रंग रे दोहा रंग – हंस और काग

हंस को प्राचीन काव्य में, खास कर लोक साहित्य में खुब महिमान्वित किया गया है। हंस को आत्मा के प्रतीक रूप में भी कई संत कवियों ने प्रयुक्त किया गया है। पुराने जमाने में साधु संतो फकीरों और दिव्यगुणों से युक्त औलिया पुरूषों के आगे परमहंस बिरूद लगाया जाता था। जैसे कि रामकृष्ण परमहंस। आज भी बड़े बड़े संत महात्मा और महामंडलेश्वर अपने आगे परमहंस का बिरूद लगाते हुए आप को मिल जाएगें।

हंस के संबोधनी-काव्य दोहा, अन्योक्तियां, प्राचीन भजन, संस्कृत सुभाषित आदि से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है। हंस में नीर क्षीर को परखने की द्रष्टि है, कला है, जो उसे अन्य पक्षीयों से अलग करती है। हंस मां सरस्वती का वाहन है। कवि नाथू सिंह महियारिया ने अपने ग्रंथ “वीर सतसई” में हंस जो कि सदैव मोती का चारा चुगता है उस को आधार बनाकर सरस्वती की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करी है। दोहा कुछ यूं है।

सुरपति वाहण तरु भखै, नरपति वाहण नाज।
तौ वाहण मोती चुगै, थूं सारां सिरताज।।
सुरपति यानी देवराज इन्द्र का वाहन ऐरावत हाथी है जो तरूवर के पत्ते डाली या फल आदि का भोजन करता है। नरपति यानी राजा का वाहन अश्व है जो अनाज का आहार करता है। पर हे मां शारदे! आप का वाहन तो मानसरोवर का मराल है जो सदैव मोती का चारा चुगता रहता है। अगर आप का वाहन मराल श्रेष्ठ गुणों से युक्त है इस लिए ही आप सब में श्रेष्ठतम है।

ऊजल़ गत ऊजल़ वरण, ऊजल चूण चुगंत।
ता हंसा सूं मानसर, तूं शोभा पावंत।।
कवि कहता है जो उज्जवल(बेदाग) रहन सहन वाला है, उच्च वर्ण यानी की कुलीन है, और जिस का आहार और आचार व्यवहार उच्च है, ऐसे हंसों से हे मानसरोवर तू सदैव तेरी शोभायमान रहेगा।

यह बात ठीक है, पर मानसरोवर की भी महत्ता लेशमात्र भी कम नहीं है तभी तो कवि मान सरोवर की महत्ता में कसीदे पढता है। कैसे मानसरोवर को हंस पसंद करता है आप भी देखें जरा,

लंबा चौड़ा जल़ प्रबल़, एहा समद अपार।
मोती औ हिज मानसर, हंसा पूरणहार।।
जो विशाल लंबा चौड़ा और अथाह जलराशि को समेटे हुए हो वही मानसरोवर हंसों को मोती का चारा उपलब्ध करवा सकता है। अन्य कि औकात नहीं है कि वह गुणग्राही हंसो की मेज़बानी कर के उन्हे मोती का चारा खिलाए।

ऊंडा समद अनेक, मोती खावण ना मिल़ै।
हंसावाल़ो हेक, मानसरोवर मोतिया।।
कवि मोतिया नाम के व्यक्ति को संबोधित कहकर सोरठे में कहता है। हे मोतिया! संसार में अथाह जलराशि लिए बहुत से समंदर तुझे मिल जाएगें पर मोती खाने के लिए उपलब्ध कहाँ है उन में। हंसो को मोती का चुगा उपलब्ध करवाने वाला मानसरोवर तो संसार में एक ही है।

हंस पर मेरा खुद का लिखा सोरठा देखें।

हंसा उड़ै हमेस, मानसरोवर पथ गमन।
लघु सर रुकै न लेस, क्रोड़ कमल़ लख कालिया।।
कवि काल़िया नाम के व्यक्ति को संबोधित करके कहता है। हे काल़िया! हंस हमेशा अपनी मंजिल मानसरोवर की और अग्रसर रहते हुए सदैव उडता रहता है। वह छोटे छोटे तालाब, पोखरों में भले ही करोडों कमल क्यों न देख ले रूकता नहीं है। कहने का मतलब है जिनका लक्ष्य उंचा हो उन्हे छोटे मोटे प्रलोभन प्रभावित नहीं कर सकते।

जल़ में खोजो हंसला!, तल़ री करो तपास।
मझ समदर मोती मिल़े, तट पर बैठां घास।
कवि हंस को भी कहता है कि हे हंस आप यत्न करते रहो और जल में ढूंढों आप उसमें गहराई में देखते रहो, सदैव प्रयत्नशील रहो। ऐसा करने पर ही आप को समंदर से मोती मिलेंगे। वरना तट पर बैठने पर तो घास फूस के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा।

जद तांई जल़ जोर ह्वे, सरवर थारी पूछ।
पींदो ठाली देखतां, करसी पंछी कूच।।
कवि कहता है हे सरोवर जब तलक तुम्हारे पास अथाह जलराशि का भंडार भरा रहेगा तब तलक ही तुम्हारा बोलबाला रहेगा, जलराशि खत्म होते ही पंछी उड जाएगे।

