गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-पाँचवों अध्याय

पाँचवों अध्याय – कर्मसंन्यासयोगः

।।श्लोक।।
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छेय एतयोरेकं जन्मे ब्रूहि सुनिश्चित।।१।।

।।चौपाई।।
कर्म त्याग पुनि योग सरावौ
हे माधव तय कर बतलावौ।
यां दोनां सूं जो कल्याणी
कुण सी म्हारै चित्त चढाणी।।१।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन नै परिवार रा मोह रै कारण युद्ध नीं करण री जची। इण कारण वौ युद्ध रौ कर्म त्यागणौ वाजिब समझियौ पण भगवान् तत्व ग्यान प्राप्त करणा रा कर्म री प्रशंसा करै। तद अर्जुन पूछै-हे माधव! कदैइ तो आप कर्म योग री तारीफ करौ अर कदैग तत्व ग्यान प्राप्त करण री म्हनै आ बतावौ कै म्हारा किसा कर्म करण सूं औ कल्याण होणौ है।
।।श्लोक।।
सन्न्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रैयकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

।।चौपाई।।
सांख्य र कर्म योग कल्याणी
दोनू मग री करौ पिछाणी
कर्म योग पण सिरै इ जाणी
तत्व ग्यान सूं तान मिलाणी।।४२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सांख्य योग रौ पालण हर एक मिनख स्वतंत्र व्है नै कर सकै उणरौ पालण करण में कर्मां रा स्वरूप नै त्यागण री जरूरत नीं है। मतलब खुद रौ कल्याण कर सकै पण संसार सूं राग द्वेष हटावण खातर कर्तव्य-कर्म करणौ इज कर्मयोग वाजै। इण वास्तै दोनू साधन कल्याण कारी है, परमात्मा रै प्राप्ति रा मारग है पण कर्म योग सिरै है। क्यूं कै सांख्य योग कर्म योग बिना नीं व्है सकै पण कर्म योग में सांख्य योग री आवश्यकता नीं व्है।
।।श्लोक।।
ज्ञेय: स नित्यसन्न्यासी तो न द्वेष्टि न काड़्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।।३।।

।।चौपाई।।
जिण में नह द्वेष न आस बचै
सन्यास उठै हिय रास रचै।
द्वन्द्व रा फंद नीं पास रवै
उत जग बंधण सूं मुगत हुवै।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे महाबाहो!(लम्बी भुजावां वाळौ) कर्मयोग रै मुजब थारा में सब री सेवा करण जितरौ बल है। इण वास्तै थूं सहजता सूं कर्म योग रौ पालण कर सकै। क्यू कै जिण में राग-द्वेष नीं व्है, काम वासना बिना फगत दूजां रै हित खातर कर्म करणौ तेवड़े वौ इज सन्यास योग ग्रहण कर सकै। संसार सूं मतेई सगळा बंधण छूट जाय। इण वास्तै वौ कर्मयोगी नित्य संन्यासी वाजै है। परमात्मा री प्राप्ति वास्तै उण रा द्वन्द्व मिट जाय जणै वौ सुख सूं परमात्मा री प्राप्त कर लै।
।।श्लोक।।
साड़्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।
एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

।।चौपाई।।
सांख्य योग अर कर्म ज योगा
मूरख गिणै अलग इज होगा।
ग्यानी थित एकहि दउ जाणै
परमातम नै इम पहचाणै।।४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् शरीर-शरीर रा भेद नै थिर करण नै इज सांख्य कैवै है सन्यास अर सांख्य पर्यायवाची है। अर्जुन इण नै कर्मसन्यास कैवै औ ई सन्यास रौ इज पर्यायवाची है। भगवान् श्री कृष्ण समझावै कै सांख्य योग अर कर्म योग नै न्यारा न्यारा फळ वाळौ समझण वाळा मिनख टाबर जितरी बुद्धि वाळा मूरख व्है।
जठै कै सांख्य योग अर कर्म योग दोनूं एक इज व्है है अर परमात्मा प्राप्ति रौ मारग है।
।।श्लोक।।
यत्साड़्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साड़्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति।।५।।

।।चौपाई।।
सांख्य योग सूं जकौ कमावै
कर्म योग वौ ई दै जावै।
इतरौ योग निभावण वाळौ
इज असली व्है जाणण वाळौ

