वीरदास टाल़ कीं मांगलो!!

खरी अर खारी बात हर कोई नै हजम होवणी दोरी है। पछै राज रै धणी नै तो अंकैई सहन नीं होवै कै कोई उणनै खरी बात कैवण री हिम्मत करे, अर जे कोई हिम्मत कर र कैय ई देवै तो उणनै कैद री कोठरी में नांखता जेज नीं लागै।

ऐड़ो ई एक किस्सो है साच कैवण अर नीं सुणण रो।

जैसल़मेर माथै महारावल़ हरराजजी राज करै। कवियां रै कदमां में बिछणियो नरेश। जिणां रै ऐ आखर आज ई अमर है कै-

जावै गढ राज भलांई जावो,
राज गयां नह सोच रती।
गजब ढहै कवराज गयां सूं,
पल़टै मत बण छत्रपती।।

इणी अपणास रै पाण हरराजजी रै दरबार में एक सूं बधर एक कवेसर रैता, जिणां रो अवदान राजस्थानी साहित्य पेटे आज ई अविस्मरणीय है। इणां में एक नाम जैन कवि कुशल़लाभजी रो ई है। जिणां री अनेक पोथ्यां आपांरै साहित्य री अमोल हेमाणी है। उलेख्य है कै कुशल़लाभजी मूलतः सिरूवै रा रतनू कुशलदान हा, जिणां घरेलु परस्थितियां वश जैन पंथ अपणाय मुनि कुशल़लाभ नाम धारण कियो पण हरराजजी रै मन में इणां रै प्रति वो ई आदर रैयो।

ऐड़ै उदारमना नरेश वीठू रंगरेला री कीकर अणदेखी की समझ में नीं आवै? आगै कीं बतावूं उणसूं पैला कवि रंगरेला री थोड़ी ओल़खाण दैणी ठीक रैसी।

गांम सांगड़ (जैसल़मेर) वीठू सांगड़ / सांगट नै जगमालजी राठौड़ रो दियो गांम है।
इणी गांम में कवि वीरदास वीठू रो जनम होयो तो इणी गांम में वीठू हरसूरजी रो जनम ई होयो। जिणां रै विषय में चावो है कै वे कवि रै साथै-साथै तांत्रिक ई हा। उणां री तंत्र विद्या सूं तंग आय एक गांगै/गांगलै नाम रो भूत कनौज जाय किणी सेठाणी में प्रवेश करग्यो अर निरभै होय कैवतो-

सांगड़-बांगड़ कोटड़ो, अल़गै दूर थयाह।
कांई करै हरसूरियो, (म्हे तो)कोट कनौज अयाह।।

सेठ उठै रै तांत्रिकां सूं घणाई कल़ाप किया पण वो निकल़ियो नीं। सेवट किणी कैयो कै ओ जिकै गांमां रा नाम लेय कैय रैयो है उठै जाय उण हरसूर नै लायो जावै।

सेठ घूमतो-घूमतो अर पूछतो-ताछतो सेवट सांगड़ आय हरसूरजी सूं मिलियो अर आफत निवारण रो कैयो। जणै हरसूरजी कैयो कै “म्हारै हालण री जरूरत ई नीं है तूं तो म्है एक दूहो लिखर देय रैयो हूं बो जद ऊवो दूहो बोलै, जणै तूं म्हारै वाल़ो दूहो सुणा दीजै। बो नैड़ो ई नीं ठैरैला।”

सेठ पाछो गयो अर भूत कैयो-
सांगड़…………

ओ दूहो सुण सेठ सुणायो कै-

धीरै-धीरै गांगला, धीरै पाव धरैह।
ओ आयो हरसूरियो, कुप्पड़ कंध करैह।।

इतरो सुणतां ई भूत गांगलो सेठाणी सूं निकल़ नाठो।

ऐ हरसूरजी गीत विधा रा सिद्धहस्त कवेसर हा जिणां रै विषय में चावो है-

कवित्ते अलू दूहे करमाणंद,
पात ईसर विधा चो पूर।
मेहो छंदै झूलणै मालो
सूर पदै गीतै हरसूर।।

