गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-छटौ अध्याय

छटौ अध्याय – आत्मसंयमयोगः

।।श्लोक।।
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।।१।।

।।चौपाई।।
कर्म फलां री आस नि करणौ
पर हित कर्म सु योगी बणणौ।
पण योगी अगनी नै त्याजै
तज किरिया योगी नीं वाजै।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ मिनख कर्म फलां रौ आश्रय नीं लै पण दूजां रै हित खातर कर्तव्य-कर्म करतौ रैवै वौ इज संन्यासी अर योगी कहावै है।
मतलब इण तरह निर्लिप्त रैवतौ थकौ कर्म करण वाळौ इज सन्यासी है अर सुख दु:ख में सम रैवण वाळौ योगी है।
पण फगत अग्नि रहित होवण सूं या क्रिया नीं करण सूं वौ योगी नीं वाजै।।१।।
।।श्लोक।।
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसड़्कल्पो योगी भवति कश्चन।।२।।

।।चौपाई।।
सन्यासी सब त्यागी जाणौ
कर्म योगि वेरागी मानौ।
बिन तजियां संकल्प न योगी
हे अर्जुन गिण जै वौ भोगी।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिसड़ो सन्यासी हरमेश त्यागी होवै है उसड़ौ इज कर्म योगी ई सर्वथा वेरागी (त्यागी) होवै है।
क्यूं कै संकल्पां रौ त्याग करियां बिना कोई योगी नीं बण सकै वौ तौ फगत भोगी होवै है। मतलब कै परमात्मा रै सागै संबंध रौ नाम योग है अर वौ तद इज प्राप्त व्है जद वौ स्वारथ रा संकल्प त्यागै। अर परमात्मा सूं तारतम्य थापित करै।
।।श्लोक।।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारण मुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते।।३।।

।।चौपाई।।
योगारूढ़ जकौ मुनि होयौ
पर हित करम सदा वौ जोयौ।
जिण रौ निज हित सगळौ निटियौ
वौ योगी परमातम मिलियौ।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ योग समता में आरुढ होणी चावै उसड़ा मननशील योगी खातर निष्काम भाव सूं कर्म करणौ मोटो कारण है। क्यूं कै फळ री प्राप्ति अप्राप्ति में समता है या नीं है इणरौ असर नीं पड़ै।
अर जकौ योगारूढ होयौ वौ दूजां खातर कर्म जरूर करियौ है। उणरा सगळा संकल्प मतै ई निटगा जिण सूं उण नै शान्ति मिलै। वा इज परमात्मा री प्राप्ति वाजै।
।।श्लोक।।
यदा हि नेन्द्रियार्थोषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसड़्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़ स्तदोच्यते।।४।।

।।चौपाई।।
नीं इन्द्रियां विषयां रै सागै
नीं व्है कर्म फळां सूं लागै।
जो सब संकल्पां ने तजिया
वै मिनख योगारूढ़ वजिया।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ मिनख इन्द्रियां अर विषयां रै वश में नीं है जिणनै कर्मफळां सूं आसक्ति नीं है जकौ सुख भोगण री कामना नीं करै। वौ मिनख इज योगारूढ वाजै है अर जिणरी कर्मां में आसक्ति नीं व्है जकौ सब संकल्पां नै तज दिया है मतलब क्रिया फळ री आसक्ति नीं राखणियां नै इज परमात्मा री प्राप्ति व्है है।
।।श्लोक।।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।५।।

।।चौपाई।।
खुद सूं खुद उद्धार कराऔ
अधोगती में अब मत जाऔ।
औ मन इज गिण मिंतर थारौ
दुसमी औ इज बणवा वारौ।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!थूं थारा सूं थारौ खुद रौ उद्धार इण संसार में करावण री जुगत बैठाव। थूं खुद नै अधोगति में मती जावण दै। क्यूं कै औ मन इज थारौ मित्र है अर इणनै इज थारौ दुसमी गिण जै।
इणरौ मतलब औ है कै शरीर इन्द्रियां मन बुद्धि प्राण खुद नै खुद सूं ऊंचा मानै अर म्हैं पणौ जतावै जणै उद्धार नीं व्है सकै इण खातर खुद सूं खुद रौ उद्धार करणौ पड़सी आ आत्मा इज आपरी सैण है अर आ इज दुसमी बण जाय है
।।श्लोक।।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।६।।

