गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-अठारहवौ अध्याय

अठारहवौ अध्याय – मोक्षसंन्यासयोगः

।।श्लोक।।
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।।१।।

।।चौपाई।।
हे ताकतवर! अन्तर्यामी!
विघन हरण करवाळा स्वामी।
न्यारा न्यारा तत्व गिणाऔ
मम सन्यास’र त्याग बताओ।।१।।

।।भावार्थ।।
अर्जुन कैवै हे महाबाहौ!(ताकतवर, सामर्थ्य वान), हे अन्तर्यामी!, हे!विघन नै दूर करण वाळा वासु देव म्हैं सन्यास अर त्याग रा न्यारा न्यारा तत्व जाणणी चाहूं हूँ।
।।श्लोक।।
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विंदु:।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा:।।२।।

।।चौपाई।।
काम्य कर्म रु त्याग व्है रासा
गिणै गुणी इण ने सन्यासा।
सर्व कर्म फल तज गिण त्यागा
केइ विद्व इण मत रा लागा।।२।।

।।भावार्थ।।
भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-कितरा ई पण्डित जन तौ काम्य कर्मां (लुगाई, बेटो अर धन जैड़ी प्रिय वस्तुआं री प्राप्ति खातर अर रोग-संकट निवारण वास्तै हवन, दान, तप अर पूजा रा कर्म ) रा त्याग नै सन्यास समझै है अर केई ग्यानी मिनख सब कर्मां रा फळ नै त्यागणा नै त्याग बतावै है।
।।श्लोक।।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरै।।३।।

।।चौपाई।।
सब कर्मां में दोष ज लागौ
घणा गुणी कै यां नै त्यागौ।
दूजा विद्व ज यूं समझाई
हवन दान तप तजो न भाई। ३।।

।।भावार्थ।।
केई एक विद्वान ऐड़ौ कैवै है कै कर्म मात्र दोष वाळौ हुवै है, इण खातर औ त्यागण जोग व्है है अर दूजा विद्वान आ कैवै है कै हवन, दान, तप रूपी कर्म त्यागण जोग नीं व्है है।
।।श्लोक।।
निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: सम्पप्रकीर्तित:।।४।।

।।चौपाई।।
पार्थ! त्याग, सन्यास बताऊं
पैली त्याग निस्चै गिणाऊं।
सत रज तामस त्याग ज वाजै
तीन तरह रा भेद ज साजै।।४।।

।।भावार्थ।।
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन!सन्यास अर त्याग इण दोनूं मांय सूं पैली त्याग रै विषय में थूं म्हारौ निस्चै सुण। क्यूं कै त्याग सात्त्विक, राजस अर तामस तीन प्रकार रा वाजै
।।श्लोक।।
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।५।।

।।चौपाई।।
हवन, दान, तप कर्म न त्यागौ
यां नै अवस करण में लागौ।
हवन, दान, तप मुनि अपणावै
ए ई यानै शुद्ध बणावै।।५।।

।।भावार्थ।।
हवन, दान, तप रूपी कर्म त्यागण जोग नीं व्है है बल्कि वै तौ जरूरी कर्त्त्वय है क्यूं कै हवन, दान अर तप ए तीनूं ई कर्म मुनियां (बुद्धि मान मिनखां) नै पवित्र करण वाळा है। अठै बुद्धि मान रौ मतलब वै मिनख जकौ फळ अर लाग (आसक्ति)नै त्याग’र फगत भगवन् भजन रौ कर्म करै।
।।श्लोक।।
एतान्यपि तु कर्माणि सड़्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।।६।।

।।चौपाई।।
हवन दान तप कर बिन आसा
अवर बिना फळ कर्म करा सा।
हे अर्जुन! मम सिरै विचारा
इहि कारण कर कर्म युँ सारा।।६।।
आसा=आसक्ति
।।भावार्थ।।
इण वास्तै हे पार्थ! इण हवन, दान अर तप रूपी कर्मां रै सागै सगळा कर्त्त्वय कर्मां नै लाग (आसक्ति)अर फळां री इच्छा नै त्याग ‘र जरूर करणा चाहिजै; औ म्हारौ निस्चै कियोड़ौ सिरै विचार है।
।।श्लोक।।
नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तितः।।७।।

।।चौपाई।।
नियत कर्म नीं त्यागण जोगा
सुण अर्जुन ए वचन अमोघा।
मोह कारणै त्याग करावै
वौ तौ तामस त्याग कहावै।।७।।

।।भावार्थ।।
निषिद्ध अर काम्य कर्मां रौ त्याग करणौ तौ वाजिब है पण नियत कर्मां रौ (शास्त्रविधि सूं नियत करियोड़ा वर्णाश्रम रा धर्म अर सामान्य इज स्वाभाविक कर्म है, वां नै इज अठै स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावज कर्म, अर स्वभावनियत कर्म नाम सूं कह्यौ है। )त्याग करणौ उचित नीं है इण खातर मोह रै कारण उण रौ त्याग कर देणौ तामस त्याग वाजै है।
।।श्लोक।।
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।८।।

।।चौपाई।।
कारज सगळा दु:ख दिरावै
आ जाण ‘र जौ त्याग करावै।
इसड़ौ वाजै राजस त्यागा
उण रा फळ नीं हाथ ज लागा।।८।।

।।भावार्थ।।
जकौ कोई कर्म है, वौ कर्म दु:ख स्वरूप ई है-आ जाण’र शारीरिक क्लेश रा डर सूं कर्तव्य कर्म रौ त्याग करै तौ वौ एड़ौ राजस त्याग करियां पछै ई त्याग रौ फळ कोई तरह सूं नीं पाय सकै।
।।श्लोक।।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सड़्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत:।।९।।

।।चौपाई।।
कर्म युँ शास्त्र मुजब करवावै
लाग फळां रौ त्याग करावै।
हे अर्जुन! वौ त्याग ज जाणौ
सात्विक त्याग ज वौ पहचाणौ।।९।।

।।भावार्थ।।
हे अर्जुन! जकौ शास्त्र मुजब कर्म करणौ ई कर्त्तव्य समझै अर लाग (आसक्ति), फळ री इच्छा रौ त्याग करै वौ कर्म ई सात्त्विक त्याग वाजै है।
।।श्लोक।।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:।।१०।।