केई लोग भ्रमवश इणां नै भाद्रेस रा तो केई उनीसवें सईकै में होया हरसूरजी भींयाड़ मानण री भूल कर लेवै। जदकै ऐ राव रिणमलजी रै समकालीन हा-

राव रिणमल रीति रायां ची,
सेनाउल़ि मेल़े सधर।
घायै तई उपाड़ै अरि-घड़,
घोड़ै जइयां करै घर।।

इणी सांगड़ गांम रै वासी वीठू वीरदास रो नाम तो चावो है पण उणांरै मा-बाप या किणी कौटुम्बिक जणै री कोई ओल़खाण कठै ई मिल़ै नीं पण प्रमाणिक रूप सूं आ बात जरूर मिल़ै कै कवि बीकानेर महाराजा रायसिंह, जैसल़मेर महारावल़ हरराजजी, सिरोही राव सुरताण अर जाल़ोर नवाब कमालखां बिहारी रै समकालीन हा।

कांई कारण हो, ओ तो कोई सुणण नै नीं मिलियो पण उणां जैसलमेर अर धाट क्षेत्र माथै खरी अर खारी बातां कैवण में पाछ नीं राखी। कैयो जावै कै वां जैसल़मेर महारावल़ हरराजजी नै एक गीत सुणायो जिणमें इणां कैयो कै – “सरस्वती, इंद्र, कुबेर, अर सूरज कनै ई नीं है जिकी चीज आपरै गुढै है!!”

आ सुण एकर तो रावल़जी री रीस कीं बुझी पण दूजै ई क्षण उणांनै उठै विराजिए किणी कवि कैयो कै- “हुकम सरस्वती कनै विद्या है, आप कनै अज्ञान है, इंद्र कनै मेह है आप कनै अनावृष्टि है, कुबेर कनै धन है आप धनहीन हो, सूरज कनै उजास है आप कनै अंधारो है!! आ बात वीरदास जी आपनै कैय रैया है।”

आ सुण पैला ई रीसायोड़ां रावल़जी, वीरदास वीठू नै कैद कियो।

जद वि.सं.1649 में महाराजा रायसिहजी जैसल़मेर रावल़ हरराजजी री कुंवरी गंगा साथै ब्याव करण आया। जान होल़ै -होल़ै गाजां-बाजां सागै आगै बढ रैयी ही। ढोली गीत गावै हो-

राजा रायांसिंघ ओ, दुनी सिरै दातार।
जोवो दूजो जैतसी, लाखां बगसणहार।।

घड़ी -घड़ी इण दूहै नै गावता ढोली आगै बैय रैया हा। दूहो सुण वीरदास नै झूंझल़ आई। उणां आपरै साथै कैदी हा उणांनै कैयो कै –
“कीकर ई भीत तक म्हनै ऊंचो करो जको हूं थांनै आज छोडावूं।”

कैदियां आपरै बुद्धबल़ सूं वीरदास नै ऊंचो कियो। कवि आपरी ओजस्वी वाणी में गीत पढियो कै –
“अरे गायबी क्यूं कूड़ो गीत गाय रैयो है ? ओ रायसिंह तो करोड़ां रो बगसणहार है! इणनै लाख देवतां तो लाज आवै-

राजा असपत गजपत जे रासा,
छत्र छिलंतो छाजै।
कोड़ां बगसणहार कलावत,
लाख दियंतो लाजै!!

सबद-पारखी रायसिंहजी रै कानां ऐ आखर पड़िया अर राजाजी हाथी ठंभायो अर पूछियो ओ कवेसर कुण? अर अठै इयां कीकर?