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकौ तत्व सांख्य यौगी (संन्यासी) प्राप्त करै है वौ इज तत्व कर्म योगी ई प्राप्त कर लैवै। प्रकृति सूं सम्बन्ध विच्छेद होवतां ई दोनू योग एक व्है जाय है। जकौ मिनख आं दोनूं योगां नै फळ री दीठ सूं एक देखै है वौ इज यथार्थ रूप में ठीक देख रह्यौ है।
।।श्लोक।।
सन्न्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत:।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।६।।

।।चौपाई।।
सांख्य योग है कठिन यु पाणौ
कर्म योग बिन सांख्य न आणौ।
कर्म योग रौ मग अपणावै
परमातम जल्दी मिल जावै।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!सांख्य योग री सफलता खातर कर्म योग करणौ जरूरी है। क्यूं कै इण रै बिना सिद्धि मिलणी घणी दोरी है। सांख्य योग रौ ध्येय परमात्मा प्राप्ति है औ बिना राग-द्वेष मिटियां सम्भव नीं है कर्म योग तद इज पूर्ण व्है जद मिनख राग-द्वेष रहित व्है। इण खातर इण कर्म योग री विधि सूं ब्रह्म री प्राप्ति सुगमता सूं व्है जाय है। निष्कामभाव सूं कर्म करण वाळौ इज मुनि कहावै। औ इज कारण है कै कर्म योगी जल्दी परमात्मा री प्राप्ति कर लैवै है।
।।श्लोक।।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय:।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।७।।

।।चौपाई।।
जिणरौ निर्मल अंतस व्हैणौ
इन्द्रिय देह ई वश में रैणौ।
सब जीवां नै एक ज मानै
कर्म योग सूं राग भगाणै।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कर्म योग रौ मतलब इन्द्रियां नै वश में करणौ है, अन्त:करण(अंतस) निर्मल राखणौ, अर शरीर रा सुख-आराम नै त्यागणौ मतलब शरीर नै वश में करणौ। इणरै सागै कर्मयोगी सगळा प्राणियां (जीवां) सूं एक सा भाव राखणा। अर सर्वभूतात्मभूतात्मा (सब रै सागै एक सा भाव राखणा)व्हियां बिना उदारता आवै कोनी।
।।श्लोक।।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्।।८।।

।।चौपाई।।
छू, देखै, सूंघै, सुण खावै
लै, बोलै, मल त्यागण जावै।
सोणौ, आंख मींच इपकाणौ
न क्रिया में कर्तापण लाणौ।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकौ अपणै में कोई तरह री क्रिया रौ कर्ता पण रा भाव नीं लावण वाळौ तत्ववित् वाजै। क्यूं कै प्रकृति क्रियाशील है अर आत्मा क्रिया रहित इण में कर्ता रौ ‘म्हैं’ पणौ बिल्कुल नीं व्है।
अठै देखणौ, सणणौ, स्पर्श करणौ, सूंघणौ अर खाणौ ए पांचों क्रियावां ग्यानेन्द्रियां सूं हुवै चालणौ, ग्रहण करणौ, बोलणौ अर मल-मूत्र त्यागणौ कर्मेंद्रियां सूं व्है।
।।श्लोक।।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियणीन्द्रियार्थैषु वर्तन्त इति धारयन्।।९।।

।।चौपाई।।
ग्यानेन्द्रिय ‘र कर्मेंद्रिय अंतस
प्राण उपप्राण विषय नु बरतस।
ए सगळी किरियावां खुद व्है
इण रौ कर्ता कोई कद व्है।।९।।

।।भावार्थ।।
सोवणौ एक अन्त:करण री क्रिया है। सांस लेवणौ प्राण क्रिया अर आंख खोलणौ नै मीचणौ ए उप प्राण क्रियावां है। मतलब औ है कै ए सगळी क्रियावां प्रक‌ति जनित है। इण वास्तै वौ सगळी क्रियावां सूं अळगौ व्है जाय। परमात्मा री प्राप्ति में लाग जाय।
।।श्लोक।।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संड़्गत्यक्त्वा करोति य:।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।१०।।