।।चौपाई।।
द्वेष न फूहड़ कर्म ज राखै
कुशल कर्म में लाग न राखै।
सत्वगुणी बिन संशय साजै
बुद्धिमान सत् त्यागी वाजै।।१०।।

।।भावार्थ।।
जकौ मिनख अकुशल (अजड़) कर्म सूं तौ द्वेष नहीं राखै अर नीं ई कुशल कर्म में लाग (आसक्ति) राखै वौ शुद्ध सत्त्व गुणां वाळौ, बिना संशय रौ बुद्धिमान अर साचौ त्यागी वाजै है
।।श्लोक।।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।११।।

।।चौपाई।।
तन धारी रौ कर्म सजोरौ
सगळा कर्म त्यागणौ दोरौ।
कर्म फळां नै त्याग ‘र छाजै
वौ त्यागी इज त्यागी वाजै।।११।।

।।भावार्थ।।
क्यूं कै देह धारी मिनख सगळा कर्मां रौ त्याग नीं कर सकै इण वास्तै जकौ कर्म फळां रौ असली त्यागी व्है वौ इज त्यागी वाजै है।
।।श्लोक।।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलत्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्।।१२।।

।।चौपाई।।
कर्म फळां नै नीं तजियोड़ौ
चोखौ खोटौ अर भिळियोड़ौ
कर्म फळां नै जौ तजियोडौ
उण रै पड़ै कदै नीं फोड़ौ।।१२।।

।।भावार्थ।।
कर्म फळ रौ त्याग नीं करण वाळा मिनखां नै चोखौ(इष्ट), खोटौ(अनिष्ट) अर भिळियोड़ौ (मिश्रित )तीन तरह रा फळ मरियां पछै ई भुगतणा पड़ै है पण जकौ कर्म फळ रा त्याग करियोड़ौ व्है है उण नै ए फोड़ा नीं भुगतणा पड़ै।
।।श्लोक।।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साड़्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।

।।चौपाई।।
सब कर्मां रौ अन्त कराळौ
सांख्य सिद्धि अपणावण वाळौ।
कारण पांच बताया ज्यौ है
म्हारा सूं सुण अर्जुन यौ है।।१३।।

।।भावार्थ।।
हे महाबाहौ! कर्मां रा अन्त करवा वाळा सांख्य सिद्धान्त में सगळा कर्मां री सिद्धि खातर पांच कारण बताया है यां नै थूं म्हारा सूं सुण।
यानी आत्मा नै अकर्ता बणावण खातर पांच कर्त्तव्यां रौ त्याग करणौ बतायौ है जिण सूं कर्मां रौ सर्वथा अन्त व्है जाय है।
।।श्लोक।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

।।चौपाई।।
रैवण ठौड़, करण, कर्ता व्है
इच्छावां, दैवी सत्ता व्है।
ए पांचू ई तत्व कहावै
इण सूं ई मुक्ती पा जावै।।१४।।

।।भावार्थ।।
इण विषय में यानी कर्मां री सिद्धांत में अधिष्ठान(जिण रै आसरै कर्म करै वौ अधिष्ठाता वाजै, औ शरीर अर वा ठौड़ जठै वौ रैवै वौ अधिष्ठान वाजै)अर कर्ता, न्यारा न्यारा तरह रा करण अर न्यारी न्यारी चेष्टावां उण इज तरह रा पांचवा हेतु देव है।
।।श्लोक।।
शरीरवाड़्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतव:।।१५।।

।।चौपाई।।
मन वाणी तन सूं कर साजा
शास्त्र मुजब या उल्टा काजा।
अर्जुन जो ए कर्म कराया
पांच तरह रा कारण ठाया।।१५।।

।।भावार्थ।।
मिनख मन, वाणी अर शरीर सूं शास्त्र विधान अनुकूल या विपरीत जकौ कोई कर्म करै है वां रा ए पांचां कारण व्है है।
।।श्लोक।।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।
पश्यत्यकृबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:।।१६।।

।।चौपाई।।
मैली अकल होय कर गाजा
आतम नै गिण कर्ता काजा।
वौ मलीन बुध वाळ न ग्यानी
नाय जथारथ अजलग जाणी।।१६।।

।।भावार्थ।।
पण ऐड़ौ व्हियां पछै ई मिनख अशुद्ध बुद्धि होवण रै कारण उण विषय में यानी कर्मां रै होवण में आत्मा नै कर्ता देखै है वौ मलीन बुद्धि वाळौ अग्यानी जथारथ नीं जाणै।
।।श्लोक।।
यस्य नाहड़्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।१७।।

।।चौपाई।।
म्हैं कर्ता’ अंतस में नीं व्है
बुद्धि लिप्त जग सूं जै नीं व्है।
लोकां नै मार ‘र नीं मारै
वै जन पाप बंधण सुँ बारै।।१७।।

।।भावार्थ।।
जका मिनख रै अंतस में ‘म्हैं कर्ता हूँ ‘रा भाव नीं व्है अर जिणरी बुद्धि संसारिक पदार्थां में अर कर्मां में लिप्त नीं व्है वौ मिनख यां सब लोकां नै मार ‘र ई साचलकौ नीं मारे है अर नीं ई पाप बंधण में बंधै है।
।।श्लोक।।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसड़्ग्रह:।।१८।।

।।चौपाई।।
अर्जुन ग्यान ग्येय अर ग्याता
तीन कर्म सीखण में आता।
करता करण ‘र किरिया जाणौ
तीन कर्म संग्रह पहचाणौ।।१८।।

।।भावार्थ।।
ग्याता (जाणण वाळौ) ग्यान (जिण सूं जाणीजै) ग्येय (जाणण में आवण वाळी चीज) ए तीन तरह री कर्म प्रेरणावां व्है है अर कर्त्ता(कर्म करण वाळो), करण (जिण साधनां सूं कर्म कियौ जाय )अर क्रिया(करणा रौ नाम) ए तीन प्रकार रा कर्म संग्रह व्है है
।।श्लोक।।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत:।
प्रोच्यते गुणसड़्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।।१९।।

।।चौपाई।।
गुण रौ बखाण करवा वाळा
ग्यान, करम, कर्ता कहवाळा।
तीन तरह गुण भेद बताऊं
हे ज्यूं इज थूं सुण समझाऊं।।१९।।