।।चौपाई।।
जौ आतम नै जीत लियौ है
आतम उण रौ साथीड़ौ है।
जद आतम नीं कब्जै ज्यां रै
तद आतम है दुसमी व्यां रै।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ आपरी आत्मा सूं मन, शरीर अर इन्द्रियां नै वश में कर ली है मतलब जकौ इन्द्रियां नै जीत ली है वा आत्मा आपरी मित्र है। अर जकौ आपरा शरीर, मन, इन्द्रियां नै कब्जै नीं कर सकियौ है उण खातर आ इज आत्मा आपरी दुसण बण जाय है।
।।श्लोक।।
जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित:।
शीतोष्णसुखदु:खखेषु तथा मानापमानयो:।।७।।

।।चौपाई।।
सुख दु:ख सरद गरम समाना
मान र तोहिन नै सम माना।
जीत ज इन्द्रियां व्है खुश जो ई
परमातम रौ समयक सो ई।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सरदी-गरमी सुख-दु:ख में जकौ हमेशा एक सो रैवै मान अर अपमान में जिणरै अंतस री वृतियाॉं आछी तरियां सूं शान्त रैवै। ऐड़ी निकेवळी (स्वाधीन) आत्मा वाळा मिनख रै हिय में परम पिता परमेश्वर समान रूप सूं वास करै (स्थित व्है) उण रा ग्यान में फगत परमात्मा रै सिवाय दूजी कोई चीज व्है इज कोनी।।७।।
।।श्लोक।।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय:।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:।।८।।

।।चौपाई।।
विद विग्यान तृप्त अविकारी
इन्द्रियां नै जीतै चित धारी।
माटी सोनो गिणै समाना
वै योगी हरि मांय मिलांणा।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिणरौ अंतस ग्यान विग्यान सूं तरपत व्है, जकण री दसा विकार रहित व्है, जिण री इन्द्रियां सावचेती सूं जीतियोड़ी व्है अर जिण रै वास्तै माटी, भाटौ अर हेम (सोनो) एक जैड़ा इज व्है वौ योगी परमेश्वर में विलीन व्हियोड़ौ व्है। एड़ौ कैवै है।
।।श्लोक।।
सुहृन्तित्रार्यदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्वशिष्यते।।९।।

।।चौपाई।।
बिन हित अरि मित एक समाना
पापि धर्मि बिच भेद नि माना।
साधु असाधु बरत सम भावा
वौ मुनि गिण जौ सिरै सुभावा।।९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सुहृद् मतलब स्वारथ रहित सगळां रौ हित करण वाळौ मित्र अर वैरी रै सागै उदासीन यानी बिना पक्षपात रै दोनू पक्षौ री चिंता (भलाई) करणियौ। पापि अर बंधुओं (धर्मात्मावां) नै समान भाव सूं देखणियौ इज सै सूं सिरै (श्रेष्ठ) है।।९।।
।।श्लोक।।
योगी युज्जीत् सततमात्मान:रहसि स्थित:।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह।।१०।।

।।चौपाई।।
मन इन्द्रियां वश राखण वाळौ
आस बिना संग्रह तज वाळो
वौ योगी एकांत विराजै
थिर हो परमातम में साजै।।१०।।