।।चौपाई।।
सगळा कर्म ईश अरपित व्है
इच्छावां तजणौ इज जित व्है।
जळ में कमल ज्यूं निर्लिप्त व्है
कर्म योगि उत पाप रहित व्है।।१०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! योगी (कर्मयोगी) आपरी सगळी क्रियावां भगवान नै अर्पित कर दै है। अर व्है योगी आपरी ममता, आसक्ति, लगाव, सगळा त्याग दै है। मतलब आपरी इच्छावां रौ सर्वथा परित्याग कर देवै। जद उणरी कामवासना सूं लिप्तता नीं रैवै तद वौ इयां लागै जियां कमल रा पत्ता पाणी में रैवतां थकां ई जळ सूं निर्लिप्त रैवै उण इज भांत इच्छावां री कामना नीं रैवण सूं मिनख रा सगळा पाप नष्ट व्है जाय है।
।।श्लोक।।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलौरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति संड़्गत्यक्त्वात्मशुद्धये।।११।।

।।चौपाई।।
मन बुध देह ज ममता त्यागै
योगी री फळ इच्छा भागै।
कर्म करै अंतस सुध धारण
योग धारियौ बस इहि कारण।।११।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! कर्म योगी निष्काम भाव सूं पर हित कर्म करण खातर योग धारियौ है। वो औ देह इन्द्रियां मन बुद्धि इत्याद सूं कर्म करतौ थकौ ई आपरौ नीं मानै, संसार रौ मानै। इण कारण उण री फळ मिलण री इच्छा व्है इज कोनी जिण सूं उणरौ अंतस शुद्ध व्है जाय। कर्म योगी इण खातर इज योग धारण करै है।
।।श्लोक।।
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
आयुक्त: काम कारेण फले सक्तों निबध्यते।।१२।।

।।चौपाई।।
कर्मयोगि फळ इच्छा त्यागै
परमशान्ति उण रै हिय जागै।
ममता जिण रै कर्म म जागी
वौ बंधण बँधियौ निरभागी।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! अठै कर्मफळ रौ त्याग करण वाळा कर्म योगी वास्तै युक्त: रौ उपयोग व्हियौ है। अर जकौ फळ री इच्छा, आसक्ति रौ त्याग करण वाळौ व्है क्यूं कै त्याग कर्मफळ रौ नीं पण कर्मफळ री इच्छा रौ त्यागणौ व्है है। संसारिक पदार्थां री कामना अर ममता नै त्यागण सूं शान्ति मिलै है। जकौ इण शान्ति रौ उपयोग करलै तो वौ नैष्ठिकी शान्ति(परमशान्ति) सूं वंचित व्है जाय है।
पण वौ सकामी( ममता, इच्छा सूं बंध र कर्म करणियौ) जिण वास्तै आयुक्त: रौ उपयोग व्हियौ है जिण सूं वौ कर्म बंधण सूं बंध जाय है।
।।श्लोक।।
सर्वाकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।१३।।

।।चौपाई।।
सगळा कर्म ज मन सूं त्यागै
वौ नर सदा सुखी इज लागै।
नव द्वारां सूं कर दै काना,
नीं करणौ, करवाव न आना।।१३।।
(काना=किनारा करणा, अळगौ रैवणौ आना=रत्ति भर नहीं)

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! शरीर मन बुद्धि अर प्राणां सूं जिण तरह तरह री क्रियावा़ (देखणौ, सुणणौ, छूवणौ, सूंघणौ, खाणौ, चालणौ, ग्रहण करणौ, बोलणौ अर मल-मूत्र त्यागणौ, सोवणौ, आंख खोलणौ नै मीचणौअर सांस लेवणौ) रौ बोधक सर्वकर्माणि वाजै है। आं नै विवेक पूर्वक मन सूं त्यागणौ। क्यूं कै वौ करण वाळौ ई नीं व्है अर करावण वाळौ ई कोनी व्है। सांख्य योगी री इन्द्रियां, मन, बुद्धि आदि में ममता-आसक्ति नीं रैवण रै कारण व्है वश में व्है इण वास्तै अठै वशी कहवावै है। अठै नव द्वारे पुरे रौ नाम आयौ इण रौ मतलब दो कान, दो आंखियां, दो नाक रा छेद, अर एक मुख ए सात ऊपर वाळा द्वार है अर मल अर मूत्र त्याग रा द्वार गुदा अर उपस्थ व्है। आं नव द्वारां वाळौ शरीर पुर वाजै है। इतरा त्याग करणियौ इज सुखी व्है सकै है।
।।श्लोक।।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु:।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

