गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-सातवौ अध्याय

सातवौ अध्याय – ज्ञानविज्ञानयोगः

।।श्लोक।।
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तुच्छृणु।।१।।

।।चौपाई।।
घणा प्रेम घण भाव जतावै
हे अर्जुन थूं योग निभावै।
म्हैं सगळा गुण रूप बताऊँ
सुण बिन संशय भरम मिटाऊँ।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! अनन्य प्रेम सूं म्हारा में आसक्तचित्त अर अनन्य भाव होयोड़ौ योग में लागियोड़ौ थूं जिण तरह रौ सगळा बलां युक्ति, ऐश्वर्य गुणा सूं सराबोर सगळां रौ आत्म रूप म्हैं थनै बिना संशय रै बताऊं ला वौ सुण।
।।श्लोक।।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यञ्ज्ञात्वा नेहि भूयोऽन्यञ्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।२।।

।।चौपाई।।
तत्व ग्यान विग्यान सुणाऊँ
तुझ खातर म्हैं सब समझाऊँ।
जाणण जोग कर्म पहिचाणौ
पछै बचै नीं अवर ज जाणौ।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!म्हैं थारै खातर तत्व ग्यान अर विग्यान समेत सगळा ग्यान कैऊँ ला। उण नै जाणियां पछै लारै कीं जाणण जोग नीं बचै ला।
।।श्लोक।।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्र्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।।३।।

।।चौपाई।।
जन हजार तपियां इक कोई
तां में एक म्हनै ई जोई।
वां सिद्धां में जाग विवेका
तत्व ग्यान मम जाण हि एका।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! हजारां मिनखां मांय सूं कोई एक म्हनै पावण रौ जतन करै अर उण जतन करण वाळा अलेखां योगियां मांय सूं कोई एक म्हनै पावण खातर म्हारा तत्व रूप मतलब यथार्थ रूप नै, चेतन रूप नै जाण सकै है
।।श्लोक।।
भूमिरापोऽनलो वायु:खं मनो बुद्धिरेव च।
अहडड़्कार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।४।।

।।चौपाई।।
भू जळ अगन पवन आकासा
मन बुद्धि अर अहम व्है खासा।
यां आठां रा अलग स्वभावा
ए आठ इ जड़ भाव जता वा।।४।।

।।श्लोक।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।५।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन इक अवर स्वभावा
जिण सूं जग धारण किय छावा।
औ स्वरूप मम जाणण आजा
चेतन रूप दिखाऊँ ताजा।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
पृथ्वी, जळ, अगनी, पवन, आकाश, मन बुद्धि अर औ अहंकार इण भांत ए आठ तरह में बंटियोड़ी म्हारी प्रकृति (स्वभाव) है आ प्रकृति तो जड़ प्रकृति बाजै है। अर हे महाबाहो!(अर्जुन) एक दूजी प्रकृति औरूं व्है है जिण सूं औ सगळौ जगत धारण कियौ जावै है पण थूं म्हारौ असली स्वरूप यानी चेतन रूप जाण।
।।श्लोक।।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्न्नस्य जगत: प्रभाव: प्रलयस्तथा।।६।।

