रंग रे दोहा रंग – जोगमाया को रंग

शक्ति की भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्र अपने चरम पर है। और अभी अभी ही फागुन और बसंत बीता है। लगता है फागुन के पलाश का रंग हमारे तन मन से अभी उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। जैसा कि पहले ही बता चुका हूं। राजस्थानी दोहा साहित्य में रंग के दोहों की एक भव्य परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी आप किसी सुदूर थली थार के रेगिस्तान में गांव, चौपाल, ढाणी आदि के सुबह सुबह के मेल मिलाप (रेयाण)आदि में आप को ढूंढने पर जरूर दिखाई पडेगी।

आजकल तो अफिम को एक मादक द्रव्य और सेहत के लिए हानिकारक समझकर प्रतिबंधित कर दिया गया है (और होना भी चाहिए)। पर इसी अमल-कसुम्बा की परंपरा में अमल के साथ साथ साहित्य और ज्ञान चर्चा के साथ रंग के दोहे कहे जाते थे। अफिम पिलाने वाला अपने स्नेही, संबंधी और मित्र को अपने हाथों की अंजुलि भर अफीम की मनुहार करता था और अफीम की मनुहार को स्वीकार करने वाला उस में से कुछ छीटैं उंगली से बाहर डालते हुए अफिम की प्रशंशा के साथ साथ अपने इष्ट देवता, शिव, सूर्य, विविध लोक देवता, राजस्थान के सूरमाऔ कि जो मातृभूमि के हेतु कुरबान हुए आदि के बिरूद में परंपरागत तरीके से बोले जाते थे या कवियों द्वारा लिखे जाते थे।

पारवती रा पूत नें, नमन करै सब देस।
अमलां वेल़ा आप नें, गाढा रंग गणेस।।
पार्वती के पुत्र को समस्त देश नमन करता है। अफीम.की मिजलिस की इस सुंदर बेला में हे गणेश आप को रंग है।

घमकै पावां घूघरा, डेरू हाथ डलाय।
चामंड वाल़ा चेलका, रँग हो खेतल राय।।
जिसके पाँवों में घूंघरू घमक रहा है और जो हाथों से डमरू बजा रहे है, ऐसे मां चामुंड़ा के पट्ट शिष्य क्षेत्रपाल या भैरव को रंग है।

रैण प्रभातां नित रमै, असुरां भीड़ण अंग।
अमलां वेल़ा आप नें, राजा सूरज रंग।।
आसुरी शक्तियों (नकारात्मक) से युद्ध हेतु रात्रि और दिवस जो सदैव उद्धत रहते है, ऐसे सूर्य नारायण भगवान को अमल की इस बेला में रंग है।

कीध खयंकर लंक रो, जीत भयंकर जंग।
अमल लियंकर आप ने, रघुवर किंकर रंग।।
लंका को भयंकर जंग लडकर जिसने तहस नहस कर दिया ऐसे रघुवर किंकर हनुमान को अमल की इस बेला में रंग है।

कुल़ रावण रो खय कियौ, सुर नर नाग सनाथ।
तौने नृप दशरथ तणा, रंग रंग रघुनाथ।।
रावण के कुल का नाश किया और देवताओं, मनुष्यों और नागों को सनाथ करने वाले दशरथ-तनय प्रभु श्री राम आप को रंग है। आप को साधुवाद है।

मेघनाथ नें मारियौ, सर सूं वेध सधीर।
रंग हो भाई राम रा, वंका लिछमण वीर।।
जिसने अपने बाणों से बिंध कर मेघनाद को मार गिराया ऐसे श्री राम के भाई महाभड वीर लक्षमण को रंग है।

सोहे मुद्रा सोवणी, मुगट जटा सिर माथ।
अमर नाम धर ऊपरां, रँग नित गोरख नाथ।।
जो सुहानी मुद्रा से शुशोभित है जिनके मस्तक पर मुकुट और जटा विद्यमान है, जिसका नाम इस धरती पर अजरामर है ऐसे गुरु गोरखनाथ को रंग है।

राजस्थान, गुजरात और सिंध में “रंग देना” मुहावरे का मतलब बिरूदाना होता है। और इस तरह के दोहे आज भी प्रासंगिक और इतने भव्य है कि पाठक/श्रोता सिर धुने बिना रह ही नहीं सकता। आज नवरात्रि के इस पावन पर्व पर क्यों न देवी को रंग दिया जाए (बिरूदाया जाए)?

तौ सरणै खटव्रन तणी, लोहड़ियाल़ी लाज।
आवड़ करनी आप नें, रँग इधका महाराज।
तुम्हारे शरण में ही समस्त समाज और वर्ण की हे लोहड़ियाली (लाल रंग की उन से बुनी हुई कंबल जो सामान्यतः चारण देवियां धारण करती है) लाज है। हे मां आवड़ (करनी मां की इष्ट देवी), हे मां करनी आप को खुब खुब रंग है।

रिध सिध देवण रैणवां, कवियां सारण काज।
अमलां वेल़ां आप नें, रँग करनी महाराज।।
कवियों को रिद्धि सिद्धि प्रदान करने वाली और कवियों के समस्त कार्य को सुखद अंजाम तक पहूँचाने वाली हे देवी करनीजी महाराज अमल की इस बेला में आप को रंग है।

नाम लेय नामी भयी, जग बाजी जगदंब।
उण करनल री इष्ट जो, वा वड़ आवड़ रंग।।
हम सब को पता है करनीजी महाराज आवड़ माता की उपासिका थी। आवड़ मां के नामस्मरण की माला मां करनी नें इतनी फेरी की वह जगत में जगजननी और जगदंबा के बिरूद से पहचानी गई। ऐसी श्री करनी जी महाराज की इष्टदेवी आवड़ माता को रंग है।