।।चौपाई।।
ईश अकर्ता नर बण कर्ता
नीं कर्म ज हरि रचना करता।
कर्म फळां सूं नीं संयोगा
पण सुभाव जैड़ा वै होगा।।१४।।

।।भावार्थ।।
सृष्टि री रचना रौ काम भगवान् रौ है इण वास्तै अठै आपनै प्रभु कह्यौ है। या हरि कैय सकां। प्रभु रचनाकर्ता व्हैतां थकां ई प्रभु अकर्ता वाजै। पण मिनख कर्मां रौ खुद इज कर्ता बण जाय। क्यूं कै वौ कर्म करण वास्तै स्वतंत्र है अर भगवान् कर्म फळ तौ देवै पण कर्म रै फळ सूं कोई सम्बन्ध नीं राखै। पण मिनख आपरा सुभाव (आदत, परकत) रै कारण उण रौ वशीभूत व्हियोड़ौ रैवै। जै वौ चावै तौ कर्त्तव्य, कर्म अर कर्मफळ त्याग र उण सूं निर्लिप्त व्हैय सकै।
।।श्लोक।।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु:।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव:।।१५।।

।।चौपाई।।
नीं पाप र नीं शुभ कर्मां नै
सर्व व्यापि ईश्वर कद मानै।
ग्यान ढकै अग्यान ज आगै
मोहित व्है सब जन उत भागै।।१५।।

।।भावार्थ।।
अठै परमात्मा नै विभु: रै नाम सूं सम्बोधित कर र भगवान् आ समझावै कै परमात्मा न तौ कोई पाप नै स्वाकारै है अर नीं ई कोई शुभ नै ग्रहण करै है। मतलब वै कोई रे कर्म फळ रा भागी नीं है।
आपरै खुद रौ ग्यान सगळी आत्मावां नै मतै ई व्है जाय। पण अग्यानता(अधूरौ ग्यान) रै कारण औ ग्यान ढकीजियोड़ौ है जिण कारण मिनख खुद नै उणरौ कर्ता गिणण लागगौ है। जन्तव: रौ मतलब जको मिनख मुर्खतावश विवेक नै महत्व नीं दै वौ आपरै सुख-दु:ख नै भोगणिया पशु जैड़ा है। इण अग्यानता नै अठै पशु समान मानिया है।
।।श्लोक।।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषांनाशित मात्त्मन:।
तेषा मादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्त्परम्।।१६।।

।।चौपाई।।
करै ग्यान सु नाश अग्याना
गिणै वौ ग्यान ज रवि समाना।
परमतत्व जिण सु यु पहचाणै।
व्है आलोकित जग औ जाणै।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!आपरी सत्ता अर शरीर नै न्यायौ न्यारौ मानणौ ग्यान है अर एक मानणौ अग्यान है। विवेक सूं अग्यानता रौ नाश व्है सकै है। औ विवेक इज परमात्मा नै प्रकाशित (आलोकित) कर दै। मतलब परमात्मा री अनुभूति हुवै है।
।।श्लोक।।
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:।।१७।।

।।चौपाई।।
मन बुद्धि तदरूप व्है जिणरौ
चित्त ज हुवै परायण उणरौ।
पाप रहित होयां पद पावै।।
इण गत जलम मरण मिट जावै१७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! निस्चै करण वाळी वृति रौ नाम बुद्धि है अर बुद्धि सूं परमात्मा नै पिछाण। फछै परमात्मा रौ चिन्तन होवण लाग जाय। जणै कठेई जाय नै वौ मतेई थित (स्वत: स्थिति रौ अनुभव करे) होवे। परमात्मा में अपणी सत्ता नीं व्हैणौ इज परमात्मा सूं परायण व्हैणौ वाजै।
ग्यान मतलब सत्-असत् रै विवेक री वास्तविक जागृति होवणौ। जिण सूं पाप-पुन रौ पंपाळ मिटणौ।
असत् रै कारण पुनर जलम हुवै जदे औ असत् मिट जाय तौ पुनर जलम मरण रौ पंपाळ ई नीं व्है है।
।।श्लोक।।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।।१८।।

।।चौपाई।।
विद्या, विनय पूर्ण विप्र ज व्है
गाय स्वान गज चाण्डाल ज व्है।
भेद कदेय न यां में कीन्हौ
परमातम सब नै सम लीन्हौ।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! ऐड़ौ ब्राह्मण जको विद्यावान विनयशील स्वभाव रौ ई व्है अर गाय, हाथी, चाण्डाल, कुत्ता सब नै ग्यानी पुरुष समदर्शी जाणै, समान दीठ सूं देखे। वां में कोई भैद नीं करै।
।।श्लोक।।
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद ब्रह्मणि ते स्तिथता:।।१९।।

