गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-तेरहवौ अध्याय

तेरहवौ अध्याय – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः

।।श्लोक।।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्रा‌हु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद:।।१।।

।।चौपाई।।
पार्थ देह गिण खेत तिहारौ
आतम जिण में है उजियारौ।
तत्व ग्यान जाणै औ ध्यानी
जिण सूं ई वाजै औ ग्यानी।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! औ शरीर क्षेत्र (खेत) नाम सूं जाणी जै है, इण नै जाणणियौ क्षेत्रग्य (जीवात्मा) वाजै है अर क्षेत्रग्य रा तत्व नै पिछाणणिया ग्यानी आ कैवै है।
।।श्लोक।।
क्षेत्रज्ञं चांपि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तञ्ज्ञानं मतं मम।।२।।

।।चौपाई।।
म्हैं सगळा डीलां में रैऊं
जीवात्मा उण री म्हैं व्हैऊं।
औ इ जीव जीवात्मा वाजै
विद्या बण नै इण विध साजै।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! थूं सब क्षेत्रां में क्षेत्रग्य यानी सब जीवां री जीवात्मा म्हैं इज हूँ अर क्षेत्र क्षेत्रग्य नै यानी विकार सागै प्रकृति अर पुरुष नै तत्व सूं जाणणौ है वौ इज ग्यान है औ म्हारौ कैवणौ है।
।।श्लोक।।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।३।।

।।चौपाई।।
जकौ खेत जिण जैड़ौ व्है है
तिण रै संग विकार जुड़ै है।
जिण कारण जो ई ज हुयौ है
अर्जुन सुण थोड़ौ कहियौ है।।३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! वौ खेत(क्षेत्र )जकौ दूजां जैड़ौ है अर जिण जिण विकारां वाळौ है, जकां रै कारण सूं जो व्हियौ है, अर वौ क्षेत्रग्य ई जकौ अर जिण प्रभाव वाळौ है वौ सगळौ थोड़ा में म्हारा सूं सुण।
।।श्लोक।।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधै: पृथक्।
ब्रह्मासूत्रपदैश्यचैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै:।।४।।

।।चौपाई।।
ऋ्षियाँ इणनै घण विध कैयौ
वेद मंत्र भलि भांत ज देयौ।
भाग विभा ग ज सब समझाया
निस्चै ब्रह्मसूत्र ज कहाया।।४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! ऐ खेत(क्षेत्र), जीवात्मा(क्षेत्रग्य) रा तत्व ऋषियाँ कानीं सूं घणा प्रकार सूं कह्योड़ा है, भाँत भाँत रा वेद मंत्रां सूं ई विभाग वार कह्योड़ा है अर अच्छी तरियां सूं निस्चै कियोड़ा फबता ब्रह्म सूत्रां रा पदां में ई कहयोड़ा है।
।।श्लोक।।
महाभूतान्यहड़्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा:।।५।

।।चौपाई।।
महाभूत पंच अहंकारा,
बुध अरू मूळ प्रकृति ज सारा।
दस इन्द्रियाँ इक मन व्है थारा
अर विषयाँ रा पांच विकारा।।५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि अर मूळ प्रकृति रै सागै दस इन्द्रियाँ, एक मन अर पांच इन्द्रियाँ रा विषय यानी सबद, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध अर-
।।श्लोक।।
इच्छा द्वेष:सुखं दु:खं सड़्घातश्चेतना धृति:।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।६।।

।।चौपाई।।
राग द्वेष सुख दुख चेताया
थूळ देह रा पिण्ड दिखाया।
इम समझाया विगत विकारा
खेत ज रूप दिखाया सारा।।६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
इच्छा, द्वेष, सुख-दु:ख, स्थूल देह रा पिण्ड चेतना(शरीर अर अंतस री एक तरह री चेतन शक्ति )अर धृति ( धारण करण री शक्ति) तीन तरह री व्है है-सात्विक-राजसी-तामसी इसड़ा विकारां रै सागै इण खेत(क्षेत्र) नै छोटै रूप में कह्यो है।
।।श्लोक।।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह:।।७।।

