रंग रै बादरिया

जोधपुर माथै महाराजा मानसिंहजी रो राज। मारवाड़ मोटी रियासत ही सो सीमावां री चौकस निगै राखणो आंझो काम हो, क्यूंकै मानसिंहजी रो घणकरोक बखत दोघड़चिंता अर आपरां सूं ई इज सल़टण अर खसण में बीतो।

आदमी दूजां सूं जोरदार राटक बजाय सकै पण घर रां सूं सल़टणो अबखो काम हुवै। भाई खाली बेटी नीं परणीजै बाकी वै सगल़ा थोक करै जिणसूं आदमी चिंता अर रीस री झाल़ में झुसल़ीजतो रैवै।

कविवर करमाणदजी मीसण सही ई कह्यो है कै संप जैड़ी कोई बीजी चीज नीं है। जे संप नीं है, मनां में तेड़ां है तो लंप जैड़ो कमजोर घास ई भाखर रो माथो भांग आपरी जड़ां लोप लैवै-

करमाणद आणद कहै, सबसूं प्यारो संप।
राय पड़ै सिर पत्थरां, जद जड़ लोपै लंप।।

ओ ई कारण हो कै मारवाड़ री सिंध सूं लागती सीम सूनी ही सो इणरो जाबतो करण सारू केई सिरदार महाराजा नै कैता अर आपरै भुजावां री दुहाई देता कै-
“सीम रुखाल़ण रो काम म्हांनै दियो जावै क्यूंकै फायदो उठाय’र सिंध रा सराई, राजड़, बलोच, आद जातरा मुसलमान मारवाड़ में धाड़ो करै अर परजा नै लूटै।”

एक दिन दरबार लागोड़ो हो। महाराजा पूछ्यो-
“कै लो किसो सिरदार आप मतै हुय ओ बीड़ो उठावै कै वो सिराइयां-राजड़ां, बलोचां नै सर करसी?”

किणी माई रै लाल कान ई ऊंचो नीं कियो।

महाराजा खराय’र एक’र पाछो सभा कानी जोयो तो कुड़की रा ठाकुर बहादरसिंह चांदावत, उठ्या अर किसनदासजी छींपा रै इण सोरठै नै सार्थकता दी-

हाटां में हथियार, सिकलीगर राखै सदा।
भारथ पड़ियां भार, कोयक बांधै किसनिया।।

महाराजा नै ई बहादरसिंह री बहादुरी माथै पतियारो हो। उवै जाणता कै खाकां पिदावणिया अर चूल्है माथै आपरी वीरता रा बखाण करणिया वीर नीं हुवै, क्यूंकै गाजणिया बादल़ मेह नी कर सकै तो भुसणियो कुत्तो खा नीं सकै-

बोह बकणा भड़ नांम रै, चौड़ै खाग बजाय।
गाजण मेह न वरसणा, भूसण कुत्ता न खाय।।

महाराजा घणै धीजै साथै बहादरसिंह नै सीम रुखाल़ण अर पूरो जाबतो करण रा सराजाम दे गीराब हाकम बणाय बहीर हुवण रो हुकम दियो।

बहादुरसिंह आपरै पांच सौ मेड़तियै सिरदारां साथै मुसल़मानां री लूटखसोट रोकण री धार-विचार बहीर हुया। किणी कवि कह्यो ई है-

मेड़तिया नह जांणै मुड़णो,
भिड़णो ई इज जांणै भाराथ।।

उल्लेख्य है कै आं महाराजा ई इज देवीदासजी चांदावत रै बेटे बहादुरसिंह नै वि. सं. 1872 में कुड़की री जागीर दी।
बहादुरसिंह जैड़ो नाम, उणगत रा इज गुण सो सिराई, राजड़ां आद लूटेरां रा कूट-कूट ‘र पाठा काढ दिया। कह्यो जावै कै वै इण सिराइयां नै पकड़’र एक खेजड़ै सूं बांधर कूटता सो उवो खेजड़ो आज ई बादरसिंघ वाल़ो खेजड़ो बाजै। बादरसिंह रै नाम रो सिराइयां में भय बैठग्यो सो कोई मारवाड़ कानी मूंडो ई नीं करतो।

शांति वापरगी।

पण जिणांरै मूंडै हराम लाग जावै अर जिकै लोकां रा घर लूट-लूट’र गुलछरा उडावै उवां सूं रहीजै नीं। एकदिन सिराई आपरै गांम में बैठा हा। प्रभात रो समय हो। उणां मांय सूं एक खावणखंडी डोकरी जिकी नै लेय’र आ मानता ही कै उणरै सुपनै में पंच पीर आवै अर उणनै जिकी ई बात बतावै उवा सही ढूकै। जणै एक मोटयार उण डोकरी नै पूछ्यो कै-
“खेरी माई केह खौफ (स्वपन) लधो?”