।।चौपाई।।
अंतस जिण रौ थित व्हैगौ है
जाण मुगत जग सूं हू गौ है।
ब्रह्म सदा सम निर्दोषी है।
परमातम उत थित पोषी है।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जिणरौ अंतस (अन्त:करण) समता में थित (स्थित) व्है जकौ जीवतौ रैवतौ थकौ ई आखी दुनिया नै जीत लियौ व्है मतलब वौ इण जूण सूं मुगत व्हैगौ व्है क्यूं कै वौ ब्रह्म सदा निर्दोषी अर समदर्शी व्है। इण वास्तै वै परमात्मा में लीन रैवै है।
।।श्लोक।।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्त नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबचद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित:।।२०।।

।।चौपाई।।
चोखा भूंडा सूं अळगौ व्है
राजी बेराजी इक सो व्है।
थिर बुध रौ ग्यानी हरि वौ ई
परमतत्व नै पावै सो ई।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकौ मिनख प्रिय (चोखी चीज) अर अप्रिय(भूंडी चीज) प्राप्त व्हियां नीं तो अंतस सूं खुश हुवै अर नीं ई दुःखी हुवै। मतलब उण चोखी अर भूंडी चीज रौ ग्यान होयां पछै ई एक सो रैय जाय वौ इज तत्ववेता कहावै है। वौ निरपेखी इज अंतस सूं थिर होय र ग्यानी वाजै अर परमात्मा में लीन व्है जाय है।
।।श्लोक।।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।२१।।

।।चौपाई।।
बाहर सूं मन तजियोड़ौ व्है
अंतस में सुख जुड़ियोड़ौ व्है।
परमातम सूं जुड़ियौ जोगी
आतम सुख रौ वौ व्है भोगी।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण मिनख रौ मन परमात्मा में लीन व्है जकौ आसक्ति रहित व्है जिणरी इन्द्रियां, मन, बुद्धि, शरीर, प्राण, शब्द अर स्पर्श सूं नीं जुड़ियोड़ौ इज अंतस सूं सुखी व्है है। अर जिणरी बाहर री आसक्ति मिटगी है उण नै इज अंतस रै सुख रौ अनुभव व्है है। वौ ग्यानी इज परमात्मा में एक मेक व्है जाय है। क्यूं कै उणरी बुद्धि थिर व्है जाय है। तद सगळा सुख मिल जाय।
।।श्लोक।।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:।।२२।।

।।चौपाई।।
जितरौ इन्द्रियां भोग करै ला।
उतरौ उणनै दु:ख मिलै ला।
हे अर्जुन ए जाण विनाशी
ग्यानी जन इण मांय न आ सी।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!शब्द, स्पर्श, रूप, रस अर गंध ए सगळा विषय है इन्द्रियां आं विषयां रौ जितरौ भोग करै ला मतलब इन्द्रियां अर विषयां सूं जितरौ सुख मिलै ला वौ मिनख उतरौ ई दु:ख भोगै ला। क्यूं कै ए सगळी क्रियावां विनाश करण वाळी है अर जकौ ग्यानीं है वै इण पंपाळ में नीं पड़ै।
।।श्लोक।।
शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:।।२३।।

।।चौपाई।।
देह ज नाश व्हियां सूं पैला
काम-क्रोध रा वेग सहै ला।
वो इज नर योगी कहवावै
सुख उण रै इज हाथै आवै।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
मिनख आपरा विवेक सूं राग-द्वेष, काम-क्रोध इत्याद विकारां सूं अपणै आप नै देह छूटणा सूं पैली अळगौ कर लै। जिण में सगळी वेदनावां नै सहन करण रौ सामर्थ्य व्है वौ मिनख इज योगी वाजै अर वौ इज सुख भोगै है।
।।श्लोक।।
योऽन्त:सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव य:।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।२४।।

