गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-दसमो अध्याय

दसमो अध्याय – विभूतियोगः

।।श्लोक।।
भूय एवं महाबाहो श्रृणु मे परमं वच:।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।१।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन! मम रहस्य जाणौ
वचन ग्यान रा अब पहचाणौ।
थूं राखै मम नेह घणा रौ
इहि कारण म्हैं केऊँ सारौ।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे महाबाहो! म्हारा रहस्य अर परम वचनां नै थूं सुण जिण नैं म्हैं म्हारा सूं अणूतो हेत करण वाळा नै कैऊँ मतलब थनैं म्हारा मरजी सूं कैऊँ जिण में थारौ हित होवै है।
।।श्लोक।।
न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:।।२।।

।।चौपाई।।
नीं मुझ लीला देव ज जाणै
महाऋषी तक नीं पहचाणै।
म्हैं इज हूँ इण जग रौ तारण
देव, महर्षि रौ आदिकारण।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारै असली रूप में प्रकट होवण री विद्या नै नीं तो देवता जाणै है अर नीं ई महर्षिजन जाणै है। क्यूं कै म्हैं सब प्रकार सूं देवताआं रौ अर महर्षियां ई आदि कारण हूँ।
।।श्लोक।।
योग मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्चरम्।
असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रच्युते।।३।।

।।चौपाई।।
जो अज, अनादि हरि मम जाणै
बिना व्हैम वौ म्हनै पिछाणै।
मिनखां में ग्यानी ज कहावै
सब पापां सूं मुगती पावै।।३।।
अज= बिना जलमियोड़ौ
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकौ मिनख म्हनै अज, अनादि अर महान ईश्वर में जाणै है यानी दृढता सूं बिना व्हैम स्वीकार कर लै है वौ मिनखां में ग्यानी वाजै है अर वौ सगळा पापां सूं मुगत व्है जावै है।
।।श्लोक।।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम:शम:।
सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।४।।

।।चौपाई।।
बुद्धि ग्यान बिन मोहित होयां
क्षमा सत्य अर दम शम जोयां
सुख दुख उदभव अवर विनाशा
भय र अभय तज सगळी आसा।।४।।
दम=इन्द्रियां नै वश में करणा रौ नाम दम है
शम=मन नै सांसारिक भोगां सूं हटावणौ शम वाजै।

।।श्लोक।।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश:।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:।।५।।

।।चौपाई।।
अहिंसा र समता संतोषा
जस अपजस तप दान न दोषा
सब जीवां रा न्यारा न्यारा
ए शुभ भाव म्हा सुँ है सारा।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! बुद्धि, ग्यान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, अर सुख दु:ख, उत्पत्ति, विनाश, भय अभय अरअहिंसा, समता संतोष, तप, दान, जस अर अपजस-सगळा प्राणियाँ रै ए कैई प्रकार रा न्यारा न्यारा भाव ए शुभ भाव म्हारा सूं इज होवै है।
।।श्लोक।।
महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा:।।६।।

।।चौपाई।।
पह सनकादिक चार ज होया
सप्त ऋषी, चवदा मनु जोया।
मन सूं ज्यांनै म्हैं उपजाया
अर ए श्रद्धा सुँ म्हनैं ध्याया।।६।।
पह=पैली, पूर्व में
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
महर्ष सप्त:-सात गुणां वाळा ऋषी सप्त ऋषी वाजै यां नै इज महर्षि कैवै ए सात ऋषी-मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु अर वसिष्ठ व्है है। ए सात ई वेदवेत्ता यानी वेदां रा आचार्य जाणी जै है। प्रवृत्ति-धर्म रा संचालण करण वाळा है अर प्रजापति रै कामां वास्तै लागोड़ा है।
पूर्व चत्वार:-सब सूं पैली प्रकट व्हैवण वाळा चार सनकादिक-सनक, सनन्दन, सनातन, अर सनत्कुमार ए चारुं ई
ब्रह्मा जी रै तप करण सूं प्रकट व्हीया। ए भगवत्स्वरूप है पण ए चारुं सदा पांच वर्ष री अवस्था वाळा बालक रै रूप में इज रैवै ए भगवत्कथा रा घणा प्रेमी है इण वास्तै आं चारुं मांय सूं एक वक्ता अर तीन श्रोता बण र कथा सुणै।
मनवस्तथा:-ब्रह्मा जी रौ एक दिन (कल्प) में चवदा मनु होवै है ए-स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि अर इन्द्रसावर्णि नाम सूं चवदा मनु है।
मानसा जाता:-सृष्टि रौ निर्माण भगवान् रा संकल्प सूं हुयौ है पण सप्त ऋषियाँ री उत्पत्ति भगवान् रा मन सूं हुई है इण वास्तै सप्त ऋषी, चार सनकादिक अर चवदा मनु (पच्चीस)ब्रह्मा जी रा मानस पुत्र वाजै है। ए सगळा म्हारा में इज भाव (श्रद्धा)राखै है।
।।श्लोक।।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वत:।
सो ऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय:।।७।।