लोगां अरज करी हुकम – “ओ सांगड़ रो वीठू वीरदास है।”

आ सुण महाराजा कैयो-
“वीठू! अठै कीकर? कैदी लागै ओ तो!!”

“हां हुकम ! रावल़जी इणनै कैद कियो।” किणी कैयो अर जान आगै बहीर होई।

फेरा होया अर वींद तोरण-तिणी झालण रो नेग कियो। सासू रीत मुजब घोल़ां की अर मांगण रो कैयो जद रावल़जी कैयो कै-“वीरदास टाल़ कीं मांगलो! म्हारी सरदा मुजब देसूं पण ओ मत मांगिया। ओ मांगियां आपां दोनां रो माजनो जासी! इणनै हूं नीं छोडूं।”

रायसिंहजी कैयो – “हूं तो ओ ईज मांगूं! इणनै नीं छोडै, जिणनै म्हारी तरवारां झालणी पड़सी। जे आप साम्हीं तरवार काढणी ईज चावो तो आपरी मरजी। वीरदास तो छूटसी।”

रायसिंहजी रा ऐ आकरा बोल सुण रावल़जी रा खांचा ढीला पड़ग्या अर कैयो – “बेटी जाई रै जगन्नाथ, जिणरा हेठा आया हाथ!” अर अजेज वीरदास नै छोड दियो गयो। दयाल़दासजी आपरी ख्यात में लिखे-
“अरूं रायसिंघ गुणचासै जैसल़मेर परणिया वीठू रंगरेले नूं छोडाय बीकानेर लाया तथा लाख पसाव दीना।”

कवि आय महाराजा बीकानेर नै मुजरो कियो। प्रभात रा रैयाण होई जिणमें दरबार आढा दुरसा, लक्खा बारहठ, सांइया झूला, जाडा मेहडू आद कवेसरां नै हाथी इनायत किया। उठै कवि वीरदास एक गीत पढियो जिणरो भाव ओ हो कै – “दाल़द भगवान कनै जाय रोयो कै म्हनै पताल़ में बलि, सुरग में कर्ण अर म्रितलोक में रायसिंह ठैरण नीं देवै ! पछै हूं कठै रैवू़? जणै ईश्वर कैयो कै तूं रायसिंह रा वैरी है, उणांरै घरै जाय रैवास कर” –

पताल़ तठै बलि रहण न पाऊं,
रिध मांडै स्रग करन रहै।
मो म्रितलोक रायसीं मारै,
कठै रहूं हरि दल़द कहै?
—-
घर अरि रायांसिंघ घातिया,
कुरिंध तठै जाइ वास करि!!

कवि कैयो कै – “हे रायसिंह तैं जिकी दातारगी री वेल बोई है उणरा नाल़ तो मेरू, समंद आद नै उलांग नवखंडां में पसरग्या” –

मेर उलँघ नै दध उलँघ, उलँघ दसूं दिगपाल़।
रासा कीरत वेलरा, नवखंड पसर्या नाल़!!

वाह ! कवेसर वाह!! कवि आगै कैयो कै – हे रायसिंह ! जिण कवियां रै घरै बांधण नै बकरी नीं ही, उणांनै तैं हाथीबंध कर दिया-

रायांसिंघ नां जच्चियो, पाधर रो पतसाह।
जिण घर अजा न बंधती, सो गजबंध कियाह!!

बापो ! कवेसर बापो!! वंदन थांरी वाणी नै कैय रायसिंह कैयो कै “आप तो ‘जैसल़मेर रो जस’ सुणावो जिणनै सुण रावल़जी थां माथै रूठिया!!

आ सुण कवि कैयो कै – “हमे, वा रैवण तो हुकम!!”