।।चौपाई।।
दो सुभाव जड़ चेतन ठाया
यॉं सूँ सब प्राणी जलमाया।
हूँ म्हैं इण जग रौ निरमाता
मारू म्हैं म्हैं ई जीवाता।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूँ इण तरह समझ कै सगळा प्राणी, वनस्पति दोनूं प्रकृतियॉं (स्वभावॉं) जड़ कर चेतन सूँ इज जलमण वाळा है अर म्हैं सगळा जगत रौ प्रभव (जीवावण वाळौ) अर प्रलय करण वाळौ हूं यानी सगळा जगत रौ म्हैं इज मूळ कारण हूं।
।।श्लोक।।
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।७।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन ज्यूँ मिणियॉं माळा
जुड़ि डोर व्यूँ मम जग गुँथाळा।
म्हारा सूँ कोइ न है न्यारौ
म्हैं हूँ जग रौ कारण सारौ।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे धनञ्जय! म्हारा सूँ न्यारौ दूजौ कोई परम कारण नीं है। औ सगळौ जगत् माळा रै मिणियॉं ज्यूँ एक डोर सूँ बंधियोड़ा व्है व्यूँ इज सगळी दुनिया म्हारा सूँ गूँथिजियोड़ी है।
।।श्लोक।।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो:।
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु।।८।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन म्हैं जळ में रस हूँ
भानु ससि रौ म्हैं प्रकास हूँ।
वेदां नु ओम नभ नु सबद हूँ
पुरुषां में म्हैं पुरुषारथ हूँ।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं जळ में रस हूँ म्हैं इज सूरज अर चंद्रमा रौ प्रकास हूँ। सगळा वेदां में ओम म्हैं हूं अर आकास में सबद म्हैं हूँ सागै ई म्हैं इज पुरुषां रौ पुरुषार्थ हूँ।
।।श्लोक।।
पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्र्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्र्चास्मि तपस्विषु।।९।।

।।चौपाई।।
म्हैं भूमि में पावन गन्ध हूँ
अगनी रौ औ तेज म्हैं इ हूँ।
सब जीवां रौ म्हैं जीवन हूँ
अवर तपस्वी रौ म्हूँ तप हूँ।।९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अगनी में तेज म्हैं इज हूँ। सगळा प्राणियॉं रौ जीवन म्हैं इज हूँ सागै तपस्वियॉं में तप ई म्हैं इज हूँ।
।।श्लोक।।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।।१०।।

।।चौपाई।।
सब संसार रौ बीज हूँ म्हैं
सकल जगत नै जलमाऊं म्हैं
बुध वाळां री बुध गिण हूँ म्हैं
तेज रहणियां नु तेज हूँ म्हैं।।१०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! सब संसार रौ बीज म्हैं हूँ। सकल जगत नै म्हैं इज जलमाऊं हूँ। बुद्धि वाळां री बुद्धि म्हैं इज हूँ अर तेजस्वियाँ रौ तेज ई म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्मविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भारतर्षभ।।११।।

।।चौपाई।।
लांठा नु बिन काम बळ म्हैं हूँ
बिन स्वारथ सामर्थ इ म्हैं हूँ।
काम धर्म अविरुद्ध ज म्हैं हूँ
सब जीवां में काम ज म्हैं हूँ।।११।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!म्हैं लांठा (बलवानां) रौ आसक्ति रहित अर काम रहित सामर्थ्य हूँ म्हैं सगळा प्राणियाँ में धर्म रै अविरद्ध काम हूं यानी मर्यादा मुजब शास्त्रां रै अनुकूल काम हूँ।
।।श्लोक।।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्र्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि।।१२।।

।।चौपाई।।
सत्व रजौ अर तमौ गुणां सूं
पनपण वाळा भाव यु म्हा सूं।
तो ई वै म्हारा सूं न्यारा
म्हैं ई वां नै समझूं न्यारा।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
दूजा जकौ सत्व गुणां सूं पनपियोड़ा भाव है अर जकौ रजौ गुणां अर तमौ गुणां सूं उत्पन्न होवण वाळा भाव व्है वां सगळां नै थूं म्हारा में इज होवण वाळा ज्यूं जाण। पण असल में वां रा में म्हैं नीं हूं अर वै म्हारा सूं न्यारा है।
।।श्लोक।।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्।।१३।।

।।चौपाई।।
सत रज तम गुण सब में जागा
सगळा प्राणी मोहित लागा।
जग यां तीनां नै अपणायौ
जिण सूं मुझ तक पूग नि पायौ।।१३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!गुणां रा कार्य रूप सात्विक, राजस अर तामस-याँ तीनां प्रकार रा भावां सूं औ सगळौ जगत् मोहित व्है है इण वास्तै याँ तीनां गुणां सूं परै मुझ अविनाशी तक ए पूग नीं सकिया।
।।श्लोक।।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।