।।भावार्थ।।
गुणां रौ बखाण करण वाळा शास्त्र में गुणां रा भेद ग्यान, कर्म अर कर्ता ए तीन तरह रा बताया है, यां तीनां नै थूं म्हारा सूं वास्विक रूप में सुण।
।।श्लोक।।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तञ्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।२०।।

।।चौपाई।।
न्यारा न्यारा जीव ज देखै
सब में अविनाशी हरि पेखै।
समभाव व्है थित हरी जाणौ
ग्यान वौ इ सात्विक पहचाणौ।।२०।।

।।भावार्थ।।
जिण ग्यान सूं मिनख न्यारा न्यारा जीवां में बांटिया बिना एक अविनाशी परमात्मा नै समभाव होय’ र देखै है। वौ ग्यान इज सात्त्विक वाजै है।
।।श्लोक।।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।२१।।

।।चौपाई।।
जग में न्यारा न्यारा प्राणी
न्यारा न्यारा भाव ज जाणी।
तरह तरह रूपां में जाणौ
उण नै राजस ग्यान पिछाणौ।।
२१।।

।।भावार्थ।।
पण जकौ ग्यान यानी जिण ग्यान सूं मिनख सगळा जीवां में न्यारा न्यारा केई भावां नै न्यारा न्यारा रूपां में जाणै है उण ग्यान नै थूं राजस जाण।
।।श्लोक।।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिकार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

।।चौपाई।।
देह मांय री लाग जगावै
जुगती बिन ओ ग्यान ज भावै।
वौ थोड़ौ सौ ग्यान ज गाजै
तामस इसड़ौ ग्यान ज वाजै।।२२।।

।।भावार्थ।।
पण जकौ ग्यान यानी जिण ग्यान सूं मिनख एक कार्य रूप देह में ई पूरौ आसक्त रैवै अर जकौ बिना जुगती(कळ) रै अग्यानता सूं थोड़ौ सो ग्यान राखै है वौ तामस ग्यान वाजै है।
।।श्लोक।।
नियतं सड़्गरहितमरागद्वेषत: कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।।

।।चौपाई।।
जकौ विधी सूं कर्म करावै
तजै राग फळ चाह न भावै।
व्है कर्तव्य बिना अभिमाना
सात्विक कर्म गिणौ सौ आना।।२३।।

।।भावार्थ।।
जकौ कर्म शास्त्र विधि सूं नियत करियोड़ौ व्है अर कर्त्तव्य अभिमान रै बिना, फळ री इच्छा रहित, बिना राग द्वेष रै करियोड़ा व्है है वौ सात्त्विक ग्यान वाजै है।
।।श्लोक।।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहड़्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।।

।।चौपाई।।
करै कर्म फळ आस लगायां
अहं घणै रौ मन में लायां।
हाड़तोड़ मै’णत कर गाजै
वौ ई राजस कर्म ज वाजै।।२४।।

।।भावार्थ।।
पण जकौ कर्म भोगां री इच्छा सूं या घमण्ड सूं अर हाड़ फोड़ मै’णत सूं करै वौ इज राजस कर्म वाजै है
।।श्लोक।।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।

।।चौपाई।।
कर्म नतीजा व्है बिन जाणै
हत्या घाटौ बळ न पिछाणै।
मोह राख जो कर्म करावै
वै सब तामस कर्म कहावै।।२५।।

।।भावार्थ।।
जकौ कर्म परिणाम जाणियां बिना
हानि, हिंसा अर सामर्थ्य नै जाणियां बिना फगत मोह रै वश में होय ‘र शुरू करै वौ तामस कर्म वाजै है।
।।श्लोक।।
मुक्तसड़्गोऽनहंवादी धृ्त्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते।।२६।।

।।चौपाई।।
बिना लाग गुमान नीं होणौ
धीरज कोडीलौ हूँ सोणौ।
कारज सफळ हुवै ना होवै
हरख’र दुख सम सात्विक जो व्है।।२६।।

।।भावार्थ।।
जकौ कर्ता बिना लाग रै अर अहंकार रा वचन बोलियां बिना धीरज अर कोड सूं कर्म रै सिद्ध व्हियां या नीं होयां में हरख अर दु:ख में एक सरीकौ रै’वै वौ सात्त्विक वाजै है।
।।श्लोक।।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:।
हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तितः।।२७।।

।।चौपाई।।
लाग वाळ फळ चावण वाळौ
लोभी लोग सतावण आळौ।
दुराचारी सुख दुख सह जावै
वौ इज कर्म राजस कहावै।।२७।।

।।भावार्थ।।
जकौ कर्ता आसक्ति वाळौ, कर्मां रा फळां नै चावण वाळौ अर लोभी है पछै दूजां नै तकलीफ देवण रौ स्वभाव राखै, दुराचारी व्है सुख-दु:ख में लिप्त व्है वौ राजस वाजै है।
।।श्लोक।।
आयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस:।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते।।२८।।

।।चौपाई।।
गाफल, अणपढ ध्रूत कहावै
दंभि जीविका नाश करावै।
दुखी आळसी दीर्घ सूत्री व्है
वौ तौ अवस तामसी ई व्है।।२८।।
(दीर्घ सूत्री=जकौ थोड़ा बगत में होवण वाळा साधारण कार्यां नै ई टाळतौ रैवै इण आशा सूं कै पछै कर लेवां ला)

।।भावार्थ।।
जकौ कर्ता आयुक्त (गाफल), शिक्षा सूं रहित, घमण्डी, ध्रूत अर दूजां री जीविका नाश करण वाळौ, शोक करण वाळौ, आळसी अर दीर्घ सूत्री है-वौ इज तामसी वाजै है।
।।श्लोक।।
बुद्धेर्भैदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय।।२९।।

।।चौपाई।।
बुध अर दृढ युँ धारणा रा व्है
तीन तरह रा भेद गिणावै।
न्यारा न्यारा रूप बताऊं
हे अर्जुन ! सुण म्हैं समझाऊं।।२९।।
(धृति=बुद्धि नै दृढ़ता सूं राखण वाळी धारणा)
।।भावार्थ।।
हे अर्जुन! अबै थूं गुणां रै मुजब बुद्धि अर धृति रै ई तीन तरह रा भेदां नै न्यारा न्यारा रूपां में म्हारा सूं सुण जकौ कै म्हारा कान्ही सूं पूरी तरह कह्यौ जाय रह्यौ है।
।।श्लोक।।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि: सा पार्थ सात्त्विकी।।३०।।