सरवर हंस न मिंत कर, जे चुण ऊडी जाय।
पदमण सूं कर प्रीतड़ी, जल़ सूख्यां कुमल़ाय।।
कवि सरोवर को सलाह मशविरा देते हुए कहता है। “हे सरोवर तू हस के साथ दोसती मत कर जो मोती का चुग्गा चुग कर उड़ जाएगा। इससे बेहतर कुमुदिनी (कमलिनी/या कमल)से तुम्हारी प्रीति श्रेयस्कर रहेगी जो अंत तक तुम्हारे साथ रहेगी। तुम्हारी जलराशि सूख जाने पर भी तुम्हारा साथ नहीं छोडेगी।

सरवर सूनो देखकर, पंछी उड़ग्या सट्ट।
दूख में साथीडा केई, विरला झाले वट्ट।।
सुना सरोवर देखकर पंछी उस सरोवर को छोड कर.एक के बाद एक जाने लगे। दु:ख की बेला में विरले ही सहभागी होते है। सुख के सब साथी होते है किंतु दुख में कोई सहभागी नहीं होता।

हंसा तो तब लग चुगै, जब लग देखै लाग।
लाग विहुणा जै चुगै, हंस नहीं वे काग।।
हंस तो तब तक ही चुगता है जब तक सरोवर उसके साथ स्नेह सौहार्द रखता है। अगर सरोवर के स्नेह सौहार्द में कमी आने पर भी अगर कोई हंस सरोवर को अपना आश्रय स्थान बनाकर मोती चुगता है तो उसको हंस नहीं काग समझना चाहिए।

मोथा मगरीजै मती, कागा ऊँचौ बैठ।
हंसौ थूं होसी नहीं, जिण री उँची पैठ।।
कवि कहता है हे मूर्ख कौए ऊँचाई पर बैठ कर इतना घमंड मत कर। चाहे तु कितनी हीं ऊँचाई पर क्यों न बैठ जाए हंस नहीं बन सकता।

कागा चाल कुचाल, कर मिजल़स बैठै कनै।
हंसा आप सुचाल, छोड़ै कदै न छोटिया।।
कवि छोटिया नामक व्यक्ति को संबोधित करके कहता है। हे छोटिया! सारे कौए मिलकर सभा भर के कितनी ही कुचाल क्यों न चलें, हंस अपने मूल पथ से कभी भी विचलित नहीं होते।

नीर खीर रो न्याव, हंसा बिन कहो कुण करै।
कागा लागै दाव, पख कादै चुंचां भरै।
नीर क्षीर का विवेक हंस बिना कौन कर सकता है। अगर उनकी जगह कौओं को कहैंगे तो वह पक्षापक्षी करेंगे और चंचु प्रहार करेंगे। हंस जैसा नीर क्षीर विवेक कौओं के पास कहाँ?

हंसा ! काग पढाय के, कोरी किसत करीह।
आखर कूडै जायकै, मैले चांच भरीह।।
हे हंस तुने काग को ज्ञान प्रदान करके निरी मूर्खता ही करी है। देख!आखिर में उसने अपनी चंचु गंदगी और विष्ठा से भर दी। उसे ज्ञान देना बेमतलब रहा।

हंसा! तूं हठ छोड दै, अब ना चाल चलैह।
इण सरवर परधानगी, कागा अब्ब करैह।।
हे! हंस अब तू जिद छोड़ दे अब तेरी एक भी चाल चलने वाली नहीं है। इस सरोवर.में अब कौए व्यवस्थापक की भूमिका का निर्वहन करते है।

कागां सीख न लागजे, हंसा! राखी टेक।
ऐ सर री मरज़ाद नें, तूं ही जाणै एक।।
कवि हंस को संबोधित करके कहता है। हे हंस तू कौए की सीख को ग्रहण मत करना और अपनी प्रतिज्ञा पे अड़िग रहना। इस सरोवर की मर्यादा का केवल से हंस तुझे ही पता है। दूसरों के बहकावे में मत आना।

हंसा था सो उड़ गया, कागा भया दिवान।
जा बामण घर आपणै, सीं कैरा जजमान।।
कवि कहता है, हंस था सो तो चला गया अब तो कौए दीवान बन गये है। (योग्य शाशक गुजर गये या उनका राज्य क्षय हो गया हे, नव शाशक गुण पारखी नहीं है)हे ब्राह्मण तू अपने घर की तरफ प्रयाण कर अब यजमान में वह गुणग्राहकता कहाँ।

हाड़ां हाड़ां कुचरतौ, मत ना भटकै नीच।
हठ राख्यां हंसा मिल़ै, मोतीड़ा जग बीच।।
हे नीच जीव हड्डीयों, हड्डीयों को कुचरते हुए भटका मत कर। जो हंस हठी, द्रढ प्रतिज्ञ या अपने प्रण में अड़िग होते है मोती उन्हीं को जगत में प्राप्त होते है।

बैठा हंसा ठौड़ बक, कोयल जागा काग।
रह्या तरोवर झंखरा, भलौ सरोवर भाग।।
हंस की जगह बगुलों नें.लेली है। जहाँ कोकिल पंचम स्वर में गाती थी.वह जगह कर्कश स्वर के कौए बैठ गये है। अब बडे तरुवर की जगह झाड़ झंखाड़ ही बचे हे। इस सरोवर की नियति में यही लिखा था क्या?

हंस कहै रे डेडरा, सायर लहर न दिट्ठ।
ज्यां नाल़ेर न चक्खिया, (त्यां)काचरिया ही मिट्ठ।।
हंस मेंढक से कहता है। “अरे मेंढक तूनें समुद्र की लहरों को नहीं देखा है। जिसने नारियल न चक्खा हो उसको.तो काचरिया जैसे क्षुद्र फल ही मधुर लगेंगे। कूपमडूप द्रष्टि के लोगों को इंगित करते हुए कितना शानदार दोहा है यह।

क्रमश:

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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