।।भावार्थ।।
*भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
मन बुद्धि इन्द्रियां शरीर नै जकौ वश में राखण वाळौ, बिना आस रै अर बिना संग्रह करण वाळौ योगी एकांत में थिर व्है जाय वा आत्मा इज लगोलग परमात्मा में लीन व्है जाय है।।१०।।
।।श्लोक।।
शुचौ देशे प्रतिष्ठापित स्थिरमासनमात्मन:।
नात्युच्छि्तं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।११।।

।।चौपाई।।
उत्तम भू पर कुश मृगछाला
नीं ऊंचै नीं नीचै ढाळा।
थिर थापित हुय आसण ठावै
वो योगी इम योग जमावै।।११।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
शुद्ध धरती माथै कुशा, मृगछाल अर वस्त्र बिछाय र आसण लगावै जकौ नीं तौ घणौ ऊचौ अर नीं ई साव नीची ठौड़ व्है उठै योगी आपरौ आसण लगाय र उण जगा थिर होय र योग वास्तै बैठै है।
।।श्लोक।।
तत्रैकाग्ं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय:।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।१२।।

।।चौपाई।।
उण आसण थिर हुय चितधारी
इन्द्रियां किरियावां वश सारी।
अंतस शुद्ध करण री आसा
मुनि एकाग्र करै अभ्यासा।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!उण आसण माथै बैठ र चित्त अर इन्द्रियां री सगळी क्रियावां नै वश में राखतां थकां मन नै एकाग्र कर र अंतस नै शुद्ध करण खातर मुनि औ अभ्यास करै।
।।श्लोक।।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर:।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिश श्चानवलोकयन्।।१३।।

।।चौपाई।।
सगळौ डील अडिग करवाजै
पाछै मन थिर करण लगा जै।
नजर नाक ऊपर टिकवाजै
पछै ध्यान एकाग्र कराजै।।१३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-योगी आपरी काया (डील) माथौ(सिर)अर गाबड़ (गळौ) अडिग (स्थिर)कर र पछै मन नै
थिर करै। ता पछै उणरी निजरां नाक रै ऊपर लिलाट माथै टिकाय र दूजी दिशाओं कानी बिना ध्यान फंटायां थिर व्है जाय।
।।श्लोक।।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित:।
मन:संयसम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:।।१४।।

।।चौपाई।।
ब्रह्मचर्य नै पाळण वाळौ
रैय सहज चित निडर निराळौ।
म्हां में मगन होय जा ग्यानी
मन नै रोक बैठ थिर ध्यानी।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-जकौ योगी ब्रह्मचारी धर्म रौ पालण करतो थकौ निडर होय अर आछी तरियां शान्त चित्त धार र सचेत होयोड़ौ मन नै रोक र म्हारा में लीन(मगन) होवण रौ जतन करै।
।।श्लोक।।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस:।
शान्तिं निर्वाण परमां मत्संस्थामधि गच्छति।।१५।।

।।चौपाई।।
मन वश व्हियां जपै जो योगी
आतम उत परमातम होगी।
दिन अर रात म्हनैं जो ध्यावै
वौ जन परम शान्ति नै पावै।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ आपरा मन नै वश में कर लियौ है अर आपरी आत्मा नै म्हारा में (परमात्मा में) लीन कर ली है यानी म्हारा स्वरूप में लगाय ली है वौ परम शान्ति नै पावण वाळौ है।
।।श्लोक।।
नात्यश्र्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्र्नत:।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।१६।।

।।चौपाई।।
औ योग नि घण खाऊ पावै
नीं घण भूख मरणियौ लावै।
नीं घण सोयां ज सिद्धि आवै
नीं घण जागणियौ पद पावै।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! औ योग नीं तौ घणौ खावण वाळौ धार सकै है अर नीं ई घणौ भूखौ रैवणियौ सिद्धि पाई है। भगवान् फरमावे कै जकौ दिन भर सोवतो इज रैवै उणनै ई योग प्राप्त नीं होयो है अर उण नै ई योग नीं मिलै जकौ पलक ई नीं झपकै मतलब जकौ हमेश जागतौ इज रैवै वौ ई सिद्धि प्राप्त नीं कर सकै।।
।।श्लोक।।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।१७।।