।।चौपाई।।
बिन फळ इच्छा भगवत ध्यावै
अकर्तव्य कर्तव्य कहावै।
बंधण मोक्ष अभय भय गाजै
वा बुद्धी इज सात्विक वाजै।।३०।।

।।भावार्थ।।
हे पृथानन्दन! जकौ बुद्धि प्रवृत्ति(ग्रहस्थ धारण कर ‘र ई फळ री इच्छा नीं राखै)अर निवृत्ति ( एकान्त मेंभगवान् रौ भजन करणौ) नै कर्त्त्वय, अकर्त्तव्य नै भय, अभय नै, बंधण अर मोक्ष नै जाणै है वा बुद्धि सात्त्विक बुद्धि वाजै है।
।।श्लोक।।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी।।३१।।

।।चौपाई।।
अर्जुन! बुध न जथारथ जाणै
धर्म अधर्म न भेद पिछाणै
काज अकाज ज जाणत नां ही
वाजै है बुध राजस वाही।।३१।।

।।भावार्थ।।
हे पार्थ! मिनख जिण बुद्धि सूं धर्म, अधर्म नै, कर्त्तव्य, अकर्त्तव्य नै ई जथारत नीं जाणै वा बुद्धि राजस बुद्धि वाजै।
।।श्लोक।।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।।३२।।

।।चौपाई।।
तम बुध अधरम ध़र्म ज जाणै
सगळी चीजां उलट पिछाणै।
सुण अर्जुन जो इण विध गाजै
वा ई बुद्धि ज तामस वाजै।।३२।।

।।भावार्थ।।
हे अर्जुन! तमोगुण सूं घिरीयोड़ी बुद्धि अधर्म नै धर्म समझै अर सगळी चीजां नै उल्टी समझै वा बुद्धि तामसी वाजै है
।।श्लोक।।
धृत्या यया धारयते मन:प्राणेन्द्रियक्रिया:।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृति सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।

।।चौपाई।।
हिये प्राण इन्द्रिय किरियावां
इक चित होय ‘र धारण आवां।
जिण नै सब धारण कर साजै
वा इ धारणा सात्विक वाजै।।३३।।

।।भावार्थ।।
हे पार्थ!जिण अव्यभिचारणी धारणा शक्ति सूं (भगवन विषय रै सिवाय दूजा संसारिक विषयां नै धारण करणौ व्यभिचार दोष है उण दोष सूं रहित है वा अव्यभिचारिणी धारणा है)मिनख ध्यान योग सूं मन प्राण अर इन्द्रियाँ री क्रियावां नै धारण करण वाळी धारणा(धृति) इज सात्त्विक धृति वाजै है।
।।श्लोक।।
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसड़्गेन फृलाकाड़्क्षी धृति: सा पार्थ राजसी।।३४।।

।।चौपाई।।
अर्थ धर्म अर काम ज सारै
फळ इच्छा आसक्ति ज धारै।
हे अर्जुन! जो जन यूँ गाजै
इसी धारणा राजस वाजै।।३४।।

।।भावार्थ।।
अर हे अर्जुन! कर्म फळ री‌ इच्छा राखणियौ मिनख घणी आस लगायोड़ौ जिण धारणा सूं धर्म अर्थ अर काम नै धारै वा धारणा राजस वाजै।
।।श्लोक।।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी।।३५।।

।।चौपाई।।
दुष्ट बुद्धि ज्यूं धारण सागै
भय, चिन्ता न नींद दुख त्यागै।
हे अर्जुन! औ अहं ज धारै
वौ धारण बल तामस लारै।।३५।।

।।भावार्थ।।
हे पार्थ: दुष्ट बुद्धि वाळौ मिनख
जिण धृति (धारणा) सूं नींद, भय, चिन्ता, दु:ख अर घमण्ड नै ई नीं छोड़ै मतलब धारण करियोड़ौ रैवै वा धृति, धारणा तामसी धृति वाजै है
।।श्लोक।।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्र्णु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दु:खान्तं च निगच्छति।।३६।।

।।चौपाई।।
अर्जुन सुण सुख तीन प्रकारा
सेवा भजन ध्यान गिण सारा।
दुख रौ अन्त हुवै तत्काला
ए म्हैं तुम कुँ सुणावण वाळा।।३६।।

।।भावार्थ।।
हे भरत श्रेष्ठ! अबै तीन प्रकार रा सुखां नै ई थूं म्हारा सूं सुण जिण में अभ्यास सूं रमण व्है है(जिण सुख में साधक मिनख भजन ध्यान अर सेवा रै अभ्यास सूं रमण करै)अर जिण सूं दु:खां रौ अन्त हुवै है।
।।श्लोक।।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।३७।।

।।चौपाई।।
पैलौ सुख विष जियां लखावै
पण फळ में इमरत वौ लावै।
हरि राजी व्है बुध उपजावै
वौ सुख सात्विक जाण कहावै।।३७।।

।।भावार्थ।।
एड़ौ वौ परमात्मा विषयक बुद्धि रै राजी होवण सूं उपजै है वौ सुख सांसारिक आसक्ति रै अभाव रै कारण मिलै अर पैली विष जैड़ौ लखावै पण फळ उणरौ इमरत जैड़ौ व्है है वौ सुख इज सात्त्विक सुख वाजै है।
।।श्लोक।।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।३८।।

।।चौपाई।।
जो सुख इन्द्रिय, विषय दिरावै
पैली इमरत जिम इ लखावै।
फळ उण रौ झट विष बण जावै
वौ सुख ई राजसी कहावै।।३८।।

।।भावार्थ।।
जकौ सुख इन्द्रियाँ अर विषयाँ रै संयोग सूं होवै है वौ पैली तौ इमरत जैड़ौ लखावै पण फळ में वौ विष जैड़ौ हुवै है इण कारण वौ सुख राजस सुख वाजै है।
।।श्लोक।।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन:।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।

।।चौपाई।।
गफळत आळस नींद जगावै
सुख भोगण मोह संग लावै।
इसा भाव फळ पातां आवै
वौ सुख ई तामसी कहावै।।३९।।

।।भावार्थ।।
जकौ सुख भोगकाल में अर परिणाम में ई आत्मा नै मोहित करण वाळौ व्है-वौ नींद, आळस अर प्रमाद(गफळत) पैदा करै है वौ सुख तामस वाजै है।
।।श्लोक।।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:।।४०।।

