गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-पन्द्रहवौ अध्याय

पन्द्रहवौ अध्याय – पुरुषोत्तमयोगः

।।श्लोक।।
उर्ध्वमूलमध:शाखमश्चत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दां यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१।।

।।चौपाई।।
ऊपर मूळ ज ईश्वर वाजै
ब्रह्मा पीपळ शाख विराजै।
जग में ए अविनाशी जाणौ
वेद पानड़ा इण रा मानौ।।१।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!
आदि पुरुष ऊपर कानी मूळ वाळा नीचे कानी शाखा वाळा ब्रह्मा जी संसार रूपी जिण वृक्ष(पीपळ) नै प्रवाह रूप सूं अव्यय कैवै है अर वेद जिण रा पत्ता है उण संसार रूपी वृक्ष नै जकौ जाणै वौ सगळा वेदां नै जाणण वाळौ है।
।।श्लोक।।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवाला:।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।२।।

।।चौपाई।।
पीपळ री गुण कूंपळ शाखा
नीचै ऊपर बिच विगसा खा।
मृत्यु लोक में कर्म नु सारा
बांधण मूळ सब लोक धारा।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! उण संसार रूपी वृक्ष (पीपळ) री गुणां(सत्व, रज, तम) सूं बढियोड़ी विषय रूपी कूंपळां वाळी शाखावां नीचै बिच में अर ऊपर सब जगा फैलियोड़ी है। मनुष्य लोक (मृत्यु लोक) में कर्मां रै अनुसार बांधण वाळा मूळ ई नीचै अर ऊपर सब जागा व्याप्त व्है है।
।।श्लोक।।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्चत्थमेनं सुविरूढमूल-मसड़्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।।

।।चौपाई।।
जिसौ रूप पीपळ ज कहायौ
विसौ न तत्व ग्यान में पायौ।
आदि अंत नीं थिर यूं आंटौ
वेरागी बण इणनै काटौ।।३।।

।।भावार्थ।।
इण पीपळ रूपी संसार वृक्ष रौ रूप जैड़ौ तत्व ग्यान व्हियां पछै होणौ चहिजै वैड़ौ अठै नीं पायौ जावै क्यूं कै नीं तौ इण रौ आदि है यानीं आ परम्परा कदै सूं शुरू हुई इण रौ कोई ठाह नीं है, अर नीं ई अंत है मतलब आ परम्परा कठा तक चालती रैवला पतौ नीं है पछै नीं ई इण री अच्छी तरह री स्थिति है मतलब असल में आ क्षण भंगूर अर नाशवान है इण वास्तै इण अहंता, ममता अर वासना रूप घणा दृढ़ मूळ वाळा संसार रूपी पीपळ रा वृक्ष नै दृढ़ वेराग रूपी शस्त्र सूं काट’र-
।।श्लोक।।
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय:।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यत: प्रवृत्ति: प्रसृता पुराणी।।४।।

।।चौपाई।।
तद परमेश्वर खोजण जावै
जठै पूग पाछौ नींआवै।
नाथ सनातन जौ विगसावै
आदि पुरुष हरि शरणै आवै।।४।।

।।भावार्थ।।
उण रै पछै उण परम-पद रूप परमेश्वर नै अच्छी तरह सूं सोधणौ चाहिजै, जठै पूगोड़ा मिनख पाछा इण संसार में नीं आवै अर जिण परमात्मा सूं इण पुरातन संसार वृक्ष (पीपळ) री प्रवृत्ति विस्तार नै पाय लियौ है उण इज आदि पुरुष नारायण रै म्हैं शरणां में हूँ-
।।श्लोक।।
निर्मानमोहा जितसड़्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामा:।
द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:ख सञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढा: पदव्ययं तत्।।५।।

।।चौपाई।।
मान मोह जिणरौ मरगौ व्है
लाग दोष सूं जीत गयौ व्है।
सुख दुख द्वन्द्व आस मिटगौ व्है
वौ पद परम अवस पा गौ व्है।।५।।

।।भावार्थ।।
जकौ मान अर बिना मोह रौ व्हैगौ है जिण आसक्ति सूं होवण वाळा दोषां नै जीत लिया व्है, जकौ नित निरन्तर परमात्मा में इज लागोड़ौ व्है, जकौ आपरी दीठ सूं सगळी कामनावां रहित व्हैगौ व्है, जकौ सुख-दु:ख नाम वाळा द्वन्द्वां सूं मुगत होय गौ व्है ऐड़ा ऊंचा स्थितिवाळा बिना मोह रा ग्यानी उण अविनाशी परमात्मा परम पद नै पावै है।।
।।श्लोक।।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाड़्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।६।।

।।चौपाई।।
जो मम परम धाम जद पावै
वौ ग्यानी पाछौ नीं आवै।
उणनै रवि नीं देत प्रकाशा
अवर आग नीं चांद उजासा।।६।।