नीं, म्हारो आदेश है !! रायसिंहजी कैयो तो कवि सुणावणो शुरू कियो –

मदासर पाखैय धोल़ाय माल़।
दुरब्बल भाटीय देस दुकाल़।
राती रिड़ थोहर मध्धम रूंख।
बिचोबिच बोलत धोड बैड़ूंख।
सुणी नह कोयल वाल़िय कूक।
टोल़ा मिल़ काग करंत टहूक।
भमै दिगपाल़ मरंताय भूख।
हलै हसतीय हुवै नहीं हूक।।

बापो! बापो!! देखी जैड़ी भाखी !! इणमें कूड़ कांई? रावल़जी आप माथै क्यूं रूठिया? कवि तो साची ई कैवैला, इणमें रीस री कांई बात? महाराजा कैयो तो साथै ई आदेश दियो कै हमे लगतै हाथां धाट रा थाट ई सुणा दिरावो। जणै कवि सुणावण लागो-

पदम्मण पाणिय लैण प्रभात।
रुल़ंतिय आवत आधिय रात।
विलक्खाय टाबर जोवत वाट।
धिनो धर धाट धिनो धर धाट!!

वाह वाह!!री झड़ी लागगी।

वीरदास नै महाराजा सांगड़ नीं जावण दिया अर बीकानेर ले आया। अठै इणांनै रैवण सारू गढ में घर दियो। कैयो जावै कै दरबार वीरदास सूं ‘जैसल़मेर रो जस‘ अर ‘धिनो धर धाट‘ रोजीनै सुणता। महाराणी गंगादे महाराजा री इण बात सूं चिढता। क्यूंकै जैसल़मेर वां री मातभोम अर धाट नानाणो। दोनां री नित निंदा सूं वे तंग आयग्या अर एक रात हाजरियां नै कैय वीरदास नै मांचै सैति चौतीणै कुए में खल़काय दिया। पण मारणिये सूं तारणियो मोटो होवै सो मांचो अधर ठैरग्यो। भखावटै कुवो तैंवणिया गया अर कोस उसारियो जद वीरदास कैयो-
“भाईड़ां मिनख रो काम है ! म्हनै सावल़ काढजो।”

एकर तो कुए वाल़ा डरग्या पण सेवट हिम्मत कर र काढिया तो देखियो कै बाजीसा वीरदासजी!! उणा़रै इचरज पार नीं रैयो अर पूछियो कै-
“आप कुए में कीकर?”

पण बाजीसा बात नै गिटग्या।
दिनूंगै रैयाण होई पण बाजीसा कैयो-
“हुकम म्हनै माफी देवो हूं आज ऐ कवितावां नीं सुणावूं तो साथै ई अरज करी-
“मनै रजा ई दिरावो कै म्है थोड़ा दिन गांमतरो कर आवूं!!”

“थांरै कैड़ो गांमतरो? गाय नको बच्छी अर नींद आवै अच्छी!! थांरै अठै कांई चाकरी में खलल पड़ी जको बीकानेर छोड दूजी जागा जावणो चावो?”
दरबार पूछियो जणै कवि कैयो-

जल़ ऊंडा थल़ ऊजला, पातां मैंगल पेस।
बल़िहारी उण देसड़ै, (जठै) रायांसिंघ नरेस!!

“पण तो ई म्हारो मन होयग्यो कै, देखणा सो भूलणा नीं। म्हनै रजा दिरावो।”

दरबार मन माडै रजा दी अर बेगा ई आवण री भोल़ालण दी।

कवि अठै सूं सिरोही राव सुरताण कनै गयो। जद सुरताण सुणियो कै वीठू वीरदास आयो तो उणांनै चिंता होई कै मोटो कवेसर जे पूगतो सनमान नीं दियो तो घर री काल़ी कर दैसी।

कांई करणो रैयो जितरै हाजरिये आय कैयो कै वीठू वीरदासजी हाजर होय रैया है।

वीरदास आय रावजी नै मुजरो कियो पण रावजी तो जाणै कोई मूंडै में जीब अर हाथां-पगां सत ई नीं है। सफा अबोला बैठा रैया। ना हां कैयी अर ना, ना कैयी!!