।।चौपाई।।
त्रिगुण मयी माया ज अनोखी
जिणमें जितरी जान ज झोंकी।
पण जो भजै म्हनै दिन राता
वौ ए लांघ तिरै मुझ ध्याता।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! क्यूं कै आ त्रिगुणमयी (सतगुण, रज गुण अर तमो गुण री माया) घणी अदभुत है म्हारी आ माया घणी दुस्तर है, पण जकौ मिनख फगत म्हनै इज दिन-रात (लगातार)भजै वै इण माया नै लांघ (परै )जाय मतलब इण संसार सूं तर जाय है।
।।श्लोक।।
न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:।।

।।चौपाई।।
माया सूं जो ग्यान घमाया
वै मूरख यूं समझ न पाया।
नीच असुर ऊँदा करमां रा
कदै नीं म्हनै भजिया न्यारा।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
माया सूं जिणरौ ग्यान विस्मृत व्हैगौ ऐड़ा असुरी स्वभाव धारण करणिया, नीच, नाजोगा मूरख मिनख म्हनैं नीं भजै।
।।श्लोक।।
चातुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिग्यासुरर्थार्थी ग्यानी च भरतर्षभ।।

।।चौपाई।।
चार तरह रा मम भज ध्यानी
सिरै कर्म कर लै गुण वानी।
अर्थार्थी र आर्तो चेला
जिग्यासु संग ग्यानी पैला।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! सिरै (उत्तम)कर्म करण वाळा चार प्रकार रा भगत म्हनै भजै है वै है १-अर्थार्थी-जकौ सांसारिक पदार्थों खातर म्हनै भजै
२-आर्त-जकौ संकट निवारण खातर म्हनै भजै
३-जिग्यासी-जकौ म्हनै जथारथ (यथार्थ) रूप में जाणण री इच्छा राखणिया अर
४-ग्यानी भगत ऐ चार प्रकार रा भगत म्हनै भजै है।
।।श्लोक।।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एक भक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:।।१७।।

।।चौपाई।।
यां चारां में सिरै वियोगी
थिर मन कर बण जावै जोगी।
उण ग्यानी नै म्हैं ज दुलारौ
वौ म्हारौ है प्राण ज प्यारौ।।१७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!वां चारां मांय सूं जकौ रोज म्हनै एकी भाव सूं थिर होय र अनन्य भगती वाळौ व्है वौ प्रेम भगती वाळौ अति उत्तम भगत व्है है, क्यूं कै म्हनै तत्व सूं जाणण वाळा ग्यानी नै म्हैं घणौ प्रिय व्हूँ हूँ अर वौ ग्यानी म्हनै प्राणां सूं ई प्यारौ लागै है।
।।श्लोक।।
उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।१८।।

।।चौपाई।।
भगत ज सैंग उदार हुवै है
ग्यानी तौ मम रूप ज व्है है।
मन नै रोक म्हनैं थिर ध्यावै
वौ उत्तम मुनि मम में आवै।।१८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
ऊपर बतायोड़ा चार तरह रा भगत घणा उदार (सिरै भाव वाळा) व्है है। पण ग्यानी (आध्यात्म प्रेमी) तौ म्हारौ आत्म स्वरूप इज हूवै है। ऐड़ौ म्हारौ मत (राय) है। क्यूं कै वौ म्हारा सूं न्यारौ नीं है। अर उण सूं सिरै(श्रेष्ठ) कोई दूजी गति नीं व्है सकै। वै ग्यानी (आध्यात्म विद्या प्रेमी) म्हारा में (थिर) दृढ स्थित है।
।।श्लोक।।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:।।१९।।

