै शुरू करियां बिना निष्कर्मता (जिण दसा में मिनख रा सगळा कर्म अकर्म में बदळ जाय उण अवस्था नै निष्कर्मता कैवै है) री दसा में आय सकै है अर नीं ई फगत कर्मों नै त्यागण सूं इज सिद्ध या सांख्य निष्ठ होय सकै है।
।।श्लोक।।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै:।।५।।

।।चौपाई।।
क्षण भर ई इसड़ो नीं व्है है
कर्म कियां बिन रैय सकै है।
गुण रै परवश प्राणी व्है है
परवश होय र कर्म करै है।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कोई भी मिनख कर्म करियां बिना नीं रैवै चाहै वो ग्यानी व्हौ कै अग्यानी उण रा शरीर मांय हरदम (हर क्षण) क्रियावां होवती रैवै चाहै वो जागतो रैवै कै सुपना में कै मुर्छा आयोड़ी व्है मिनख बिना कर्म रै नी रैय सकै क्यूं कै औ मिनख प्रकृति रै परवश होयोड़ो है (सुभाव मिनख री वृतियां सूं बणै नै उणरी वृतियां उणरा गुण सूं बणै अर गुण रौ निर्माण प्रकृति सूं व्है ) इण कारण कर्म करण वास्ते तो मिनख परवश है पण उण में राग द्वेष राखण में वो आजाद हैं।
।।श्लोक।।
कर्मेंन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते।।६।।

।।चौपाई।।
माडाणी इन्द्रिय कर वश में
चित सूं उण नै पकडै कस नै।
इसड़ा मूरख दंभी सारा
मिथ्याचारी हुवै ज न्यारा।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मूरख लोग (मूढ बुद्धिवाळा मिनख) इन्द्रियां रा क्रिया कलापां नै{(कर्मेंद्रियां (वाक् हाथ, पग, उपस्थ गुदा)रै सागै श्रोत्र, त्वचा, आंख नाक अर जीभ) बाहर सूं तो माडाणी रोकियोड़ी राखै पण चित्त सूं इन्द्रियां रा विषयां सूं चिपियोड़ा रैवै इण खातर व्है मिथ्याचारी वाजे (कहावै)है।
।।श्लोक।।
यास्तिन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त:स विशिष्यते।।७।।

।।चौपाई।।
मन सूं इन्द्रिय वश में लेवौ
हे अर्जुन मर्यादित रैवौ।
बिन निज हित थूं कर्म कियां जा
पछै सिरै बण नै जीयां जा।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं मन सूं थारी इन्द्रियां(अठै इन्द्रियां-वाक्, हाथ, पग, उपस्थ, गुदा, आंख, कान, नाक, त्वचा अर जीभ)नै वश में करलै। अर मर्यादित (शास्त्र विधि रा कर्म) रैवणौ सीख जा। इण रौ मतलब कै इन्द्रियां रौ अच्छी तरह सूं नियमन करणौ जाण लै।
अर्थात इन्द्रियां नै कर्तव्य कर्म में लगावणौ जिण सूं इन्द्रियां रौ संयम मते ई व्है जाय। अठै बिना निज हित दूजां रौ हित करण वाळौ कर्म योगी सिरै(श्रेष्ठ) हुवै है।
।।श्लोक।।
नियतं कुरु कर्मत्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।८।।

।।चौपाई।।
शास्त्र नीति रा कर्म कियां जा
नीं करणा सूं सिरै गिणा जा।
कर कर्तव्य कर्म नित प्यारा
जिण सूं होसी वारा न्यारा।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं क्षत्रिय होवण रै कारण थारा वर्ण धर्म रै मुताबिक परिस्थिति वश युद्ध करणौ थारौ स्वाभाविक कर्म है। इण वास्तै औ नियत कर्म है
आगै भगवान समझावे कै कर्म नीं करणा रै बदळै कर्म करणौ घमौरियां सिरै (श्रेष्ठ)है। मतलब कर्म त्यागणा री तुलना में नियत कर्म करणौ श्रेष्ठ है। बिना कर्म करियां जीवण रौ निर्वाह नीं व्है सकै।
।।श्लोक।।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म बन्धन:।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसड़्ग: समाचार।।९।।

