गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-चौथो अध्याय

चौथो अध्याय – ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः

।।श्लोक।।
इम विवस्वते योगं प्रोत्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत।।१।।

।।चौपाई।।
सूरज नै म्हैं योग सुणायौ
भानु पुत्र मनु नै समझायौ।
इक्ष्वाकु पितु मनु सूं लीदौ
इम अविनाशी योग यु दीदौ।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कह्यौ-म्हैं इण अविनाशी योग रौ ग्यान सूरज नै कह्यौ सूरज ग्रहस्थ जीवन यापन करतां थकां आपरा बेटा मनु नै समझायौ अर मनु आपरा बेटा राजा इक्ष्वाकु नै औ ग्यान विगत वार दियौ।
।।श्लोक।।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता योगोनष्ट: परन्तप:।।२।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन आ परम्परा री
रीत राज ऋषि जाणी सारी।
घणा काल सूं आ छिप गी है।
आ धरती तज किण दिस गी है।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे परन्तप अर्जुन! इण वास्ते परम्परा सूं चली आई आ योग विद्या राज ऋषि जाणी पण अबै घणा टाइम सूं इण पृथ्वी माथै सूं लुप्त व्हैगी है।
।।श्लोक।।
स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोत्त: पुरातन:।
भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यों ह्येत दुत्तमम्।।३।।

।।चौपाई।।
भक्त ज म्हारौ सखा तु ही है
जूनो योग यु आज कही है।
क्यूं कै औ उत्तम रहस्य है
छानै राखण जोग विषय है।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं म्हारौ सखा तौ पैली सूं इज है पण अबै म्हारौ भगत ई बणगौ है। भगत वौ व्है जको शरणागत व्है। शरणागत नै उपदेश दियो जा सकै सखा नै नीं। भगवान कैवै म्हैं थनै वौ इज उपदेश दैय रयौ हूं जकौ म्हैं सृष्टि रै आदि में सूर्य नै दियौ जकौ घणौ जूनौ(पुरातन)है। म्हैं वौ इज अविनाशी हूं पण अबै छाने सै (गुप्त रूप में) अवतार लेय र थारै साम्ही प्रकट हुयौ हूं। म्हारौ ईश्वर रूप गुप्त राखण जोग है औ इज स्है सूं उत्तम रहस्य है।
।।श्लोक।।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत:।
कथमेत द्विजनीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।४।।

।।चौपाई।।
रवि रौ जल्म सिष्टि थपतां हौ
आप अबार जलमियोड़ा हौ।
औ उपदेश आप किम दीदौ
आ समझावण रौ हक लीदौ।।४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे जनार्दन! आप फरमायौ कै आप औ उपदेश म्हंनै देय रह्या हौ वौ आप आदि देव सूरज नै घणौ पैली देय दियौ हौ। हे भगवन्!म्हनैं कृपा कर नै आ बतावौ कै आप तौ अबार म्हारै साथै जलमियोड़ा हौ पछै आप औ उपदेश सूरज देव नै कीकर दियौ।
।।श्लोक।।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

।।चौपाई।।
कैई जलम व्हिया है थारा
अवतरियौ म्हूं कैई बारा।
म्हैं सगळा जलमां रौ ग्याता
थारै जलम समझ नीं आता।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थारा अर म्हारा व़गत व़गत सर कैई जलम व्हिया है पण व्है न्यारा न्यारा तरह रा है। मतलब कै भगवान् अर उण रौ अंश जीवात्मा दोनू अनादि अर नित्य है। नै आं नै आपरै पाछला (पुर्नजलन्मों) जलमां री जानकारी होवै है। जकां नै युंजान योगी रै नाम सूं जाणै है। अर भगवान् युक्तयोगी वाजै आं नै साधना करियां बिना मतेई सिद्धि मिल जाय अर ए नित्य योगी वाजै। भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति इत्याद में पूर्ण रूप सूं विद्यमान व्है है। पण हे परन्तप अर्जुन! थूं भी कैई जलम लिया है जकां री जाणकारी थनै नीं है क्यूं कै थारै अंतस में नाशवान पदार्थों री कामना होवण रै कारण थनै
पाछला जलमां री जाणकारी नीं मिल सकै है।
।।श्लोक।।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।

।।चौपाई।।
म्हैं अजलम्यौ अर अविनाशी
सब प्राण्यां रौ ईश रहासी।
आ इ प्रकृति है ताकत म्हारी
इण री लीला न्यारी न्यारी।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! दूसरा मिनखां ज्यूं नीं तो म्हारौ जल्म व्है है अर नीं ई म्हारी मौत व्है सकै है म्हैं अविनाशी हूं। सब प्राणियां रौ ईश्वर रैवतौ थको छोटा सूं छोटा रूप में रैवतो थको ई प्रभुत्व रा गुण नीं त्याग्या।
भगवान् री खरी प्रकृति आं सगळां सूं न्यारी है। इण नै इज संधिनी-शक्ति, संवित्-शक्ति अर
आह्वादिनी-शक्ति कैवै है।
भगवान् नै मिलावण वाळी भक्ति अर ब्रह्मविद्या ई आ इज है। प्रकृति इज भगवान् री शक्ति है। उण शक्ति नै भगवान आपरै वश में लेय र प्रकट होवै है।
।।श्लोक।।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७।।