।।चौपाई।।
वैभव जाण जोग औ म्हारौ
जो जन लेवै तत्व इयारौ।
बिना व्हैम स्वीकारै ज्यां नै
अविचल बिना भरम आ मानै।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
जकौ मिनख म्हारी इण वैभव नै अर योग सामर्थ्य नै तत्व सूं जाणै है मतलब मजबूती सूं स्वीकार कर लेवै है वौ अविचल भगती योग मय व्है जाय इण में कोई व्हैम नीं है।
।।श्लोक।।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्व प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:।।८।।

।।चौपाई।।
म्हैं इण जग रौ जलम ज कारण
सारौ जग चावै मम धारण।
आ जाण र श्रद्धा मम पावै
भजन भाव सूं शरण ज आवै।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं इण जग रै जलम रौ मूळ कारण हूँ अर म्हारा सूं इज सगळौ संसार प्रवृत्त होय रह्यौ है मतलब चेष्टा कर रह्यौ है। ऐड़ौ मान र म्हा में इज श्रद्धा प्रेम राखतोड़ा बुध वाळा भगत म्हनैं इज भजै है सैंग तरह सूं म्हारै शरण में रैवै है।
।।श्लोक।।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।९।।

।।चौपाई।।
प्राण ज हरि में अरपण वाळा
जस नित उणरा गावण वाळा।
उण में तुष्ट ज होवण वाळा
उण री धुन में ज रमण वाळा।।९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारा में चित्त लगावण वाळा अर म्हारा में इज प्राण अरपण करण वाळा भगत आपस मेंं म्हारा गुण प्रभावां नै जतावता थका वां रौ कै’णौ करतौड़ा नित निरन्तर उण में इज सन्तुष्ट रैवै है अर म्हारा सूं इज प्रीत पाळै है।
।।श्लोक।।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०।।

।।चौपाई।।
वै जन म्हा में लीना व्हिया है
भजन कोड सूं घणा किया है।
वां नै बुद्धि योग मिल जावै
इण विध वै म्हारा बण जावै।।१०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! ऐड़ा मिनख नित निरन्तर म्हारा में लीन हैं अर घणी जिम्मेदारी सूं म्हारा भजन करै है वैड़ा भगतां नै म्हैं बुद्धि योग देऊँ हूँ। जिण सूं वै म्हनैं पाय लै।
।।श्लोक।।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।११।।

।।चौपाई।।
वां भगतां पर किरपा किन्हीं
अर हिरदै में ठौड़ ज दिन्हीं।
घोर अँधारां नै ई हरवां
ग्यान रूप दीवां सूं भरवा।।११

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!वां भगतां माथै किरपा करण
वास्तै इज वां रा स्वरूप में म्हैं रैवण वाळौ हूँ। म्हैं इज वांरौ अग्यान रूपी अंधारौ जगामग ग्यान रूपी दीवा सूं हटावण वाळौ हूँ।
।।श्लोक।।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।१२।।

।।चौपाई।।
परम धाम प्रभु आप कहावै
खुद ई परम पवित्र हु आवै।
दिव्य पुरुष सनातन आप ही
आदि देव अज सर्व व्याप ही।।१२।।

।।श्लोक।।
आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे।।१३।।

।।चौपाई।।
ऋषी देव नारद स आप ही
असित व्यास ‘र देवल आप ही।
खुद ई खुद यूँ ब्रह्म कहावै
मम खातर इम खुद ही आवै।।१३

।।भावार्थ।।
अर्जुन कह्यौ-हे पुरुषोत्तम! आप इज परम ब्रह्म, परम धाम अर परम पवित्र हौ। क्यूं कै आपनै सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष अर देवतावां रा आदि देव, अज (अजलमा)अर सर्व व्यापी कैवै है।
उण इज भांत देव ऋषि नारद, असित, देवल, ऋषि अर महर्षि व्यास ई कैवै है आप ई म्हारै हिया में वसौ हौ
।।श्लोक।।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा:।।१४।।