।।चौपाई।।
जिसौ ज भू, स्वर्गा पर लाधै
देव सिवाय कठै नीं साधै।
इसौ सत्व नीं पायौ जावै
जो कुदरत सूं न्यारौ आवै।।४०।।

।।भावार्थ।।
पृथ्वी में या स्वर्गा में या देवतावां रै सिवाय दूजी कोई जागा एड़ौ कोई ई सत्त्व नीं है जकौ प्रकृति सूं पैदा व्हियौ यां तीन गुणां सूं रहित व्है।
।।श्लोक।।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।।४१।।

।।चौपाई।।
विप्र, क्षत्रिय, वैश्यां, शुद्रां रा व्है
कर्म स्वभाव मुजब न्यारा व्है।।।
हे अर्जुन! ए इम बांटी जै
जिण रौ कर्म जिसौ जाणी जै।।४१।।

।।भावार्थ।।
हे परन्तप!(अर्जुन!)ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्यां रै अर शूद्रां रै कर्म स्वाभाव सूं पैदा व्हिया गुणां सूं न्यारा न्यारा करीजिया है।
।।श्लोक।।
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मक्रर्म स्वभावजम्।।४२।।

।।चौपाई।।
अंतस अर इन्द्रिय वश लावै
पाळण धर्म कष्ट सह जावै।
क्षमा सरलता उर में लावा
वेद पढण ब्राह्मण ज स्वभावा।।४२।।

।।भावार्थ।।
अंतस नै रोकणौ इन्द्रियाँ नै वश करणौ, धर्म पालण खातर कष्ट सहन करणौ, बारै-मांय सूं शुद्ध व्हैणौ, दूजां दोषां नै क्षमा करणौ, मन इन्द्रियाँ अर शरीर नै सरल राखणौ वेदां में, ईश्वर अर परलोक में श्रद्धा राखणौ, वेदां रौ अध्ययन करणौ परमात्मा लै तत्व रौ अनुभव करणौ ए सगळा ब्राहम्ण रा स्वभाव व्है है।
।।श्लोक।।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।

।।चौपाई।।
, तेज, धीर, शूरापण लाणौ
पटु, जुध में नीं पीठ दिखाणौ।
स्वामिभाव रख दान ज देवै
स्वाभाविक कर्म क्षत्रिय व्है व्है।।४३।।
(पटु=चतुर)
।।भावार्थ।।
शूरवीरपणौ, प्रताप(तेज), धीरपणौ, चतुराई अर युद्ध में पीठ नीं दिखावणौ, दान देवणौ अर स्वामिभाव राखणौ ए सगळा कर्म क्षत्रिय रा स्वाभाविक कर्म वाजै।
।।श्लोक।।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४

।।चौपाई।।
कृषि गोपालण सत् व्यवहारा
स्वाभाविक कर्म वैश्य सारा।
सब वर्णां री सेवा सोहै।
स्वाभाविक कर्म शूद्र जौ है।।४४।।

।।भावार्थ।।
खेती करणौ, गोपालण करणौ अर खरीदणौ-बेचणौ सत् व्यवहार मतलब तोल माप अर गिणती में खोट राखियां बिना चीजां में मिलावट करियां बिना या बदळियां बिना घणौ नफौ कमायां बिना छळ कपट करियां बिना दूजां रौ हक छीनियां बिना जकौ सत्यता पूर्वक व्यापार करै वौ सत्यव्यवहार वाजै है ए वैश्य रा स्वाभाविक कर्म कहावै है। अर सब वर्णां री सेवा करणौ शूद्र रा स्वभाविक कर्म वाजै है।
।।श्लोक।।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
स्वकर्मनिरत: सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु।।४५।।

।।चौपाई।।
खुद खुद रा स्वाभाविक काजा
भगवत पावण सिद्धि लगाजा।
जिण विधि मिलै सिद्धि समझाऊं।
विगत वार म्हैं थनै सुणाऊं।।

।।भावार्थ।।
आप आप रा स्वाभाविक कर्मां में लागोड़ा मिनख प्रुभु प्राप्ति रूप परम सिद्धि नै पाय लै। आपरा स्वाभाविक कर्मां में लागोड़ा मिनख जिण तरह रा कर्म करण सूं सिद्धि पावै वा विधि म्हैं थनै विगत वार बताऊं।
।।श्लोक।।
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।४६।।

।।चौपाई।।
जकौ ईश सब जीव जणावै
वौ इज ओ संसार रमावै।
उणनै कर्म मुजब इज ध्यावै
तद ओ मिनख सिद्धि नै पावै।।४६।।

।।भावार्थ।।
जिण परमात्मा सूं सगळा जीवां री उत्पत्ति होवै है अर जिणमें औ सकल संसार व्याप्त (समायोड़ौ) है, उण परमात्मा रौ आपरै कर्म रै मुजब पूजण कर ‘र मिनख फगत सब सिद्धियां पाय लै है।
।।श्लोक।।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।

।।चौपाई।।
खुद रौ कर्म करै निष्ठा सूं
पण परधर्म तजै अळगा सूं।
वर्ण मुजब जो कर्म करावै
वौ स्वधर्म सै पाप निठावै।।४७।।

।।भावार्थ।।
दोष रहित ई दूजां रा धर्म सूं आपां रौ धर्म सिरै है। क्यूं कै स्वभाव मुजब यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अर शूद्र रा कर्म न्यारा न्यारा है वै आपरा कर्म नै निष्ठा सूं करै वौ कर्म इज स्वधर्म वाजै है। एड़ा स्वधर्म करण वाळौ मिनख कदै ई पाप रौ भागी नीं हुवै।
।।श्लोक।।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।।४८।।

।।चौपाई।।
दोष देख अर कर्म न त्यागौ
हे अर्जुन आ जाण ‘र जागौ।
सगळा कर्म युँ दोष करावै
जिम धूंआ सँग अगन मिलावै।।४८।।