।।चौपाई।।
यज्ञ ज साधै हित दूजां रा
करलै वै कर्त्तव्य ज सारा।
स्वारथ सूं मत बन्ध ज प्यारा
हे अर्जुन!कर कर्म ज न्यारा।।९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे कुन्ती नन्दन! थूं यज्ञ(कर्त्तव्य पालन रै कर्म रौ नाम यज्ञ है)कर न्यारा न्यारा वर्णौं रा न्यारा न्यारा कर्म व्है उण में इज स्वधर्म कर परधर्म रा आंकलन व्है। यज्ञार्थ कर्म करण वाळा रौ मन परमात्मा में लीन व्है। निष्काम भाव सूं करियो कर्म स्वधर्म व्है अर सकाम भाव सूं करियो पर धर्म(अन्यत्र धर्म) कहावे। जद मिनख स्वार्थ भाव सूं कर्म करै तद वो कर्म बंधन में बंध जाय इण वास्ते आसक्ति रहित होय र कर्म कर।
।।श्लोक।।
सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:।
अनेन प्रसविष्यध्यवमेष वोऽस्त्वष्टकामधुक्।।१०।।

।।चौपाई।।
ब्रह्मा जी रच सृष्टि ज कहियौ
कर्म कर्त्तव्य करता रहियौ।
कर्म करो निष्काम इ सारा
मोक्ष मिलण रा ए आधारा।।१०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! प्रजापति ब्रह्मा जी सृष्टि री रचना कर नै कह्यौ कै थै सगळी प्रजा ( अठै मिनखां रै वास्ते)कर्त्तव्य रा विधान रै सागै प्रजा री रक्षा अर कल्याण खातर वृद्धि करौ।
हे अर्जुन!निष्काम भाव सूं करिया कर्म सूं इज मोक्ष मिलै। अर कर्त्तव्य कर्म री सगळी सामग्री ब्रह्मा जी प्रदान करै है।
।।श्लोक।।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ।।११।।

।।चौपाई।।
देवां रौ मन अब थै ठारौ
देव ऋषि करसी हित सारौ
एक एक रौ बणौ सहारौ
जिण सूं सुख पावै जग सारौ।।११।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कर्म योगी रौ ध्यैय आपरा कर्त्तव्य कर्मों सूं प्राणी मात्र नै सुख पहुंचावणौ व्है। इण खातर ब्रह्मा जी सगळा प्राणियां री उन्नति खातर कर्त्तव्य पालण रौ आदेश देवै। जिण सूं उण रौ कल्याण हुवै। इण खातर एक एक लौ सहयोग करण रौ कैवै। अर और इज मुगती रौ मारग है।
।।श्लोक।।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो तो भुड़्क्ते स्तेन एव से:।।१२।।

।।चौपाई।।
यज्ञ सामग्री देव इ दै ला
उत थूं कर्म निभावण लै ला।
निज हित त्याग करौ हित वां रौ
नीं तो चोर कहै जग सारौ।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! यज्ञ (कर्त्तव्य पालण रौ कर्म) री सगळी सामग्री थानै देवगण दियां जायला। पण आ खुद रै भोगण खातर नीं देय र दूजां रा कर्त्तव्य पालण खातर मिनख नै दैवै है थूं इण नै खुद खातर नीं लगाय र दूंजा रै हित खातर लगाय लै। पण वो मिनख जको दूजां रै हित खातर दियोड़ी सामग्री नै खुद उपयोग करण लाग जाय तद वो चोर बण जाय। उण मिनख रौ अंतस कदै ई शान्त अर शुद्ध नीं होय सकै।
।।श्लोक।।
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।१३।।

।।चौपाई।।
करौ कर्म निष्काम भाव सूं
योग शेष उपयोग चाव सूं।
स्वारथ सूं पापी बण जावै
पाप भोगतो जूण घमावै।।१३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कर्त्तव्य कर्म रौ विधि पूर्वक निष्कामभाव सूं पालण करणा रौ प्रतिफल (यज्ञ शेष रै रूप में व्है) है)योग समता है। कर्म योग री आ खासियत व्है कै (औ कर्म योग आपने संसार सूं इज मिलै जिण नै संसार खातर इज लगावणौ हुवै पण उण नै खुद खातर लगावण सूं कर्म बंधण में बंध जाय जिण सूं मुक्त होवण खातर कर्म यज्ञ सिद्ध करणौ पड़ै है।
।।श्लोक।।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न-सम्भव:।
यज्ञाद्भवति पर्जन्य: यज्ञ कर्म-समुद्भवम्।।१४।।