।।चौपाई।।
हे केशव! म्हा खातर कैयौ
उणनै म्हैं सत मान ज लेयौ।
प्रभु लीला नीं दानव जाणै
अर नीं इणनै देव पिछाणै।।१४।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे केशव! जकौ कीं ई आप म्हारै खातर कैवौ हौ उण सब नै म्हैं सत्य मानूं हूॅं। हे भगवान् !आपरी इण लीला वाळा रूप नै नीं तौ दानव जाण सकिया है अर नीं ई देव जाण सकिया है।
।।श्लोक।।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।।१५।।

।।चौपाई।।
हे जीव ज जलमावण वाळा!
हे हरि जीवां रा रखवाळा!।
हे देवां रा देव निराळा!
खुद ई खुद नै जाणण वाळा।।१५।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे प्राणियाॅं नै पैदा करण वाळा! हे प्राणियाॅं रा ईश्वर! हे देवां रा देव! हे जगत रा स्वामी! आप खुद इज आपनै जाणौ हौ।।
।।श्लोक।।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्त तिष्ठासि।।१६।।

।।चौपाई।।
तीन लोक में आप हि व्यापौ
रूप इसौ विराट मम आपौ।
औ वैभव किण रूप ज जाणै
हे! माधव जग नीं पहचाणै।।१६।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे माधव!आप इज इण दिव्य वैभव नै पूरी तरह कैवण नै समर्थ हौ जिण वैभव सूं आप तीनां लोकां में व्याप्त हौ।
।।श्लोक।।
कंथ विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।१७।।

।।चौपाई।।
हे योगेसर ! म्हैं किम जाणूं
चिन्तन री वा विधि पहचाणूं।
किण भावां में प्रभु दरसावौ
ए सब आप म्हनै समझावौ।।१७।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे योगेश्वर! म्हैं किण भांत लगोलग चिन्तन करतोड़ौ आपनै जाणूं अर हे माधव! आप किण किण भावां में म्हारा सूं चिन्तन करण जोग हौ।
।।श्लोक।।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूय: कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।१८।।

।।चौपाई।।
हे माधव! विस्तार बताऔ
योग शक्ति वैभव समझावौ।
तरपत नीं हुय सकियौ भगवन्
आ इमरत वाणी सुण मुझ मन।।१८।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै-हे जनार्दन! आपरी योग शक्ति अर वैभव नै तोई विस्तार सूं कैवौ। क्यूं कै आपरा इमरत वचनां नै सुण र म्हारौ मन तरपत नीं व्हियौ मतलब सुणण री लालसा अजै बणियोड़ी है।
।।श्लोक।।
हन्त ते कथायिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय:।
प्राधान्यत: कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।१९।।

।।चौपाई।।
अर्जुन! सुण वैभव कीं म्हारा
इण रा दिव्य ज रूप अपारा।
जको प्रमुख है थनै सुणाऊं
किय विस्तार पार नीं पाऊं।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे कुरुश्रेष्ठ! अबै म्हैं म्हारा जकौ दिव्य वैभव है व्हां नै थारै वास्तै प्रधानता सूं कैऊंला क्यूं कै म्हारै विस्तार रौ अन्त नीं है औ अपार है।
।।श्लोक।।
अहमात्मा गुड़ाकेश सर्वभूताशयस्थित:।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।२०।।

।।चौपाई।।
सगळां रा हिय मांय वसूं म्हैं
गुडाकेश गुणवान गिणूं म्हैं।
पार्थ जीव री आतम म्हैं हूॅं
आदि मध्य अर अंत ज म्हैं हूॅं।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं सगळा प्राणियाॅं रै हिरदै में वसियोड़ी आत्मा म्हैं हूॅं अर सगळा प्राणियाॅं रौ आदि, मध्य अर अंत म्हैं इज हूॅं।
।।श्लोक।।
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।।२१।।