।।चौपाई।।
तज अभिमान सिरै होणा रौ
क्षमा सहजता रौ‌ गुण धारौ
मन वाणी सुँ सरल व्है सेवै
इन्द्रियाँ, मन वश में कर लेवै।।७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
सिरै होण रौ गुमान नीं, आचरण रौ गुमान नीं, हिंसा नीं करणी, गलती करणिया नै माफ करणौ मन-वाणी सूं सहज सरल रैवणौ, श्रद्धा सूं गुरु री सेवा करणौ अंतस सूं थिर होय’र बारै-मांय सूं इन्द्रियाँ नै वश में करणौ अर-
।।श्लोक।।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहड़्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम्।।८।।

।।चौपाई।।
विषयाँ सूं वैरागी होणौ
अंहकार नेड़ौ नीं जोणौ।
जीणौ मरणौ रोग बुढ़ापौ
दुख दोषां नै फेर ज जापौ।।८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
इन्द्रियाँ रै विषयाँ सूं वेरागी व्हैणौ अहंकार नै त्यागणौ अर जलमणौ, मरणौ, बुढ़ापा जैड़ी व्याधियाँ अर सुख-दु:ख रूपी दोष नै बार बार देखतौ रैवणौ।
।।श्लोक।।
आसक्तिरनभिष्वड़्ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।९।।

।।चौपाई।।
लाग हीण होवणौ ज जाणौ
सुत दारा घर धन तज आणौ।
अबखी-हबकी में सम होणौ
चोखी भूंडी नै नीं जोणौ।।९।।

(दारा=पत्नी)
(अबखी= प्रतिकूल, हबकी= अनूकूल)
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!बेटा, घर वाळी, घर अर धन री लाग नीं राखणी, ममता रौ मोह त्यागणौ अर चोखा-भूंडा मिलती बगत सम भाव रैवणौ यानी अनूकूल अर प्रतिकूल परिस्थितियाँ में चित्त नै एक भाव राखणौ।
।।श्लोक।।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।१०।।

।।चौपाई।।
शुद्ध आचरण योग ज जाणौ
मुझ हरि में इम चित्त लगाणौ।
आदत एकल रैवण ठावौ
विषयाँ रौ भोगी तज आवौ।।१०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! मुझ परमेश्वर में अनन्य योग सूं अव्यभिचारिणी(शुद्ध आचरण वाळी) भगती सूं पछै एकान्त अर शुद्ध देश में रैवण रौ स्वभाव डाल अर विषयाँ में लिप्त मिनखां सूं अळगौ होय जा अर-
।।श्लोक।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।११।।

।।चौपाई।।
अध्यात्म ग्यान हिय में लावै
तत्व ग्यान म्हारा सूं आवै।
औ सगळौ तौ ग्यान इ वाजै
बाकी सब अग्यान गिणा जै।।११

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
अध्यात्म ग्यान रोज थिर हुवै है अर तत्व ग्यान रा अर्थ रूप में परमात्मा नै इज देख जै। औ सगळौ ग्यान वाजै है अर इण सूं विपरीत सगळौ अग्यान वाजै है ऐड़ौ कह्यौ है।
।।श्लोक।।
ज्ञेयं यक्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१२।।

।।चौपाई।।
जाणण जोग जकौ व्है सारौ
जाण्यां अति आनन्द उतारौ।
वौ सगळौ कह सूं विसतारा
वौ हरि नीं सत असत कहा रा।।१२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ जाणण जोग है अर जिणनै जाण ‘र मिनख परम आनन्द पाय लै। उणनै म्हैं आछी तरियाँ कैऊं ला। वौ अनादि वाळौ परम ब्रह्म नीं सत् इज कह्यौ जा सकै अर नीं ई असत् कैय सकां।
।।श्लोक।।
सर्वत: पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वत: श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठाति।।१३।।

।।चौपाई।।
सब कानी पग हाथां वाळौ
सब दिश में मुख अखियाँ वाळौ।
चहुँ दिश माथा कानां वाळौ
सब ठौड़ा थित करै उजाळौ।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
वौ सब कानी हाथ पग-वाळौ, चहुँ दिश आंखियां, शीश, मुख वाळौ अर चारूंकानीं कान वाळौ है। क्यूं कै वौ संसार में सगळां नै व्याप्त कर’र स्थित है।।
।।श्लोक।।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
आसक्ति सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

।।चौपाई।।
सब इन्द्रियाँ विषयां नै जाणै
पण व्है सब बिना इन्द्रिय पाणै।
स्वारथ बिन सब धारण वाळौ
निर्गुण व्है गुण भोगण वाळौ।।१४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! वौ(परमेश्वर) सब इन्द्रियाँ रै विषयाँ नै जाणण वाळौ व्है है, पण असल में सब इन्द्रियाँ रहित व्है है, आसक्ति रहित व्हैतौ थकौ ई सगळां नै धारण-पोषण करण वाळौ अर गिर्गुण व्हैतौ थकौ गुणां नै भोगण वाळौ है।
।।श्लोक।।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।१५।।