।।चौपाई।।
जद जद हुवै धरम री हानी
उदय हुवै अधरम बहु कानी।
हुयजा सकल जगत दुखियारौ
तद अवतारौ हुवै ज म्हारौ।।७।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जद जद भगवत्प्रेम, धर्मात्मा, सदाचारी, निरापध अर दूबळा(निर्बल)मिनखां माथै नास्तिक, पापी, दुराचारी, अर लूंठा मिनखां रौ अत्याचार बढ़ जाय अर मिनखां में सदगुण, सदाचार अर अपणायत री कमी आय जाय अर दुर्गुण दुराचारियों री वृद्धि व्हैय जाय तद तद भगवान् रौ अवतार होणौ तय है।
इण प्रकार भगवान बार-बार अवतार लै है। औ अवतार नवा नवा रूपां में व्है है। भगवान रै अवतरण रौ खास ध्येय धर्म नै थापित करणौ व्है है अर अधर्म रौ नाश करणौ व्है है। मिनख में कामना री जागृति इज धर्म रौ नाश व्हैणौ वाजै है। आप आप रा कर्त्तव्य सूं बेमुख होणौ व्है है। औ इज कर्त्तव्य अर अधर्म रौ अभ्युत्थान वाजे है। अर इण कामना रौ नाश करण वास्तै नै निष्कामभाव रौ प्रसार करण खातर भगवान् अवतार लै लै है।
।।श्लोक।।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे मुंडे।।८।।

।।चौपाई।।
रिच्छा करण साधुआं आवै
अर विनाश दुष्टां कर जावै
थापित करै धरम निष्कामी
औ अवतरणौ व्है नित नामी।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! साधुवृति वाळा मिनखां सूं इज अधर्म रौ नाश अर धर्म रौ प्रचार हुवै है। यां री रिच्छा करण वास्तै भगवान् बार-बार अवतार लै है।
निष्कामभाव रौ उपदेश, आदेश अर प्रचार इज धर्म नै थापित करणौ कहावै है। क्युं कै निष्काम भाव रा प्रचार सूं इज धर्म री स्थापना अपनै-आप व्हैय जावै है। जरूरत पड़ै जणै भगवान प्रकृट व्हैय जा औ अवतरण हर एक युग में बार-बार होवै है।
।।श्लोक।।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।९।।

।।चौपाई।।
जलम कर्म मुझ दिव्य ज जाणौ
अजलमा अविनाशी पिछाणौ।
कर निष्कामभाव कज सारा
प्रकटूं करण मिनख उद्धारा।।९।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारौ जलम अर कर्म दिव्य है अलौकिक है साधारण मिनखां जैड़ौ मत जाण अठा तक कै देवताओं सूं ई विलक्षण व्है। कर्मों री दिव्यता योग सूं व्है इण कारण दूजां रौ हित मतै ई व्है जाय। म्हैं अजल्मो अर अविनाशी व्हैतां थकां ई जन हितार्थ सगळा कर्म करूं इण खातर अवतार लैवूं। भगवान रा कर्म निर्लिप्त है औ इज भगवान् रा जलम अर कर्म रा तत्व नै जाणणौ कहावै। निष्कामभाव सूं दूजां रौ हित करण खातर कर्म करणौ इज परमात्मा री प्राप्ति वाजै है। मतलब भगवान् जैड़ा रूप धारण करै वैड़ी इज लीला करै।
।।श्लोक।।
वीतरागभयक्रोध मन्मया मामुपाश्रिता:।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता।।१०।।

।।चौपाई।।
राग क्रोध भय सूं व्है रहिता
मुझ में लीन हुऔ ज आश्रिता।
ग्यान रूप तप में पवित्रता
व्है नर मुझ को प्रापत हुवता।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
परमात्मा सूं विमुख होवण सूं नाशवान में राग उत्पन्न हुवै राग सूं ममता जागै ममता लोभ पैदा करै अर जद लोभ प्राप्ति में कोई बाधक बणै तद क्रोध आवै क्रोध ई दोय तरह रौ सामलौ कमज़ोर व्है जणै डरै अर जै सामलौ ताकतवर हुवै तौ भय पैदा करै इण भांत आं सगळां री उत्पत्ति व्है। पण जद मिनख भगवान् री दिव्यता नै तत्व सूं जाण जाय उण बगत उणनै भगवान् प्रिय लागै उठै वौ भगवान् रै शरण में जाय परौ अर भगवन्मय व्है जाय। भगवान् री दिव्यता नै तत्व सूं जाणणौ इज ग्यान है। ग्यानी मिनख पवित्र व्है। ग्यानी मिनख नाशवान वस्तुआं नै आपरी अर आपरै वास्ते नीं मानै औ इज ग्यान तप वाजै। पवित्र मिनख परमात्मा नै पावण री योग्यता राखै। आ मिनखा जूण भगवत प्राप्ति खातर इज पाई है।
।।श्लोक।।
ये यथा मां प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।११।।

।।चौपाई।।
जिण हिसाब सूं भजै भगत है
उतरौ इज फळ मिलै तुरत है।
सैंग तरह रा जन मुझ मग रौ
अनुगामी बणवावै चित रौ।।११

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन (पृथानंदन)! भगत म्हारै जिण भाव सूं, सम्बन्ध सूं अर प्रकार सूं शरण में आवै म्हैं ई उण नै उण भाव सूं, उण सम्बन्ध सूं अर उण प्रकार सूं इज आश्रय देवूं हूं। ज्यूं कै जै भगत म्हनैं गुरु मानै तो म्हैं उणरौ सिरै गुरु बण जाउं, जै चेलौ मानै तो म्हैं उण रौ चेलो बणणौ स्वीकार कर लूं, जै माता-पिता मानै तो उठै माइत ज्यू लखाउं, बेटो माने तो उण ठौड़ बेटो जैड़ौ व्यवहार करूं। भाई, सखा अर नोकर मानै तो म्हैं वां रै खातर उण इज रूप में प्रकट होय जाउं हूं। जठै भगत म्हारै बिना डाफाचूक व्है जाय म्हैं उठै उतरौ इज उंतावळौ व्याकुल व्हैय जाऊं हूं।
ज्यूं कै थारै(अर्जुन)खातर थारौ सखा अर सारथी बणणौ स्वीकारियौ। विश्वामित्र जी खातर वां रौ चेलौ(राम) बणणौ।
।।श्लोक।।
काड़क्षन्त कर्माणां सिद्धिं यजन्त इह देवता:।
क्षिप्रं हि मानुषे रोके सिद्धिर्भवति कर्मा।।१२।।

