🌺रंग रे दोहा रंग – हंस और बगुला🌺

हंस लोक साहित्य में प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। कुछ हंस और सरोवर के संवाद के है, कुछ काग और हंस की तुलनात्मकता के है, कुछ में हंस और तरूवर या पेड़ का संवाद है कुछ में हंस और बगुले का संवाद इत्यादि है। हंस और बगुला दोनों ही श्वेत होते हैं, पर हंस तो गुणग्राही और सज्जन होता है जबकि बगुला कुटिल, शठ होता है।

गुसाई जी ने अपने महाकाव्य रामकथा को “रामचरितमानस” नाम देकर राम के चरित को मानसरोवर का रूपक देकर अप्रत्यक्ष रूप से पाठक और श्रोताऔं को एक गुणी मराल (हंस) के रूप में महिमान्वित किया है।

“मानस का हंस” सुविख्यात लेखक अमृतलाल नागर का व्यापक प्रतिष्ठित बृहद हिंदी उपन्यास है जिसे गौस्वामी तुलसीदास के जीवन को आधार बनाकर रचा गया है। इस उपन्यास में गुसाईजी का जो चरित्र चित्रण किया गया है वह सहज मानवीय है। यह उपन्यास हिन्दी के क्लासीकल उपन्यासों में शुमार है और हिन्दी साहित्य के मानसरोवर का एक अप्रतिम मौक्तिक है।

हंस और मानसरोवर का लोभ संवरण करने से ज्यादातर साहित्यकार खुदको रोक नहीं पाए है। आज मैं भी हंस, सरोवर, तरूवर और बगुला आदि पात्र/प्रतीकों से रचे गढे पुराने कवियों के कतिपय दोहे रूपी मौक्तिक आप सभी गुणीजन-पाठक-मराल के लिए राजस्थानी साहित्य/लोक साहित्य के मानसरोवर से चुन चुन कर प्रस्तुत कर रहा हूं।

सुण समदर सौ जोजना, लीक छोड़ मत जाह।
छोटा छीलर ऊझल़ै, तै घर रीत न आह।।
हे! सौ योजन तक फैले समुद्र तू अपनी सीमा मत लांघ। अपनी लीक से आगे मत जा। छोटे पोखर तालाब ही छलकते है क्योंकि वह अधूरे है। छलकना तुम्हारा स्वभाव नहीं। घर तुम्हारे घर की रीति या परंपरा नहीं है।

हीलोल़ा दरियाव रा, झाझा हंस सहंत।
बुगला कायर बापड़ा, पहली लहर पुल़ंत।।
समंदर की अनगिनत लहरें तो हंस ही झेल सकता है। बगुले जैसे कायर तो पहली लहर में ही धराशायी हो जाते है। यह बगुलों के बस की बात नहीं है।

हूंती मोटी आस, सायर झीलेवा तणी।
हंसा भया निरास, बग देख्या जद डोलता।।
मन में हंस को बहुत ही बडी आशा थी कि वह मानसरोवर में जाकर स्नान करे। पर जब वह वहाँ पहुँचा तो वहाँ का माहौल देखकर बडा ही निराश हुआ, जब उसने मानसरोवर में बगुलों को डोलते हुए देखा।

मान सरोवर मांय, बग मराल़ भेल़ा वसै।
खाज आपणौ खाय, भाग प्रमाणै भेरिया।।
कवि भैरिया नाम के व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहता है “हे भैरिया मानसरोवर के जल में हंस और मराल दोनों रहते है। दोनों अपने अपने भाग्य के अनुरूप जीवनयापन करते है। अर्थात् हंस मोती का चारा चुगता है जबकि बगुला मछली खाकर जीवन निर्वहन करता है।”

संत कवि दादूदयाल जी इसी भाव को अपने दोहों के माध्यम से कुछ यूं बयां करते है।

दादु हंस मोती चुगै, मान सरोवर न्हाय।
फिर फिर कैसे बापडा, काग करंका माय।
हे दादू! हंस तो मानसरोवर में मोती का चारा चुगता है और उसके शुद्ध जल से स्नान करता है तो फिर यह बेचारा कौऔ के बीच कैसे?

दादु हंस मोती चुगै, मान सरोवर न्हाय।
बुगला छीलर बापड़ा, चुण चुण माछी खाय।।
हे दादू! हंस तो मानसरोवर में सदैव मोती चुगता रहता है और शुद्ध जल से स्नान करता रहता है। जबकि बेचारा बगुला छोटे तालाब/पोखर से मछलीयां मार कर खाता रहता है।

मान सरोवर मांय, सीपां रा मोती चुगै।
नाडा बुगला न्हाय, महण घटै न मोतिया।।
तो कवि मोतिया नामधारी शख्स को संबोधित करते हुए कहता है। हे मोतिया!मानरोवर में हंस सीप से मोती चुगता है। छोटे नाडे या तालाब, पोखर में बुगला नहाता रहता है। उन दोनों के क्रिया कलापों से समुद्रमें पानी थोडी घटता है?अर्थात् नही घटता है।

सरोवर सूख गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि हंसों का संपोषक संवर्धक आज इस हालत में नहीं की उन की मान मनुहार और आवाभगत या स्वागत शुश्रुषा कर सके। कवि जब यह दृष्य देखता है तो कहे बिना नहीं रहता। कवि के शब्दों मे