।।चौपाई।।
जथा जोग खावण विचरणियौ
जथा जोग इज कर्म करणियौ।
जथा जोग जागण सोवणियौ
वो योगी दुख नाश करणियौ।।१७।।

।।भावार्थ।।
अठै भगवान् श्री कृष्ण कैवै है कै कम भोजन अर खरी कमाई रौ करणवाळौ, कम घूमण फिरण वाळौ अर जितरी जरूरत है उतरा कर्म री चेष्टा करण वाळौ, नीं घणौ सोवण वाळौ अर नीं ई घणौ जागण वाळौ जथा जोग क्रिया करण वाळौ सगळा कष्टां रौ नाश करणियौ योगी वाजै है।
।।श्लोक।।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।१८।।

।।चौपाई।।
चित वश में कर योग ज धारै
उण पुळ थिर आतम कर तारै।
सगळा भोगां नै तज वारौ
वो योगी व्है योग जगारौ।।१८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै योगी आपरा चित्त नै वश में करै उण बगत (पुळ) वौ परमात्मा में लीन व्हियोड़ौ थिर व्है है। उण काल में वौ सगळा भोगां सूं स्पृहा रहित (अळगौ व्हियोड़ौ) व्है है। वौ योगी इज असली योगी वाजै है।
।।श्लोक।।
यथा दीपो निवातस्थो नेड़्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन:।।१९।।

।।चौपाई।।
पवन बिना दीवौ थिर जागै
चित वश होय योगि नीं भागै।
आतम सूं अभ्यास कियोड़ौ
उणरौ इज व्है मन रमियोड़ौ।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! ज्यूं कै बिना पवन रै दीवा री लौ विचलित नीं व्है मतलब उण री रोशनी सीधी ऊपर कानी इज जावै अठी उठी नीं बिखरै व्युं इज अभ्यास करियोडौ योगी आपरी इन्द्रियां नै वश में कर राखी है उण री आत्मा ई अठी उठी विचलित नीं व्है दीवा रै ज्यूं सीधी परमात्मा में इज लागै है।
।।श्लोक।।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।२०।।

।।चौपाई।।
योग मगन व्है मन औ जोवै
चित निरुद्ध अवस्था ज होवै।
अर एकाग्र ज चित राखणियौ
खुद में खुद नै इज परखणियौ।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! योग रौ अभ्यास करणियौ जद एकाग्र चित व्है जाय तो घणा काल तक आ अवस्था रह्यां पछै वौ खुद में इज मगन व्है जाय अर इण सन्तुष्टी नै इज निरुद्ध अवस्था कैवै है।
।।श्लोक।।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्ममतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:।।२१।।

।।चौपाई।।
औ अनन्त सुख परै ज इन्द्रियां
पण पावै ला शुद्ध मन व्हियां।
वौ पुळ ईश मिलण रौ आवै
आतम उण सूं नीं हट पावै।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
वौ सुख जकौ खुद सूं इज अनुभव होय सकै उण नै अतीन्द्रिय सुख कैवै। क्यूं कै औ सुख शुद्ध मन सूं सूक्ष्म बुद्धि सूं ग्रहणकरियोडौ
घणौ बत्तौ सुख है इण खातर औ सुख बुद्धि ग्राह्म सुख वाजै है।
इण दशा में थिर व्हियोड़ौ योगी परमात्मा सूं विचलित नीं व्है सकै।
।।श्लोक।।
ये लब्ध्वा चापरं लाभ मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते।।२२।।

।।चौपाई।।
लाभ ईश पावण में जाणै
दूजौ कछु नीं अवर पिछाणै।
थिर व्है हरि पावण री ठांणै
उण नै डिग नीं दुख कर जाणै।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जिणनै परमात्मा री प्राप्ति रै लाभ सूं बत्तो लाभ और कोई नीं लागै अर जदै वौ थिर होय र आत्मा सूं परमात्मा में लीन व्है जाय तो उणनै दु:ख हरगिज नीं डिगाय सकै मतलब वौ विचलित नीं व्है।
।।श्लोक।।
त विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञतम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।२३।।