कवि समझग्यो कै रावजी पूगती दातारगी री हैसियत में नीं है। जणै उणां कैयो कै-
“हे सुरताण म्हनै ठाह है कै तैं अबार ई दुरसा आढा नै कोड़ पसाव कियो हो! जिणसूं थारो खजानो खाली है! म्हनै लागै ई दुरसै जैड़ै बिजनोल़ियै थारा आंतरा काढ लिया जिणसूं तूं बलहीण होयग्यो! ऊठण री आसंग नीं पड़ै-

कोड़ दई अतंस कढै, पिंड में रैयो न पाण।
दुरसै वीजू डंकियो, सो बैठो सुरताण!!

पण म्है तो मन देखूं धन नीं!! थारो मन ई मरग्यो तो ले थारी काठी राख सिरोही!! कैय वीरदास दरबार सूं मुड़ण लागा जितै रावजी उठिया अर कैयो “माफी कविवर माफी !! म्हारी भूल होई सो कबूल करूं। आजरै दिन म्हारै कनै आपनै देवण सारू फखत ओ सिरोही रो आसण है सो आप विराजो अर म्हनै मोटो करो।”

कवि सुरताण री इण उदारता सूं राजी होय कैयो – “सिरोही म्है पाई! आ, है जिकां नै सौभै!! म्हांनै नीं!! आ कैय राव सुरताण री दंताणी रै जुद्ध में बताई वीरता रा गीत सुणाया-

ईसरसी सादूल़ उभै उर,
रायांसिंघ जगमाल रत्ता।
कमधज एक एक केलपुरो,
आबू तल़ पौढिये इत्ता।।

राव सुरताण री वीरता अर उदारता विषयक कवि रा गीत मिले। वीजा हरराजोत जिको वडो तरवारियो हो अर रावजी सूं घणा खेटा किया। जिणनै रणांगण में राव सुरताण मार सिरोही में शांति थापी। कवि लिखै कै “सुरताण री ऐड़ी तरवार बुई जिणसूं उण वीजै रै शरीर रा दो भाग होयग्या जिको सदैव भोम मांगतो रैतो-

हरराजोत संग्राम हूवतां,
सोढ सुकर साहै सुजड़।
भांणा-तणै कीधा बेहूं भागै,
भोम मांगता जिकै भड़।।

यूं लागै कै वीठू वीरदास सिरोही घणा रैया होसी या अठै आवता-जावता रैया होसी क्यूंकै सिरोही राव अखेराज देवड़ा माथै रचित कवि रा गीत मिलै। कवि राव अखेराज रै काव्य प्रेम अर उणांरी वीरता नै बखाणतां लिखै-

आखर लिए दिए आघाहटां,
पातां कीजै रोर पखै।
मूंछां तणै लिए खल़ मूंछां,
आंकुरां आवते अखै।।

राव अखेराज सुरताण री वंश परंपरा में ईज हा अर इणां रो बखत घणो उथल़-पुथल़ रो रैयो। अखेराज इतियास में ‘उडणो अखेराज’ बाजतो। इणी राव अखेराज महेश आढा नै ऊंड अर खीमराज दधवाड़िया नै कासिंद्रो दियो-