।।चौपाई।।
अदिति रा बाराह सुत म्हैं हूॅं
ज्योतिष री किरणां रवि म्हैं हूॅं।
पवन देव रौ तेज ज म्हैं हूॅं
अधिपति नक्षत्रां रु चांद् ्श् म्हैं हूॅं।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं अदिति रा बारा बेटां मांय सूं विष्णू अर ज्योतिष किरणां वाळौ सूरज ई म्हैं इज हूॅं। अर गुणपचास पवन देवतावां रौ तेज अर नक्षत्रां रौ अधिपति चंद्रमां म्हैं हूॅं।
।।श्लोक।।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव:।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।२२।।

।।चौपाई।।
सामवेद वेदां में म्हैं हूँ
देवेन्दर इन्द्रियाँ में म्हैं हूँ।
अर जीवां में चेतनता हूँ
यांरी म्हैं ग्यान शक्तियां हूँ।।२२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं वेदां में सामवेद हूँ, देवां में इन्दर हूँ, इन्द्रियां में मन हूँ अर भूत प्राणियाँ री चेतना मतलब वांरी ग्यान शक्तियां हूँ।
।।श्लोक।।
रुद्राणां शड़करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरु: शिखरिणामहम्।।२३।।

।।चौपाई।।
म्हनै रुद्रां में शंकर जाणौ
यक्षां मांय ज कुबेर पिछाणौ।
धनिकां में अगनी इज म्हैं हूँ
ऊंचा पहाड़ सुमेरु म्हैं हूँ।।२३।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
एकादश रुद्रां में शंकर म्हैं हूँ। यक्ष अर राक्षसां में धन रौ स्वामी कुबेर म्हैं हूँ। धनिकां में अगनी ई म्हैं हूँ अर ऊंचा ऊंचा पहाड़ौ में शिखर वाळौ सुमेरु पर्वत म्हैं हूँ।।
।।श्लोक।।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर:।।२४।।

।।चौपाई।।
पुरोहितां कुँ बृहस्पति म्हैं हूँ
सेनापती में स्कन्द म्हैं हूँ।
जलाशया़ॅँ में समुद्र ज म्हैं हूँ
हे अर्जुन!सब ठौड़ ज म्हैं हूँ।।२४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे पार्थ!
पुरोहितां रौ मुखिया बृहस्पति म्हनै जाण। सेनापतियां में स्कन्द अर जलाशयां में समुद्र म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
महृ्र्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय:।।२५।।

।।चौपाई।।
महर्षियां में भृगु ऋषि म्हैं हूँ
वाणी में ओंकार ज म्हैं हूँ।
हवनां में जप हवन ज म्हैं हूँ
थिर रैवण हिम पर्वत म्हैं हूँ।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
म्हैं महर्षियां में भृगु कर सबदां में एक अक्षर अर्थात ओंकार हूँ सब तरह रा यग्यां में जप यग्य हूँ अर थिर रैवण वाळा में हिमालय पर्वत हूँ।।
।।श्लोक।।
अश्चत्थ:सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि:।।२६।।

।।चौपाई।।
सब रूंखां में पीपळ म्हैं हूँ
देव ऋषी में नारद म्हैं हूँ।
गन्धर्व में चित्ररथ म्हैं हूँ
योगी मांय कपिल मुनि म्हैं हूँ।।२६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं सब वृक्षां में पीपळ रौ वृक्ष हूँ, देव ऋषियां में नारद मुनि, गन्धर्वां में चित्ररथ अर योगियाँ में कपिल मुनि म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
उच्चै: श्रवसमश्चानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नाराणां च नराधिपम्।।२७।।

।।चौपाई।।
इमरत म्हैं उपजाऊं मानौ
सागै उच्चैश्रव हय जाणौ।
गजां मांय ऐरावत म्हैं हूँ
नरां मांय ई नरपति म्हैं हूँ।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
इमरत री उत्पति रै सागै घोड़ां(हय) में उच्चैश्रव घोड़ौ म्हनै जाणौ। हाथियाँ में सिरै ऐतावत हाथी म्हैं हूँ। अर मिनखां में मिनखां रौ राजा म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
आयुधानामहं वज्र धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि:।।

।।चौपाई।।
शस्त्रां में वज्र मुझ कुँ कहियै
कामधेनु धेनुन में सहियै।
कामदेव विधि रीति कहाऊं
साँपां में वासुकि कहलाऊं।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
शस्त्रां में म्हैं वज्र वाजूं हूँ, धेनुआं में म्हैं कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति सूं सन्तान पैदा करण खातर म्हैं कामदेव हूँ अर साँपां वास्तै म्हैं सर्प राज वासुकि हूँ।।
।।श्लोक।।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितृणामर्यमा चास्मि मम: संयमतामहम्।।२९।।