।।चौपाई।।
दुख रूपी संसार सु अळगौ
वो इज योग हमेशा पळगौ।
चित में छोह धीज रौ वासौ
निस्चै सूं व्है कर्म उजासौ।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ दु:ख रूपी संसार सूं अळगौ व्हैगौ है मतलब संयोग रहित व्हैगौ है उण रौ इज नाम योग है। उणनै औ जाणणौ चहिजै कै वौ चित में धीरज अर छोह (उमंग) धार लै पछै निस्चै पूर्वक कर्त्तव्य कर्म करतो रैवै।
।।श्लोक।।
सड़्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत:।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियमित समन्तत:।।२४।।

।।चौपाई।।
तज संकल्पां री सब आसा
मन इन्द्रियां वश रा पी घासा।
योग धारवा बैठौ ध्यानी
पायौ आतम विद्या ग्यानी।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
संकल्पां सूं उत्पन्न व्हियोड़ी सगळी काम वासनावां (आसावां)नै त्यागियोड़ौ अर
पछै मन सूं सगळी इन्द्रियां कर्मणेन्द्रियां नै वश में कर र ध्यान धारणियौ इज योगी ग्यानी वाजै है।
।।श्लोक।।
शनै: शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।२५।।

।।चौपाई।।
मन चंचल, थिर कर अब भाई
धीरज धार बुद्ध अपणा ई।
परमातम में चित्त लगा जा
इण रै सिवा सोच मत राजा।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! हवळै हवळै अभ्यास करतो थकौ उपरति नै पाय लै मतलब संसार रा पंपाळां सूं अळगौ व्है जा। पछै
नेठाव सूं बुद्धि रौ उपयोग करतो थको अंतस सूं परमात्मा री प्राप्ति में लाग जा इण रै सिवाय दूजी कानी ध्यान इज मत दै।
।।श्लोक।।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।२६।।

।।चौपाई।।
औ मन बिना लगाम ज घोड़ौ
इण नै घेर करौ थिर थोड़ौ।
सबद विषय रा रोड़ा त्यागौ
परमातम पावण में लागौ।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!औ थिर नीं रैवण वाळौ अचपळौ(चंचल) मन जिण जिण सबदां रा विषयां रै निमत संसार में विचरण करै जणै वां वां विषयां सूं अळगौ राख र परमात्मा में लगावण री सोच।
।।श्लोक।।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।२७।।

।।चौपाई।।
पाप रहित मन रज गुण त्यागै
चित्त में इण रै शान्ति जागै।
एक हि भाव होय हरि ध्यावै
वौ योगी उत्तम सुख पावै।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिणरौ मन आछी तरियां सूं शान्त व्है है, जकौ पाप रहित व्है है अर जकौ रजोगुण त्यागियोड़ौ व्है है वौ योगी परमपिता परमात्मा में एक हि भावा व्हियोड़ौ है इसड़ौ योगी उत्तम आनन्द पावण रौ हकदार व्है है।
।।श्लोक।।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।।

।।चौपाई।।
इम योगी मन वश में करलै
आतम सूं परमातम भजलै।
अंतस सूं सुख पावण वाळौ
खुस हुवतो व्है जोग जगा ळौ।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
वौ पाप रहित योगी इण तरह आत्मा नै परमात्मा में लगावतोड़ौ हरख सूं परब्रह्म परमात्मा री प्राप्ति अनुभव करण लाग जाय है।
।।श्लोक।।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।।२९।।

