🌺रंग रे दोहा रंग🌺 – 🌻रंग बसंत🌻

बसंत का हमारे देश में बडा ही महत्व है। बसंत रूत में प्रकृति नवपल्लवित हो उठती है। रंग बिरंगे फूलों से वातावरण मादक हो जाता है। किंशुक, पलाश के लाल फूल पहाडियों पर बडे ही मन भावन लगते है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने प्रकृति को गेरूए रंग में रंग दिया हो। बसंत पंचमी से होली तक लगातार बसंतोत्सव मनाया जाता है। फागुन तक अनवरत चलता यह महोत्सव भारतीयों के जीवन में घुल मिल गया है।

बसंतोत्सव मनाने के संदर्भ हमें संस्कृत साहित्य से लेकर राजस्थानी की प्राचीन कविताओं में मिलते है। मृच्छकटिकम नाटक में एक गरीब ब्राह्मण चारुदत्त और एक गणिका बसंतसेना के प्रेम का वर्णन किया गया है। इसमें बसंतोत्सव का शानदार चित्रण नाटककार छुद्रक ने किया है। महाकवि कालिदास नें भी अपने काव्य ऋतुसंहार में अन्य ऋतुऔं के साथ साथ बसंत ऋतु का बडा ही अद्भुत वर्णन किया है। राजस्थानी की एक प्राचीन कविता शैली हुआ करती थी जिसे “फागु” कहा जाता था। ऐसी ही एक प्राचीन कृति का नाम “बसंत विलास” है। आज भी बसंत के आगमन पर राजस्थान में फाग गाने बजाने की परंपरा है। बसंत के वैभव का महत्व इस बात से जाना जाता है कि संस्कृत में चौदह वर्ण वाले एक छंद का नाम ही वसंततिलका है। वैसे भारत में प्रेम काव्य हर ऋतु से संबंधित कविता में मिल जाएगा फिर भी बसंत में प्रेम परवान पर होता है। मेरा कहने का मतलब है कि पश्चिमी देशों में प्रेम के लिए जैसे एक ही दिन वेलेंटाइन डे मुकर्रर है बिलकुल उसके विपरीत भारतीय सभ्यता और संस्कृति में पले पनपे लोग प्रेम को पल पल जीते है। हर क्षण, हर दिन, हर साल भारतीय जनमानस प्रेम के रंग में रंगा रहता है। आज मेरी भी कोशिश है कि चलो हम बसंत के बहाने प्रेम के रंग में रंग जाए।

प्रेमी मन केसर कुसुम, सुरत नीर को संग।
ज्यों ज्यों अवटे व्रह अगनि, त्यों त्यों निकसे रंग।।

प्रेमी का मन केसर के पुष्प की भांति होता है जब वह सुरत यानी कि याद के नीर में मिलकर विरहाग्नि की गर्म आँच से जैसे जैसे तपता जाता है तब तब उसमें से और रंग निकलता जाता है।

जैसे निर्मल होत है, कनक अनल के संग।
तैसे प्रेमी विरह बल, चढे सुरत को रंग।।

जैसे सोना अग्नि का स्पर्श पाकर निर्मल हो जाता है, और निखर जाता है, ठीक वैसे ही प्रेमी जब विरह की अग्नि में जलता तब उस पर सुरत (याद) का रंग चढ जाता है।

और रंग उतरें सबै, ज्यों दिन बीतत जाय।
बिरह प्रेम बूटा रचें, दिन दिन बढत सवाय।।

संसार के समस्त रंग धुल सकते है, मिट सकते है या मैले भी हो सकते है। कोई रंग शाश्वत नहीं है। जैसे जैसे समय व्यतीत होता जाता है सब रंग फीके पड सकते है या उतर सकते है। परंतु विरह प्रेम के बुटे से रचित रंग समय व्यतीत होनें पर सवाया निखरता ही जाता रहता है।

कबीर साहब का यह दोहा देखें।

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गइ लाल।।

रात दिवस मन माहरौ, रातौ धारै रंग।
और रंग लागै नहीं, काल़े कंबल़ संग।।

मेरा मन रात दिन लाल रंग ही धरे रहता है अब और रंग इस पर नहीं लग सकता। ठीक उसी प्रकार जैसे काले कंबल पर कोई और रंग नहीं चढता।

केसर को रंग जरद है, चूनै को रंग सेत।
दोन्यूं मिल़ लाली करै, ऐसो राखो हेत।।

केसर का रंग पीला होता है और चुने का रंग सफेद होता है। जब दोनों एक दूसरे में घुल मिल जाते है तो लाल रंग में परिवर्तित हो जाते है। हमें आपस में एक दूसरे से परस्पर ऐसे प्यार रखना चाहिए।

फागण मास बसंत रित, सुण भोगी भरतार।
परदेसां री चाकरी, जावै कवण गमार।।

नायिका कहती है “एक तो फागुन का महिना चल रहा है और संग संग बसंत ऋतु का आगमन हो गया है। प्रेम करने की इस ऋतु में परदेस की चाकरी के लिए कौन गँवार है जो जाएगा?”