।।भावार्थ।।
उण परम पद नै नीं सूरज, नीं चन्द्रमा अर नीं अगनीं ई प्रकाशित कर सकै है अर जिण परम पद नै पायोड़ौ जीव पाछौ संसार में नीं आवै वौ इज म्हारौ परम धाम है।
।।श्लोक।।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।७।।

।।चौपाई।।
जो मम अंश जगत में आवै
सनातनी जीवात्म कहावै।
कुदरत में थित मन युँ लुभावै
पांचू इन्द्रिय खिंचती जावै।।७।।

।।भावार्थ।।
इण देह में आ जीवात्मा म्हारौ इज सनातन अंश है (मतलब ज्युं बिना विभाग में थित व्हियौ महाकाश घटकां में न्यारौ न्यायौ इज लखावै, उण इज भांत सब जीवां में एकीरूप में थित व्हियोड़ौ परमात्मा न्यारौ न्यारौ इज प्रतीत हुवै है। )अर वठै इज इण प्रकृति में थित मन सागै पांचू इन्द्रियाँ नै आकृषित करै है।
।।श्लोक।।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्चर:।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।८।।

।।चौपाई।।
हवा जियां ज गन्ध लै जावै
जीवातम तन त्याग’र न्हावै।
मन आतम सँग इन्द्रिय रैवै
नुवी देह धारण कर लेवै।।८।।

।।भावार्थ।।
जियां हवा गन्ध रै स्थान सूं गन्ध नै लेय ‘ र उड़ जावै उण इज तरह आ जीवात्मा ई जिण पैली वाळा शरीर नै तजै वठा सूं मन सागै इन्द्रियाँ नै लेय’र नुवा शरीर में प्रवेश कर जाय। ‘
।।श्लोक।।
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।।९।।

।।चौपाई।।
चाम कान नयन ज रसना रै
संग नाक पाँचु इन्द्रियाँ रै।
लेय आसरौ मन संयोगै
आ जीवातम विषय ज भोगै।।९।।

।।भावार्थ।।
आ जीवात्मा मन रौ आसरौ लेय’र कान, ऑंख, चामड़ी, रसना(जीभ) अर नाक आं पांचू इन्द्रियाँ सूं विषयां रौ भोग करै है।
।।श्लोक।।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:।।१०।।

।।चौपाई।।
जकौ देह नै त्याग’र जावै
थित रह विषय भोगणौ आवै।
त्रिगुणी माया मूढ़ न जाणै
ग्यान रूप ऑंख्याँ पहचाणै।।१०।।

।।भावार्थ।।
देह नै त्याग ‘र जावण वाळां नै अथवा दूजा शरीर में थित व्हियोड़ौ नै या विषयां नै भोगै इण तरह तीनूं गुणां सूं युक्त व्हियोड़ौ नै ई अग्यानी मिनख नीं जाणै है फगत ग्यान रूपी ऑंखियाँ वाळा विवेकशील ग्यानी इज तत्व सूं जाणै है।
।।श्लोक।।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस:।।११।।

।।चौपाई।।
जतन करण रौ योगी ठायौ
आतम नै खुद मांय ज पायौ।
पण अंतस सूं शुद्ध न होयौ
जतन कियां ई तत्व न जोयौ।।११।।

।।भावार्थ।।
जतन (यत्न) करण वाळा योगीजन ई खुद रै हिरदै में वसियोड़ै इण परमातम तत्व सूं जाणै है। पण जकौ आपरा अंतस नै शुद्ध नीं करियौ ऐड़ा अग्यानी मिनख तौ जतन करता रह्यां पछै ई इण आत्मा नै नीं जाणै।
।।श्लोक।।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्।।१२।।

।।चौपाई।।
सूरज रौ औ तेज अपारौ
जिण सूं जग में व्है उजियारौ।
चांद अगन रौ तेज निहारौ
मान सेंग उजियारौ म्हारौ।।१२।।

।।भावार्थ।।
सूरज में जो तेज सगळा संसार नै प्रकाशित करै है अर जकौ तेज चंद्रमा अर अगनी में है वौ तेज म्हारौ इज तेज मान।
।।श्लोक।।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।।१३।।

।।चौपाई।।
कर प्रवेश धर नै म्हैं तारूं।
म्हैं सब जीव ओज सूं धारूं।
इमरत सो चंदौ बण आऊँ
औषधियाँ नै पुष्ट कराऊँ।।१३।।

।।भावार्थ।।
अर म्हैं इज पृथ्वी में प्रवेश कर नै आपरी शक्ति सूं सगळा प्राणियाँ नै धारण करूं हूँ अर म्हैं इज रसस्वरूप मतलब अमृत रूपी चन्द्रमां होय’ र सगळी औषधियाँ नै यानी वनस्पतियाँ नै पुष्ट करूं हूँ।
।।श्लोक।।
अहं वैश्यवानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।
प्राणापानसमायुक्ता: पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।१४।।