।।चौपाई।।
सब प्राणि अन्न सूं जलमे है
बिरखा सूं इ अन्न पनपै है।
बिरखा यज्ञ कियां होवै है
कर्म करण सूं यज्ञ हुवै है।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!सगळा प्राणियां री उत्पत्ति अन्न सूं इज हुवै है अर अन्न रौ निर्माण बिना जळ रै सम्भव नीं है जळ रौ मोटो स्त्रोत बिरखा है जिण सूं कूआ, ताळाब नदी नाळा भरीजे है अर इण (वृष्टि)बिरखा लावण खातर यज्ञ (कर्त्तव्य कर्म)करणौ पड़ै। यज्ञ त्याग सूं इज फलीभूत हुवै है।
।।श्लोक।।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।१५।।

।।चौपाई।।
वेदां सूं कर्मों नै जाणौ
अक्षर सूं ई वेद पिछाणौ।
सब जागा परमेसर पावै
नित्य कर्म सूं थित व्है जावै।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!वेद(ब्रह्म) कर्त्तव्य करण री विधि बतावै। इण कारण इज कर्मों री उत्पत्ति वेदां सूं जाणिजे।
वेद परमात्मा सूं प्रकट हुवै है अर कर्त्तव्य पालण री विधि बतावै है अक्षर रौ निर्माण वेद में इज व्है है। जिण सूं यज्ञ उत्पन्न हुवै है पछै यज्ञ सूं इज बिरखा हुवै बिरखा सूं इज अन्न पैदा व्है अर अन्न सूं सगळा प्राणी हुया है। आं प्राणियां में मिनख व्है है अर ए मिनख इज कर्त्तव्य-कर्म रौ पालण करै है। जठै निष्कामभाव सूं कर्त्व्य-कर्म रौ पालण व्है उठै परमात्मा विराजमान व्है। परमात्मा अविनाशी है अर सब जागा (सर्व व्यापी)पाया जावै अर उठै नित स्थित व्है है।
।।श्लोक।।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य:।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।।१६।।

।।चौपाई।।
परम्परा सूं नीं चालणियौ
भोग इन्द्रियां रौ लेवणियौ।
उत वो अर्जुन पाप कमावै
बिरथा ई इम जूण घमावै।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जको मिनख इण तरह परम्पारा सूं प्रचलित सृष्टि रा चक्र रै मुताबिक नीं चालै मतलब कै आपरै कर्त्तव्य रौ पालण नीं करै वो इन्द्रियां रौ भोग लेवणियो रैवै। एड़ा मिनख नवा नवा पाप करै अर पापी कहावै वां मिनखां रौ जीवणौ बिरथा (व्यर्थ)इज है।
।।श्लोक।।
यास्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यां न विद्यते।।१७।।

।।चौपाई।।
जो आतम में रम तरपत व्है
अर आतम रौ संतोखी व्है।
उण नै कीं ई नीं करणौ व्है
नीं पाणौ ई बाकी हो व्है।।१७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे पार्थ! अठै वां त्यागी मिनखां री विलक्षणता रा बखाण करिया है।
जिणरी रति(प्रीति), तृप्ति अर सन्तुष्टि बाकी नीं बची है वांनै आं सूं विरक्ति व्हैगी है। मतलब यां नै आत्मा सूं त्याग दी है। जको आत्मा में इज रमण करण वाळौ, आत्मा सूं तरपत (तृप्त)होवण वाळौ अर आत्मा सूं इज सन्तुष्ट होवण वाळा मिनख रै अबै कोई कर्त्तव्य पालण रौ काम बाकी नीं है।
।।श्लोक।।
नैव तस्य कृतेनार्थौ नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय:।।१८।।

।।चौपाई।।
कर्म करण रौ पुन नीं जिण नै
नीं करणा रौ दोष न उणनै।
दुनिया सूं नीं लेणौ देणौ
तिण सूं हित दूजां रौ व्हैणौ।।१८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! उण महा पुरुष रौ इण दुनिया में नीं तो कर्त्तव्य कर्म करण रौ कोई ध्येय(प्रयोजन) है मतलब इण कर्म करण सूं नीं तो लाभ मिलणौ है अर नीं ई कर्म नीं करण सूं कोई कर्म निवृति रौ प्रयोजन व्है। एड़ा कर्मयोगी सिद्ध महा पुरुष रौ निज हित खातर कोई संबंध नीं व्है है। मतलब इण दुनिया रा सगळा पदार्थां सूं कीं लेणौ देणौ नीं है। इण शारीरिक सुख सूं रत्ती भर (किंचित्मात्र) ई स्वारथ नीं है।
।।श्लोक।।
तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुष:।।१९।।