।।भावार्थ।।
हे कुन्ती नन्दन! दोष व्हैतां थकां ई सहज कर्म(प्रकृति रै मुजब शास्त्रविधि सूं नियत करियोड़ा जकौ वर्णाश्रम रा धर्मरूप स्वाभाविक कर्म है व्हां नै इज अठै स्वधर्म, सहज कर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावजन्य कर्म, स्वभा्वनियतकर्म नाम सूं जाणिजै) रौ त्याग नीं करणौ चहिजै क्यूं कै सगळा कर्म दोष युक्त होया करै ज्यूं कै धूंआ अग्नि में भिळ’र रेवै है।
।।श्लोक।।
असक्त बुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह:।
नैष्कर्म्यसिंद्धि परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति।।४९।।

।।चौपाई।।
बुध जिण रौ बिन लाग ज आळौ
इन्द्रिय, तन वश में करवाळौ।
संन्यासी बण योग करावै
निष्कामी सिद्धी वौ पावै।।४९।।

।।भावार्थ।।
जिणरी बुद्धि सब जागा बिना लाग वाळी है। जकौ आपरा शरीर अंतस इन्द्रियाँ नै वश में कर लिया है जकौ बिना इच्छा रै है वौ मिनख सांख्य योग सूं सै सूं सिरै स्वाभाविक, आपौ आप सिद्ध निष्कामी भाव, निर्लिप्त भाव है वाळी सिद्धि पाय लै है।
।।श्लोक।।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।

।।चौपाई।।
अर्जुन हियै शुद्ध हरि पावै
यौ ई ग्यान ज निष्ठा लावै।
ए जिण विध पाई जै कै ऊं
म्हैं औ थोड़ौ ग्यान ज दै ऊं।।५०।।

।।भावार्थ।।
हे कुन्ती नन्दन! सिद्धि (अंतस री शुद्धि) नै पायोड़ौ साधक ब्रह्म नै(परमात्मा नै) जकौ कै ग्यान री परम निष्ठा है जिण तरह सूं पावै है वै प्रकार थूं म्हारा सूं संक्षेप में समझ।
।।श्लोक।।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।।५१।।

।।चौपाई।।
जो योगी हरि पावण चावै
सात्विक बुद्धी वौ अपणावै।
दृढधारी इन्द्रिय वश वाळौ
राग विषय नै त्यागण आळौ।।५१।।

।।श्लोक।।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस:।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रित:।।५२।।

।।चौपाई।।
वसत एकलौ अल्पाहारी
तन मन वाणी वश रौ धारी।
ध्यान मगन व्है हरि नै ध्यावै
भव बंधण सूं मुक्ती जावै।।५२।।

।।श्लोक।।
अहड़्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम।
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।५३।।

।।चौपाई।।
अहंकार बल दर्प ‘र कामा
करै क्रोध नीं संग्रै नामा।
ममता तज ‘र शान्त हुय जावै
सांख्य योगि वौ हरि नै पावै।।५३।।

।।भावार्थ।।
जकौ विशुद्ध (सात्त्विक) बुद्धि सूं वैराग्य रै आसरै रैवै एकान्त वास करण वाळौ अल्प आहार करण वाळौ, नेठाव सूं इन्द्रियां नै वश में करण वाळौ, शरीर, वाणी मन नै वश में करण वाळौ, शब्दादि विषयां (शब्द, स्पर्श, रूप, रस अर गन्ध पांच विषयां)रौ त्याग करियां पछै राग द्वेष नै तज ‘र लगोलग ध्यान मगन होय जाय वौ अहंकार, बल, दर्प (जमीन जायदाद रौ घमण्ड)काम वासणा, क्रोध अर परिग्रहण (संग्रह)रहित होयां पछै ममता त्याग शान्त रैवणियौ ब्रह्म (परमात्मा) प्राप्ति रौ पात्र हुवै है
।।श्लोक।।
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काड़्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्।।५४।।

।।चौपाई।।
हरि में लीन तुष्ट व्है जोगी
करै न दुख नीं इच्छा भोगी।
वौ सब जीवां में समभा्वी
पराभक्ति निर्लिप्त हु पावी।।५४।।

।।भावार्थ।।
पछै वौ इज सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव सूं स्थित, तुष्ट(प्रसन्न) मन वाळौ योगी नीं तौ कोई रै वास्तै शोक (दु:ख) करै अर नीं ई कोई इच्छा राखै है। ऐड़ा सगळा जीवां में सम भाव वाळा योगी म्हारी पराभक्ति(साची भक्ति) पाय लै है।
।।श्लोक।।
भवत्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।५५।।

।।चौपाई।।
पराभक्ति सूं मम हरि जाणै
जैड़ौ हूँ वैड़ौ ज पिछाणै।
उण भक्ति नै तत्व सूं लावै
पछै तुरत म्हा में ज समावै।।५५।।
(पराभक्ति=साची भक्ति)
।।भावार्थ।।
उण भक्ति सूं म्हनै परमात्मा नै जकौ हूँ अर जितरौ हूँ ठीक वैड़ौ रौ वैड़ौ तत्त्व सूं जाण लेवै है अर उण भक्ति सूं म्हनै तत्त्व सूं जाणियां पछै तुरत इज म्हारा में समाय जाय है।
।।श्लोक।।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्चतं पदमव्ययम्।।५६।।

।।चौपाई।।
कर्म योगि म्हा में ज समावै
काज सैंग करता ई जावै।
सनातनी मम किरपा पावै
अविनाशी ज परम पद लावै।।५६।।

।।भावार्थ।।
म्हारै परायण व्हियोड़ौ कर्मयोगी सगळा कर्मां नै हमेश करतोड़ौ म्हारी कृपा सूं सनातन अविनाशी परमपद नै पावै है।
।।श्लोक।।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव।।

।।चौपाई।।
सब कर्मां नै मन सूं आपै
मम अरपण कर जो जन जापै।
थिर बुध योग ध्यान कर ध्यावै
म्हा में निस्चै चित्त लगावै।।५७।।

।।भावार्थ।।
सगळा कर्मां नै मन सूं म्हारा में अरपण कर ‘र पछै सम बुद्धि रूप योग धार’र म्हारा में परायण हौ
जा अर लगोलग म्हारा में चित्त वाळौ व्है जा।
।।श्लोक।।
मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहड़्कारान्न श्रोष्यसि विनड़्क्ष्यसि।।५८।।

।।चौपाई।।
म्हा में चितवाळौ बण आवै
मम किरपा संकट कटवावै।
अहंकार उर में जद लाया
परमारथ सूं भिस्ट कहाया।।५८।।