।।चौपाई।।
आतम में जद सब सुख आवै
जो आतम में ई रम जावै।
आतम रौ ई वौ चित ग्यानी
ब्रह्म लीन योगी व्है ध्यानी।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जिण नै बारला प्रकृति जन्य सुखां सूं लगाव नीं व्है फगत आत्मा में इज सुख मिलै उण नै ‘अन्त:सुख:’ कैवै। जकौ भोगां में रमण नीं करै पण सिर्फ आत्मा तत्व में इज रमण करै वौ’अन्तराराम:’ मय वाजै अर जिण नै इन्द्रियां, बुद्धि रौ ग्यान अर संसार रा जितरा ग्यान है वां सगळां ग्यानां रौ आधार आत्मा व्है उणनै ‘अन्तर्ज्योति:’ सूं जाणै।
आं सगळां रौ सांख्ययोगी आप री स्थिति ब्रह्म (परमात्मा)में थिर कर दै। उण नै परम शान्त ब्रह्म री प्राप्ति व्है जाय है।
।।श्लोक।।
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।
छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:।।२५।।

।।चौपाई।।
पाप क्षीण जिणरा व्हैगा है
सब जीवां रा हित करगा है।
संशय दोष ज सब मिटगा व्है
वौ ग्यानी हरि लीन कहावै।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण रा सब पाप खत्म व्हैगा है जकौ आपरा शरीर इन्द्रियां मन बुद्धि नै वश में कर लिया है अर जकौ सगळा प्राणियां रै हित खातर इज जीवै है जिणरै मन में कोई खोट या संशय नीं है वौ ग्यानी, विवेकी इज परमात्मा में लीन व्हियोड़ौ योगी कहावै है।
।।श्लोक।।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।२६।।

।।चौपाई।।
काम क्रोध तजिया जिण ग्यानी
मन बुद्धि सम सदा ई मानी।
उण रै हिय में ब्रह्म ज वसिया
जीवण मुगत हुयोड़ौ लखिया।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
काम वासना अर क्रोध रै बिना जकौ चित्त नै जीतियोड़ौ व्है, जकौ परम ब्रह्म परमात्मा सूं साक्षात्कार करियोड़ौ व्है उण ग्यानी मिनख रै खातर सब कानी सूं परमात्मा इज परिपूर्ण व्है है।
।।श्लोक।।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्मांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो:।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नसाभ्यन्तरचारिणौ। २७।।

।।चौपाई।।
छोड़ बारला विषय ज बारै
भूंहां बिचे दृष्टि जो धारै।
विचरण करै पवन सम नाशा
प्राण अपान बराबर सांसा।।२७।।

।।श्लोक।।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण:।
विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स:।।२८।।

।।चौपाई।।
वश में कर इन्द्रियां मन बुद्धी
मोक्ष परायण जाण ज शुद्धी।
रीस र डर इच्छा रख अळगा
वै मुनि सदा मुगत इज हुयगा।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ मिनख बारला विषय भोगां नै चिन्तन नीं करतौ थकौ बारै इज काढ़ देवै अर अंखियां री दीठ (दृष्टि) नै भूंहां(भ्रकुटि) रै बीच में थित कर नै पछै नाक माय प्राण वायु अर अपान वायु नै सम दीठ सूं बरतै।
जिण री इन्द्रियां, शरीर, मन बुद्धि जीतियोड़ौ व्है ह़ै ऐड़ौ जकौ मोक्ष परायण मुनि वाजे। वौ मिनख इच्छा भय अर रीस (क्रोध) सूं रहित व्हैगौ है वौ सदा मुक्त इज है।
।।श्लोक।।
भोक्तारं यज्ञतपसांं सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।।

।।चौपाई।।
भगवन इज तप यग्य ज भोक्ता
देवां रौ ई देव ज होता।
सब जीवां पर दया दिखाळौ
इसो भक्त शान्ति: पा वाळौ।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!सगळा शुभ कर्मों रौ भोक्ता म्हैं इज हूं यानी तप यग्य रौ भोक्ता म्हंनै इज गिण। अर जकौ खुद खातर आसक्ति रहित होय सुख-दु:ख विहिन होय रवै उण वास्तै म्हनै इज सब देवां रौ देव मान। म्हनै इज सगळा प्राणियां रौ निस्वार्थी दयालु, प्रेमी जाण इतरा जाणण वाळौ भगत इज परम शान्ति पावण वाळौ व्है है
।।चौपाई।।
औ अध्याय पांचवौ पूरौ
हरि विद्या अर योग सरूरौ।
कर्म सन्यास योग बतावै
चौपाई रच वीरू लावै।।३०।।


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