।।चौपाई।।
बिन निज हित रा कर्म कियां जा
भली भांत हरमेश निभा जा।
बिन निज हित करिया सब काजा
परमेश्वर मिलणा रा साजा।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! इण वास्ते थूं हरमेश(लगातार, निरन्तर)आसक्ति रहित होय र कर्त्तव्य कर्म नै करियां जा। क्यूं कै बिना निज हित चावणियौ कर्त्तव्य कर्म करण वाळौ मिनख परमात्मा री प्राप्ति सहज होय र कर सकै है।
।।श्लोक।।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।
लोकसड़्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।२०।।

।।चौपाई।।
जनक जिसा निष्कामी ग्यानी
कर्म योग री सिद्धी जाणी।
करलै औ थापित लोगां में
कर्म योग सूं हरि है ज्यां में।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!राजा जनक जिसड़ा ग्यानी ग्हस्थाश्रम में रैय र निष्कामभाव सूं(आसक्ति रहित) सगळा कर्म करता थका परम सिद्धि नै प्राप्त करली (परमात्मा री प्राप्ति करली) अर वै सगळा राजा जको जनक सूं पैली अर जनक रै पछै हुया ई परम सिद्धि प्राप्त करली।
अठै लोक संग्रह रौ अर्थ हुवै लोकमर्यादा नै सुरक्षित राखणी। इण वास्ते निस्वार्थ भाव सूं कर्म करणौ जरूरी हुवै।
भगवान अर्जुन नै समझावै कै-थनै कर्म योग रौ आदर्श थापित करणौ है जिण सूं परमात्मा री प्राप्ति व्है मतलब परम सिद्धि मिलै।
।।श्लोक।।
यद्यदाचरित श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।२१।।

।।चौपाई।।
चोखा मिनख करै जो काजा
तेंही काज करै जन साझा।
छोड़ प्रमाण जको बै जावै
बौ अनुसरण करण सब आवै।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!संसार सूं मिलियोड़ौ शरीर, धन, परिवार अधिकार सगळा पदार्थ दूजां री सेवा में लगावण खातर मिलिया है। श्रेष्ठ पुरुष (चोखा मिनख) मिनख मात्र रै खातर आदर्श व्है है वां रा आचरण हरमेश शास्त्रमर्यादा रै अनुकूल हुवै है जिण सूं मते ई कर्त्तव्य रौ पालण व्है। तिण सूं सगळा संसार रौ स्वत: ई हित होवै है। वै जिण भाव सूं प्रमाण छोड़ र जावै सगळा लोग उण रौ इज अनुसरण करै है। क्यूं कै वां रा भाव असीम रौ प्रभाव असीम हुवै है।
।।श्लोक।।
न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानावाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।२२।।

।।चौपाई।।
सकल पदारथ पाया सब ही
शेष रया अब कोय न अज ही।
जन हित कर्म करूं रै प्यारा।
बिना कर्म नीं मुझ उद्धारा।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारै वास्ते तीनो लोकां में करण जोग कोई कर्त्तव्य कर्म प्राप्त करणा बाकी नीं रह्या है। तो ई म्हैं लोकसंग्रह खातर कर्त्तव्य कर्म करतो जाय रह्यो हूं। म्हैं कर्म रै प्रति सजग हूं नीं तो इण में आळस करूं हूं अर नीं ई कर्म री उपेक्षा।
।।श्लोक।।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।२३।।

।।चौपाई।।
जे नीं करूं सावचेती सूं
तो म्हैं उत आळस में जी सूं।
क्यूं कै सब म्हारै मग चालै
वां नै हे अर्जुन कुण झालै ?।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं घणी सावधानी राख र कर्म करूं हूं। क्यूं कै सगळा मिनख म्हारा कर्म रौ अनुसरण करै है। जे(यदि) मिनखआळस कै प्रमाद करै तो वै आपरौ सगळौ अणमोल जीवण नष्ट कर दै।
।।श्लोक।।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्म चेदहम्।
सड़्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:।।२४।।