।।भावार्थ।।
ठावी तरह सूं म्हारा में चित्त्वावाळौ होय’ र थूं म्हारी कृपा सूं सगळा संकटां नै अनायास ई पार कर जाय ला। जै अहंकार रै कारण म्हारा वचनां नै सुणियौ अणसुणियौ करै ला तौ नष्ट व्है जावेला। यानीं परमारथ सूं भिस्ट व्है जाय ला।
।।श्लोक।।
यदहड़्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।

।।चौपाई।।
लेय आसरौ युँ अहंकारौ
जुध नीं करणा रौ ओ धारौ।
थारौ झूठौ जाण पड़ै ला
क्षात्र धर्म तव युद्ध करै ला।।५९।।

।।भावार्थ।।
अहंकार रौ आसरौ लेय’ र थूं जकौ मान रह्यौ है कै थूं जुध नीं करै ला तौ ओ थारौ घमण्ड झूठौ है क्यूं कै थनै थारौ ओ इज क्षात्र-धर्म(क्षात्र-स्वभाव) थनै जुध करण खातर लगावै ला।
।।श्लोक।।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्।।६०।।

।।चौपाई।।
स्वभाव ज तुझ कर्म सूं बांधै
मोहवश जुध न करणौ सांधै।
क्षात्र स्वभाव रु परवश आगै
अर्जुन युद्ध करै ला सागै।।६०।।

।।भावार्थ।।
हे कुन्ती नन्दन! आपरा स्वभाव रै मुजब कर्म सूं बंधियोड़ौ मोह रै वशीभूत होय’र जिण युद्ध नै थूं नीं करणी चावै उण युद्ध नै ई थनै क्षात्र प्रवृत्ति रै परवश होय ‘र करणौ पड़ै ला।
।।श्लोक।।
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।

।।चौपाई।।
तन रा यन्त्र मांय असवारा
जीवां रै कर्मानूसारा।
हरि खुद माया सूं ज भमावै
सब जीवां रै हियै समावै।।६१।।

।।भावार्थ।।
हे अर्जुन! शरीर रूपी यन्त्र में असवार होय’ र सगळा प्राणियां नै अन्तर्यामी परमेश्वर आपरी माया सूं वां रै काज रै मुजब भमावै (भ्रमण करावै) अर सगळा जीवां रै हिरदै में वसै है।
।।श्लोक।।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

।।चौपाई।।
अर्जुन थूं हरि रै शरणां जा
हरि किरपा सूं शांती पा जा।
अवर सनातन धाम जआवै
परम पिता परमेश्वर पावै।।६२।।

।।भावार्थ।।
हे भारत! थूं सब प्रकार सूं उण परमेश्वर री इज शरण में जा। उण परमात्मा री कृपा सूं इज थूं परम शान्ति अर सनातन परमधाम पाय लै ला।
।।श्लोक।।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यागद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।

।।चौपाई।।
अति छानै रौ ग्यान बतायौ
सोच विचार चित्त में ठायौ।
भली भांत सब ग्यान ज धारौ
मरजी मुजब ज कर अवतारौ।।६३।।

।।भावार्थ।।
इण तरह ओ गोपनीय सूं ई अति गोपनीय ग्यान म्हैं थनै कह्यौ हूँ, इण रहस्ययुक्त ग्यान नै थूं सूं भली भांति सोच विचार’र ज्यूं चावै व्यूं कर यानी थारी मरजी मुजब कर।
।।श्लोक।।
सर्वगुह्यतमं भूय: श्रृणु में परमं वच:।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।।

।।चौपाई।।
छानी बात छानै सुणाई
म्हारा सूं पाछी सुण भाई।
मम प्रिय मिंत खास हित कारी।
इहि कारण तव कहणी धारी।।६४।।

।।भावार्थ।।
सै सूं घणी छानै सूं ई छानै री बात थूं म्हारा सूं पाछी सुण थूं म्हारौ घणौ प्रिय मित्र है इण वास्तै आ खास हितकारी बात म्हैं थनै कैवूं ला।
।।श्लोक।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।।

।।चौपाई।।
मम चित वाळ, भगत मम हौ जा
पूजै मम नम वाळ ज हौ जा।
सत्य वचन दूं इम मम पावै
क्यूं कै थूं घण व्हालौ भावै।।६५।।

।।भावार्थ।।
हे अर्जुन! थूं चित्त धारण वाळौ व्है जा, म्हारौ भगत बण जा, म्हारी पूजा करण वाळौ अर म्हारै आगै नमण वाळौ व्है जा। इयान कर ‘र थूं म्हनैं पाय सकै ला ओ म्हैं थनै साचौ वचन दूं हूँ, क्यूं कै थूं म्हारौ घणौ प्रिय है।
।।श्लोक।।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।६६।।

।।चौपाई।।
सगळा कर्मकर्तव्य त्यागौ
आय शरण म्हारा में लागौ।
पापां सुँ थनै मुक्त कराऊं
दुख मत कर म्हैं आ समझाऊं।।६६।।

।।भावार्थ।।
सगळा धर्मां नै यानी सगळा कर्तव्यकर्मां नै म्हारा में त्याग ‘र फगत एक मुझ सर्वशक्तिमान, सगळां रौ आधार परमेश्वर री इज शरण में आ जा। म्हैं थनै सगळा पापां सूं मुक्त कर दूं ला, थूं दु:ख मत कर।।६६।।
।।श्लोक।।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।६७।।

।।चौपाई।।
तप हीणा नीं राज सुणाहै
बिन भगती बिन सुणणौ चाहै।
जकौ भूंडियां म्हारी चावै
आं सब नै गीता न सुणावै।।६७।।

।।भावार्थ।।
थनै ओ गीता जी रौ रहस्य वाळौ उपदेश कोई काल में नीं तौ तप विहीणा मिनख नै, नीं बिना भगती वाळा नै, अर नीं ई सुणण री इच्छा नीं राखणियां नै कैणौ चाहिजै सागै ई जकौ म्हारा में दोष दृष्टि राखै उण नै ई कदै ई नीं कैणौ चाहिजै।
।।श्लोक।।
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:।।६८।।

।।चौपाई।।
परम राज मम प्रेमी भावै।
भगतां नै जै शास्त्र सुणावै।
इण में रती न संशय आवै
वौ निस्चै ई मुझ कूं पावै।।६८।।