।।चौपाई।।
जे कर्मां री ज सिद्धि चावौ
तो उत देव पूजवा जावौ।
कर्म भूमि गिण नर आ थारी
कर निष्कामभाव पावा री।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मिनखा जूण कर्म करण खातर इज मिली है अर कर्म योग सूं इज सिद्धि प्राप्त व्है पण कर्म योग निष्कामभाव सूं मतलब भगवत्प्राप्ति खातर व्हैणौ चहिजै। मिनखा जूण में दूजां रै हितार्थ करियोड़ौ कर्म इज परलोक में भोगीजै है। इण खातर थूं निर्लिप्त होय ईश वंदना कर।
।।श्लोक।।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।१३।।

।।चौपाई।।
चार वरण रचिया ज जियां ई
वरण व्हिया गुण कर्म तियां ई।
यां रौ कर्ता हूं अविनाशी
कर्म अकर्ता जाण निभा सी।।१३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!पाछला जलमां रै कर्मां र गुणां (सत्व, रज अर तम) रै मुजब म्हैं चार वर्णों(ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अर शूद्र) री रचना करी। क्यूं कै ए म्हारा इज अंश है अर म्हैं प्राणी मात्र रौ रुखाळौ हूं। इण खातर म्हैं हमेशा यां रौ हित देखूं। तो ई म्हैं आं सगळा कर्मां सूं निर्लिप्त हूं अर इण कर्म में म्हारौ कीं खर्च ई नीं व्है है इण वास्तै म्हैं अव्ययम् वाजूं हूं। म्हारौ आं कर्मफलां सूं कोई सम्बन्ध नीं है आ इज कर्म री दिव्यता वाजै।
।।श्लोक।।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।।१४।।

।।चौपाई।।
कर्मफलां में नीं मुझ ममता
इहि कारण नीं म्हारी लिप्ता।
मुझ लीला में लीन हु वाळा
इज बंधण सू़ं छूटण वाळा।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारौ कर्मफलां सूं किंचिन्मात्र ई आसक्ति, ममता या कामना नीं है। मतलब कै म्हारा में कर्मफल रौ भोक्तत्वाभिमान अंकै ई नीं है आं रै नीं रैवण सूं मुक्ति स्वत: सिद्ध व्है जाय। कर्म संसारी करै क्यूं कै उण में कर्म करण रौ अभिमान व्है। क्रिया वा व्है जिण सूं फळ मिलण खातर नीं करै ज्यूं कै सांस रौ लेवणौ अर छोड़णौ, आंख रौ खोलणौ बंद करणौ ए सगळी क्रियाएं वाजै पण भगवान जको क्रिया करै वै लीला गिणीजै।
।।श्लोक।।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्।।१५।।

।।चौपाई।।
किया ज कर्म बडेरा जैड़ा
थूं ई कर्म कियां जा वैड़ा।
कर्म किया हा जन हित कारी
थूं ई इसड़ौ बण उपकारी।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मुमुक्षु होय’र वौ ग्यान अर्जित करणी चावतौ हौ, जन कल्याण करणी चावतौ हौ। भगवान अर्जुन नै समझावै-थारै पूर्वज ई कर्तव्य कर्म करियौ हौ अर वै कल्याण री प्राप्ति करी इण इज तरह थूं
ई वां रौ अनुसरण कर अर लोकहित रा कर्म कर।
भगवान अर्जुन नै कैवै मुमुक्षु ई इण इज भांत कर्तव्यभिमान अर स्वेच्छा रौ त्याग कर नै कर्म करियौ हौ इण वास्तै थूं ई इण तरह रा कर्म करियां जा।
।।श्लोक।।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।
छत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।।

।।चौपाई।।
कर्म किसौ अकरम किसड़ौ व्है?
आ जाणण ग्यानी भमगौ है।
म्हैं वौ कर्म तत्व समझाऊं
जलम मरण सूं मुक्त कराऊं।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण शरीर, वाणी अर मन सूं होवण वाळी क्रियावां नै कर्म गिणै है। कर्म भाव रै मुजब बदळ जाय। भाव बदळतां ई कर्म री संग्या बदळ जाय। फगत बारली (बाहरी ) क्रिया करण सूं या नीं करण सूं कर्म रै असली ग्यान री जाणकारी नीं व्है। मतलब कर्म रै तत्व रौ वास्तविक निर्णय नीं व्है सकै। इण खातर भगवान् कैवै-साचेलो कर्म किसो व्है? वो कर्म आप सूं क्यूं बंधै? अर वौ आप नै कीकर बांधै?इण सूं कीकर मुक्त व्है सकौ? इण सगळां री म्हैं विवेचना करूं ला। जिण नै जाण र थूं जलम मरण रा बंधण सूं छूट जायला। भगवान् समझावै कै आ घणी झीणी जाणकारी है जिण नै मोटा मोटा विद्वान ई इण विषय में चूक कर बैठै। वां री बुद्धि ई भमीज जाय। इण वास्तै जै कामना, ममता, आसक्ति इज कर्मां नै बांधण वाळी है यां नै त्यागण सूं इज मुक्ति मिलै। आ जाणणौ इज कर्म तत्व नै जाणणौ समझ।।
।।श्लोक।।
कर्मणौ ह्यपि बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:।।१७।।