।।चौपाई।।
घणा जलम नु पछै व्है ग्यानी
सब में वासुदेव नै जाणी।
इसा भाव सूं म्हनैं ज ध्यावै
दुरलभ विसौ महात्मा पा्वै।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
घणा जलमां पछै अन्तिम जलम में यानी मिनखा जूण में सै कीं(सब कुछ) परमात्मा इज है इसड़ा ग्यानवान म्हारा शरण में आवै है वैड़ा महात्मा घणा दुरलभ मिलै है।
।।श्लोक।।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:।
तं तं नियममास्थाय प्रकृतियां नियंता: स्वया।।२०।।

।।चौपाई।।
जकौ आस रख ग्यान निठायौ
निज स्वभाव रै वश में आयौ।
श्रद्धा सूं जद देव ज ध्यायौ
न्यारा न्यारा देव मनायौ।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! वां वां भोगां री कामनावां (आसा) सूं जकां रौ ग्यान हरायिज गौ है। वै मिनख आपरा स्वभाव सूं प्रेरित व्है र उण उण नियमां नै धारण कर र दूजा दूजा देवतावां नै भजै मतलब पूजै है।
।।श्लोक।।
यो यो यां यां तनुं भक्त: श्रद्धायार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।२१।।

।।चौपाई।।
जितरा देव सकाम ज पूजै
जिणरी श्रद्धा जिण नै सूझै
विसा विसा इज देव दिखाऊँ।
वा श्रद्धा म्हैं थिर कर जाऊँ।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जकौ जकौ भगत जिण जिण देव नै श्रद्धा सूं पूजै वां वां भगतां रै वास्तै म्हैं वैड़ा वैड़ा देव दिखाऊँ अर वां री श्रद्धा नै उठै थिर(दृढ) कर दूं।।
।।श्लोक।।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
रहते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।२२।।

।।चौपाई।।
हिय सूं भगत ज देव रिझावै
उण देवन सूं वौ सब पावै।
औ विधान म्हैं खुद रचवायौ
भगत उठै मनचायौ पायौ।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जकौ भगत श्रद्धा सूं जिण देवता रौ पूजन करै उण देवता सूं उणनै सब मिल जाय औ विधान म्हैं इज रचवायौ हूँ। अर वौ भगत उण देवता रै मार्फत मनचायौ फळ पायौ है।
।।श्लोक।।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामापि।।२३।।

।।चौपाई।।
देव दियौ जो फळ निठ जावै
उण फळ री सीमा झट आवै।
पण जो म्हनै मतै ज्यूं ध्यायौ
वौ फळ उत नियमित इज पावै।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
देवता जकौ फळ देवै वौ फळ जल्दी निठ जाय उण फळ निठण री सीमा जल्दी आय जाय मतलब उणरी expired date अवश्य व्है पण म्हारा भगत म्हनै मरजी चा्वै ज्यूं ध्यावै तो ई म्हैं वां नै अकूट(बिना समाप्त व्हैण वाळौ) फळ देऊँ जकौ नीठै कोनी यानी नाशवान नीं व्है स्थाई फळ व्है है।
।।श्लोक।।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।२४।।

।।चौपाई।।
अविनाशी फळ भगत न पायां
परमेश्वर गिण म्हनै न धायां।
समझै फगत जगत रौ प्राणी
म्हनै पाण री नर इम ठाणी।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
भगत म्हारौ असली रूप यानी अविनाशी रूप नीं जाणै वौ बोदी अकल रौ म्हारा सर्व श्रेष्ठ रूप नै भूल र म्हनैं सांसारिक प्राणी जाणै जिण रौ जीवण-मरण व्है यानी जकौ विनाशी व्है। अर म्हनै परमात्मा नै मिनख रौ देह धारण करण वाळौ मानै है।
।।श्लोक।।
नाहं प्रकाश: सर्वस्व योगमायासमावृत:।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।२५।।