फागण आयौ साह्यबा, घर घर उच्छब फाग।
राज कँवर रंग रस रमै, लायक घण गल़ लाग।।

हे प्रियतम फागुन का आगमन हो चुका है। घर घर फाग गाए जा रहे है और उत्सव मनाया जा रहा है। हे राजकुमार आप अपनी प्यारी प्रियतमा के गले मिल रसरंग खेलो।

मेरा भी एक दोहा देखें

सखी! अमीणौ साह्यबौ, गहरौ लाल गुलाल।
फागण जिम घण फूटरौ, करतो लालम लाल।।

हे सखी मेरा प्रियतम लाल गुलाल की तरह गहरा है। जो फागुन की तरह मुझे लाल लाल कर देता है।

फागण मास, बसंत रित, नव तरुणी नव नेह।
कहै सखी कैसे वणै, च्यार अगन इक गेह।।

एक तो फागुन का महिना, उस पर बसंत ऋतु में नव तरूणी प्रियतमा और नया नया प्रेम। हे सखी यह कैसे संभव है कि चारों अग्नि एक साथ साथ रहे।

मातो जोबन, फाग रुत, प्रेम पियारा दूर।
रल़ी न पूजै जीव री, मरूं बिसूर बिसूर।।

यौवन मदमस्त है, साथ में फागुन का मौसम है और उस पर नायिका का प्रियतम उस से दूर है। नायिका को कुछ नहीं सुझ रहा रहा है। और प्रियतम को याद कर कर के मर रही है।

प्रियतम की अनुपस्थिति में बसंत भी बैरन लगती है प्रेमीजनों को।

तरत झरत सूकत सरत, दादर मरत दुरंत।
पीतम घर नह पेखतां, बैरण बणी बसंत।।

लाज पाज दधि लोपियो, वण रतिराज वसंत।
नर तरवर धर मोरिया, एता मद चूवंत।।

लाज रूपी समुद्रके तट को रतिराज बसत ने लांघ दिया है। मनुष्य, वृक्ष, धरती और मोर मदमस्त हो गये है।

कोडामणि कू कू करै, कोयल आंबा डाल़।
तरवर नव पल्लव धरे, मधुकर मणि री माल़।।

आनंदित होकर कोयल आम की शाखाओं पर कू कू कर रही है। तरूवर नें नव पल्लव धारण कर लिए है और ऊनपर गूंजन करते भँवरे माला की मणियों की भाँति लग रहे है।

अगर गुलाल उछाल़ जल़, केसर हौद छलाय।
अनुरागण नें आव पिव, फागण फाग रमाय।।

अबीर गुलाल का जल फैक कर, केसर के हौज में फागुन का फाग गाकर. और प्रेम करके हे प्रियतम मेरे साथ फागुन खेलो।

रहौ सधीरा राजवण, नैण न नांखौ नीर।
रंगौ मत इण रंग में, चंगौ म्हारौ चीर।।

हे प्रियतम आप धीरज धरो आँखों में पानी मत छिडको। इस तरह रंगों में मेरे सुंदर चीर को मत रंगो।

सौ मण तो केसर उडी, सौ दस उडी गुलाल।
बूबन हंदा महल में, रातूं रम्यौ जलाल।।

सौ मन केसर उड़ाई गई और सौ दस मन गुलाल बिखेरा गया। बूबना के महल में रात को जलाल ने प्रेम की खुब होली खेली।

पांन झड्या सै रूंख रा, गयी वेल सब सूख।
दूभर रीतु बसंत की, गया पियारा मूक।।

सभी वृक्षों के पत्ते झड़ गये है। सारी बेलें सूख गई है। वसंत की ऋतु अब दूभर हो गई है क्योंकि प्रियतम मुझे छोडकर परदेश चले गये है।

काची तौ नारी भली, तातौ भलौ तुरंग।
उण कसियां उण भीड़िया, दूणौ दूणौ रंग।।

नारी मुग्धावस्था वाली सुंदर और अश्व बढिया अच्छा रहता है। एक को कसने से और दूसरे को आलिंगन करने से रंग दूगुना हो जाता है।

नेह घणै बोली निसा, सुख सूं जिण रे संग।
ऊ मन वस्यौ न ऊतरे, रंग भीनी रो रंग।।

प्रेम पूर्वक रातभर जिस प्रेमी के साथ रंगभीनी नायिका ने वार्तालाप किया हो उसका रंग उस प्रेमी के मन से उस रंगभीनी नायिका का रंग कैसे उतर सकता है।

प्रियतम का खयाल जेहन में आते ही दुनिया अबीर ओर गुलाल के रंग से भर जाती है। मेरे शब्दों में कहूं तो

जब जब आया जहन में, उनका मुझे खयाल।
कागज पर गिरने लगा, कुम कुम और गुलाल।।

ठीक उसके विपरीत प्रियतम की अनुपस्थिति में रंगों भरी दुनिया भी बेरंग और बेज़ान जान पडती है।

सजन वौल़ावै हूं खड़ी, ऊभ बजारां मझ्झ।
लाख घरां री वसतडी, लगै बिरंगी अज्ज।।

नायिका प्रियतम को बिदाई करा कर अभी अभी लौटी है। वह कहती है “साजन को विदेश गमन हेतु बिदा करने के उपरान्त में बाजार में खडी हूं पर आज उनकी अनुपस्थिति की वजह से शहर की लाखों की बस्ती विरान और बेरंग लग रही है।”

~~नरपत आसिया “वैतालिक”
डी-404,
श्री धर सेच्युरी,
सीटी पल्स सिनेमा रोड,
बी ए पी एस गर्ल्स स्कूल के पास
रांदेसन, गांधीनगर, गुजरात।

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