डोकरी बोली कै-
“डीकरां! मुखै (म्हनै) खौफ लधौ (आया है) आहे बाहदरो काफर मरी व्यो। जाओ माल लुट्टो न खावो।”
यानी म्हनै सुपनो आयो है कै काफिर बहादुर मरग्यो।

छोरां कह्यो कै-
“अमा ! बहादरो मराणो तो की थ्यो बीजो कोई होसै?”

डोकरी रै परायै माल सारू दाड़ां झुल़ण लागी वा होठ मुल़मुल़ावती बोली कै–
“धाड़ो पो करो। बाहदरो माराणो पो तो पछे केहड़ो (कौनसा) बीह (भय)”

छोरा ई पराए माल माथै मौज उडावणिया हा, सो आपरै आयलां-भायलां नै भेल़ा कर’र बहीर हुया अर आधीक रात रा मारवाड़ रै किणी गांम माथै राटकर पड़्या। पण जिकां रा दिनमान पौचा हुवै उणांरो बैली खुदा ई नीं हुवै। ज्यूं जीव रै दोला जमराज चकारा देवै ज्यूं ई इज लूटेरां माथै काल़ रूप फिरता बहादुरसिंह आ पड़्या।

सिराइयां नै च्यारां कानी सूं घेर’र कूट कूट’र ऊगटा काढ दिया। च्यार-पांचेक रा दिनमान ठीक हा सो उवै घोड़ां कनै चौकस इण उडीक में ऊभा हा कै ज्यूं ई माल खोसर लावैला अर त्यूं इज घोड़ां नै पाछा गांम कानी तपड़कावांला। जितै उणांनै कूकारोल़ो सुणीज्यो। उणां मांय सूं एक-दो कानसारो दियो तो आप वाल़ा बैली कूकता सुणीजै हा। आप मरतां बाप किणनै याद आवै। उवै तो घोड़ा चढ पड़ छूटा जिको दिन आपरै गांम में जावतां उगायो।

उठै आगै धूंई माथै उवा डोकरी अर बीजा दो च्यार बूढिया तपै हा जितै घोड़ां री पोड़ां सुणीजी। उण डोकरड़ी जोयो तो दो च्यार घुड़सवार एकी ढाण आवै हा। उणांनै देखर उवा बोली-
“हलै भणां माड़ू छाना नीं रैवै। की करै बहादरो ? ऐ आया उवै री आंख्यां में धूड़ न्हांखै।”

जितै घोड़ियां वाल़ा धूंई नैड़ा आय उतरिया।

उवांनै देखतां ई डोकरड़ी बोली-
“धाड़ेतियां आया रा! तो दयो उथल़ा (वहां के) समिचार (खबर) ?
अपणा डिकरा (बेटा) किथ (कहां) है, धाड़ो केहड़ो रयो की थ्यो? (हुआ) माल बीजो की लेह आया?”
सगल़ी बातां डोकरड़़ी एक ई सास में पूछगी।

आयोड़ां फूंकारो खावतां अर रीसां बल़तां कह्यो कै-
“अमा! तुंह कूड़ी पड़ी, अपणा मड़द (मर्द) बिचारा मारिज्या!”

मरणियां में डोकरड़ी रा एक-दो छोरा ई भेल़ा हा। उवा रीसां बल़ती बोली कै-
“तेयाल़ा (तुम्हारे) भाई माराणा तो तुंह ए मरंत पछो जिहतो (जीवित) केनां (किसलिए) आयो?”
तो ई डोकरी जीव नै थावस देयर पूछ्यो कै
“मराणा जिको तो मराणा, थे माल बीजो की लेह आया?”