।।चौपाई।।
परिपूरण सगळा जीवां में
बारै-मांय, अचर-चर वां मे
अळगौ अर नेड़ौ ई व्है है
घण छोटा सूं नीं जाणै है।।१५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! वौ (परमेश्वर) चराचर सब प्राणियाँ में बारै-मांय परिपूर्ण है सागै चर-अचर ई वौ इज है अर वौ अति सूक्ष्म होवण सूं साधारण प्राणियां रै जाणण जोग नीं है औ अळगा सूं अळगौ अर नेड़ा सूं नेड़ौ है।
।।श्लोक।।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।१६।।

।।चौपाई।।
बिन विभाग परमातम होयौ
चर-अचर ज में खण्डित जोयौ।
विष्णु रूप पाळै, रुद्र मारै
ब्रह्म रूप जलमावै तारै।।१६।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
वौ परमात्मा विभाग रहित एक रूप सूं आकाश में परिपूर्ण व्हैतौ थकौ ई चराचर सगळा प्राणियाँ में विभक्त व्हियोड़ौ लखावै अर औ जाणण जोग परमात्मा विष्णु रूप में जीवां नै धारण-पोषण करण वाळौ, रुद्र रूप में संहार करण वाळौ अर ब्रह्म रूप में सगळां नै उत्पन्न करण वाळौ है
।।श्लोक।।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१७।।

।।चौपाई।।
सब जोतां में जोत जगावै
माया सूं घण परै कहावै।
बोध, तत्व हरि पावण जोगौ
जन जन रै हिरदै में होगौ।।१७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
आ परम ब्रह्म ज्योतियां री ई ज्योति है यानी सूरज, चांद, तारा, अगनी रा उजास रौ आधार ई आ जोत इज है अर माया सूं घणी परै कहावै है। वौ परमात्मा बोध स्वरूप जाणण जोग, तत्व ग्यान नै पावण वाळौ सगळां रै हिरदै में समायोड़ौ व्है है।
।।श्लोक।।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासत:।
मद्भक्त ए्तद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।१८।।

।।चौपाई।।
खेत, ग्यान अर जाणण जोगौ
इम बखाण थोड़ा में हो’गौ।
जकौ भगत आ तत्व सुँ जाणै
वौ भगत ज मम पाय पिछाणै।।१८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!इण तरह खेत(क्षेत्र), ग्यान अर जाणण जोग परमात्मा स्वरूप नै थोड़ा में कह्यौ है जकौ म्हारौ भगत इणनै तत्व सूं जाण र म्हनै पाय लै है।
।।श्लोक।।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।१९।।

।।चौपाई।।
पुरुष स्वभाव अनादी जाणौ
राग-द्वेष अवगुण पनपाणौ।
सकल पदारथ सिरजण वाळौ
तीन गुणां सूं चमकण वाळौ।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
प्रकृति अर पुरुष-यां दोनां नै अनादि जाण अर राग-द्वेष जैड़ा विकारां अर त्रिगुणात्मक पदार्थां नै ई प्रकृति सूं पैदा व्हियोड़ा जाण।
।।श्लोक।।
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२०।।

।।चौपाई।।
काज, करण, कुदरत व्है सेतु
आतम सुख-दुख भोगण हेतु।
अर्जुन ए सगळा ज विकारा
सगळा हुवै प्रकृति रा कारा।।२०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
कार्य (आकाश, हवा, अगनी, जळ अर पृथ्वी रै सागै सबद, छूवणौ (स्पर्श), रूप, रस, अर गन्ध) रौ नाम (काज)कार्य है। अर करण (बुद्धि, अहंकार, मन, श्रोत, त्वचा, रसना, नैत्र अर ध्राण सागै वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ अर गुदा) नै पैदा करवा रौ हेतु प्रकृति वाजै है। जीवात्मा, सुख-दु:खां रै भोगण में ई प्रकृति हेतु हुवै है।
।।श्लोक।।
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुड़्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसड़्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।२१।।