।।चौपाई।।
जै म्हैं कर्म करूं नीं जाणौ
सगळां रौ व्है नाश पिछाणौ।
उठै वर्णसंकर व्है भाळौ
वो दुनिया ज मिटावण वाळौ।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! यद्यपि एड़ौ कदै ई नीं व्है कै म्हैं कर्म नीं करूं पण जे म्हैं कर्त्तव्य कर्म नीं करूं तो सगळौ मनुष्य जीवन नष्ट व्है जाय। क्यूं कै सगळी दुनिया म्हारै कर्म रौ अनुसरण करै। कर्म नीं करण सूं कर्मां में वर्णसंकरता पैदा व्है जाय ला। वा वर्णसंकरता इण मिनखा जूण रौ विनाश करण रौ कारण बणै ला।
।।श्लोक।।
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथा सक्तश्चिकीर्षुर्लोकसड़्ग्रहम्।।२५।।

।।चौपाई।।
करै करम जिसड़ा अग्यानी
उसड़ा करम करौ सब ग्यानी।
व्है रख लाग करै कज जिसड़ा
आप करौ निष्भाव ज उसड़ा।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण तरह अग्यानी मिनख आपरा स्वार्थ खातर सावचेती अर तत्परता सूं कर्म करै उण इज भांत ग्यानी मिनख ई दूजां रै हित में कर्म करै है। इण खातर भगवान कर्म करण रा विषय में ग्यानी मिनखां नै अग्यानी मिनखां जिसड़ी लगन सूं कर्म करण री आग्या दै है।
क्यूं कै आसक्ति रहित मिनखां रै भावां, आचरणौ रौ प्रभाव लोगां रै अलावा पशु-पक्षियां माथै ई पड़ै है।
।।श्लोक।।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसड़िगनाम्।
जोषयेत् सर्व-कर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।२६।।

।।चौपाई।।
ग्यानी मिनख व्हियां थिर जाणौ
भरम न अग्यानी में लाणौ।
करजौ शास्त्र विहित सब काजा
अग्यानी सुं अवर करवा जा।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! परमात्मा रै स्वरूप में अटल व्हियोड़ौ सिद्ध पुरुष (स्थित प्रग्य, थिर बुध वाळौ मिनख) नै चहिजै कै वौ शास्त्र विहिन कर्मों में आसक्ति वाळाअग्यानीं मिनखां री बुद्धि में भरम पैदा नहीं होवण दै। हां अलबता खुद शास्त्र विहित कर्म भली भांत कर नै वां सूं ई वैड़ा इज कर्म करवावै।
।।श्लोक।।
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।

।।चौपाई।।
सगळा करम ज कुदरत सूं व्है
अग्यानी रौ वहम शुरू व्है।
अहंकार भरियो अंतस में
करता बण फिर रया ज मद में।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! वास्तव में पूरा (सम्पूर्ण) कर्म प्रकृति रै गुणौ सूं करीजिया करै है। पछै ई जिण रौ अंतस अहंकार सूं भरियोड़ौ व्है वो अग्यानी आ जाणै कै आं सगळा गुणां रौ कर्ता म्हैं इज हूं। अर म्हैं म्हैं रा मद में झूमतो फिरै।
।।श्लोक।।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्म विभागयो:।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।२८।

।।चौपाई।।
पण समझो महबाहो धारा
गुण विभाग अर कर्म ज न्यारा।
आतम यां दोनां सूं अळगो
कर्म योग निरलिप्त ज पळगो।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे महाबाहो! पण गुण विभाग अर कर्म विभाग{(ए त्रिगुणात्म माया रा कार्य रूप व्है जिण में पांच महाभूत (कर्मेन्द्रियां अर पांच इन्द्रियां रै सागै शब्दादि पांच विषयां समेत आं सगळा समुदाय रौ नाम गुण विभाग व्है है। अर आं परम्परा री चेष्टाऔं रौ नाम कर्म विभाग व्है है)} रै तत्व यानी गुण विभाग अर कर्म विभाग सूं न्यारौ आत्मा रौ स्वरूप व्है है अर इण आत्मा नै निरलेप जाणणौ इज तत्त्व ग्यान जाणणौ है। इण त्रिगुणात्मक तत्व ग्यानी इज कर्म योगी व्है अर वौ किण सूं इज आसक्त नीं होवै। परम तत्त्व में विलीन हुयोड़ौ व्है है।
।।श्लोक।।
प्रकृतेर्गुण-सम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।

