कविता की संजीवनी और राणा सांगा

वीर महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) के झंडे के नीचे सारे राजस्थान के वीर बाबर से युद्ध करने के लिए जुटे थे। युद्ध के मैदान में पूरी वीरता से देर तक लड़ते लड़ते घायल राणाजी को अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मूर्छा आ गयी। राणा को अचेत अवस्था में देखकर उनका महावत सावधानी से राणाजी के हाथी को युद्ध क्षेत्र से भगा ले गया। होश आते ही राणाजी को अपनी हार का पता चला तो वे क्रोध में पागल से हो गए। हारने की व युद्ध क्षेत्र छोड़ने की लज्जा ने उनको पूरी तरह से तोड़ दिया। युद्ध में उनका एक हाथ कट गया, एक पांव बेकार हो गया, एक आँख जाती रही। शरीर पर अस्सी घाव लगने के बावजूद उनको जीते जी युद्ध क्षेत्र छोड़ कर वापस लौटने वाली बात इतनी लज्जाजनक लगी कि उन्हें अपने जीवन से ही निराशा हो गयी। उन्होंने अपने आप को मरा हुआ मान लिया। अब किसी काम काज, खाने पीने इत्यादि में उनका मन नहीं लगता था। यहाँ तक कि उन्होंने लोगों से मिलना जुलना भी बंद कर दिया। महाराणा की यह मानसिक दशा देख हरिदास महियारिया नाम के एक चारण कवि से रहा नहीं गया। उन्होंने डिंगल में निम्न गीत रच कर राणाजी को सुनाया।

गीत
सतबार जरासंघ आगल श्री रंग,
विमुहा टीकम दीधा जंग।
मैलि घात और मधु सूदन।
असुर घात नांखै अलग।।1।।
पारथ हेकरसां हथणांपर,
हटियो त्रिया पडंता हाथ।
देख जकां दुरजोधण दीधी।
पछै तकां कीधी सज पाथ।।2।।
हेकर राम तणी तिय रावण,
मंद हरै गो दहकमल।
टीकम सो हिज पत्थर तारिया।
जगनायक ऊपरां जल।।3।।
एक राड़ भव मांह अवत्थी,
अमरख आंणै केम उर।
मालमां कैया त्रण मांगा।
सांगा तू साले असुर।।4।।
कृष्ण भगवान को जरासंध ने सात बार हराया परन्तु आखिर में वे जरासंध को मार कर ही माने। दुर्योधन द्वारा द्रोपदी के चीर हरण के दौरान समय विपरीत जान शूरवीर पांडव भी अपना मस्तक नीचे करके बैठे रहे परन्तु अवसर मिलते ही उन्होंने दुर्योधन का वध किया। भगवान राम की सीता को भी एक बार तो रावण ले ही गया था परन्तु वे इस दुःख से निराश हकर बैठ नहीं गए। रामजी पानी पर पत्थर तैरा कर रावण का अंत करके सीता को वापस लेकर आये। अतः हे सांगा राणा ! पूरी उम्र में सिर्फ एक युद्ध हार कर तू क्यों अफ़सोस कर रहा है। बाबर के कलेजे में सांगा का नाम आज भी भय पैदा करता है। उठ, शर्माता क्यों है ? युद्ध कर।

इस गीत ने राणाजी के कलेजे पे जैसे संजीवनी बूंटी का काम किया। सुनते सुनते ही राणा के रोम रोम में रोमांच आ गया और वे पूर्ण जोश के साथ वापस उठ खड़े हुए। हाथ सीधा मूछों पे गया और राणा ने उसी समय प्रण किया कि जब तक बाबर को हरा नहीं दूंगा तब तक चित्तोड़ में पांव नहीं रखूँगा। नया उत्साह, नया जीवन देने वाले चारण कवि को राणा ने उसी समय बकाण नामक  गांव देकर सम्मानित किया।

राणा सांगा पूर्ण उत्साह से दूसरे युद्ध की तैयारी में जुट गए परन्तु समय को कुछ ओर ही मंज़ूर था। युद्ध से डरने वाले कायर देश द्रोहियों ने उनको धोखे से जहर देकर मार दिया।

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