।।चौपाई।।
प्राणी जलम प्रकृति में पावै
भांत भांत रा गुण अपणावै।
आतम नै जिसड़ा गुण भावै
उण योनी में भोगण आवै।।२१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! प्रकृति में रैवण वाळा प्राणी इज प्रकृति रा गुणां नै भोगै है अर जैड़ा गुणां री संगति करै वैड़ी इज ऊंच-नीच योनि में जलम लेवण रौ कारण बणै है।
।।श्लोक।।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर:।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुष: पर:।।२२।।

।।चौपाई।।
जीव देह सूं उपद्रष्टा व्है
आग्या देवण अनुमन्ता व्है।
भर्ता भोक्ता ईश कहावै
तन में रह हरि ए अळगा व्है। २२।।

{(उपद्रष्टा=देह सूं सम्बन्ध राखणियौ)(अनुमन्ता=अनुमति देवण वाळौ)
(भर्ता=भरण-पोषण करण वाळौ)(भोक्ता=सुख-दु:ख भोगण वाळौ)}
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जीवां रौ शरीर रै सागै सम्बन्ध होण सूं उपद्रष्टा वाजै। अर उण रै सागै मिल ‘र सम्मति, अनुमति देणा सूं अनुमन्ता वाजै अर अन्न-जळ ग्रहण करण सूं भर्ता वाजै औ सुख-दु:ख भोगै इण खातर भोक्ता वाजै है। औ खुद इण रौ मालिक मानण सूं महेश्वर बण जावै पुरुष सै सूं लूंठौ है, परम आत्मा है इण खातर औ परमात्मा वाजै है औ देह में रै’तौ थकौ ई सब सूं सम्बन्ध रहित है।
।।श्लोक।।
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणै: सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।२३।।

।।चौपाई।।
नरां, गुणां इम प्रकृति नुँ जाणौ
न्यारा न्यारा गुण पहचाणौ
सगळा वौ वरताव निभावै
तौ वौ नर पाछौ नीं आवै।।२३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
इण तरह पुरुष नै अर गुणां रै
सागै प्रक‌ति नै जकौ मिनख तत्व सूं जाणै है वौ सब प्रकार रा कर्तव्य कर्म करतौ थकौ ई पाछौ जलम नीं लेवै है मतलब जलम मरण रा भव बंधन सूं मुक्त व्है जाय है।
।।श्लोक।।
ध्यानेनात्मनि पश्चयन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये साड़्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।२४।।

।।चौपाई।।
ध्यानी जन हरि हिरदै पावै
ग्यानी उठै ग्यान गुण गावै।
कर्मयोगि कर कर्म निभावै।
इण विध यां नै प्रभु जी भावै।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
केई मिनख ध्यान योग सूं, केई सांख्य योग सूं तौ केई कर्म योग सूं खुद ई खुद खुद सूं खुद ई खुद में परमात्मा तत्व रौ अनुभव कर लेवै है।
।।श्लोक।।
अन्ये त्वेवमजानन्त: श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा:।।२५।।

।।चौपाई।।
पण कम बुध रा सुण दूजां सूं
करै ज पूजा नित हिरदां सूं।
श्रवण परायण वै तर जावै
सागर पार मरण रा पावै।।२५।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
दूजा मिनख इण तरह ध्यान-योग, सांख्य योग, अर कर्म योग इत्यादि साधनां नै नीं जाणै पण दूजां रै जीवन्त मुख महापुरुषां सूं सुण ‘ र पछै पूजा करै ऐड़ा वै श्रवण परायण मिनख, ई मरण रा संसार रूपी सागर नै निस्चै पार कर जावै है।
।।श्लोक।।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजड़्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।२६।।

।।चौपाई।।
जकौ जीव ज जलमिया जैड़ा
वै थावर या जंगम वैड़ा।
खेत आतमा सूं जायेड़ा
जाण इसां रा पार ज बेड़ा।।२६।।
(खेत=क्षेत्र, आत्मा=क्षेत्रग्य)
(जायेड़ा= जलमियोड़ा)
।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे भारत वंशियां में सिरै अर्जुन!वै जितरा ई स्थावर अर जंगम जीव जलमे है वां नै थूं खेत (क्षेत्र)अर आतमा (क्षेत्रग्य) रै संयोग सूं पैदा व्हियोड़ा जाण।
।।श्लोक।।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।।२७।।