।।भावार्थ।।
जकौ पुरुष म्हारा सूं परम प्रेम कर ‘र इण परम रहस्य सूं भरियोड़ौ गीता शास्त्र म्हारा भगतां नै कैवै ला, वौ म्हनै इज पावै ला-इण में कोई संशय नीं है।
।।श्लोक।।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।।६९।।

।।चौपाई।।
उण सूं प्यारौ मिनख न कोई
काज करणियौ भू नह होई।
जो गीता रा गुण गावै ला
उण सूं बत्तों भळै न व्है ला। ६९।।

।।भावार्थ।।
उण सूं बढ ‘र म्हारौ प्रिय काज करण वाळौ ( निर्लिप्त भाव सूं गीता जी रौ प्रचार करण वाळौ)मिनखां में दूजौ कोई नीं है;अर आखी धरती माथै उण सूं बढ ‘र म्हारौ प्रिय दूजौ भविष्य में कोई व्हैला ई कोनी।
।।श्लोक।।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं सम्वादमावयो:।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:।।७०।।

।।चौपाई।।
म्हां बातां रौ पाठ करै ला
धर्म ग्यान री बात भजै ला।
ग्यान हवन ओ करियौ जावै
म्हारा मत सूं मम वौ पावै।।७०।।

।।भावार्थ।।
जकौ मिनख म्हां दोनां रा इण धर्म सम्वाद रौ पाठ करै उण सूं ई म्हैं ग्यान हवन रै रूप में पूजी जूं ला ऐड़ौ म्हारौ विचार है
।।श्लोक।।
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नर:।
सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

।।चौपाई।।
श्रद्धा सूं बिन निन्दा भावा
गीता सुणणौ जदी सुहावा।
तन छूटां सै पाप परा जा
शुभ लोकां नै पावण आ जा।।७१।।

।।भावार्थ।।
श्रद्धावान अर भूंडियां करण वाळा सूं अळगौ जकौ मिनख इण गीता जी नै सुण ई लै तौ वौ इण शरीर छूटती बगत पुन्न करण वाळां रा शुभ लोकां नै पाय लै।
।।श्लोक।।
कच्चिदेतच्छुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।७२।।

।।चौपाई।।
पार्थ थुँ थिर चित्त होय धारी
गीता सुणणौ है गुणकारी।
अर्जुन मोह परत अग्यानी
बता नष्ट व्हियौ कै नि ग्यानी।।७२।।

।।भावार्थ।।
हे पृथानन्दन! कांई थूं थिर चित्त होय ‘र गीता जी रौ ग्यान सुणियौ? अर हे धनञ्जय! कांई थारौ अग्यानी मोह नष्ट व्हियौ कै नीं व्हियौ।
।।श्लोक।।
अर्जुन कैवै
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव।।७३।।

।।चौपाई।।
हरि मोह अबै म्हारौ भागौ
यादां में म्हैं पाछौ आ’गौ।
व्हैम त्याग नै थिर म्हैं हूँ लौ
इब आग्या पालण कर लूं लौ।।७३।।

।।भावार्थ।।
हे अच्युत! (भगवान्)आपरी कृपा सूं म्हारौ मोह नष्ट व्हैगौ है, म्हारी याददाश्त आयगी है, म्है व्हैम (सन्देह) रहित होय’र थिर होयगौ हूँ। अबै म्हैं आपरी आग्या रौ पालण करूं ला।
।।श्लोक।।
संजय कैवै
इत्यहं वासुदेवस्वय पार्थस्य च महात्मन:।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।।७४।।

।।चौपाई।।
इम म्हैं हरी वासुदेवा रौ
अर संवाद ज अर्जुन वा रौ।
मम अदभुत यौ राज ज भायौ
मगन होय म्हैं उत सुण आयौ।।७४।।

।।भावार्थ।।
इण तरह म्हैं भगवान् वासुदेव अर महात्मा पृथानन्दन अर्जुन रौ ओ
मगन करण वाळौ अद्भुत संवाद म्हैं सुणियौ।
।।श्लोक।।
व्यासप्रसादाच्छुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयत: स्वयम्।।७५।।

।।चौपाई।।
दिव्य दीठ ओ व्यास दिरायौ
छानै ग्यान कृष्ण प्रकटायौ।
पार्थ नै कहतां म्हैं आयौ
सामीं सुण नै मन बिलमायौ।।७५।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र नै कह्यौ-श्री व्यास जी री कृपा सूं दिव्य दीठ पाय’ र म्हैं इण परम गोपनीय योग नै भगवान् श्रीकृष्ण रै श्रीमुख सूं अर्जुन नै सुणावतां साक्षात सुणियौ।
।।श्लोक।।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु:।।७६।।

।।चौपाई।।
अर्जुन कृष्ण संवाद ज सौयौ
बार बार सिमरण कर जोयौ।
ओ उपकारी अदभुत लागौ
हे राजन हुय खुस म्हैं आ ‘गौ।।७६।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र नै कैवै-हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण अर अर्जुन रै इण रहस्य सूं भरियौ, कल्याण कारी अर अदभुत संवाद नै बार बार सिमरण कर’र म्हैं हजार वार राजी होय रह्यौ हूँ।
।।श्लोक।।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे:।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः: पुनः।।७७।।

।।चौपाई।।
मोटौ रूप कृष्ण रौ छायौ
याद कियां घण इचरज आयौ।
हे राजन छवि माधव छायी
हरखित बार बार मन भायी।।७७।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र नै कैवै-हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण (श्रीहरि) रा उण अदभुत, विराट रूप नै ई बार बार याद करण सूं म्हंनै घणौ इचरज होय रह्यौ है अर म्हैं हजार वार राजी व्हैय रह्यौ हूँ।
।।श्लोक।।
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।

।।चौपाई।।
योगेश्वर माधव जित छावै
अर्जुन उत गाण्डिव सँग जावै।
नीति अचल जय वैभव आवै
इसी धारणा म्हारी चावै।।७८।।

।।भावार्थ।।
संजय धृतराष्ट्र नै कैवै-हे राजन्! जै योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण है अर जठै गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन व्है है, उठै इज विजय विभूति अर अचल नीति व्है है ऐ म्हारा विचार है।
।।चौपाई।।
युँ अध्याय अठारवौ ठायौ
अर संन्यास ज योग बतायौ।
विरेन गीता भाव बतायौ
उल्थौ चौपाई में लायौ।।


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