।।चौपाई।।
नागां में शेषनाग म्हैं हूँ
जळ रौअधिपति वरुण ज म्हैं हूँ।
पितरां में अर्यमा ज म्हैं हूँ
शासक मांय यमराज म्हैं हूँ।।२९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
म्हैं नाग वंश सर्पां में शेषनाग हूँ, जलचरां रौ अधिपति वरुण देवता म्हैं हूँ अर पितरां में अर्यमा नामक पितर हूँ सागै ई शासन करण वाळां में यमराज म्हैं इज हूँ।
।।श्लोक।।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्।
मृगणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।३०।।

।।चौपाई।।
दैत्यां में प्रह्लाद ज म्हैं हूँ
गिणती करवा बगत ज म्हैं हूँ।
पशुवां में मृगराज ज म्हैं हूँ
पंछी में ई गरुड़ ज म्हैं हूँ।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं दैत्यां मांय प्रह्लाद हूँ, गिणती करण वाळां में समय म्हैं हूँ। पशुवां में मृगराज सिंह म्हैं हूँ अर पक्षियाँ में मन मर्जी रा वेग सूं चालण वाळौ पक्षी गरुड म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी।।३१।।

।।चौपाई।।
पावन करण पवन इज म्हैं हूँ
शस्त्र धारि श्री राम ज म्हैं हूँ।
मीनां बिचली ज मगर म्हैं हूँ।
नदियां में भागीरथ म्हैं हूँ।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
सारी सृष्टि नै पवित्र करण वाळौ वायु म्हैं हूँ। शस्त्र धारण करण वाऴां में म्हैं श्री राम हूँ। मछलियाँ मांय मगर मच्छ म्हैं हूँ सागै ई नदियाँ में भागीरथी गंगा नदी म्हैं हूँ।।
।।श्लोक।।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम्।।३२।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन ! म्हैं सृष्टि रचाऊँ
आदि मध्य अर अन्त कहाऊँ।
आत्मा-विसयक ज्ञान कहाऊँ
झगड़ा सगळा म्हैं निपटाऊँ।।३२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! इण सृष्टि रौ आदि अन्त अर मध्य म्हैं हूँ। म्हैं विद्याआं में अध्यात्म विद्या या ब्रह्म विद्या म्हैं इज हूँ।
अर आपस में वाद विवाद होयां उणनै सुल्टावण वाळौ तत्व ग्यान म्हैं कहाऊं।।
।।श्लोक।।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्व: सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख:।।३३

।।चौपाई।।
अक्षर मांय अकार ज म्हैं हूँ
समास कुँ द्वन्द्व समास म्हैं हूँ।
काळ में महा काळ कहाऊं
धारण पोषण म्हैं अपणाऊं।।३३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हैं अक्षरां में आकार हूँ, समासां में म्हैं द्वन्द्व समास वाजूं हूँ। अक्षय काल यानी काल रौ महाकाल अर सब कानीं मुख वाळौ, विराट रूप वाळौ, सगळां रौ धारण-पोषण करण वाळौ म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्ति: श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृर्ति: क्षमा३४।।

।।चौपाई।।
म्हैं हूँ सब रौ ज मृत्यु कारी,
जलम ज करवा रौ म्हैं धारी।
तिरिया री श्री कीरति म्हैं हूँ
वाक् स्मृती मेधा धृति म्हैं हूँ।।३४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
म्हैं सगळां रौ नाश करण वाळौ मृत्यु कारी म्हैं हूँ, सगळां रौ जलम दाता म्हैं हूँ अर स्त्रियां(तिरिया) में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति अर क्षमा हूँ।।
।।श्लोक।।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर:।।३५।।

।।चौपाई।।
श्रुति में म्हैं बृहत्साम गाऊं
छन्दा में गायत्रि कहाऊं।
महिनां में म्हैं मिगसर मासा
ऋतुआं मांय बसन्त निवासा।।३५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! गावण जोग श्रुतियाँ में म्हैं बृहत्साम अर छन्दा में गायत्री छन्द म्हैं हूँ। महीनां में म्हैं मिगसर मास अर ऋतुआं मांय बसन्त ऋतु म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।।३६।।