।।चौपाई।।
योगमाया छिपा जद आयौ
भगत ज म्हनै विनाशी पायौ।
म्हैं अविनाशी परमेश्वर हूँ
पण मूरख समझै म्है नर हूँ।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं म्हारौ योगमाया रूप छिपाय र जद मिनखां साम्ही आऊँ इण कारण औ बोदी अकल रौ भगत(मिनख समुदाय )म्हारै अविनाशी परमेश्वर रूप नै नीं पिछाण सकै यानी म्हनैं जलम मरण होवण वाळौ इज समझै।
।।श्लोक।।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।

।।चौपाई।।
बीत्या, अबै, भवस रा प्राणी
म्हैं सगळां री उत्पत जाणी।
पण हे अर्जुन! म्हनैं न भावै
भगती बिन म्हा तक नीं आवै।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!पाछलौ(बीतियोड़ौ), अबार (वर्तमान)घटित हो रह्यौ अर भविष्य में होवण वाळा सगळा प्राणियाँ नै म्हैं जाणूं हूँ। पण कोई भी मिनख म्हनैं श्रद्धा यानी भगती बिना नीं जाण सकै।
।।श्लोक।।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

।।चौपाई।।
आस द्वेष सूं जकौ पनपियौ
सुख-दुख में अर्जुन! जो पड़ियौ।
द्वन्द्व मोह रा रागी ध्यावै
मूरख बण व्है जूण गमावै।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे भरतवंशी अर्जुन! इण संसार में इच्छा(आसा) अर द्वेष सूं पनपियोड़ा(उत्पन्न) सुख-दुख द्वन्द्व रूपी मोह रै वशीभूत प्राणी अणूती अग्यानता में जाय परा है।
।।श्लोक।।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:।।२८।।

।।चौपाई।।
सिरै कर्म कर पाप निठावै
राग-द्वेष रा द्वन्द्व मिटावै।
थिर हुय जो जन म्हा तक आवै
म्हनैं लगोलग जपतौ जावै।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!पण निष्काम भाव सूं सिरै(श्रेष्ठ) कर्मों रा आचरण कर र जका मिनखां रा पाप निठगा (नष्ट व्हैगा) है, वै राग-द्वेष सूं पनपियोड़ा, द्वन्द् रूपी मोह सूं मुगत व्हैगा है एड़ा थिर स्वभाव वाळा(दृढ़ निश्चयी) भगत म्हनैं सब प्रकार सूं भजै है।
।।श्लोक।।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्रमध्यात्मं कर्म चाखिलम्।।२९।।

।।चौपाई।।
जो मुझ शरण जतन सूं आवै
जलम मरण रा दंश छुड़ावै।
वौ सब ब्रह्म अध्यात्म जाणै
सगळा इ कर्म धरम पिछाणै।।२९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! बूढ़ापा अर मरण सूं मुगत पावण रै खातर जकौ मिनख म्हारा शरण में आय र जतन (प्रयत्न) करै वै उण ब्रह्म नै, सगळा अध्यात्म नै अर सगळा कर्मों नै जाण जाय है।
।।श्लोक।।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विंदु:।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:।।३०।।

।।चौपाई।।
सैंग जीव अध्यात्म ज जाणै
मरण ज बगत म्हनै चित आणै।
म्हनै पाण रौ मारग ठायौ
वौ ग्यानी यूं म्हनै ज पायौ।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ मिनख अधिभूत (भौतिक स्थूल सृष्टि) अधिदेव यानी ब्रह्मा जी नै पावण री कोशिश करै। ऐड़ा मिनख आपरा चित्त सूं सिमरणिया अन्त काल में म्हनैं पाय लै है यानी म्हनैं जाण लै है।।
।।चौपाई।।
यु तीसां चौपाइयां ठाई
इण अध्याय सात में भाई।
ग्यान विग्यान योग सिखायौ
अर्जुन किसन संवाद आयौ।।


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