सरवर वै इज हे सखी!, हंसा करत हुलास।
कड़खा कुंजर डूबता, (जठै)पंछी मरै पियास।।
अरी सखी!सरोवर तो वही है जहाँ हंस हमेशा आनंद प्रमोद किया करते थे, जहाँ बड़े बड़े हाथी पानी में डुब जाते थे (तैरते थे) उस सरोवर के इतने दुर्दिन आ गये है कि वहां छोटे छोटे पक्षी भी प्यासे मर रहे है।

मन चाह्या मोती चुग्या, वधी प्रीत विख्यात।
सूखै सरवर हंसलो, रह्यो हुतौ इक रात।।
इस सूखे सरोवर में कभी एक रात रूका था जहाँ हंस ने मनचाहे मोती का चारा चुगा था, और सरोवर से खुब आत्मीय प्रेम किया था।

हंस ने मानसरोवर को छोड़ दिया है। अर्थात् किसी गुणीजन के वहां से प्रतिभा का पलायन हुआ है। तो कवि आश्चर्य चकित होकर पुछता है।

मोती चुगणा मनसमा, सुख झाझौ नह साल।
सो तज दीधा मांनसर, हंसा किसौ हवाल।।
मोती चुगने के लिये पर्याप्त है, वह सुख वैभव की कमीं भी तुझे अखर नहीं रही है। उस सुख वैभव से भरे मानसरोवर को हे हंस !तुमने क्यों छोड़ दिया।

तो कवि को दुसरे दोहे में उसका जवाब मिलता है।

विण सोभा दीसै बुरा, मांनसरोवर मित्त।
हंस गया बुगला रह्या, थया अचंभा चित्त।।
बिना मानसरोवर के आवाभगत और आदर सत्कार के, हंस को बुरा लग रहा है। हंसों का सरोवर से लगातार पलायन हो रहा है। और अब सिर्फ बगुले ही बचे है। बहुत ही आश्चर्य और दु:ख हो रहा है।

मालै चुगता मोतियां, मुधरै बोल मराल।
सोय इजाफो मानसर, तो सम कीना ताल।।
मोती चुगते हुए मधुर स्वर में मराल बोल रहे है। हे तालाब तेरे तट पर विश्राम कर के हंसों ने तेरी श्री वृद्धि कर दी है तेरी शोभा में चार चांद लगा दिए है।

हंस और मानसरोवर के दोहों के साथ साथ हंस और तरूवर के दोहै भी राजस्थानी भाषा में पाये जाते है। पंछी जब तरुवर पर बैठता है तो तरूवर हिल जाता है या डगमगा जाता है। कहने का मतलब आश्रयदाता को अच्छा नहीं लगता आगंतुकों का आना। तब (हंस)पक्षी रूपी आगंतुक क्या कहते है जरा आप भी सुनें।

डिगै मती रे तरवरां, मन में रहे सधीर।
पाव पलक रो बैठणौ, घड़ी पलक रो सीर।।
हे तरूवर तू डगमगा मत अपने मन में धैर्य रख हम पल दो पल के पाहुन है यहाँ पर और घड़ी दो घड़ी ही हमारा और आप का सानिध्य है।

तब हंस को तरूवर जवाब देता है कि हे हंसा तू जो मुझे समझ रहा है वह नहीं हूं। तेरा भार वहन करने की क्षमता हे हंसा मुझमें नहीं है।

म्है तो हंसा इरंड हां, बिट्टा पन मत देख।
भार खिमै सिर आपरै, दूजा तरवर देख।।
हे हंसा ! मैं तो अरण्डी का तरू हुं। बडे बडे पात देखकर ऐसा मत समझ कि मैं तुम्हारा भार झेल पाऊँगा। तुम्हारा भार वहन करने.की क्षमता रखे ऐसे दुसरे वृक्ष को जाकर खोज।

जंगल में दावानल प्रज्वलित हो उठा। सारा जंगल धू धू करता अग्नि की लपटों में समाहित हो भस्म होने लगा। चंदन का वृक्ष जिस पर कई हंसों नें अपना डेरा बना रखा था वह भी जलने लगा। लोक कवि चंदन के वृक्ष की उक्ति के स्वरूप में कहते है।

आग लगी नवखंड़ में, दाझ्या चंदण वंस।
हम तौ दाझत पंख विण, तू क्यूं दाझूं हंस।।
चंदन का वृक्ष कहता है। समस्त जंगल में आग लग गई है। सारे चंदन और बांसवन के वृक्ष जल रहे है। हम तो बिना पंख के ही जल रहे है तरूवर होने से पलायन नहीं कर सकते पर हे हंस! तू फिजूल में क्यूं अपने आप को आग में झोंक रहा है।

तब वह हंस जवाब देता है।

पांन मरोड्या रस पिया, बैठा इक इक ड़ाल़।
आप जल़ो में उड़ चलूं, जिणौ कितौक काल़।।
हे तरुवर !तुम्हारे पत्तों को आप की हर एक डाल पर बैठकर खूब मरोड़ा है और आप के फलों का खूब रस पिया है। अभी आप जल रहे हो और मैं उड़ जाऊँ यह अच्छी बात नहीं हमें कितना जीना है। मैं मुसीबत की इस वेला में आप का साथ हरगिज़ नहीं छोड़ना चाहता।

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *