राजस्थानी लोकसाहित्य में मूल्य-बोध

लोकसाहित्य अर समाज रो संबंध निर्विवाद है क्यूंकै लोक अर समाज परस्परावलंबी है। किणी पण जुग में लोक बिना समाज अर समाज बिना लोक कोनी रह पावै। इणरै बावजूद ई लोक अर समाज दोनूं अेकदम अेक कोनी, आं री आप-आपरी सींवां है, आप-आपरी न्यारी ओळखाण है। ‘लोक’ मानखै री उण मौलिक स्थिति रो वाचक है, जकी मांय समाज अर असमाज दोनूं भांत रा तत्त्व भेळा मिलै बठै ‘समाज’ मानखै री अेक खास तत्त्वां सूं नियंत्रित स्थिति रो परिणाम हुवै। मूळ में लोक अर समाज दोनां रो जन्मजात संबंध है पण दोनूं अेक-दूजै रा पर्यायवाची कोनी, पूरक जरूर कैय सकां। लोक जद कीं अेक खास तत्त्वां सूं युक्त होय आपरी अेक खास अभिव्यक्ति करै, तो बो समाज रै रूप में आपणै सामी आवै। इण दीठ सूं ‘‘लोक में समाज विद्यमान रैवै पण आ भी साच है कै लोक में वां समाजू तत्वां सूं मुक्त स्थिति भी साथै ई साथै बणी रैवै। इण भांत ईं द्वैत सूं जको अद्वैत बणै उणरो नाम लोक है।’’ (लोकसाहित्य विज्ञान- डाॅ. सत्येन्द्र, पृष्ठ- 450) ओ ई कारण है कै रोजीनां री बोलचाल में इयांकला सबद का पद सुणण नैं मिलै कै फलाणी चीज समाज विरोधी है अर फलाणी समाज-हितैषी का पछै समाज-सापेक्ष अर समाज-निरपेक्ष री बात ई सुणी जावै। लोकसाहित्य इयांकलै ई लोक रो वाणी-विलास है। दूजै सबदां में कैय सकां कै लोकसाहित्य लोक री समग्र अभिव्यक्ति है।

लोक अर उणरै दीखतै रूप माथै विचार करतां लागै कै जिण भांत मानखै री हर अभिव्यक्ति उण सारू अनिवार्य उपयोगी अभिव्यक्ति हुवै, उणीं तराजै आज भी आपां जिणनैं लोक कैवां उणरी सगळी अभिव्यक्तियां निजू स्तर का पछै समाजू स्तर दोनां दीठ सूं उणरी निजू अभिव्यक्तियां ई है। अर आं मांय अनिवार्य उपयोगिता री भावना नहचै ई रैवै। लोक री कोई पण अभिव्यक्ति फालतू कोनी हुवै, उणरो आपरो कोई मकसद, कोई उपयोग पण जरूर हुवै। उदाहरण रूप में देखां तो- आपणै घरां मांय लुगायां गीत गावै तो बै आ समझै कै अै गीत गावणां उण खातर, उणरै टाबर-टींगरां खातरा, उणरै घरधणी खातर, उणरै घर अर घर री सगळी चीजां, जीव-जिनावरां अर खेती-पाती तकात सारू उपयोगी है अर उपयोगी भी बा चावै जितरा अर जियां रा जियां ई है। लोक री नारी रो कोई पण गीत, कोई पण कहाणी फगत गीत गावण का कहाणी कैवण खातर ई कोनी हुवै अर नां ई गीत अर कहाणी तांई सीमित ई रैवै। इणरो अरथ ओ है कै सगळो लोकसाहित्य ‘लोक’ रै अस्तित्व रो अेक अनिवार्य अंग है अर बो पग-पग पर उणरै जीवण सूं गूंथीजेड़ो नै उणरी आस्था सूं ओतप्रोत है। इयांकली स्थिति में फगत उणरी शैली का पछै उणरै रूप री नकल करतां आपां कोई रचना बणावां अर आपणी भावना नैं लोक रै द्वार पर पुगावां तो बा लोक सारू अग्राह्य ई नीं अहितकर पण हुवै। इणनैं इयां पण समझ सकां कै किणीं आदमी री असली आंगळी काट’र उणरी ठौड़ विज्ञान रै चमत्कार सूं प्लास्टिक सर्जरी कर मौकळी फूटरी आंगळी लगावां तो उणनैं उण आदमी सारू हितकर सिद्ध नीं कर सकां।

मतलब ओ है कै लोक नैं सायास बणावण री आफळ कदैई सिग कोनी चढै। लोक रै तो ढंगढाळै नैं समझणो ई पड़ै अर इणनैं समझण सारू लोक रै संसर्ग में जावणो पड़ै अर लोक में आस्था जतावणी पड़ै। लोक रै सहज, सरल अर विस्तृत रूप नैं आपणी समझ रै संकीर्ण दायरां में बांधणो ना तो लोक सारू उपयोगी अर ना आपणै खुद सारू उपादेय। इण खातर लोक री लहर नैं समझतां उणरी अभिव्यक्ति में विद्यमान मूल्यां रो बोध करण री जरूरत है। मूल्य रै निर्माण नैं इयां समझ सकां कै मिनख री सगळी क्रिया-प्रतिक्रिया रो केंद्र उणरो मस्तिष्क हुवै। मस्तिष्क मांय विचारां रो मंथन चालै। इण विचारमंथन री प्रक्रिया में मानखो आप सारू कीं आदर्शं तय करै। आपरै तय कर्योड़ै आदर्शां तांई पूगण री हर संभव आफळ करै। कई आदर्श तो इयांकला हुवै जकां नैं पावण री प्रबल इच्छा पण हुवै। आ प्रबल इच्छा जद तथ्य का सिद्धांत रूप में रैवै तो आ आकांक्षा कहीजै पण जद आ आकांक्षा व्यवहार रूप में परिणत होवै तो मूल्य री श्रेणी में आवै।

दूजै सबदां में इयां कैय सकां कै मानखै रै ऊंचै अर आदर्श विचार-मंथन रै परिणामस्वरूप जकी-जकी आकांक्षावां पूरी होय मूर्त रूप लेवै, वै मूल्यां री श्रेणी में आवै। जठै तांई मूल्यां री बात है तो मूल्य तो किणी क्रिया का भावना रै साथै जुड़’र आपरी उपादेयता रो आभास करावै। मूल्य मानखै रै विश्वास रो नाम है, जकै रै आधार माथै मिनख आपरी प्राथमिकतावां तय कर पछै उण क्रम सूं काम तेवड़ै। शाश्वत अर समसामयिक दो भागां में जे मूल्यां नैं बांटतां देखां तो शाश्वत मूल्य तो सदा बियां रा बियां रैवै पण समसामयिक मूल्य बदळता रैवै। इण दीठ सूं आपां कैय सकां कै मूल्यां रो निर्धारण समाज रै दर्शन सूं हुवै। डाॅ. राधाकमल मुकर्जी कैवै कै “मूल्य बै सामाजिक प्रतिमान, लक्ष्य वा आदर्श है, जकां रै आधार पर न्यारी-न्यारी परिस्थितियां अर विषयां रो मूल्यांकन करीजै।’’

कुल मिलाय’र मोटामोटी कैय सकां कै मूल्य ई है जका मानखै नैं उत्कर्ष कानी पावंडा भरावै। मूल्य ई है जका मानखै नैं विकृति सूं बचाय संस्कृति रै सांतरै मारग लागण री सीख अर हूंस देवै। मूल्य ई है जका ‘इदम न ममः’, ‘सर्वे भवंतु सुखीनः’ अर ‘जीओ और जीने दो’ जियांकली उदात्त भावनावां रो उद्भव अर विकास करै। मूल्य ई है जका मानखै रै जीवण में श्रद्धा, विश्वास, प्रेरणा, प्रतिबद्धता, दया, करुणा अर क्षमा जैड़ै भावां रो संचरण करै। मूल्य ई जका राजस्थान री वीर माता रै मूंढै ‘फिर देतो फिर मेलती, मां इण सांसै नाथ’ का पछै ‘इळा न देणी आपणी हालरिया हुलराय’ जैड़ी मर्मस्पर्शी अर मोदीली वाणी रो प्रस्फुटन करावै। मूल्य ई जकां रै पाण प्रणधारी पाबू आपरी व्हाली धण नैं चंवरी में छोड़ गायां री वाहर चढै अर बोल साटै मौत नै मोल लेवै। मूल्य ई जकां रै पाण वचनां रो बंध्योड़ो तेजो धोळियो भयंकर विषधर रै सामी आपरी कोमळ जीभ निकाळ डंक झेलै। मूल्य ई है जकां रै पाण हिंदुआ सूरज राणा प्रताप भाखरां अर जंगळां में भटकणो स्वीकारै तो क्रांतिकारी केसरीसिंह बारठ मेवाड़ी राणा फतेहसिंह रै सोयोड़ै स्वाभिमान नैं ललकारै। मूल्य ई है जकां रै पाण राजमहलां री महाराणी मीरां साधां री संगत में घुंघरू बांध नाचै अर तथाकथित निम्न जाति रै रैदास नैं आपरो गुरु बतावती गुमेज करै, मूल्य ई है जकां रै पाण अछूतां नैं गळै लगावणियै बाबै रामसा पीर री जयकार आखै मारवाड़ अर सारै गुजरात रै जनकंठां सूं गूंजै ‘ खम्मा खम्मा हो म्हांरा रूणीचै रा धणियां’, मूल्य ई है जकां रै पाण खेजड़ी जियांकलै रूंख नैं बचावण खातर मिनख आपरी ज्यांन जोखम में न्हाखै तो हिरणां री रिछ्या सारू प्राण देय प्रण निभावण नैं त्यार दिसै। लबोलवाब में आ कैवां कै मूल्य ई है जका मानखै नैं धीज-पतीज देवै, मिनखाचारै री साख भरै, इण जगत रो संचालन करै अर सगळी व्यवस्था नैं बणायां राखै तो कोई अतिशयोक्ति कोनी।

मूल्यबोध री बात करां तो आंतरिक अर बाह्य दोनूं भांत रै मूल्यां री बात करणी जरूरी लखावै। मानखै सारू मांयला मूल्य साध्य रूप है तो बारला मूल्य साधन रूप हुवै। साध्य रो कदैई चुणाव नीं करीजै वो तो सदा सर्वदा रैवै। ना तो उणरै खातर कोई कारण री दरकार तो ना कोई परिस्थिति री पुकार। इणरै उलट बारला मूल्य मांयलै (साध्य) मूल्यां सारू साधन रो काम करै। आं रै लारै कोई न कोई खास प्रयोजन रैवै। मांयलै मूल्यां में जठै सत्यम्, शिवम् सुंदरम् री बात करां बठै बारलै मूल्यां में आपणा सामाजिक, सांस्कृतिक अर व्यक्तिगत जीवनमूल्य भेळा आवै। मूल्यां सारू प्रमुख श्रोत-रूप में संविधान, संस्कृति अर धर्म आद तत्त्व काम करै। संविधान में दियोड़ा मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य, नीति-निर्देशक तत्त्व अर मानवाधिकार मूल्य निर्धारण में सैयोगी है। बियां ई संस्कृति रा भौतिक मूल्य साधन रूप है पण अभौतिक मूल्य साध्य रूप आपणै सामी रैवै। धर्म सूं नैतिकता, आचरण, चरित्र, शांति अर आस्था जियांकलै मूल्यां री थापना हुवै।

राजस्थानी लोकसाहित्य में मूल्यबोध री बात करतां राजस्थान अर उणरै लोकजीवण री इधकायां, अबखायां, सामाजिक, सांस्कृतिक अर धार्मिक पृष्ठभूमि आद नैं ध्यान में राखतां इण विषै माथै विचार करणो पड़सी। जठै तांई शाश्वत मूल्यां री बात है तो बै तो हर लोक अर हर क्षेत्र में मिलै ई मिलै तो पछै राजस्थानी लोक भी इणरो अपवाद कोनी। दया, क्षमा, करुणा, परोपकार, सहयोग, आज्ञापालन, ईमानदारी, न्यायप्रियता, निष्ठा, राष्ट्रप्रेम अर आपरी संस्कृति रै प्रति गर्व रो भाव आद मूल्य तो राजस्थानी समाज में भी औरां दांई मिलैला ईज, वां री बात नीं कर’र अठै राजस्थानी लोकजीवण रै वां मूल्यां री बात करणी समीचीन लागै जका इण लोक नैं दूजां सूं न्यारो अर निकेवळो बणावै। मूल्य मोटामोटी मांयली अर अनुभव करण वाळी चीज है, जकी आचरण सूं ईज ओळखीज सकै। इण कारण अठै आपां राजस्थानी लोकसाहित्य में प्रचलित लोकोक्तियां, दूहा, ओखाणां, ख्यातां-वातां री अखियातां अर लोकगीतां री भावभरी सोनैली कड़ियां री लड़ियां जोड़तां मूल्य रूपी हार रा दरसण करां।

बाळक रै जनमतां ईं उणरी मां रै मूंढै उण सारू मूल्य री सीख सरू हुज्यावै जकी आखरी सांस तांई साथै रैवै। राजस्थानी लोकगीत ‘बाळो पांख्यां बारै आयो माता बैण सुणावै यूं ’ में राजस्थानी वीर माता आपरै बाळै नैं नाळो मोळती बिरियां मूल्य री सीख देवै-‘बैर्यां री फौजां रा बाळा सीस काट घर आइजे यूं ’। इणीं भांत बा मायड़ झूलो झुलावती वेळा ई ‘इळा न देणी आपणी हालरिया हुलराय ’ री लोरी गावै। रणांगण सारू जावती बखत आपरै बेटै अर पति दोनां नै अखरावती कैवै कै ‘‘सहणी सबरी हूं सखी दो उर उलटी दाह/ दूध लजाणै पूत सम, वलय लजाणै नाह’’ रण में खेत रैवणियै बेटै सारू त्राहि-त्राहि कर’र रोवण री बजाय वीर माता अंतस सूं अंजस रा आखर उच्चारै ‘बेटा दूध उजाळियो, तू कट पड़ियो जुद्ध/ नीर न आवै मो नयण, पण थण आवै दुद्ध ’। राजस्थान री नारी सारू वीर माता अर वीर नारी रो विरुद इणीं कारण है कै वा वीरत री कीरत नैं आपरै जीवणमूल्यां री जड़ मानै। ‘कट भल जाज्यो खेत में, पर मत आज्यो हार’ अर ‘पग-पग चूड़ी पाछटूं, जे रावत री जाम’ री आखड़ी घालण वाळी नारी कितरी महान हुवै, स्यात कायर लोगां री तो पिढ़िया खप मर जावै तो भी इण ऊंचाई रो अंदाज ई नीं लगा सकै। ममता रै महानद मां रै कोमळ हियै सूं आपरी आंतड़ी रै सीर नैं इण भांत री करड़ी सीख इण बात री साख भरै कै राजस्थान रै जनजीवण में प्राण सूं बेसी प्रण अर ज्यान सूं बेसी आन री अलबेली रीत है। इण वीर वसुंधरा रै कण-कण सूं स्वाभिमान अर मरजादा रै मंडण रा स्वर गूंजै। लोकसाहित्य रा अै दूहा मूल्यबोधन सारू महताऊ निगै आवै –

कटकां तबल खड़क्किया, होय मरद्दां हल्ल।
लाज कहै मर जीवड़ा, वेह कहै घर चल्ल।।
माण रखे मरजे मती, मरे न मूके माण।
जब लग सास सरीस में, तब लग ऊंची ताण।।

जीवण में उत्कर्ष कानीं बढ़ण री सीख अठै रै लोकसाहित्य में हरठौड़ मिलै। निजू स्वार्थ खातर का काची काया रै मोह रै कारणै आपरै फरज सूं चूकण नैं अठै रो लोकमानस घणो नाजोगो अर नीचकर्म मानै। घूंटी रै साथै ई इयांकला संस्कार दिया जावै कै जद कदे फर्ज निभावण रो काम पड़ै तो अठै रा सपूत पाछै नीं हटै। ‘सूरा ओ रण में जूझिया’ लोकगीत रा अै बोल इण बात नैं पुख्ताऊ करै कै मूल्य रक्षा रो मारग इतरो सांतरो अर शाश्वत मानीज्यो है कै इण पर चालणियां री कीरत रा कोट हर ठौड़ निगै आवै। बूढो दादो आपरै किशोर पोतां नैं मोहवश जुद्ध में जावण री बजाय पाछा घिरण रो कैवै, पण कुळ री निकळंक परंपरा रा वाहक कांई जबाब देवै सुणो-

‘‘दादाजी ! पाछा फिरां तो म्हारो कुळ लाजै
लाजै म्हारी माता बाई रो थान
सूरा ओ रण में जूझिया ।’’
(राजस्थानी लोकगीत विहार-प्रथम भाग: नरोत्तमदास स्वामी, पृ. 188)

आपरी मातभोम, धरम, गाय, नारी अर रूंखां री रिछ्या सारू जूझणियां जोधारां रै जस री गाथावां जुगांजुगां चालै। ‘जस रा आखर जेहिया जातां जुगां न जाय’ कैवतां इण लोक में आ सीख सदा दीरीजै कै संसार थिरचक कोनी, काया थिर कोनी पण जस अर कळंक दोनूं जुगां जुगां रैवै ‘जस पीछै रह जायगो, कै रह जाय कळंक।’ अठै रै वीरां तो भगवान सूं भी आ ई विनती करी है कै हे दाता जींवता राखै जितरै लाज बणी राखजे, जे लाज जावै तो पछै उणसूं पैली जीव निकाळ दीजै-

सांई तो सूं वीनती, ऐ दुय भेळा रख्ख।
लाज रखै तो जीव रख, लज बिन जीव न रख्ख।।

लोक कदेई पक्षपात नीं करै, ना ई लोक री अदालत में किणीं भांत री रिश्वत री रीत रा रायता संभव हुवै इण खातर लोक में तो सूरां-पूरां, देवां-दातारां अर जुझारां नैं ईज रंग दिरीजै। कायर-कपटी अर निजस्वार्थी लोगां नैं लोक री धिक्कार ई सुणणी पड़ै। राजस्थानी लोकसाहित्य रा अै दूहा मूल्यबोध रा महताऊ थंभ मानीज सकै-

मूंजीड़ा मर जावसी, भीड़ी मुट्ठड़ियांह।
मधकर ! चंगा मांणसां, रहसी गल्लड़ियांह।।
कंकण बंधण, रण चढण, पुत्र बधाई चाव।
अै तीनूं दिन त्याग रा, कहा रंक कहा राव।।
धर लूटै, छूटै धरम, ग्रहै कटक्कां गाय।
उण वेळा नर आळसै, कुळ छत्री न कहाय।।

लोक री आं आंटीली, अलबेली पण अंजस वाळी उक्तियां नैं जकै लोगां जाणी अर व्यवहार में उतारी वां री पंगी (कीरत) समदां पार पूगी। ओ ई कारण है कै लोकगीतां अर गाथावां में डूंगजी-जवाहरजी, कूंप नरेश महेशदास अर रतना राणै जेड़ा आजादी रै अनुरागी वीरां रा वाखाण करती जनकंठां री वाणी लोगां रै सोयैड़ै स्वाभिमान नैं जगावै। थानैं रंग सौ कूंप नरेस सिरैनाम वाळै इण लोकगीता रा अे बोल राजस्थान लोकजीवण रै मूल्यां री ओळखाण करावे –

महेस कहै सुण मेड़ता, साची साख भरेस।
कुण भिड़सी, कुण भागसी, देखै जिसी कहेस।।
दूजां ज्यो भागो नहीं, दाग न लाग्यो देस।
वागां-खागां वांकड़ो, मही वांको माहेस।।
पग जड़िया पाताळियां, अड़िया भुज अमरेस।
तन झड़िया, तरवारियां, मुड़िया नहीं महेस।।

इणीं भांत रै स्वाभिमान अर मरजादा पालण री असंख्य गाथावां मरुधरा रै कण-कण सूं गूंजै। स्वतंत्रता रै पुजारी डूंगजी-जवाहरजी री गाथा आज भी अठै रै लोकजीवण रै आंटीलै मूल्यां री साख भरै। आगरै रै किलै में जद डूंगजी अंग्रेजां री केद में हुवै। जियां-तियां कर वां रा साथी लोटियो जाट अर करणियो मीणो वां नै जेळ सूं निकाळण रो सराजाम करै। जद लोटियै अर करणियै रात रा जेळ में घुस आपरै बेली डूंगजी नैं आवाज लगाई – ‘बोलै छै तो बोल डूंगजी बेड़ी देवां काट’। आवाज सुणतां ई डावोड़ी बुरज में बंध्योड़ो डूंगजी न्हार री दाईं दडूक्यो। लोटियो जाट जियां ई डूंगजी री बेड़ियां काटण आगै बढ़्यो डूंगजी रै संस्कारां में छिप्या राजस्थानी लोक रा मूल्य जाग उठ्या अर डूंगजी लोटियै नैं रोक्यो। उण वेळां डूंगजी जकी बात लोटियै नैं कही वा राजस्थानी लोक रै मूल्यबोध री सखरी साख भरण वाळी बात है, अर बा आ है-

बंध में बैठ्यो कहै डूंगजी, सुण रै लोट्या जाट।
पैलां तो बंधवां री काटो, पाछै म्हारी काट।।
के जाणैगा सित्तर बंधवा, के जाणैगा लोग।
डूंग न्हार यूं ई भागो, ज्यूं निकळ भागो चोर।।
बुरज तोड़कर बारै काढो, बंधवा अेकै साथ।
दो दिन में मर ज्यावां लोटिया, दुनी करैगी वात।।

डूंगजी खुद री ज्यान री परवाह नीं करतां पैली आपरै साथै बंदी बणायोड़ा सत्तर लोगों री बेड़ियां काटण सारू आपरै साथियां नैं प्ररित किया। लोटियो थोड़ो झिझक्यो तो डूंगजी उणनैं करड़ी जुबान बोलतां कैयो कै ‘मरणै सूं जे लोटिया, तोपां को भै खाय/ तेगो तेरो करे म्यान में, पूठो घर नै जाय।’ मतलब ओ कै मर ज्याणां मंजूर पण मूल्य निभाणा लाजमी री आखड़ी डूंगजी छोडी कोनी। सगळा बंदियां री बेड़ियां काट्या पछै ई डूंगजी री बेड़ी कटी अर सगळा अेकै साथै बारै निकळ्या। इतरो ई नीं गुणपूजा अर कियोड़ै उपकार नैं सिर-आंख्यां राखण वाळै इण राजस्थानी लोक रो वीर डूंगजी जद आपरै गांव बठोठ पूग्यो तो डूंगजी री राणी वां नैं वधावण लागी। उण वेळां डूंगजी आपरै साथी लोटियै रै प्रति कृतज्ञता जाहिर करतां राणी नैं कैयो कै-

म्हानैं मतां बधावो राणी, वधावो लोट्यो जाट।
म्है आपै नहिं आया, म्हानैं ल्यायो लोट्यो जाट।।

इण राजस्थान री धरा रा लोग भलांईं धनवान नीं हुवै पण वां रो ईमान सदा ऊंचो रैयो है। ‘मरद तो जुबान बंका, कूख बंकी गौरियां’ री कैबत मुजब अठै रै मानखै में जुबान री कीमत मोटी रैयी है। अठै रै लोकजीवण में रिपिया-पीसां रै लेणदेण में इयांकली निकेवळी रीतां-पांतां रा उदाहरण मिलै कै लोग लेणदेण करतां लिखापढ़ी में लेणदार री जात-विशेष रो कोई चिह्न मांड देता, उणरै अंगूठै का हस्ताक्षरां री दरकार ई कोनी समझता। इणरै पाछै भी सोच आ ही कै व्यक्ति सूं उणरी जात-न्यात अर समाज बड़ो हुवै, आदमी आपरी तोहीन सहन कर सकै पण ‘गोत री गाळ कडूंबै लागै’ उणनैं सहणी दोरी हुवै। देणदार नैं भरोसो हो कै जे कदास बो आदमी नीत खराब करै तो उणरी जात-गोत उणनैं लाज-मरजाद री याद दिरावण सारू त्यार रैवै। अठै इयांकला उदाहरण मिलै कै वीर भड़ आपरी मूंछ रा बाळ अडाणै राख’र हजारां रिपिया उधार लेवता अर खुद सूं नीं चुकाईजता तो वां री पीढ़ियां आपरै बडेरां री मूंछ रै बाळ नैं छुडावण सारू हर संभव कोशिश करती। मारवाड़ रै जोधार बल्लू चांपावत रो प्रसंग इण बात रो जीवतो-जागतो उदाहरण है।

वि.स. 1701 में राव अमरसिंह राठौड़ वीरगति नैं प्राप्त हुयां पछै वीरवर बल्लू चांपावत अमरसिंह राठौड़ री सेना रै संगठन वास्तै आगरा रै अेक सेठ सूं पचास हजार रुपिया उधार लिया अर उणरै बदळै आपरी मूंछ रो अेक बाळ सेठां रै अडाणै मेल्यो। विधि रो विधान इसो हुयो कै बल्लू चांपावत वीरगति नैं प्राप्त हुग्यो। सेठां रा रुपिया बाकी रैयग्या। पण कई पीढियां बीत्यां पछै सेठां रो वंशज बल्लू चांपावत रै उत्तराधिकारी हरसोळाव रै ठाकुर सुरतानसिंह कनैं आय रुपिया अर मूंछ रै बाळ री बात बताई तो ठाकुर सुरतानसिंह तुरंत अेक लाख रुपिया री संपत्ति आदर साथै देय आपरै पूर्वज री मूंछ रो बाळ छुड़ायो। इण इतिहासू तथ्य री साख रो ओ दूहो लोक में आज ई प्रचलित है-

कमध बलू मुख केस, महिपत गैणे मेलियो।
सो लीधौ सुरतेस, अेक लाख द्रव आपियो।।
(राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन – डाॅ. शक्तिदान कविया, पृष्ठ 113)

रण अर मरण रा अनुरागी आं विलक्षण वीरां सारू तो आपरै कर्तव्य-पथ रो वरण ई जीवण रो ध्येय हुया करतो। इणीं परंपरा सूं अठै रै लोक में वीरां री पूजा हुवै, गांव-गांव में जुझारां, भोमियां अर लोक देवी-देवतावां री देवळियां इण बात री साख भरै कै जकां लोगां आपरै निजू स्वार्थ रो त्याग कर परमार्थ सारू काम कियो, वां नैं इण लोक में आज ई आदर्श मानै। मारणियैं री बजाय माफ करणियों मोटो मानीजै पण ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’ रै सीगै क्षमा रो अधिकार उणीं कनै मानीजै जको औगुण पर गुण करै अर मार सकै पण मारै कोनी। अेक दूहो देखो-

औगुण ऊपर गुण करै, दिल रो मेट दरद्द।
मार सकै, मारै नहीं, वा को नाम मरद्द।।

राजस्थानी लोक रो अेक निकेवळो मूल्य है स्यामधरम यानी स्वामिभक्ति। आपरै स्वामी रै प्रति वफादारी अठै रै मानखै री ओळखाण रैयी है। इतिहास इण बात रो गवाह है कै मुसळमानां अर मुगलां री सेना रा सेनापति हिंदू राजा रैया। वां आपरै स्वामी रै प्रति वफादारी निभावण सारू मरणो अंगेज लियो पण बात सूं फिरणो कोनी अंगेज्यो। आज ई आखै भारत में मारवाड़ी आदमी जको पूरो राजस्थान-वासियां सारू रूढ़ नाम हुग्यो री आपरी साख अर धाक कायम है। अठै रो मानखो मानै कै सैकड़ों सुक्रत्यां पर अेक स्यामधरम भारी पड़ै। इणरी साख भरतो कवि देवकरणजी बारठ (इंदोकली) रो ओ दूहो लोक री अमर संपत बणग्यो-

विधना अपणै हाथ सूं, तोलै सबै करम्म।
सौ सुक्रत इक पालड़ै, अेको सांम धरम्म।।

लोक इण बात नैं बराबर याद राखै कै मिनखा देही बार-बार कोनी मिलै। आदमी री उमर पल-पल छीजती जावै, आछा कामां सूं अमर हुवै अर माड़ा कामां सूं भूंडीजै । आखरी जावणो सगळां नै ई है। आज आपां बीत्योडां रै भूंडै अर भलै कामां री बातां करां जियां ई आवण वाळै दिनां में लोग आपणी बातां करसी। भक्तकवि ओपा आढा रा अै बोल कितरा सतोल है-

यूं ही करतां जावै ऊमर, पल में काल, परार क पौर।
आपैं बात करां अवरां री, (ज्यूं) आपां री करसी कोई और।।

राणियां तो घणी हुई पण का तो जौहर री झाळा अंगेजती पदमणी नैं लोक याद करै अर का पछै भगती री भागीरथी रो अवगाहन करण वाळी मीरां इण लोक री सांस-सांस में बसै। मीरां अर कबीर रा भजन-बाणियां लोक सारू जीवण रै संविधान रो काम करै। मीरां रै भजनां री ओळियां लोकोक्तियां रूप लोक नैं मूल्यां री सीख देवै। ‘लूण अलूणो ही सही अे अपणै पियाजी रो साग’ ‘छेल विराणो लाख को अे अपणै काम न होय/ताके संग सिधावतां अे भलो न कहसी कोय’ री बात नारी अर पुरुष दोनां सारू मूल्य निर्धारण रो काम करै। आपरै जीवण साथी पर भरोसो करणो अर उणसूं सामंजस्य बिठा’र चालणो जीवण री कसौटी मानीजै, उण पर खरा उतरणियां नैं ई लोक स्वीकारै।

लोकसाहित्य रो अेक हिस्सो लोकप्रवाद भी है। लोक में प्रचलित अे प्रवाद पण जीवनमूल्यां री ओळखाण करावै। आं प्रवादां री कथा घणी गंभीर अर शिष्ट-विशिष्ट नहीं होतां थकां भी आं रो संदेश अकरो नै सखरो हुवै। आजकालै छोटी-छोटी बातां खातर वैवाहिक-बंधन तटातट तूटता दिखै। इण बात री बरसां पैली मजाक-मजाक में सूचना देतो अेक प्रवाद है कै कोई सायधण आपरै मोट्यार रै नाम सूं खुश कोनी ही। उणरै पति रो नाम लटूरो हो जकै नैं लोग-बाग लटूरियो कैवता। बा आपरै मोट्यार नैं कैयो कै थारै नाम सूं म्हनैं तो सरम आवै, म्हारी मान’र थारो नाम बदळल्यो। लटूरियो बोल्यो नां, नाम तो है सो ई रैसी, बदळा-बदळी ताबै कोनी आवै। बा बोली तो पछै म्हैं मोट्यार बदळ सकूं पण लटूरियै री लुगाई कहीजतां म्हनैं तो घणी सरम आवै। लुगाई रूसगी अर अेक दूजै आदमी सूं ब्याव कर लियो, जकै रो नाम हो ‘अमरो’। नाम सूं खुश हुई पण भांवजोग री बात अमरो थोड़ै दिनां नै मरग्यो। बा लुगाई खासा दुखी हुई। सोच्यो अमरो तो अमर हुवै मर्यो कियां। खैर ! पछै बण अेक ‘सूरो’ यानी वीर नाम रै आदमी सूं ब्याव कर लियो। सूरवीर नाम सूं राजी। पण दो च्यार दिनां में सूर री पोल चोड़ै आयगी, छोटी-मोटी लड़ाई मंडी अर सूरो भाग छुट्यो। नाम रै प्रतिकूल आचरण देख बीं लुगाई नैं आपरै निर्णय पर घणो दुख हुयो। बा पाछी आपरै पैलड़ै मोट्यार लटूरियै कनैं आई अर माफी मांगती बोली कै जे उणनैं माफ कर सकै तो बा पाछी लटूरियै कनैं आवणी चावै। लटूरियो बोल्यो मैं तो भेजी ई कोनी ही अर म्हनैं ठा हो कै तूं पाछी आसी। बै पाछा साथै रैवण लाग्या। आ पूरी घटना इण तथ्य रो बोध करावै कै मोटै नामां में कीं कोनी पड़्यो, काम सखरा करणां चाईजै। राजस्थानी लोक में इण पूरी घटना री साख रो अेक दूहो जनकंठां में गूंजतो रैवै-

अमरा तो मरता देख्या, भागत देख्या सूरा।
आगे ते पीछा भला, नाम भला लै’टूरा।

मिनख री मूंगम तो उणरै काम सूं हुवै। ऊंचै कुळ में जलम लेय नीच करम करणियां नैं अठै रै लोक कदैई मान नीं दियो। इणरै उलट तथाकथित रूप सूं छोटी मानीजण वाळी जातियां में जनमियोड़ा संतां अर भगतां रै सनमान में पण लोक कदैई लारै नीं रैवै। अठै रै लोकगीतां अर डिंगळ गीतां में सामंतां रै अन्याय, अधर्म अर आचारहीनता री खुलै सबदां में निंदा करीजी है। कवि बुधजी आसिया आपरै समैं रै कुलीनवर्ग री नीच करतूतां रो खुलासो करतां साफ कैयो-

नीची तांण बुरै मुख नीलज, संगतां नीची नीच सभाव।
नीचां नाम घालवा नीलज, अवतरिया ऊंचै कुळ आय।।

राजस्थानी लोक सदा सूं गुणपूजा रो पखधर रैयो है। ओ ई कारण है कै जद-जद गुणवान लोगां री उपेक्षा हुई, उण-उण टेम लोक रै अंतस सूं ओळभै रा सुर आलाप लियो। मारवाड़ रै महाराजा तखतसिंह (सं. 1900 -1929 वि.) रै शासनकाल में विलासिता, व्यभिचार अर वारुणी-व्यसन रो भयंकर चाळो देख लोक रै कवियां उण राज नैं पोपांबोई रै राज री संज्ञा देवतां कवितावां लिखी। जथा-

गुळ खळ अेकण भाव गिणीजै, सूरा कायर सरखा।
मुरधर में पटरोळ मचाणी, पोपां वाळी परखा।।
साळू काज जिके नर सांप्रत, भालां भांजै भैंसा।
नरहर थोड़ा दीह निभासी, अनरथ रा मग अैसा।।