।।चौपाई।।
छळ रै मांय जुआ इज म्हैं हूँ
टणकां री टणकाइ ज म्हैं हूँ।
जीतणियाँ री जीत ज म्हैं हूँ
निस्चै अर सत्वगुण ज म्हैं हूँ।।३६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! छळ करण वाळां रौ जूऔ म्हैं हूँ। प्रभावशाली मिनखां रौ प्रभाव ई म्हैं हूँ। जीतण वाळां री जीत म्हैं हूँ, निस्चै करण वाळां रौ निस्चै म्हैं हूँ अर सात्विक पुरुषां रौ सात्विक भाव ई म्हैं हूँ।।
।।श्लोक।।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पा्ण्डवानां धनञ्जय:।
मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।।३७।।

।।चौपाई।।
वृष्णिवंश वासुदेव जाणौ
पाण्डव थुं धनञ्जय पहिचाणौ।
मुनियां में वेद व्यास म्हैं हूँ
कविया में शुक्राचार्य म्हैं हूँ। ३७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! यादवां रौ एक वंश वृष्णिवंश है उणमें वासुदेव मतलब थारौ सखा म्हैं हूँ, पाण्डवां रै मांय धनञ्जय यानी थूं है। मुनियां रै मांय वेदव्यास अर कवियां में शुक्राचार्य म्हैं हूँ।
।।श्लोक।।
दण्डों दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मोनं चैवास्मि सुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।।३८।।

।।चौपाई।।
दमन करण री ताकत म्हैं हूँ
जीतण मन री नीत ज म्हैं हूँ।
छानै राखण मौन ज म्हैं हूँ
ग्यानी रौ तत्व ग्यान म्हैं हूँ।।३८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! दमन करण वाळां रौ दण्ड म्हैं हूँ यानी दबावण वाळां री ताकत म्हैं इज हूँ, जीतण वाळां रै मन री नीत म्हैं हूँ। छानै राखण जोग भावां रौ रक्षक मौन म्हैं हूँ अर ग्यानियां रौ तत्व ग्यान म्हैं हूँ।।
।।श्लोक।।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जून।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम।।३९।।

।।चौपाई।।
सब जीवां रौ बीज ज म्हैं हूँ
उदभव रौ कारण इज म्हैं हूँ।
जीव कोइ चर’र अचर नीं है
जो म्हारै बिन दुनिया जी है।।३९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ सब प्राणियां रै उत्पत्ति रौ कारण है वौ म्हैं इज हूँ, क्यूं कै ऐड़ौ चर अर अचर कोई प्राणी नीं है जकौ म्हारै बिना जूण जीवी है।
।।श्लोक।।
नान्तोऽस्मि मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तृद्देशत्: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।।४०।।

।।चौपाई।।
हे अर्जुन! मम वैभव सारा
जिण रा दिव्य ज रूप अपारा।
जिण रा म्हैं विस्तार बताया
अर छोटा सा भाव दिखाया।।४०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! म्हारै दिव्य वैभव रौ अन्त नीं है, ऐ तौ म्हैं थनै छोटे रूप में बताया है। अर जकौ विस्तार सूं बताया है व्है सगळा थारै वास्तै इज बताया है।
।।श्लोक।।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्।।४१।।

।।चौपाई।।
जकौ जकौ वैभव सौ भावै
चमक-दमक ताकत ज सुहावै।
दरसाणौ म्हारौ इज जाणौ
अंश तेज म्हारौ पहचाणौ।।४१

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ जकौ ई वेभव वाळी, जगामग वाळी अर धन सम्पत्ति वाळी वस्तुवां है वां सगळां नै थूं म्हारा तेज रौ अंश इज जाण।।
।।श्लोक।।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहर्मिदं कृत्स्त्रमेकांशेन स्थितो जगत्।।४२।।

।।चौपाई।।
अर्जुन ! घणौ जाणणौ की व्है
म्हैं इण जग कुँ योग दीवी है।
अंश मात्र औ योग ज पायौ
थिर व्है इण जग नै समझायौ।।४२।।
की व्है=कांई व्है?
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! इण घणा जाणण सूं थारौ कांई मतलब है। म्हैं इण सकल जगत नै म्हारी योग शक्ति रा अंश मात्र सूं धारण कर र थिर ( स्थित) हूँ।।
।।चौपाई।।
औ दसमो अध्याय ज भायौ
योग शास्त्र रौ ग्यान बतायौ।
पार्थ-कृष्ण संवाद सुणायौ
योग विभूती रौ जस गायौ।।


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