संमत सोल़ निनाणवें, चैत दसम पख सुद्ध।
दियो ऊंड महेदास नै, अखमल पट्टो अवद्ध।।

इणरै आठ साल पछै खीमराज दधवाड़िया नै कासिंद्रो दियो-

संमत सत्तर सातो वरस, चैत सुदि चवद्दस।
का़यंद्रा कवि खेम नै, अखमल दियो अवस्स।।

इण सूं आपां कैय सकां कै वीरदास वीठू घणी ऊमर पाई अर आपरी प्रतिभा रो डंको बजायो। इणी बखत में वे शायद जाल़ोर री जात्रा करी होसी। जाल़ोर माथै जिण दिनां बिहारी मुसल़मानां रो शासन हो। नवाब गजनीखांन री वंश परंपरा में कमालखां होयो। कमालखां मन रो मोटो अर कविता रो प्रेमी नवाब हो। बात चालै कै इणी जात्रा में एक दिन वीरदास वीठू किणी कुए री पाटवाल़ माथै आपरा गाभा धोवै हा उणी दरम्यान कमालखां घोड़ै चढियो कुए आयो। कवि आपरी धुन में हो कोई ध्यान नीं दियो। कपड़ां माथै पड़ती थाप अर उछल़तै छांटां सूं घोड़ो चमकियो। इणसूं अर नवाब कानी ध्यान नीं देयर आपरी धुन में कपड़ा धोवतै कवि माथै नवाब नै रीस आयगी अर उण कवि नै तड़क र कैयो – “ऐ कुट्टण (धोबी) !! इतरो सुणतां ई कवि नै ई रीस आयगी अर नस बिनां ऊ़ची करियां कैयो – “कुट्टण तेरा बाप!!” अर ऊपर जोयो तो उणां नै नवाब निगै आयो! कवि रै तो जीब माथै सारदा ही। नवाब रीस में आपरी तरवार काढण हाथ पाधरो कियो जितै कवि कैयो कै – अरे कमालखां ! म्हनै कुट्टण कैय क्यूं लाजां मारै? बेटी रा बाप ! कुट्टण तो थारो बाप हो ! जिण लाहौर नै लूंटियो, सिरोही नै कूटी जिण भाद्राजण नै धोयो अर बाड़मेर नै पाधरो कियो!! इतरै शत्रुवां नै झूड़णियै बाप रो बेटो है तूं। थारै थपकारै सूं तो दुसमण संकित अर धरती धूजायमान है। पछै म्हनै कुट्टण मत कैय-

कुट्टण तेरा बाप, जिकै सिरोही कुट्टी।
कुट्टण तेरा बाप, जिकै लाहौरी लुट्टी।
कुट्टण तेरा बाप, जिकै बायड़गढ बोया।
कुट्टण तेरा बाप, जिकै धूबड़ा धबोया।
कूटिया प्रसण खागां किता, संकै अर धूजै धरा।
मो कूटण म कह कमालखां! तूं कूटण किणियागरा।।

कवि री अजस्र निकल़ती वाणी नै कमालखां सुणतो रैयो अर ज्यूं ई कवि छप्पय पूरो कियो अर कमालखां रै मूंडै सूं निकल़़ पड़ियो – “वाह कविवर वाह!! तुम तो रंग(खुशी) के रेले(धारा) हो!! कमाल है ! कठै सूं बात नै कठै पूगाय दी। वाह!!”

उण दिन पछै वीरदास वीठू ‘रंगरेले वीठू’ रै नाम सूं प्रसिद्धि पाई। साहित्यिक जगत उण दिन पछै कवि नै, कवि रै मूल़ नाम सूं नीं अपितु कमालखां रै प्रदत्त नाम सूं जाणण लागो। आज ई पांडुलिपियां में कवि री रचनावां माथै रंगरेला वीठू ई मिले न कि वीरदास।

जनकंठां में निवास करणिये कवि री रचनावां विषयक दो न्यारी-न्यारी धरणावां मिले। आधा कैवै कै-

रंगरेले विष रेल़ियो,
माडधरा रै मांह!

तो आधा इणां री बात नै नीं अंगेज र कैवै-

रंगरेले रंग रेल़ियो,
माडधरा रै मांह।

जको ई कियो पण कवि बिनां हिचक कियो। कवि री आपरी रचनावां में मेवाड़, ढूंढाड़, गोढवाड़ आद री सांस्कृतिक अर सामाजिक विकृतियां माथै बेबाकी सूं लिख्यो जिको आज ई जन कंठाग्र है।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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