।।चौपाई।।
योगी सगळै थिर इकराया।
आतम व्है समभावी भाया।
सगळां में निज आतम जाणै
आतम सब री वौ यु पिछाणै।।२९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
सगळी जागा अनन्त चेतन व्हियोड़ौ इकरायौ(एकी भाव व्हियोड़ौ) थिर होय र योग धारियोड़ी आत्मा वाळौ पछै सगळां नै सम भाव देखणियौ योगी सगळां में खुद री आतमा जाणै अर सगळां री आत्मा नै वौ पिछाणै।
।।श्लोक।।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।३०।।

।।चौपाई।।
जो सब में मम व्यापक देखै
अर सगळा म्हारै इज लेखै।
उण खातर म्हैं नीं अण दीठौ।
अर नीं वौ म्हारा सुँ अदीठौ।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जकौ मिनख सब प्राणियां री आत्मा में म्हनैं इज व्यापक देखै है अर सगळा प्राणियां नै म्हारै मांय इज जाणै है उण रै वास्तै म्है अण दीठौ(अदृश्य) नीं रैय सकूं अर वौ म्हारै खातर अण दीठौ नीं व्है सकै है।
।।श्लोक।।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।
सर्वथा वर्तमानौऽपि स योगी मयि वर्तते।।३१।।

।।चौपाई।।
सब जीवां में थित मम जाणै
बिना भैद भजणौ मम ठाणै।
जो योगी इण विध मम ध्यावै
वौ आनन्द अवस ई पावै।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
सब देश काल व्यक्ति वस्तु घटना परिस्थिति इत्याद में जकौ म्हनै इज जाणै। मतलब सगळा जीवां में एकी भाव में थित व्है अर सगळा रै साथै बराबर रौ व्यवहार करै पछै म्हारौ इज भजन करतौ रैवै वौ योगी हमेशा आनन्द पावै है।
।।श्लोक।।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दु:ख स योगी परमो मत:।।३२।।

।।चौपाई।।
खुद माथै लै अवर पिछाणां
सुख दुख नै जो गिणै अपाणा।
जो मानै है म्हनै सयोगी
हे अर्जुन वौ परम ज योगी।।३२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ योगी खुद रै शरीर री उपमा देय र दूजां प्राणियां नै पिछाणै अर साथै बराबर रौ व्यवहार करै अर सुख-दु:ख खुद माथै हुयोडौ जाण र सब रै सागै व्यहार करै वौ इज परम श्रेष्ठ योगी वाजै है।
।।श्लोक।।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।

।।चौपाई।।
जद माधव सम योग बतायौ।
कर विणती अर्जुन औ चायौ।
चंचल मन थिर व्है नीं पावै
इहि कारण ए निजर न आवै।।३३।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैयौ-हे मधुसूदन! जकौ औ योग आप समभाव सूं बतायौ है, म्हारौ मन चंचल होवण रै कारण म्हैं इणरी नित्य (स्वाभाविक) स्थिति नै नीं देख पाय रह्यौ हूं।
।।श्लोक।।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलददृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।३४।।

।।चौपाई।।
हे माधव मन चंचल आंटौ
विचलित अर बलवान ज काठौ।
जियां पवन रुकणौ नीं सोरौ
तियां इ मन वश हुवणौ दोरौ।।३४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे श्री कृष्ण!औ मन घणौ चंचल अर प्रमथन(विचलित) स्वभाव वाळौ है सागै ई औ घणौ हटी(आंटौ) नै बलवान न्यारौ है इण कारण इण मन नै वश में करणौ उतरौ इज दौरौ है जितरौ दुष्कर पवन नै रोकणौ व्है है।
।।श्लोक।।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तैय वैराग्येण च गृह्यते।।३५।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन मन चंचल होवै
पण कर कर अभ्यास ज धोवै।
जो मन में वैराग ज लायौ
निस्चै ई मन वश में आयौ।।३५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!(महाबाहो) बिना संशय रै आ बात पक्की है कै औ मन चंचल है सोरै सास वश में नीं आणौ है पण बार बार अभ्यास करण सूं अर वैराग धारण सूं इण मन नै वश में लाय सकै है।
।।श्लोक।।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मति:।
वश्यात्मना तु तत्ता शक्योऽवाप्तुमुपायतत:।।।।३६।।