।।चौपाई।।
कर्म अकर्म दोयां नु जाणौ
सागै सैंग विकर्म पिछाणौ।
क्यूं कै कर्म गहन बण जावै
इतरी समझ अजै नीं आवै।।१७।।

।।भावार्थ।।
अठै कर्म, अकर्म अर विकर्म री जाणकारी दी है। जकौ कामवासना सागै शास्त्रविहित क्रिया व्है वा कर्म वाजै। कामवासना रहित फगत दूजां रै हित खातर करियोड़ौ कर्म अकर्म बण जाय। विहित कर्म जकौ दूजां रौ अहित या दु:ख पहुंचावण खातर करौ तद वो विकर्म (पाप कर्म)बण जाय।
निर्लिप्त होय र कर्म करणौ इज अकर्म रा तत्व नै जाणणौ वाजै।
कामवासना राख र कर्म करणौ विकर्म जाणी जै है।
कुण सो कर्म मोक्ष करावण वाळौ है अर कुण सो कर्म बंधण में बांधण वाळौ है औ निर्णय करणौ घणौ मुस्किल (कठिन) काम है।
।।श्लोक।।
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत्।।१८।।

।।चौपाई।।
जकौ कर्म में अकर्म जाणै
अर अकर्म में कर्म पिछाणै।
वो मिनखां में ग्यानी वाजै
उण योगी रा कर्म ज गाजै।।१८।।

।।भावार्थ।।
कर्म करतां थकां या नीं करतां ई उण सूं निर्लिप्त रैवणौ। यानि खुद रै खातर कोई प्रवृति या निवृति नीं करणौ। साधक खुद असंग, निर्लिप्त रैय जाय औ इज कर्म में अकर्म देखणौ गिणीजै।
अकर्म में कर्म देखणा रौ मतलब निर्लिप्त रैवतां थकां कर्म करणा कै नीं करणा यानि कर्म करती बगत या नीं करती बगत ई नित्य निरन्तर निर्लिप्त रैवै।
परमात्मा नै जाणण वास्तै खुद नै परमात्मा रौ अभिन्नता अनुभव करणौ पड़ै। इण वास्तविकता रौ अनुभव करणौ इज जाणणौ वाजै है। जकौ कर्म में अकर्म अर अकर्म में कर्म रा तत्व नै जाण लियो है वौ सैंग कीं जाण लियौ है। कर्म योगी सिद्धि असिद्ध में सम रैवै है समता रौ नाम इज योग है।
करणौ, जाणणौ अर पा्वणौ बाकी नीं रैवणा सूं वौ कर्मयोगी अशुभ संसार बंधण सूं मुक्त व्है जाय है।
।।श्लोक।।
यस्य सर्वै समारम्भा: काम-संकल्प-वर्जिता:।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तामाहु: पण्डितं बुधा:।।१९।।

।।चौपाई।।
बिन संकल्प आस बिन लागै
कर्म ज शुरू कियौ उण आगै।
कर्म ग्यान अगनी में बळिया
बुध सूं ग्यानी पण्डित कहिया।।१९।

।।भावार्थ।।
कर्म योग सूं सिद्ध व्हिया महापुरुषां में संकल्प अर कामना दोनू नीं रैवै। क्यूं कै उण सूं जको कर्म व्है वै सगळा शास्त्र सम्मत हुए। जिण सूं कोई रौ नुकसान कदै ई नीं व्है। वै कर्म संकल्प रहित कर्म इज वाजै।
कर्मों रौ सम्बन्ध शरीर अर संसार सूं व्है आं सगळां री शुरुआत अर अंत अवस व्है पण स्व(स्वरूप)कदै ई नीं बदळै आ जाणकारी राखणौ इज ग्यान है। अर औ ग्यान आपरै शरीर रै साथै अग्नि में भस्म व्हेय जाय जद आप देह त्यागौ।
जकौ कर्मों रा स्वरूप नै त्याग र परमात्मा में लाग जाय उण नै जाणणौ घणौ दोरौ है। वांनै ग्यानी कहयौ है यानि बुद्धिमान पण्डितां रौ ई पण्डित कहियौ है।
।।श्लोक।।
त्यक्त्त्वा कर्मफलासड़्ंग नित्यतृप्तो निराश्रय:।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किश्चित्करोति स:।।२०।।

।।चौपाई।।
नीं व्है आश्रित फळ त्यागणियौ
वौ नर मतै तृप्ति पावणियौ।
योगी रा यु कर्म व्है अकर्म
वै इ वाजै जन हित रा कर्म।।

।।भावार्थ।।
जकौ महापुरुषां नै कर्म रै फळ री आसक्ति नीं व्है वै कर्म योगी निराश्रयी व्है है। वां नै मतै ई त‌प्ति व्है जाय है।
महापुरुषां सूं होवण वाळा सगळा कर्म सांगोपांग इज हुया करै क्यूं कै वांरी कर्मफळ में आसक्ति नीं व्है। तद वां रा ए कर्म अकर्म बण जाय (निर्लिप्त भाव सूं करियोड़ा कर्म जको जन हित खातर व्है)।
।।श्लोक।।
निराशीर्यत-चित्तात्मा त्यक्त-सर्व-परिग्रह।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।२१।।