छोरां कह्यो-
“अमा काली (पागल) पी थई ! ऊएरो (उसका) नांह (नाम) बाहदरो है, ऊऐ नां जिणण आल़ी न अंसा नांह (हमक़ो) जिणण आली मा मींह (में) फर्क है।”

डोकरी ई अपणैआप नै मरद लुगाई मानती। ढाणी-ढपाण्यां री दो च्यार लुगायां उवै रै ई कूट्योड़ी ही सो उवा बोली कै-
“की फर्क है ऊऐ मींह न म्हें मींह?”1
लख लाण (लानत) है तिना (तुमको), तैंह मेयाल़ो (मेरा) दुध पो लजोयो (शर्मिंदा किया)
ऊऐ बाहदरे मींह कया (कौनसे) बै (दो) सास (जीव) हता (थे)
की फर्क है ऊऐ नां जिणण मींह न म्हें मींह?”

एक बोछरड़ै छोरड़ै धूंई रै ठोकर लगाय खीरा उछाल़्या सो एक खीरो डोकरड़ी री साथल़ (जंघा) माथै जाय पड़्यो। खीरो पड़तां ई डोकरी उछल़ी अर छोरै साम्हो खारी मीट सूं जोयो तो छोरै कह्यो-
“तेंह में आन (और) उवै नां जिणण आल़ी मींह ऐ फर्क है कै तैंयाल़ै हेक टांढो (अंगार) चिहड़यो (चिपा) है तुंह तबड़का (फदाकें) ती कढै जाणे तीन बरसां री तोड (जवान मादा ऊंठनी) कढै जिंह आन बाहदरे रो बाप खुट्टो (स्वर्गवासी हुआ) जदै ऊऐ री माँ ऊए भेल़ी बल़ी ती।
तेयांल़ै गल़ाई (तरह) घरघरणे (पुनर्विवाह) को जाए!”

आ वारता सुण पाखती बैठै किणी डोकरियै कह्यो-
“महायदी (मादरखोर) माड़ु (मिनख) सहे (सब) मराऐ छड्या”

बहादुरसिंहजी री वीरता रा घणा किस्सा है। धूड़सार रा रचयिता उदयराजजी लिखै-

बादरियै बबरेल, मुरधर ढाबी मारकै।
खाग बलोचां खेल, कुड़की बेड़ी कारणै।।

आज ई मांगल़िक टांणै हुवण वाल़ी रैयांण में इण सूरमै नै रंग दीरिजै। दीरिजणो ई है क्यूंकै किणी कवि है कह्यो है कै किणी मूर्ख, गादड़ियै रै जोड़ कायर अर कापुरस नै रंग नीं दैणो, रंग तो सूरां-पूरां नै दैणो-

नहीं गंवारां गादड़ां, कायर कापुरसांह।
रंग अणी रा रावतां, सूरां सापुरसांह।।

बहादुरसिंह चांदावत मरट अर ठरकै वाल़ा ठाकुर हा सो रैयांण में कवेसर घणै गुमेज सागै बहादुरसिंह अर उणांरै बैल्यां नै रंग देता दूहा पढै-

रंग रे बादरियाह, पाधरिया कीना पिसण।
अधपत आदरियाह, दाल़ धरा री दैण नै।।
घोड़ां रजपूतां घसण, तोड़ा धुक ताठौड़।
दौड़ा मुरधर देश रा, रंग खोड़ा राठौड़।।
कुड़की हंदां कांगरां, जामगियां जगमग्ग।
बैल्यां बादरसिंघ रां, (थांनै) रूक लड़ाकां रंग।।

आखी मारवाड़ में बहादुरसिंह कुड़की रै नाम सूं हिरण बांडा हुवता। मुसल़मानां सूं मुकाबलै में उणां रो एक गोडो स्थाई रूप सूं कजरायल हुयग्यो हो सो उवै खोड़ावता। खोड़ावण रै कारण ‘खोड़ा-राठौड़’ रै नाम सूं चावा है।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

One comment

  • लोकपाल रोहड़िया

    डिंगल व राजस्थानी की लोकलुभावन लोकोक्तियों,करिश्माई कहावतो,मोहक मुहावरों और काव्यात्मक दृष्टांतों से सजी संवाद शैली उक्त ऐतिहासिक आख्यान में चार चाँद लगा देती है ;पाठक मंत्रमुग्ध से एक साँस गिरधरी लेखन को अपनी नजरों पीने के प्रयास में लगे रहते है ! हैरत तो यह है कि ऐसा इनके प्रत्येक ‘बात’ आख्यान के साथ होता है ! इस अनूठे साहितकार को लखोलख दाद ! आत्मिक अभिनंदन !…लोकपाल रोहड़िया

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