।।चौपाई।।
जिण रौ मन वश में नीं आयौ
वौ योगी नीं योग ज पायौ।
लगातार परयास ज कीन्हा
उण योगी नै इज फळ दीन्हा।।३६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण रौ मन वश में करियोड़ौ है, ऐड़ौ योगी योग नीं पाय सकै पण जकौ आपरौ मन वश में कर लियौ है मतलब लगातार प्रयास रत रह्यौ है उण नै अवस ई सहज रूप सूं योग प्राप्त व्हियौ हूं।।
।।श्लोक।।
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस:।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।३७।।

।।चौपाई।।
योग मांय श्रद्धा जो लावै
पण संयम दृढ नीं कर पावै।
अन्त मांय जौ रयगौ आगौ
वौ योगी किण गति नै पागौ।।३७।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कह्यौ-हे कृष्ण! जकौ योग में श्रद्धा राखण वाळौ है ; पण संयम नीं है इण कारण जिण रौ मन अन्तकाल में योग सूं टळगौ है, अळगौ व्हैगौ है वैड़ा योगी नै सिद्धि नीं मिल र किण गति में जावै ?
।।श्लोक।।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठौ महाबाहो विमूढो ब्रह्मण:पथि।।३८।।

।।चौपाई।।
ईश प्राप्ति रै मग रौ मोगौ
वौ मोहित बिन आश्रय होगौ।
जिम बिखरी बदरि दोउ कानी
नष्ट भ्रष्ट तो नीं हो जाणी।।३८।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव कठैई वौ योगी परमेश्वर रै प्राप्ति रै मारग में मोहित अर आश्रय रहित होयोड़ौ उण छिन्न भिन्न व्हियोड़ी बादळी रै ज्यूं नष्ट-भ्रष्ट तो नीं व्हैगौ है।
।।श्लोक।।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषत:।
त्वदन्य: संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।।३९।।

।।चौपाई।।
हे माधव मम संशय भारी,
आप हि योग्य ज भया मुरारी।
अवर न इण नै छेदन वारौ
आप सिवा नीं हुवै उबारौ।।३९।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव! म्हारा इण संशय नै आछी तरियां सूं छेदन करण रा सक्षम आप इज हो आपरै बिना दूजो इण संशय रौ छेदन करण रौ योग्य कोई नीं है।
।।श्लोक।।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गतिं तात गच्छति।।४०।।

।।चौपाई।।
न इहलोक परलोक बिगारौ
दुरगति कुण है करवा वारौ।
ईश मिलण रौ कर्म ज धारै
उण री दुरगति हुवै न हारै।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे पार्थ! उण योगी रौ नीं तौ इहलोक में नाश व्है सकै अर नीं ई परलोक में कीं बिगड़ सकै। क्यूं कै हे अर्जुन! आत्मा रा उद्धार खातर मतलब परमेश्वर प्राप्ति खातर कर्म करणिया री दुरगति होय ई नीं सकै।
।।श्लोक।।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्र्वती: समा:।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।४१।।

।।चौपाई।।
योग कर्म सूं भटकण वाळा
पुण्यवान लोक ज पा बाळा।
घणा बरस तक उत रह जावै
उत्तम कुल में जलम ज पावै।।४१

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! योगभ्रष्ट मतलब जको योगी योग कर्म सूं भटकगा है पुण्यवान लोकां में जावै यानि सुरग जैड़ा उत्तम लोकां में जावै है अर उठै घणा वर्षां तक निवास करै पछै उठै रैय र शुद्ध आचरण वाळा(श्रीमान) रै घरै जलम लेवै है।
।।श्लोक।।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोको जन्म यदीदृशम्।।४२।।