।।चौपाई।।
जीव प्राण-अपान ई म्हैं हूँ
तन री जठरांगण ई म्हैं हूँ।
चार तरह रा अन्न पचाऊं
सब जीवां नै म्हैं इ बचाऊं।।१४।।

।।भावार्थ।।
म्हैं इज सगळा जीवां रै देह में रैवण वाळौ प्राण अर अपान सूं जुड़ियोड़ी जठराग्नि होय’र चार प्रकार रा अन्न (चबाय’र खावण वाळौ जियां रोटी, निगळ जावण वाळौ जियां दूध, जकौ चाटियौ जावे जियां चटणी अर चूसण वाळौ ज्यूं गन्ना) नै पचाऊं हूँ।
।।श्लोक।।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो-मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो-वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।१५।।

।।चौपाई।।
जीवां रै हिय में ई म्हैं हूँ
स्मृति ग्यान अपोहन म्हैं हूँ
वेद-वेद्य वेदग्य ज म्हैं हूँ।
सब रौ कर्ता-धर्ता म्हैं हूँ१५।।

।।भावार्थ।।
म्हैं इज सगळा प्राणियाँ रै हिरदै में अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ, म्हैं इज स्मृति, ग्यान अर अपोहन (संशय जैड़ा दोषां नै विचारां सूं हटावणौ)अर सगळा वेदां सूं वेद्य (जाणण जोग), वेदां रै तत्व रौ निर्णय करण वाळौ अर वेदां नै जाणण वाळौ ई म्हैं इज हूँ।
।।श्लोक।।
द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।१६।।

।।चौपाई।।
दो तरह रा तत्व जाणी जै।
क्षर अक्षर सूं पहचाणी जै।
क्षर तौ सब रा देह कहावै
अर जीवातम अक्षर भावै।।१६।।
क्षर=नाशवान, अक्षर=अविनाशी)

।।भावार्थ।।
इण संसार में क्षर (नाशवान्)अर अक्षर (अविनाशी) दोय तरह रा तत्व हुवै है। सगळा जीवां रा
शरीर क्षर अर जीवात्मा अक्षर वाजै है।।
।।श्लोक।।
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:।।१७।।

।।चौपाई।।
उत्तम पुरुष अनोखौ बाजै
औ परमातम बण नै साजै।
तीन लोक रौ धारक औ है
पोषक अविनाशी इज यो है।।१७।।

।।भावार्थ।।
उत्तम पुरुष तौ बीजौ (विलक्षण, अनोखौ) ई व्है है जकौ परमात्मा रै नाम सूं जाणी जै है वौ इज अविनाशी परमात्मा तीनूं लोकां रै मांय प्रवेश कर’र सगळां रौ भरण पोषण करै है।
।।श्लोक।।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम:।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: परुषोत्तम:।।१८।।

।।चौपाई।।
नाशवान म्हैं हूँ ज अतीतौ
अविनाशी सुँ सिरै गूंजी तौ।
वेदां में ‘पुरुषोतम’ वाजूं
लौकिक में प्रसिद्ध व्है साजूं।।१८।।

।।भावार्थ।।
कारण कै म्हैं क्षर (नाशवान) सूं अतीत हूँ अर अक्षर (अविनाशी) सूं उत्तम हूँ। इण खातर लोकां अर वेदां में पुरुषोत्तम नाम सूं जाणी जूं अर प्रसिद्ध हूँ।।
।।श्लोक।।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भवति मां सर्वभावेन भारत।।१९।।

।।चौपाई।।
अर्जुन! जो ग्यानी मम जाणै।
पुरुषोतम मम रूप पिछाणै।
वौ मम तत्व सुँ जाणै सारा
सिमरै मम कूं सै परकारा।।१९।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन!जकौ ग्यानी मिनख म्हनै इण तरह तत्व सूं पुरुषोत्तम रूप में जाणै है, वौ सब जगा सब प्रकार सूं म्हनै वासुदेव नै इज भजै है।।
।।श्लोक।।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

।।चौपाई।।
छानै रौ युँ शास्त्र सुणायौ
हे अर्जुन!औ म्हैं इ बतायौ।
तत्व सुँ जाण’र हुवै ज ग्यानी
भव बँध सूं संतोख ज आणी।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे निष्पाप अर्जुन! इण तरह रौ औ घणौ रहस्य वाळौ अर छानै रौ शास्त्र म्हैं थनै कह्यौ हूँ, इण नै तत्व सूं जाण ‘र मिनख ग्यानी अर संतोखी होय जाय है।
।।चौपाई।।
पन्द्रहवौ अध्याय ज ठायौ
हरि पुरुषोत्तम योग बतायौ।
अर्जुन कृष्ण सँवाद सुणायौ
यूं विरेन्द्र अनुवाद बणायौ।।


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