अठै रो रंगकाव्य इण लोक रै मूल्यां रो खुलासो करतो सखरो लोककाव्य है। इण लोक रै आदर्शां, अठै री परंपरावां अर अठै रै संस्कारां नैं माण देवणियां सूरां, वीरां, दातारां अर जूझारां रै जस नैं लोक रै हर उच्छब पर रंग दिरीजै।

सोढी छोडी बिलखती, माथै जस रो मोड़।
वणियो गायां वाहरू, रंग पाबू राठौड़।।
केळू सुत चढती कळा, भळहळ ऊगा भाण।
अमलां वेळां आपनैं, रंग मेहाजळ राण।।
भल कटार साजी भली, सुरियळ लीनी संग।
अमलां वेळां आपनैं, रोहड़ हरखा रंग।।
(गिरधर रतनू ‘दासोड़ी’ – सांस्कृतिक गौरव जगावतो रंग-काव्य)

‘सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात’ रै नीतिसम्मत वाक्य नैं निभावतां लोक भी काणै नैं काणो नीं कैवण री सीख देवै। ‘कैवै धीवड़ी अर समझै बहूड़ी’ री कैबत इणीं कारण चाली है। लोक रो अन्योक्ति काव्य मरजादा रै मंडण अर पाखंड रै खंडण री सखरी सीख देवै। सरवर, नदी, हंस, कोयल, मेंढक, मोर आद रै बहानै सूं मानखै नैं नीति-नियमां री निकेवळी सीख देवण री परापरी रीत लोक में मिलै। लोकसाहित्य रा कीं दूहा उदाहरण रूप प्रस्तुत है-

तोड़ नदी मत तीर तूं, जे जळ खारो थाय।
पांणी वहसी च्यार दिन, अवगुण जुगां न जाय।।
सरवर! हंस मनायलै, नैड़ा थका बहोड़।
ज्यां बैठां रळियावणो, त्यां सूं तान न तोड़।।
सुण समदर सौ जोजना, लीक छोड़ मत जाय।
छोटा छीलर ऊझळै, तैं घर रीत न आह।।

जंगळ री आग में बळतै चंदण रै बड़लै हंस नै कैयो रै बड़ला म्है तो इण आग में बळण सारू मजबूर हां क्योंकै उड़ नी सकां पण तूं पांख्यां थकां म्हांरै साथै क्यूं बळै ? हंस रो जवाब कितरो सांतरो अर सोवणो है-

पांन विधूंस्या रस पियो, सुख पायो इण डाळ।
थे जळो र म्हे उड चलां, जीणो कितेक काळ।।

कियोड़ै उपगार नैं नीं भूलण री सीख देवता लोक रा अे दूहा खास पढणजोग है-

माळी ग्रीखम मांय, पोख घणो द्रुम पाळियो।
जिणरो जस किम जाय, अत घण बूठां ही अजा।।
जळ न डूबोवै काठ नैं, कहो कदूणी प्रीत।
अपणो सींच्यो जांण के, अेह बड़ां की रीत।।
डिगै मती रे तरवरा ! मन में रहे सधीर।
पाव पलक रो बैठणो, घड़ी पलक रो सीर।।

लोकसाहित्य में किणी समाज रो प्रकृत, पवित्र अर प्रशस्त रूप मिलै। जीवण रै थोथे आदर्शां सूं अळगी रैय फगत अंतस रै भावां री सामूहिक अर सहज अभिव्यक्ति ही लोकसाहित्य री श्रेष्ठता अर सरलता रो कारण है। किणी समाज रै शाश्वत अर समसामयिक जीवनमूल्यां रो बोध उणरै लोकसाहित्य री विविध विधावां में सहजता सूं हुवै। लोकसाहित्य री अेक विधा लोकोक्ति है। लोक में इयांकली घणी उक्तियां मिलै जकी उण लोक रै मानखै री आंतरिक प्रवृत्तियां री वाचक हुवै। राजस्थानी लोक रो अेक मूल्य है कै आपरी कुळ परंपरा रै विपरीत आचरण सूं मरण नैं आछो मानीजै। इण सारू लोकोक्तियां प्रचलित है कै- मर ज्याणां मंजूर पण दूध र दळिया नीं खाणा, भूखो व्है कितरो तऊ, सिंघ घास नहीं खाय, प्राण जात पर प्रण न जाय आद। अेक अन्योक्तिपरक दूहो देखो-

हंसा ! विरद विचारलै, चुगै तो मोती चुग्ग।
नींतर करणा लंघणा, जीणो कितेक जुग्ग।।

अठै री लोककथावां रा कथानक अर कथानायकां रा चरित्र कदम कदम पर मूल्यां री रक्षा सारू अड़ता निगै आवै। अठै री वातां-ख्यातां सब रै मूळ में राजस्थानी मूल्य आपरी निकेवळी छिब में दीपायमान मिलै। अंत में निष्कर्ष रूप आ ई बात है कै लोकसाहित्य री सहजता अर सरलता नैं समझण सारू लोक री आत्मा में वास करण री दरकार है, अति बौद्धिकता, चमत्कारिकता अर पांडित्यप्रियता वाळा लोगां सारू लोक रै मर्म नैं समझणो घणो अबखो काम है।

~~डाॅ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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