।।चौपाई।।
अंतस, इन्द्रियां वश में ज्यांरी
तज दै बुध सूं आशा सारी।
करता थकां कर्म इम सारा
पाप बंध सूं छूटै न्यारा।।२१।।
।।भावार्थ।।
कर्मयोगी में आशा नीं रही है उण री इन्द्रियां शरीर अंतस मतै ई वश में व्है जाय है। वौ भोग सामग्री रै संग्रह रौ बुद्धि सूं त्याग कर लै (त्यक्तसर्वपरिग्रह)
कर्मयोगी री इच्छा, आसक्ति, वासना इत्याद री अंतस सूं त्याग कर दै यानि कामना नीं रैवै।
सगळा कर्म मन, बुद्धि, इन्द्रियां शरीर सूं(शरीर निर्वाह खातर जरूरी कर्म, खान-पान, शोच-स्नान वास्ते) इज होय रह्या है म्हारौ वां सूं कीं लेणौ देणौ नीं है। इण वास्तै उण नै पाप नीं लाग सकै मतलब उणरा सगळा कर्म अकर्म व्है जाय है। क्यूं कै वां में आळस प्रमाद नीं आय सके।
।।श्लोक।।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।२२।।

।।चौपाई।।
जकौ मिलै उण में तरपत व्है
द्वन्द् सिद्धि जित असिद्धि सम व्है
करतां कर्म बंधै न प्यारौ
उण में स्वारथ नीं है न्यारौ।।२२।।

।।भावार्थ।।
कर्म योगी शास्त्र विधान सूं अनुकूलता प्रतिकूलता, स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि मिलण सूं उण माथै कोई असर नीं पड़ै। वो हर परिस्थिति में समान रूप सूं संतुष्ट व्है। उण प्राणी में ईसको बिल्कुल नीं व्है।
सिद्धि-असिद्धि में राग-द्वेष, हर्ष-शोक में सम भाव रैवै है।
कर्मयोगी कर्म करतां थकां ई वौ किण सूं ई नीं बंधै क्यूं कै वौ निर्लिप्त व्है।
।।श्लोक।।
गतसड़्स्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस:।
यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।।२३।।

।।चौपाई।।
कर्मयोग तो ममता त्यागै
ग्यान योग सूं ‘म्है’पण भागै।
यग्य करम दूजां हित करिया
तदै सैंग ई कर्म ज मिटिया।।२३।।

।।भावार्थ।।
इण अध्याय रै कर्मयोग रौऔ खास श्लोक है। क्यूं कै लोगसंग्रहार्थ कर्म करता रैवण सूं कर्म योगी क्रियावां पदार्थ सूं अळगी व्है जाय मतलब उण री आसक्ति समूळ मिट जाय। तदै कर्म योगी असंत व्है जाय अर असंत व्हैतां ई वौ सर्वथा मुक्त व्है जाय है।
इण प्रकार क्रिया अर पदार्थ रौ स्वरूप सूं अळगौ व्हैतां ई वौ बंधण सूं छूट जाय।
ग्यार्थ कर्म रौ मतलब व्है यग्य रै वास्तै कर्म करणौ। निष्काम भाव सूं दूजां रा हित में जकौ कर्म करां वौ इज यग्य वाजै। इण कारण इज वौ कर्मबंधण सुं मुक्त व्है जाय। मतलब उणरी कर्मों रै सागै अपणी स्वत: सिद्ध असंतता रौ अनुभव व्है जाय। वौ इज अकर्म वाजै है।
।।श्लोक।।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।२४।।

।।चौपाई।।
जु बरतन में हवन व्है सारा
अर सामगरी ब्रह्म हमारा।
ब्रह्म बिना नीं कर्म स्वरूपा
कर्म यु बणिया ब्रह्म ज रूपा।।२४।।

।।भावार्थ।।
जिण बरतन में अग्नि में (हवन) में आहुति दै इजै उण स्त्रुक् स्त्रुवा नै अरपण करणौ वाजै इण अरपण नै इज ब्रह्म कैवै है।
अर हवन में तिल, जौ, घी रौ उपयोग हुवै वां हव्य पदार्थों नै ई ब्रह्म इज मानै। इणरौ मतलब आहुति देवण वाळौ ई ब्रह्म है अर जिणमें आहुति देविजै वा अग्नि ई ब्रह्म इज है। यानि सगळा कर्मों में ब्रह्मबुद्धि हुवै है। इण वास्तै सगळा कर्म ब्रह्म रूप इज बण जाय। ब्रह्म में इज कर्म समाधि होवण रै कारण सगळा कर्म ब्रह्म रूप व्है जाय।
।।श्लोक।।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनी: पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेवैपजुह्वति।।२५।।

।।चौपाई।।
भगवन अरपण यग्य हुवै रै
यग्य इसौ निष्काम इ व्है रै।
जीवात्मा ई परमात्मा व्है
वो योगी रौ यग्य कहावै।।२५।।

।।भावार्थ।।
अठै कर्मयोगी सूं देवतावां रै पूजण रौ अनुष्ठान अच्छी तरह सूं करणौ बतावै। निष्कामभाव सूं भगवान नै अरपण करियोड़ौ यग्य कहावै क्यूं कै भगवान् देवतावां रा ई देवता है। इणमें ममता कामना आसक्ति नैड़ी आगी ई नहीं रैवै। जिण सूं औ देवयग्य वाजै।
जीवात्मा रौ परमात्मा में लीन व्है जाणै नै ई यग्य कहियौ है। औ दूजा तरह रौ यग्य है।
।।श्लोक।।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।२६।।

।।चौपाई।।
इन्द्रियां कर संयम में ग्यानी
हवन अगन में करलै ध्यानी।
हवन करौ इन्द्रियां, विषयां रौ
तदै यग्य व्है पूरण ज्यां रौ।।२६।।

।।भावार्थ।।
अठै इन्द्रियां नै संयम में राखणौ ई यग्य वाजै है। मतलब एकान्त काल में इन्द्रियां(श्रोत, त्वचा, नेत्र, रसना अर घ्राण) अर विषयां(शब्द, स्पर्श, रूप, रस, अर गन्ध) रौअग्नि में हवन करणौ ई यग्य वाजै। जिण सूं राग-द्वेष सगळा मिट जाय। जकण रौ परिणाम सिद्धि प्राप्त व्हैणौ हुवै (परमात्मा री प्राप्ति)।
व्यवहार काल अर एकान्त काल दोनां में समान स्थिति रैवै हैं।
।।श्लोक।।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरै।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।२७।।

।।चौपाई।।
इन्द्रिय सागै प्राणेन्द्रियां रा
यग्य समाधि रूप व्है न्यारा।
हवन अगन में रुक जा सारा
ग्यान प्रकाश करावै ज्यांरा।।

।।भावार्थ।।
इण पद में समाधि अर यग्य रा प्रकार बताया है। इण मांय दसों इन्द्रियां री क्रियावां रौ समाधि में होम करिया करे। मतलब सगळी{(दस) (ग्यानेन्द्रियां अर कर्मेंन्द्रियां)}री क्रियावां रुक जाय है। सागै प्राणां री क्रियावां ई रुक जाय। पण समाधि अर नींद ए दो एक दूजा सूं न्यारी व्है है क्यूं कै समाधि काल में उण री लगन परमात्मा में लीन व्हैण सूं ऐड़ौ ग्यान प्रकाशित (जागृत) व्है जाय है। जिण सूं इण काल (नींद ) में प्राणां री गति चालती रैवै।
समाधि योग रूप अग्नी में हवन व्है जाय जिण सूं चंचलता मिट जाय पण परमात्मा रौ ग्यान जाग जाय।
।।श्लोक।।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता:।।२८।।

।।चौपाई।।
भांत भांत रा यग्य गिणाया
दान योग तप यग्य सुहाया।
स्वाध्याय ज गीता मन भाया
शास्त्र निमत उत्तम फळ पाया।

।।भावार्थ।।
जन हितार्थ करियोड़ा दान (कुआ, ताळाब, बावड़ी, मंदिर, धर्मशाला, धान, कपड़ा, पाणी, दवाई, किताबां रौ दान देणौ द्रव्य यग्य वाजै।
आपरा कर्त्तव्य रै पालनार्थ विपरीत परिस्थितियों नै सहन कर नै राजी राजी उणरौ पालण करणौ तप यग्य वाजै।
सब परिस्थितियों में सम भाव रैवणौ योग यग्य कहलावै।
जन हितार्थ गीता रामायण महाभारत, भागवत, वेद उपनिषद रौ पढ़णौ मनन करणौ स्वाध्याय यग्य गिणीजै है।
इण पद में आं भांत भांत रा यग्यां रौ वर्णन करियौ है।
।।श्लोक।।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणपानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणा:।।२९।।

।।चौपाई।।
कीं व्है होम अपान हु प्राणा
अर दूजा प्राण ण हु अपाना।
प्राण अपान वेग रुक जाणी
प्राणायाम परायण ताणी।।२९।।

।।भावार्थ।।
योगी भांत भांत री आहतियां दैवै कैई योगी अपान सूं प्राण में आहुति दैवै तो दूजोड़ा प्राण सूं अपान में आपरी आहुति(जुह्वति) दैवै।
प्राण री ठौड़ आपरा हिरदै में (ऊपर) व्है है। अर अपान री जगा आपरै गुदा (नीचै)में हुवै है। मतलब सांस नै बारै निकाळण री वेळा वायु रौ वेग (गति)ऊपर कान्ही व्है है अर सांस नै मांय लेवती वेळा वायु रौ वेग(गति) नीचे कान्ही हुवै है। इण वास्तै सांसां नै बारै निकाळणौ ‘प्राण’ रौ कारज है अर सांसां नै मांय खेचणौ ‘अपान’ रौ कर्म है। इण भांत योगी पैली बारै री वायु नै डावा (बांया)नाक (चन्द्रनाड़ी)सूं मांय खेंचै। वा वायु ह्रदय में वसियोड़ि प्राण वायु नै सागै लेतोड़ी नाभी रै मारग सूं अपान में लीन व्है जाय। इण विधि नै ‘पूरक’ कैवै। पछै प्राण अर अपान वायु दोनू री गति नै रोक दै। इण नै ‘कुम्भक’ कैवै। पछै मांयली वायु नै जीमणा (दांया)नाक (सूर्य नाड़ी) सूं बारै निकाळै है। औ इज प्राण वायु रौ अपान वायु में हवन है। जिणनै ‘रेचक’कैवै। पछै सूर्य नाड़ी सूं पूरक, कुम्भक अर रेचक करै औ बार बार करणौ प्राणायाम रूप यग्य वाजै। निष्कामभाव सूं प्राणायाम रै परायण सूं परमात्मा री प्राप्ति व्है है।
।।श्लोक।।
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:।।३०।।

।।चौपाई।।
खावौ रोज नियंत्रित खाणौ
तदै हवन व्है पूरण जाणौ।
इसड़ा यग्य ज पाप भगावै
परमातम सूं लगन लगावै।।३०।।