लोवड़ सूर लुकावियौ, भाई डसत भुजंग।
खरी खोड़ली री बहन, मावड़ आवड़ रंग।।
जिसनें अपने भाई महिरख को सर्पदंश हुआ उस वक्त सूर्य को अपनी लोवड़ी (लाल ऊन से बुनी ओढनी) मे छुपाकर सवा प्रहर तक सूर्य को रोक कर रखा था ताकि उनकी छोटी बहन खोड़ियार पाताल से अमृत लेकर सूर्योदय से पहले वापस आ जाए, ऐसी मां आवड़ को रंग है।

कटक जिमायौ कुल्लड़ी, सेखा दल़ बल़ संग।
उण करनल री इष्ट जो, वा वड़ आवड़ रंग।।
जिस करनी मां ने राव शेखा की फौज को बालिका के स्वरूप में एक कुलड़ी (मिट्टी का छोटा पात्र) में भोजन पकाकर जिमाया था उन की इष्ट देवी मां आवड़ को रंग है।

जबर जितायौ जैतसी, कामर सूं कर जंग।
उण करनल री इष्ट जो, वा वड़ आवड़ रंग।।
बीकानेर के शाशक राव जैतसी को हुमायु के भाई कामरान मिर्जा से युद्ध में कम संसाधन होने के विपरीत युद्ध में विजेता बनाने वाली करनी मां की इष्टदेवी मां आवड़ को रंग है।

सेखौ लाई सिंध सूं, बण ने चील विहंग।
उण करनल री इष्ट जो, वा वड़ आवड़ रंग।।
राव शेखा मुलतान में विधर्मीयों द्वारा कैद कर लिया गया उस वक्त चील पक्षी का स्वरूप धारण कर राव शेखा को अपनी पीठ पर बिठाकर सकुशल वापस लेकर आने वाली मां करनी की इष्टदेवी मां आवड़ को रंग है।

छपन क्रोड नवलाख अर, चौरासी मझ अंग।
वा विराट वपु धारिणी, आवड़ मावड़ रंग।।
जो अपने शरीर में छप्पन करोड़ चामुंडा, नवलाख लोवड़ियाल और चौरासी चारणीयों को समेटे हुए है, उस विराट स्वरूपा भगवती आवड़ मां को रंग है।

जिण नें सब जग में नमै, दुखिया दीन दबंग।
तखत तेमड़ै जो तपै, वा वड़ आवड़ रंग।।
जिसको संसार के दीन दु:खी और दबंग सभी वंदन करते है, जिसके चरणों में शीश झुकाते है, उस जैसलमेर में तेमडे पर्वत पर बैठने वाली तप रत तपस्वीनी आवड़ मां को रंग है।

भले गुंथियौ भेल़ियो, भेल़ा वणै भुजंग।
जिण नें धारणि आवड़ा, मावड़ नें घण रंग।।
हे मां आप साँपों से बुना भेल़िया (काली ऊन से बुना वस्त्र जिसे चारण देवियां धारण करती है) खुद ही बुनकर धारण करती हो, आप को रंग है।

सात सिंह रथ स्वार हुई, चाबुक करै भुजंग।
हुंकारै खल़दल़ हणण, वा वड़ आवड़ रंग।।
जो स्वयं सात सिंहों से सुसज्जित रथ पर आरूढ होकर दैत्य दल का संहार करने हेतु उसको भुजंग की चाबुक बनाकर स्व्यं हांक रही है उस आवड़ मां को रंग है।

असि वाहे अरि रो कियौ, अंबर ढग उतबंग।
वा बैरी दल़ बाढणी, मावड़ आवड़ रंग।।
जिसने तलवार का प्रहार कर दुश्मनो के मस्तकों का अंबार आकाश तक उँचा लगा दिया है। उस वैरीयों के दलबल को नष्ट करने वाली मां आवड़ को रंग है।

जहरीला झाझा रखै, भेल़ा क्रोड भुजंग।
दैत दल़ां ने डारवा, वा वड़ आवड़ रंग।।
जो दैत्य समूह को दबानें और डराने हेतु अपने पास सदैव करोड़ जहरीले भुजंगो को रखती है उस मां आवड़ को रंग है।

जद हुंकारे जोगणी, ध्वनि जिम कोटिक भृंग।
असि तोलर अरियां हणण, मावड़ आवड़ रंग।।
जब वह खड़ग तोलकर शत्रुऔं को हनने हेतु हुंकार करती है तो करोड़ भँवरे जैसे गुंजारव करते हो ऐसी ध्वनि सुनाई पड़ती है। ऐसी मां आवड़ को रंग है।

खल़ बल़ दल़ खंडण करण, किय सिंह जीन तंग।
वा विराट वपु आवड़ा, मावड़ नें घण रंग।।
दुष्ट दैत्यों के दल बल को खंडित करने हेतु जिसने अपने सिंह की जीन को तंग किया है। उस विराट वपुधारिणी आवड़ मां को रंग है।

मानव, किन्नर, जक्ष सुर, कीटक पसु विहंग।
प्राणी मात्र नें पाल़णीं, मावड़ आवड़ रंग।।
मानव, किन्नर, यक्ष, देवता, कीटक, पशु और विहग सभी योनि धारित प्राणीयों का पालन पोषण करने वाली मां आवड़ को रंग है।

आखै नरपत आसिया, चारण री अवलंब।
जोगण जय जय आप री, आवड़ मां लख रंग।।
नरपत आसिया कहता है कि हे चारणों की एक मात्र अवलंबन मां आवड़ आप की सदैव जय जय कार हो। आप को लाखों रंग है।

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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