।।चौपाई।।
मोहित कुदरत रा गुण सूं व्है
इसो मिनख गुण कर्म ज दूव्है।
बोदी बुध रा उण अग्यानी
ग्यानी भटकावण मत जा नीं।।२९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सत्व, रज कर तम ए तीन गुण प्रकृति सूं मिलियोड़ा है अर मिनख आं गुणां सूं बंध जावै है।
जको प्रकृतिजन्य गुणां सूं बंधियोड़ा है वै अग्यानी मिनख वाजै। अग्यानी मिनख शुभ कर्म तो करे पण वै इण में मोह रै वशीभूत होय र इज करै। वै मिनख ममता अर कामना सूं बंधियोड़ा होवण सूं वै तत्व नै पूर्ण रूप सूं नीं जाणै जिण सूं वां नै मन्दान कम बुध वाळा (बोदी बुध)कैवै। ग्यानी मिनख रौ फर्ज हुवै कै अग्यानी मिनखां नै शुभ कर्म करण सूं विचलित नीं व्हैण दै।
।।श्लोक।।
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगत ज्वर:।।३०।।

।।चौपाई।।
अंतस सूं ज विवेकी होवै
अर्पित कर्म ज मुझ कर सोवै।
तज ममता सन्ताप सु नातो
युद्ध कर आस रहित हु जा तो।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं आध्यात्म चित्त (अंतस सूं विवेक शील, विचारशील)होय र सगळा कर्त्तव्य-कर्म‌ नै म्हनै अर्पित कर दै अर्थात आं कर्त्तव्य कर्मों सूं थारो नातों तोड़ दै। अर थूं आसा रहित, ममता रहित अर सन्ताप रहित होय र युद्ध करलै।
।।श्लोक।।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:।।३१।।

।।चौपाई।।
दोष दृष्टि सूं दूर रियां जा
परमेश्वर पावण नै आ जा।
कर्म बंध उण रा कट जावै
श्रद्धानत अनसुय बण पावै।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! लार ला श्लोक में म्हैं बतायो कै दोष दृष्टि(असूया) रौ जाणण वाळौ मिनख यानी कै आपरा गुणां में दोष देखणौ। दोष दृष्टि रहित मिनख अनसूयन्त: कहलावै है। अर जठै कोई चीज पावण री लालसा व्है उठै मिनख में दोष दृष्टि रैवण री आशंका बढ़ जाय। इण खातर मिनख री श्रद्धा परमात्मा प्राप्ति में(श्रद्धावान) होवणी चहिजे। जिण सूं वौ कर्म बंधण सूं छूट जाय।
।।श्लोक।।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतस:।।३२।।

।।चौपाई।।
जो म्हारै मत मुजब न चालै
दोष ज म्हारा में सब घालै।
खुद नै पूरा ग्यानी समझै
वै तो नष्ट व्हियोड़ा गिणजै।।३२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जको मिनख म्हारा मत नै नीं माने, म्हारा बताया मारग रौ अनुसरण नीं करै व्है खुद नै घणा ग्यानी, विग्यानी सिद्धांत रा निर्माता नवी नवी चीजां री खोज करण वाळा भगवान रा नियमां रौ पालण नीं करणिया सगळा ग्यान रा ग्याता समझै है। वां मिनखां नै सत्-असत्, सार-असार, धर्म-अधर्म, बंधण-मोक्ष इत्याद बातां रौ बोध नीं हुवै। वै सगळा अग्यानी (मूर्ख)मिनख नष्ट व्हियोड़ा समझ।
।।श्लोक।।
सदृशं चेष्टते स्वस्या प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति।।३३।।

।।चौपाई।।
करम हुवै परकत परवाणा
ग्यानी रा स्वाभाविक ध्याना।
ग्यानी नीं परकत रै वश व्है
इण में हठ नीं वो कर सक व्है।।३३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जितरा ई कर्म हुवै है व्है सगळा मिनख रै परकत(स्वभाव) रै मुजब इज व्है है। शरीर री सगळी क्रियावां प्रकृति रै अनुसार इज व्है। ग्यानी पुरुष री प्रकृति राग द्वेष रहित व्है अर प्रकृति रै वश में नीं व्है पण उण री चेष्टा तो स्वभाव रै मुजब इज व्है। महापुरुष री प्रकृति निर्दोष व्है अर वो प्रकृति रै वशीभूत नीं व्है। इण कारण महा पुरुष री चेष्टा प्रकृति(स्वभाव) रै विपरीत नीं व्है सकै उण रौ हठ नीं चाले। इण कारण-हे अर्जुन!थारा स्वभाव में क्षात्रधर्म वसियोड़ौ है, दूजां री रक्षा करणौ है। थूं युद्ध नीं करण री हठ नीं कर सकै। ग्यानी पुरुष रौ उद्देश्य परमात्मा री प्राप्ति व्है है।
।।श्लोक।।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।३४।।

।।चौपाई।।
न्यारी इन्द्रिय विषय ए न्यारा
राग द्वेष इणरा हथियारा।
वश में वां रै मत ना रै जौ
विघनी सूं अळगा पग दै जौ।।३४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! न्यारी न्यारी इन्द्रियां (श्रोत, त्वचा, आंख, जीभ अर नाक) रै न्यारा न्यारा विषयां रा(सबद, स्पर्श, रूप रस, अर गन्ध) रा न्यारा न्यारा राग द्वेष हुवै। राग द्वेष सूं इज अहम (म्हैं) पैदा हुवै इण खातर थूं यां दोनो रै वश में मत रै जै। क्यूं कै ए दोनू कल्याण रा मारग में विघन पैदा करणिया है। ए आपरा शत्रु है जिण सूं मिनख रौ पतन व्है है।
।।श्लोक।।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।३५।।

।।चौपाई।।
मत ना बरतो धरम परायौ
धरम तो निज इ हुवै सवायौ।
मरण भलो निज धरम ज लारै
अवर परायौ धरम डरा रै।।३५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! दूजां रौ वर्ण, आश्रम, धर्म (कर्त्तव्य) भलां ई ऊपर सूं दीखण में चोखौ लागतौ व्है जिण में धन-वैभव, सुख-सुविधा, मान-बड़ाई मिलती व्है तो ई मिनख नै किणी स्थिति में आपरै (स्वधर्म) रौ त्याग नीं करणौ चहिजे नै निष्काम निर्मम अर अनासक्त होय र स्वधर्म रौ इज पालण करणौ चहिजे। राग-द्वेष रहित होय र स्वधर्म रौ अच्छी तरह सूं आचरण करिया ‘समता'(योग) रौ अनुभव हुवै। अपणै कर्त्तव्य रौ नि: स्वार्थ भाव सूं पालण करणौ इज स्वधर्म है। अर औ(कर्त्तव्य) इज कल्याण करण वाळौ है। स्वधर्म रौ पालण करतां जे मरण ई व्है जाय तो वै धर्मात्मा अमर व्है जाय। पर धर्म हमेशा दुख दायी हुवै है वौ भयावह हुवे है।
।।श्लोक।।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरित पूरुष।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:।।३६।।

।।चौपाई।।
करै पाप बिन चायां क्यूं औ
किण सूं प्रेरित होयो ज्यूं औ।
कुण माडाणी पाप करावै
कुण भगवन् यां नै बिलमावै।।३६।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे भगवन!(वार्ष्णैव) भगवान क‌ष्ण रौ वृष्णिवंशियों में अवतार होवण रै कारण भगवान कृष्ण नै ‘वार्ष्णैय’ नाम सूं पिछाणै है।
इण श्लोक में अर्जुन भगवान श्री कृष्ण नै़ कै वै कै जे कोई मिनख
पाप करण री इच्छा त्याग र कर्म करै पण कोई दूजो उणनै माडाणी पाप करावै तौ वौ कुण है हे केशव आप बताओ।
।।श्लोक।।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसुमद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनामि वैरिणम्।।३७।।

।।चौपाई।।
काम र क्रोध रजोगुण सूं व्है
क्रोध रौ जलम इ काम हू व्है।
भोग करण सूं पाप ज बढ़ जा
पाप इ थारा वैरी बण जा।।३७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मन में लालसा, तृष्णा राखणा सूं इज रजोगुण उत्पन्न व्है है। रजोगुण सूं कामना उत्पन्न व्है। मतलब साफ है कै राग सूं काम रौ जलम व्है अर काम सूं राग बढ़ै। परिणाम औ है कै कामना इज सगळा पापां रौ कारण व्है आ इज मिनख री वैरी व्है क्यूं कै इण सूं विवेक ढक जाय।।
।।श्लोक।।
धूमेनाव्रियते वद्य्नर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्थापन तेतेदमावृतम्।।३८।।

।।चौपाई।।
जियां धुआं सूं अगन ज छिप जा
मैला दरपण सूं छबि लुकजा।
जठै जेर में गर्भ ज ढक जा
तेहि काम सूं गुण तव मिट जा।।३८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जियां कांच माथै रजी लागण सूं दर्पण धुंधलौ हुय जावे जिणसूं आपरी फोटू साफ नीं दीखै। इण इज भांत कामना बढ़ण सूं मिनख रौ ग्यान घट जाय इण कारण उण रौ पतन होणौ तय है। ज्यूं कै गर्भ में जेर सूं ढकियोड़ा रौ ठाह नीं पड़ै कै बेटो हुव सी कै बेटी उण ठौड़ मिनख रौ विवेक नष्ट होय जाय उठै पतन तय है।
।।श्लोक।।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।३९।।

।।चौपाई।।
घी घालण सूं अगनी बढ़ जा
अवर कामना इण सूं जग जा।
आ आवै उत वैरी बण नै
अर ढक जावै तद विवेक नै।।३९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै हे अर्जुन!
जिण तरह हवन में घी री आहुति देवण सूं अग्नि री झाळ बढ़ जाय है उण इज भांत मिनख रै मन माफिक भोग भोगण सूं उण री कामना बढ़ जाय। जको तृप्त नीं व्है। आ इज कामना मिनख री दुसमी बण जाय अर उण रा विवेक (ग्यान) नै ढक दै।
।।श्लोक।।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।४०।।

।।चौपाई।।
काम निवास करै बुध मन में
जिण सूं ग्यान ज ढकै अहम में।
औ अभिमान घणौ बिलमावै
इन्द्रिय द्वार सूं औ नित आवै।।४०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कर्म करण रा साधन शरीर, इन्द्रियां, मन अर बुद्धि हुवै है। जे यां में काम (तृष्णा) रैवै तो मिनख मोह रा बंधण में बंध जाय जिण सूं उण में अभिमान इन्द्रियां रै द्वार सूं आय जाय। औ अभिमान इज ग्यान (विवेक)नै ढक दै। अर मिनख रै पतन रौ कारण बणै है
।।श्लोक।।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।।४१।।

।।चौपाई।।
पैली इन्द्रियां नै कर वश में
काम विवेक नु मारै कस नै।
ग्यान विग्यान नाश करणियौ
काम ही बुद्धि नै ज हरणियौ।।४१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-इण वास्ते हे-भरतवंशियां में श्रेष्ट अर्जुन!सब सूं पैली थूं थारी इन्द्रियां नै निष्कामभाव सूं वश में कर लै। नीं तो आ कामना थारा ग्यान यानी विवेक अर विग्यान यानी विशेष ग्यान (तत्व ग्यान, बोध )रौ नाश कर दै ला। आ कामना महापापी हुवै इण नै बलपूर्वक मारणी जरुरी है।
।।श्लोक।।
इन्द्रियाणि पाराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।
मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धे: परतुस्तु से:।।४२।।

।।चौपाई।।
इन्द्रिय जाण शरीर सूं पर व्है
आ बलवान र लघू अवर व्है।
इण सूं मन मन सूं बुध थारौ
बुध इज आतम रौ इधकारौ।।४२।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! इन्द्रियां सूं इज विषयां रौ ग्यान हुवै पण विषयां सूं इन्द्रियां री जाणकारी नहीं व्है सकै क्यूं कै विषयां में इन्द्रियां नै प्रकाशित करण रौ सामर्थ्य नीं व्है। इन्द्रियां मन नै नीं जाणै पण मन सगळी इन्द्रियां नै पिछाणै है। मन बुद्धि नै नीं जाणै पण बुद्धि मन नै जाणै है। बुद्धि मन अर उण रा संकल्पां नै ई जाणै है। बुद्धि रौ मालिक अहम है अर अहम में इज कामना रौ रैवास है। अहम सूं आगै साक्षात् परमात्मा रौ अंश व्है।
।।श्लोक।।
एवं बुद्धे: परं बुद्धा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।४३।।

।।चौपाई।।
बुध सूं परै ज आतम जाणी
आतम सूं इज निरख कराणी।
काम ज अपणौ औ दुखदारौ
औ दुसमी गिण मार करारौ।।४३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे महाबाहो! बुध सूं परै आत्मा हुवै इण वास्तै पैली आत्मा नै पिछाण पछै आत्मा सूं खुद री निरख परख कर। अर जाण कै औ अहम रूपी काम आपाणा में है जको घणौ बाधक है। इण खातर काम दुखदाई है।
हे महाबाहो(अर्जुन)! औ काम विवेक नै ढक दै इण नै थारौ दुर्जन वैरी (शत्रु)जाण अर इण नै मारण री जुगत कर अर परमात्मा सूं जुड़।

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