।।भावार्थ।।
जकौ नियमित अहार-विहार करै वौ ईज प्राण रौ प्राण में हवन कर सकै है। मतलब प्राण अर अपान नै आप आपरी जगा रोक सकै है। जिणनै स्तम्भवृति प्राणायाम कैवै। इण सूं पापां रौ नाश व्है है।
फगत परमात्मा सूं लाग राख र प्राणायाम करणा सूं अंतस निर्मल व्है जाय अर भगवत प्राप्ति संभव व्है।
सगळा यग्यां रौ अनुष्ठान करता रैवणा सूं उण रा सगळा पाप नष्ट व्है जाय अर अविनाशी परमात्मा री प्राप्ति व्है जाय है।
।।श्लोक।।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम।।३१।।

।।चौपाई।।
जन हित यग्य अमरता लावै
हे अर्जुन परमातम पावै।
यग्य बिना इह लोक बिगड़णौ
नीं परलोक कल्याण हुवणौ।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
निष्कामभाव पूर्वक दूजां नै सोरा करण खातर समता रौ अनुभव होवणौ इज ‘यग्यशिष्ट अमृत’ रौ अनुभव होवणौ कहावै। मतलब वौ सनातन पर ब्रह्म परमात्मा नै पाय लै है। मिनखा जूण यग्य करण खातर इज मिली है। जन हित कर्त्तव्य कर्म इज यग्य वाजै।
अर यग्य नीं करण सूं थारौ इह लोक बिगड़णौ पक्को है अर परलोक में ई कल्याण नीं व्हैणौ है।
।।श्लोक।।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।३२।।

।।चौपाई।।
इसड़ा बहुविध जाण यग्य व्है
वेद वाणि रौ विस्तारण व्है।
सगळा कर्म जन्य इम जाणौ
मुगत दिरावण वाळा मानौ।।३२।।

।।भावार्थ।।
यग्य कैई तरह रा व्है है ज्यांरौ वर्णन वेद वाणी में विस्तार सूं करियोड़ौ है। जिणरै करण सूं परमात्मा री प्राप्ति हुवै है।
आं सगळा यग्यां रै वास्तै ‘तान् सर्वान्’ रौ प्रयोग हुयौ है। ए सगळा यग्य कर्म जन्य यग्य है जको कर्मां सूं हुवै। इण खातर भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन रै वास्तै ए भाव प्रकट करै है।
फळ री इच्छा त्याग र लोक हितार्थ कर्म करण सूं मिनख कर्म बंधण सूं मुगत व्है जाय है।
।।श्लोक।।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाञ्ज्ञानयज्ञ: परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।३३।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन तव भेद बताऊं
ग्यान यग्य यु सिरै द्रव्यां ऊं।
कर्म योग सूं औ समझावै
सगळा कर्म ग्यान में मावै।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! पैली वाळा श्लोक मै भांत भांत रा यग्य री जाणकारी मिली। यग्य रै वास्तै द्रव्य री अर कर्म री आवश्यकता है। जिण यग्य में द्रव्य री प्रधानता व्है वो यग्य द्रव्यमय यग्य वाजै।
अंतस रा सगळा दोष मिटाय र यग्य करण वाळौ गुरु रै कनै जावै उण बगत वो कर्मों अर पदार्थों सूं ऊपर उठ जाय है उण बगत उणरौ एक इज लक्ष्य व्है उण नै इज सगळा कर्मों अर द्रर्व्यां रौ तत्व ग्यान में समाप्त व्हैणौ वाजै, उण में लीन व्हैणौ कहावै।
।।श्लोक।।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्त्तत्त्वदर्शिन:।।३४।।

।।चौपाई।।
गुरु सेवा कर करौ प्रणामा
पूछौ प्रश्न सहज बण नामा
तत्व ग्यान तद ही पावै सा
परम ग्यानी यु दै उपदेशा।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन जै थूं कर्मों नै त्याग र ग्यान प्राप्त करणौ सिरै (श्रेष्ठ) मानै तौ थनै कोई तत्वदर्शी ग्यानी महापुरुष कनै जाय र दण्डवत् प्रणाम कर र, सेवा कर र सहज होय र नम्रता
सरलता अर जिग्यासा सूं परमात्मा नै पावण खातर प्रश्न पूछणा सूं उणनै उण महापुरुष सूं तत्व ग्यान रा उपदेश री प्राप्ति व्है जाय।
।।श्लोक।।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मति।।३५।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन तव बोध करावै
तत्व ग्यान औ मोह भगावै।
खुद में जगत दीसतौ जावै
तद परमातम मिलवा आवै।।३५।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थनै महापुरुष तत्वग्यान रौ बोध करावेला पण औ बोध उण बगत हुवे ला जद मिनख आपरा खुद रा विवेक नै समझे ला तद अविवेक मिट जाय ला उण अवस्था में मिनख रौ मोह छूट जाय तद उणनै पूरी दुनिया खुद में नींगे (दीसै) आवै। मतलब उणरी संसार अर शरीर नै नीं देख र सिर्फ परमात्मा नै देखण री इज इच्छा व्है।
।।श्लोक।।
अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।।३६।।

।।चौपाई।।
पापी में सब सूं बड़ पापी
उण नै ई मिल जावै माफी।
तत्व ग्यान में अर्जुन पड़जा
ग्यान रूप नोका लै तिरजा।।३६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!पाप री कैई श्रेणियां व्है उण मांय नै सगळा पापियां सूं मोटा पापी नै ‘पापकृत्तम’कैवै है। जै थूं उण श्रेणी रौ पापी व्हियां पछै ई तत्व ग्यान रौ बोध व्है जाय तो थारौ बेड़ौ पार व्है जाय। क्यूं कै तत्व ग्यान होवतां ई पैली रा करियोड़ा सगळा पाप तुरन्त मतेई नष्ट व्है जाय। इण वास्तै पाप असत् व्है है अर ग्यान सत् व्है हैं।
।।श्लोक।।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।३७।।