।।चौपाई।।
नश्वर हुतौ चराचर जोवै
परमेश्वर नीं नश्वर होवै।
थिर हरि नै सम रूप ज जाणै
वौ इज असल सत्य पहचाणै।।२७।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्री कृष्ण कैवै हे अर्जुन!
जकौ नाश होवण वाळा(नश्वर) सगळा जीवां में परमेश्वर नै नाश रहित अर सम रूप( स्थित)थित देखै है वौ इज वास्तव में सही देखै है।।
।।श्लोक।।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थिततमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं त्यों याति परां गतिम्।।२८।।

।।चौपाई।।
सब ठौड़ा सम रूप ज होवै
ईश्वर नै समरूप ज जो वै।
खुद रौ नाश न खुद सूं चावै
परम गति ज इण विध नर पावै।।२८।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! क्यूं कै सब जगा सम रूप में थित ईश्वर नै समरूप सूं देखण वाळौ मिनख खुद रौ नाश खुद सूं नीं करै इण वास्तै वौ परम गति नै पाय लै।
।।श्लोक।।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वश:।
य: पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।।२९।।

।।चौपाई।।
प्रकृति सुँ सब कज व्हैतौ जावै
जकौ ज नर मन में औ लावै।
आतम नै ज अकर्ता देखै
जथारथ ज साची वौ वेखै।।२९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! अर जकौ मिनख सगळा कर्मां नै सब तरह सूं प्रकृति सूं इज व्हियोड़ा देखै अर आत्मा नै अकर्ता देखै वौ इज असल में जथारथ देखै है।
।।श्लोक।।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत् एवं च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३०।।

।।चौपाई।।
जिण क्षण भाव हियै औ आवै
अलग भाव हरि में वौ पावै।
जीवां रा विगसाव ज देखै
उण पुळ हरि उत पावण लेखै।।३०।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण क्षण औ मिनख जीवां रा भिन्न-भिन्न भावां नै एक परमात्मा में इज स्थित देखै अर उण परमात्मा सूं इज सकल जगत रौ विस्तार देखै उण इज पुळ वौ परमात्मा नै प्राप्त व्है जाय है।।
।।श्लोक।।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

।।चौपाई।।
अनादि अर निर्गुण होवै है
अविनाशी हरि तन में व्है है।
असल मांय नीं कीं करवाळौ
नीं किण में इ लिप्त हौ वाळौ़।।३१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
अनादि होवण सूं अर निर्गुण होण सूं औ अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित व्हैतौ थकौ ई असल में नीं तौ कीं करै है अर नीं ई किणी में लिप्त व्है है।।
।।श्लोक।।
यथा सर्व गतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।।

।।चौपाई।।
जियां ज आभौ सगळै छायौ
विरल होण सूं लिप्त न भायौ।
बियां आतमा तन में फैली
तन रा गुण सूं लिप्त न व्है ली।।३२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण तरह सगळै छायोड़ौ आकाश सुक्ष्म(विरल) व्हैवण रै कारण लिप्त नीं हुवै इण इज भांत देह में सब जगा स्थित आत्मा निर्गुण होण रै कारण शरीर रा गुणां सूं लिप्त नीं होवै।।
।।श्लोक।।
यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि:।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।३३।।

।।चौपाई।।
जिम रवि एक उदय सब जागा
सै ब्रह्माण्ड उजासण लागा।
इहि भांती आतम तन सेता
चमकावण लागै तन खेता।।३३।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जिण तरह एक इज सूरज इण सकल ब्रह्माण्ड नै प्रकाशित करै है उण इज भांत एक आत्मा सगळा खेत (क्षेत्र) नै प्रकाशित करै है।
।।श्लोक।।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।।

।।चौपाई।।
जकौ जगत सुँ मुगत व्है जाणै
खेत आत्म रौ भेद पिछाणै।
ग्यान आँखियाँ तत्व ज भावै
वै जन परम ब्रह्म नै पावै।।३४।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
इण तरह खेत (क्षेत्र)अर आत्मा(क्षेत्रग्य) रा भेद नै जाणणौ व्है है। पछै कार्य समेत प्रकृति सूं मुगत होवण नै जकौ मिनख ग्यान रूपी अंखियां सूं तत्व नै जाणै है वै महात्मा जन परम ब्रह्म परमात्मा नै पावै है
{(क्षेत्र=जड़, जीव)
(क्षेत्रग्य=चेतन, जीवात्मा)}
।।चौपाई।।
औ अध्याय तेरवौ ठायौ
जड़-चेतन रौ विभाग भायौ।
भावानुवाद इसो गुणायौ
पार्थ किशन संवाद सुणायौ।।


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