।।चौपाई।।
या वै ग्यानवान कुळ जलमें
परमारथ रौ फळ ‌नीं पल में।
वै ए स्वाभाविक कृत ठावै
दुर्लभ इसड़ौ जलम ज पावै।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! या ( अथवा)वै वैराग्यवान योगी उण लोक में नीं जाय र ग्यानवान योगी रै कुळ में इज जलम लेवै है पण इसड़ौ जलम घणौ दुर्लभ हुवै है।
।।श्लोक।।
तंत्र तं बुद्धि संयोग लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूय: संसिद्धौ कुरुनन्दन।।४३।।

।।चौपाई।।
चिंता मत कर अर्जुन वांरी
पूर्व संयोग बुध जिण धारी।
देह पाछला सूं औ पायो
कर परयास अबै हिय धायौ।।४३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! उठै उण रा शरीर में पैली संग्रह व्हियोड़ौ बुद्धि संयोग नै, योग रा संस्कारां नै अनायास इज प्राप्त कर लेवै अर हे कुरुनन्दन! इण रा प्रभाव सूं वौ फेर परमात्मा री प्राप्ति रूप सिद्धि रै वास्तै पैली सूं बत्ता प्रयास करै है।
।।श्लोक।।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्त्रियते ह्यवशेऽपिस:।
जिज्ञासु रवि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।४४।।

।।चौपाई।।
योग ज भ्रष्ट व्हियोड़ो योगी
ग्यानी रै कुळ जलम लियो गी।
वौ जिग्यासू जद बण जावै
कर्म फळां सूं ज मुक्ति पावै।।४४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जौ योगी योग करती बगत विचलित (योग भ्रष्ट) व्हियोड़ौ है योगी ई आपरा पैली रा अभ्यास रै कारण वौ भगवान् कानीं बेगौ आकर्षित हुया करै अर समय बुद्धि योग रौ जिग्यासू ई वेदां में कहयोड़ा सकाम कर्मां रा फळ सूं परै जाय परौ है।
।।श्लोक।।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिष:।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।।४५।।

।।चौपाई।।
भांति भांति कर जतन ज सारा
अर हिय सूं तज सैंग विकारा।
संस्कार पिछला जलमां रा
पाय परमगति योगी न्यारा।।४५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! पण प्रयत्नपूर्वक प्रयास करण वाळौ तौ लार ला कैई जलमां रा संस्कारां रै जोम सूं इण इज जलम में सिद्ध व्हैय र सगळा पापां सूं छुटकारौ पाय र पछै तुरत परमगति पाय लै।
।।श्लोक।।
तपस्विभ्योऽपि मतोऽधिक:
ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।
कर्मिभ्यश्र्चाधिको योगी
तस्माद्योगी भवार्जुन।।४६।।

।।चौपाई।।
तपसी सूं योगी व्है ऊंचौ
शास्त्र ग्यानि सूं गिण मत नीचौ।
सब कर्मां सूं योगी आछौ
हे अर्जुन योगी थूं साचौ।।४६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! योगी तपस्वियां सूं सिरै (श्रेष्ठ) व्है वाजै है अर सकाम कर्म करण वाळां सूं ई योगी सिरै इज व्है है इण खातर थूं योगी है।
।।श्लोक।।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:।।४७।।

।।चौपाई।।
सब योगियां में जु चित चोगी
मुझ में लीन भजन रत जोगी।
वौ म्हारा मत में दृढ़ धारी
सिरै गिणै है योगी भारी।।४७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सगळा योगियां में जकौ श्रद्धावान् योगी म्हारा में लाग्योड़ा अन्तर आत्मा सूं म्हनै भजतौ रैवै वौ योगी म्हनै घणौ सिरै (श्रेष्ठ) लागै है।
।।चौपाई।।
औ छटमौ अध्याय ज पूरौ
अर्जुन किसन सँवाद सबूरौ।
इहि कारण पड़ियो औ नामौ
कहवावै यु आत्म संयामौ।।

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