।।चौपाई।।
अगनी भसम लकड़ कर जावै
नीं अर्जुन कीं शेष बचावै।
ग्यान रूप री अगन तिहारा
करम भसम कर दैवै सारा।।३७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जिण तरह अगनी री झाळ में मोटा मोटा लकड़ बळ र राख व्है जाय। लारै फगत भसम बचै इण इज भांत ग्यान रूपी अगनी थारा सगळा संचित, प्रारब्ध अर क्रियामाण कर्मों नै बाळ र राख कर देवै। मतलब थारौ संसार सूं सम्बन्ध विच्छेद व्है जाय। पछै परमात्मा सूं इज सम्बन्ध शेष रवै।
।।श्लोक।।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।।३८।।

।।चौपाई।।
ग्यान समान न पावन होवै
मिनखा जूण बिना नीं सोवै।
कर्मयोगि बण सिद्धी पावै
अपणै आप ग्यान व्है जावै।।३८।।

।।भावार्थ।।
*भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! संसार में यग्य, दान, तप, जप, पूजा, व्रत, ध्यान, प्राणायाम ए सगळा करणा मिनखा जूण में इज सम्भव है अर आं सूं मिनख पवित्र होवै है। औ सब तत्व ग्यान मिलतां ई व्है जाय। जिण रौ कर्म योग सिद्ध व्है जाय उण रौ सम्बन्ध संसार रा सगळा पंपाळां सूं छूट जाय। तद वौ मिनख अपणै आप में तत्व ग्यान रौ अनुभव करण लाग जाय परमात्मा उण रै घट में विराजमान व्है जाय।
।।श्लोक।।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।।

।।चौपाई।।
इन्द्रियां वश कर रखलै सरधा
तत्परता सूं मिट जा दुविधा।
तत्व ग्यान रौ भान हुयां व्है
परमशान्ति उणनै मिल जा वै।।३९।।
(सरधा=श्रद्धा)

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
श्रद्धा री खासियत व्है तत्परता अर इन्द्रियां नै वश में राखणौ। जकां री इन्द्रियां पूरी तरह वश में व्है वो तत्परता बरततो थको साधन परायणता सांगोपांग दिखावै।
परमात्मा में आदरपूर्वक विश्वास करणौ इज श्रद्धा वाजै है। तद उणनै परमात्म तत्व रौ ग्यान हुय जाय। तत्व ग्यान रौ अनुभव होयां उणरा सगळा दु:ख दूर व्है जाय अर परमशान्ति रौ अनुभव होवै।
।।श्लोक।।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।४०।।

।।चौपाई।।
अग्यानी बिन सरधा वारा
संशय पतन करावै सारा।
नीं इह लोक ज व्है हितकारी
परलोक इ नीं व्है सुखकारी।।४०।।

।।भावार्थ।।
जको मिनख विवेक रै बिना अर श्रद्धा रहित संशय वाळा व्है अर दूजां री बात रौ अनादर करै वांरी कदेई उन्नति नीं व्है सकै। उण मिनखां रौ इह लोक अर परलोक दोनू बिगड़ जाय, व्है सुख हरगिज नीं पाय सकै।
।।श्लोक।।
योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।४१।।

।।चौपाई।।
सब कर्मों रा बंधण छूटा
हे अर्जुन ए योग अनूठा।
पर हित कर्म करै व्है ध्यानी
नाश हुवै उत संशय ग्यानी।।४१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!सगळा कर्म दूजां रै हित खातर व्है तद मतेई समता रौ अनुभव व्है जाय। जिण सूं वौ कर्म बंधण सूं छूट जाय।
मिनख रै मन रा सगळा संशय मिट जाय। पण तद जद वौ कर्म तत्व नै आछी तरिया जाण लै।
कर्म योगी आपरा आत्म स्वरूप बोध नै जाणणा रौ ध्येय राखै है।
मतलब पर हित कर्म करणौ। खुद रै खातर कोई कर्म नीं करणा सूं कर्म योगी रौ सगळा बंधणां सूं छूटणौ वाजै है।
।।श्लोक।।
तस्मादज्ञानसम्भूतं ह्रत्स्थं ज्ञानासिनात्मन:।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।४२।।

।।चौपाई।।
इह कारण नित कर्म ज करणौ
समता नै थिर कर जुध लड़णौ।
हे अर्जुन खग धार तिहारौ
कर्म बंध सूं व्है छुटकारौ।।४२।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन युद्ध नीं करण री ठाण लै तद भगवान् श्री कृष्ण वैड़ी दसा जाण र उण नै कर्त्तव्य कर्म करण री प्रेरणा देवै। उण रै हिया माथै अग्यान अर संशय रौ पड़दौ पड़गौ वौ हटावण वास्तै तत्व ग्यान सीखावे। उणनै ग्यान रूपी तरवार धारण री प्रेरणा सूं पैली समता सूं थिर होय र जुध करण री आग्या दै। मिनख रा कर्म अर फळ न्यारा न्यारा व्है पण उणरो स्वरूप हमेशा एक इज व्है पण तद जद वौ निर्लिप्त होय र कर्म करै। जिण सूं वौ संसार रा सगळा बंधणां सूं छूट जाय अर मतेई समता रौ अनुभव व्है जाय।
।।चौपाई।।
औ चौथौ अध्याय ज अपियौ।
ब्रह्म योग सन्यास समपियौ।
तत्व ग्यान इण सूं मिल जावै
सांख्य योग नू कर्म जगावै।।४३।।


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